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हमारे बारे में.

आज’ (१९२०)

संस्थापक - राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त

संस्थापना दिवस- ५ सितम्बर, १९२०

प्रेरणास्रोत

राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त ने ३० अप्रैल, १९१४ से शुरू हुई अपनी विदेश यात्रा के दौरान तीन महत्वपूर्ण अनुभव एकत्र किये-

(१) जहां-जहां वहगये, उन्होंने देखा कि वहां के लोग अपनी मातृभाषा अथवा अपने देश की भाषा में ही बात करते हैं और गर्व का अनुभव करते हैं। इससे प्रभावित होकर उन्होंने निश्चय किया कि अब वह भी बोलचाल, भाषण, पत्र-व्यवहार आदि में हिन्दी का ही प्रयोग करेंगे और उसके विकास एवं समुन्नयन के लिए हर सम्भव प्रयास करेंगे। इस संकल्प का उन्होंने जीवनभर पालन किया। आजके जन्मके पीछेयह भी एक कारक रहा।

(२) जापान की एकशिक्षा संस्था का निरीक्षण कर वह विशेष रूप से प्रभावित हुए। यह संस्था सरकारी सहायता और सरकारी प्रभाव से एकदम मुक्त थी। उन्होंने निश्चय किया कि भारत में भी राष्ट्रीय शिक्षाप्रदान करने के लिए ऐसी ही एक संस्था स्थापित की जाय जो सरकारी नियन्त्रण से मुक्त हो। काशी विद्यापीठ की स्थापनाके पीछे यही लक्ष्य था।

(३) ब्रिटेन में लन्दन टाइम्ससमाचार-पत्र से श्री गुप्त बहुत प्रभावित हुए। उनके मन में एक सपने ने जन्म लिया कि राष्ट्रभाषा हिन्दी में भी ऐसा ही एक प्रभावशाली समाचार-पत्र प्रकाशित किया जाना चाहिए। यह सपना आजके जन्म के रूप में साकार हुआ।

आजकी नीतियां औरउद्देश्य

राष्ट्ररत्न ने आजके प्रकाशन के सम्बन्ध में जब लोकमान्य तिलक का परामर्श प्राप्त करने की चेष्टा की तो तिलक महाराज ने इन बातों पर विशेष बल दिया-

-स्वराज्य प्राप्त करने का प्रयत्न करो।

-अपने पत्र के माध्यम से लोगों को उनके स्वाभाविक अधिकार समझा दो।

-अपने धर्म के पालनमें यदि विघ्र उपस्थित हो तो उसकी परवाह न करो और ईश्वर के न्याय पर विश्वास रखो। आजका प्रकाशनारम्भ होने पर इन उपदेशात्मक बातों का पालन करना ही अखबार का उद्देश्य माना गया।

आजकी मूल नीति की घोषणा करते हुए संस्थापक राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त और सम्पदक पण्डित बाबूराव विष्णु पराडक़र ने कहा - हमारा उद्देश्य अपने देश के लिए पूर्ण रूप से स्वतन्त्रता का उपार्जन करना होगा। हम हर बात में स्वतन्त्र होना चाहते हैं और यही हमारा लक्ष्य है।

आजका नाम आजही क्यों

आजके नामकरण के बारे में कहा गया- हमारा पत्र दैनिक है। प्रत्येक दिन इसका प्रकाशन होगा। संसार भर केनये-नये समाचार इसमें रहेंगे। दिन-प्रतिदिन संसार की बदलती हुई दशा में नये-नये विचार उपस्थित करने की आवश्यकता होगी। हम इस बात का साहस नहीं कर सकते कि हम सर्वकाल, सर्वदेश, सर्वावस्था के लिए जो उचित, युक्त और सत्य होगा, वही सर्वदा कहेंगे। हमें रोज-रोज अपना मत तत्काल स्थिर करके बड़ी-छोटी सब प्रकार की समस्याओं को समयानुसार हल करना होगा। जिस क्षण जैसी आवश्यकता पड़ेगी, उसी की पूर्ति का उपाय सोचना और प्रचार करना होगा। अतएव हम एक ही रोज की जिम्मेदारी प्रत्येक अंक मेंले सकते हैं। वह जिम्मेदारी प्रत्येक अंक में ले सकते हैं। वह जिम्मेदारी प्रत्येक दिन केवल आज की होगी, इस कारण इस पत्र का नाम आजहै।

आजके विशेष उद्देश्य

-‘आजके संचालकों द्वारा प्रकाशित कर्तव्य सूचनापत्र में लिखा है कि भारत के गौरव की वृद्धि और उसकी राजनीतिक उन्नति आजका विशेष लक्ष्य होगा।

-हमारा उद्देश्य अपने देश के लिए हर प्रकार से स्वतन्त्रता पाना है। हम अपने देशवासियों में स्वाभिमान का संचार करना चाहते हैं। उनको ऐसा बनायें कि भारतीय होने का उन्हें अभिमान हो, संकोच नहीं। जब हममें आत्मगौरव होगा तो अन्य लोग भी हमें आदर और सम्मान की दृष्टि से देखेंगे। जब हमारे घर ऊंचे होंगे तो बाहर के लोग हमारा निरादर करने का साहस नहीं करेंगे।

-हमारा मूल मन्त्र है कि हमारे देश का गौरव बढ़े। यही हमारा राष्ट्रीय सिद्धान्त है और यही हमारा राजनीतिक सिद्धान्त है।

-‘आजदेश में जातीय संघर्ष, दंगा-फसाद नहीं चाहता और न ही व्यक्ति-व्यक्ति में वैमनस्य पसन्द करता है। हम उन सभी बातों के पक्षधर हैं जिनसे भारत और भारतीयता का नाम विश्वमें रोशन हो। हमारा प्रयास यही रहता है कि व्यक्ति विशेष पर कटाक्ष न हो। उनके विचारोंकी समीक्षा और परीक्षा की जा सकतीहै। चरित्र-हनन से हमें परहेज है और न ही हम किसी की व्यक्तिगत जिन्दगी में ताक-झांक को पसन्द करते हैं।

-हमारा लक्ष्य अपना घर सम्भालने का है, दूसरों के घर ढहाने का नहीं। हां, अपना घर ठीक करने में यदि कोई किसी तरह की बाधा उपस्थित करता है तो हम उसका प्रतिकार अवश्यकरेंगे।

-हम मानते हैं कि राष्ट्र का एकमात्र अंग राजनीति नहीं है। वह साधन है, साध्य नहीं, वह माध्यम है, लक्ष्य नहीं।

-हम देश काल के अनुरूप शिक्षा के हिमायती हैं और इसके लिए हम निरन्तर संघर्षशील रहते हैं। हम चाहते हैं कि देश में ऐसी सर्वव्यापी शिक्षा की व्यवस्था हो जिससे लोग अपने अधिकार और कर्तव्य समझ सकें। हमारा उद्देश्य है कि शिक्षा ऐसी दी जाय जिससे शिक्षितों को रोजगार मिले।

-व्यापार, व्यवसाय, कृषि आदि की उन्नति पर आजहमेशा जोर देता रहा है, आज भी वह उसीनीति पर चल रहा है और आगे भी चलता रहेगा। हम मानते हैं कि धन और सम्पत्ति के बिना हमारा राष्ट्रीय जीवन निष्फल है। हमें हर नागरिक को पर्याप्त धन-धान्य, सुख-सुविधा मिले, यह भी देखना है।

-‘आजधार्मिक और सामाजिक स्वतन्त्रता का पक्षधर है। हम चाहते हैं कि सभी धर्मों के लोग परस्पर मिलजुल कर स्नेह से रहें। हर आदमी यह समझे कि स्वराष्ट्र की उन्नति ही उसका सर्वश्रेष्ठ धर्म है। राष्ट्रभक्ति से ऊपर कोई धर्म नहीं।

-लेखन-शैली, विचार गाम्भीर्य और शिष्ट भाषा की प्रणाली की रक्षा करते हुए सभी प्रकार के नये-पुराने मतों को आजमें स्थान दिया जाता है। हम इस बात की बराबर कोशिश करते हैं कि मतों के प्रकाशन में राग-द्वेष, दलबन्दी, तटबन्दी आदि न आने पाये।

-हम यह मानते हैं कि एक जाति या देश को दूसरी जाति या देश पर अनुचित आक्रमण नहीं करना चाहिए। हर देश अन्य देशों के आक्रमण से संरक्षित रहे और अपने घर का प्रबन्ध करने में उसे पूरी आजादी प्राप्त हो। बाहर की दखलन्दाजी हमें बर्दाश्त नहीं।

-हमारी संस्कृति, सभ्यता और परम्परा सबसे पहले है। इनकी रक्षा के लिए आजकुछ भी कर सकता है।

आजका विस्तारीकरण

आजके विस्तारीकरण की प्रक्रिया १९७७ से शुरू हुई। कानपुर से आजका प्रकाशन शुरू हुआ। इसके बाद उत्तर प्रदेश में आगरा, गोरखपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, बरेली से भी आजप्रकाशित होने लगा। बिहार में पटना, रांची, धनबाद, जमशेदपुर से आजका प्रकाशन होता है। आज के सभी संस्करण कम्प्यूटर, फैक्स, मोडम, इण्टरनेट और अति आधुनिक छपाई मशीनों से लैस हैं। सूचना एवं प्रौद्योगि की के क्षेत्र में जो क्रान्ति आयी है, उससे कदम से कदम मिलाकर आज आगे बढ़ रहा है। इसकी प्रसार संख्या निरन्तर बढ़ रही है। सभी संस्करणों में साप्ताहिक विशेषांक नियमित रूप से और विभिन्न विषयों पर परिशिष्ट समय-समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। आजने हमेशा जनता की आवाज बुलन्द की है। आजादी से पहले भी और आजादी के बाद भी। अवरोधों के बावजूद वह कभी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हुआ। आजआज भी भारतीय जनता की आवाज है।

सन् १९२० में ही यानी आज से ९४ साल पहले आजने अपने एक सम्पादकीय में जो लिखा था, वह आज भी एकदम सत्य है। यह आजकी परम्परागत दूरदृष्टि का प्रतीक है। सम्पादकीय इस प्रकार है- संसार इस समय बेचैन है। चारों ओर हलचल है। सब नर-नारीपरेशान हैं। क्यों? राष्ट्रनीतिज्ञों को इसका कारण विचार कर निकालना चाहिए। जिधर देखिये उसी ओर अशान्ति विराज रही है। सब लोग एक दूसरे से अप्रसन्न हैं। अपनी-अपनी श्रेणी को संघटित कर सब लोग दूसरी श्रेणियों से लडऩे के लिए तैयार हैं। इस हलचल में केवल एक सिद्धान्त है- जिसके पास अधिकार है, उससे अधिकार ले लेना चाहिए। जिसके पास अधिकार नहीं है, वह दूसरों को अधिकार प्राप्त देखकर जलता है और उसके पास से अधिकार हटवाना चाहता है। अनाधिकारी अधिकारी से द्वेष करता है और अधिकारी अनाधिकारियों की संख्या देख उनसे डरता है, उनकी संघटित शक्ति घटाना चाहता है और उनके प्रति रोष दिखाकर उन्हें अधीन अवस्था में ही पड़े रहने का आदेश देता है। राष्ट्र-राष्ट्र, वर्ग-वर्ग, वर्ण-वर्ण सबके झगड़े का मूल मन्त्र यही प्रतीत होता है कि अधिकारी के पास अधिकार न हो।

अधिकार हटाया जाना चाहिए। तो शान्ति कैसे हो सकती है, चैन कैसे मिल सकता है? शासन और शासित, मालिक और मजदूर, अमीर और गरीब अपने-अपने हक और फर्ज दोनों को जब तक अच्छी तरह नहीं समझते, तब तक नीति नहीं हो सकती। दो परस्पर विरोधी श्रेणियों को यह सच समझना होगा।

आजका समग्र कलेवर

आजमें प्रकाशित सामग्री की पठनीयता और प्रामाणिकता निर्विवाद है। आजके प्रत्येक अंक में वाराणसी और आसपास के विस्तृत समाचार तो जाते ही हैं, प्रदेश भर के विशेषरूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश के समाचारों को विशेष महत्व दिया जाता है। इन समाचारों के संकलन के लिए निजी संवाददाताओं का जाल फैला हुआ है। अन्य प्रदेशों की राजधानियों तथा विदेशों से प्राप्त समाचारों के प्रकाशन की भी विशेष व्यवस्था है।

विविध समाचारों के अलावा विभिन्न विषयों पर पठनीय सामग्री भी प्रकाशित होती रहती है। अलग-अलग विषयों के लिए अलग-अलग दिन बंधे हुए हैं। किसी दिन अर्थ-वित्त-वाणिज्य-श्रम सम्बन्धी लेख निकलते हैं तो किसी दिन शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थियों की समस्याओं पर लेख छपते हैं। कृषि, ग्राम्य जीवन, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य और अन्तरराष्ट्रीय विषयों पर भी लेखों का नियमित प्रकाशन होता है। विभिन्न समस्याओं पर पाठकों के विचार भी आमंत्रित किये जाते हैं और उन्हें विधिवत छापा जाता है। आज में हर वर्ग और विभिन्न रुचि के पाठकों के लिए प्रचुर सामग्री विद्यमान रहती है।

-कुछ वर्षों (१९४३से १९४७ तक) को छोडक़र पण्डित बाबूराव विष्णु पराडक़र १९२० से १९५५ तक आजके सम्पादक रहे। श्री कमलापति त्रिपाठी आज में १९३२ में आये। कुछ समय बाद वह आजके सम्पादक नियुक्त हुए और पराडक़रजी को प्रधान सम्पादक बना दिया गया।

-१९४३ में श्री विद्या भास्कर और बाद में श्रीकान्त ठाकुर, रामकृष्ण रघुनाथ खाडिलकर आजके सम्पादक बने।

श्री सत्येन्द्र कुमार गुप्त

परम देशभक्त और विद्या अनुरागी श्री सत्येन्द्र कुमारगुप्त ने सन् १९५९ में आजके प्रधान सम्पादक का गुरु गम्भीर दायित्व ग्रहण किया। उनकी विवेक दृष्टि, दृढ़ संकल्प और उनके नैष्ठिक व्रत ने पत्र को नयी ऊंचाई दी। आपका त्यागमय और आदर्शवादी जीवन था। इससे पहले १९४२ से सोलह वर्ष तक उन्होंने आजका कौशलपूर्वक संचालन किया था। उन्होंने जब प्रधान सम्पादक का कार्य सम्भाला था, उथल-पुथल और संकटों का समय था। हिन्दी समाचार-पत्र भी उससे अछूते नहीं थे। मिशन की भावना का लोप हो चुका था। व्यावसायिक मानसिकता और व्यावसायिक वास्तविकता ने पत्रों का स्वरूप औरउद्देश्य ही बदल दिया था। उद्योग, व्यापार और राजनीति का नया अर्थ नवीन शक्ति के रूप में समाजको प्रभावित कर रहा था। महंगी और अभाव जन-जीवन को सन्त्रस्त कर रहा था। अखबारी कागज औरअन्य संसाधन भी सहज उपलब्ध नहीं हो रहे थे। ऐसी विषम परिस्थिति में भी सत्येन्द्रकुमार गुप्त ने आजकी गौरवपूर्ण परम्परा की रक्षा करते हुए पत्र को उन्नति की ओर अग्रसर किया।

श्री गुप्त ने अनेक बाधाओं के बावजूद पत्र का पृष्ठ-विस्तार कर उसे नये भारत की आवश्यकता के अनुरूप बनाया। पत्र में केवल राजनीतिक समाचार ही नहीं, सांस्कृतिक, साहित्यिक और लोकमंगल से जुड़ी खबरों को भी अधिक स्थान और महत्व प्राप्त होने लगा। आपने विभिन्न समाज में राष्ट्र-निर्माण के प्रति जागृति पैदा करने के लिए पत्र के माध्यम से प्रेरित किया। भारत की आत्मागांवों में बसती है। पराधीन काल में इनकी जिस तरह उपेक्षा की गयी, उससे न केवल आत्मनिर्भरता समाप्त हो गयी अपितु उसका सांस्कृतिक वैशिष्ट्य भी नष्ट हो गया। आपनेलुप्त होती लोककला और लोक संस्कृति को नया जीवन देने के लिए पत्र के माध्यम से यथेष्ट प्रोत्साहन दिया।आजपहला पत्र है जिसने सबसे अधिक महत्व गांवों को दिया। विश्वसनीयता पत्र की सफलता की कुंजी है। यही समाचार पत्र की सार्थकता को सिद्ध करती है। वह इसके लिए सदैव सतर्क रहते थे। श्री गुप्त पत्रकारिता के उन गुणों तथा परम्पराओं के प्रबल समर्थक थे जिसको राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त ने प्रस्थापित किया था और जिनके द्वारा यह क्षेत्र सम्मानित और गौरवान्वित होता है। श्री गुप्त मानते थे कि लिखे हुए शब्द सत्यनिष्ठ होने चाहिए। उनकोस्पष्ट निर्देश था कि सत्य का निरूपण करना कर्तव्य है, पर उसकी अभिव्यक्ति की भी मर्यादा है। पचीस वर्षों तक आज के सफल सम्पादन के बाद उनका निधन ६ नवम्बर, १९८४ को हो गया।

श्रीमती शशिबाला गुप्त

आजकी विकासयात्रामें ज्ञानमण्डलकी अध्यक्षा श्रीमती शशिबाला गुप्तका भी महत्वपूर्ण योगदानरहा है। सन्ï १९४२ में जब श्रीसत्येन्द्र कुमार गुप्त ने ज्ञानमण्डल लिमिटेड का प्रबन्ध सम्भाला, उनकी सहधर्मिणी श्रीमती शशिबाला गुप्त इस कार्य में सक्रिय सहयोग प्रदान करती थीं। उन्होंने १९५९ में ज्ञानमण्डल के प्रबन्ध संचालक का कार्यभार सम्भाला और जीवन पर्यन्त बखूबी निभाया। वह केवल निपुण गृहिणी ही नहीं, अपितु कुशल प्रशासक भी थीं। उन्होंने ज्ञानमण्डल मुद्रणालय के पुराने यन्त्रों के स्थान पर तेजी के साथ मुद्रण के लिए आधुनिकतम यन्त्र स्थापित किये। उनका सिद्धान्त था कि हर चीज के लिए एक स्थान होना चाहिए और हर चीज अपने स्थानपर होनी चाहिए। प्रबन्धनका यह गुर उनकी सफलताका रहस्य था। हर हालमेंव्यवस्था बनी रहनी चाहिए और उसमें तनिक भी व्यवधान उन्हें पसन्द नहीं था। समयसेअखबार पाठकोंके हाथोंमें पहुंच जाय, इसका वह पूरा ध्यान रखती थीं। पत्र छपाई ऐसी हो जिससे वहसर्वांग सुन्दर हो, इसके लिए शशिबालाजी विशेष रूपसे सतर्क रहती थीं और अपनेसहयोगियोंको निर्देश देती थीं। आजकी स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर उनके प्रोत्साहन और प्रेरणा से सचित्र प्रेमसागरका प्रकाशन हुआऔर उसे नि:शुल्क वितरित किया गया। यह उनके प्रयासका फल था कि मुद्रणके क्षेत्रमेंज्ञानमण्डल देशमें अग्रणी मुद्रणालय बन गया।

श्री शार्दूल विक्रम गुप्त

वर्तमान में श्री शार्दूल विक्रम गुप्त आजके प्रधानसम्पादक हैं। उनके कुशल नेतृत्व और निर्देशन में यह पत्र निरन्तर उन्नति के पथ पर अग्रसर है। उन्होंने सन्ï १९८४ में प्रधान सम्पादकका कार्यभार सम्भाला। वैसे, सन्ï १९७९ से ही वहपत्रकारिताके क्षेत्रमें हैं जब उनके नेतृत्वमें अत्यन्त लोकप्रिय पत्रिका अवकाशका प्रकाशन आरम्भहुआ। इस पत्रिकाने अल्पकालमें ही हिन्दी जगतमें अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लियाथा। उन्होंने आजके सम्पादककाकार्यभार सम्भालते ही पूरे मनोयोग और अपार उत्साह से पत्र के विस्तार की योजना बनायी और उसे मूर्तिमान करने के लिए अथक प्रयास किया। यह उनकी दूरदर्शिता ओर शिव संकल्प का परिणाम है कि आज यह पत्र देश के विभिन्न राज्यों के पन्द्रह नगरों से एक साथ प्रकाशित हो रहा है और इसकी प्रसार संख्या लाखों में पहुंच गयी है। आज पत्रकारिता पेशा बनगयी है। व्यावसायिक स्पर्धाने पत्रोंको आकर्षक अवश्य बनाया है लेकिन निरन्तर महंगे हो रहे पत्र आम आदमी की पहुंचसे बाहर होते जा रहे हैं। इसके विपरीत श्री गुप्त ने आजको सर्वसुलभबनाये रखा है। वस्तुत: वह उन आदर्शों और सिद्धान्तोंके लिए प्रतिबद्ध हैं जिनकोलेकर राष्टï्ररत्नशिवप्रसादजीने आजकी स्थापना कीथी। श्री गुप्तने पत्रको जनसेवाका माध्यम बनाये रखा है।  उनके नेतृत्व, उदार प्रोत्साहन, उदात्त प्रेरणाऔर सक्रिय सहयोगसे आजनिरन्तर आगे बढ़ रहा है।

आजका वर्तमान

आजहर मोर्चेपर आज भी ईमानदार लड़ाई लड़ रहा है। उसकी नजर आज भी शासकपर है, शासित पर है। अफसरशाही की गतिविधियों पर उसकी कड़ी नजर होती है। ग्राम जगत उससे अछूता नहीं है। गांवों की समस्याओं को वह सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। शिक्षा, शिक्षक, शिक्षार्थी, महिलाओंकी स्थिति, बढ़ते अपराध, सरकारकी दुर्नीति, पुलिसकीनिष्क्रियता सबपर उसकी नजर होती है। मजदूर और कानून, हड़ताल और बन्द सभी उसके दायरे में हैं। राजनीतिक दल और धार्मिक प्रश्न जैसे विषयों पर आजके विचार स्वतन्त्रत होते हैं। श्रमजीवी युग की बारीकियों को वह पहचानता है। भविष्यपर आजकी नजर बराबररहती है। अहिंसापर हम पहले भी जोर देते रहे और आज भी देते हैं। राष्टï्रकी आर्थिकसमृद्धिके बारेमें आजकी चिन्ता सर्वोपरि है और जनताके सुख-दु:खका साथी बनेरहनेमें आजको गर्वका अनुभवहोता है। हम आपबीतीको विशेष महत्व देते हैं। आपबीती वह है जो हमारे देशकी जनतापरबीतती है। प्रकाशमें अन्धकार ढूंढऩेकी आजकी आदत नहीं है, फिर भी वह सचेष्टï रहता है किसर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश हो। अन्धेरा मिट जाय। जनता क्या चाहती है इसे शासकोंतकपहुंचाना हमारा फर्ज है। हम जनसेवाके व्रती हैं। आजके लिए भारतवासीही नहीं, सम्पूर्ण मानवमात्र ईश्वर समान है। हम मानते हैं कि मानव सेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है। इसीरास्तेपर आजआज भी चल रहा है।

कुछ अन्य प्रकाशन

(१) सोमवारविशेषांक- आजके सोमवार विशेषांक का प्रकाशन १९४४ में शुरू हुआ।

(२) स्वार्थ-ज्ञानमण्डल से स्वार्थपत्रका प्रकाशन शुरू हुआ था। दो-ढाई वर्ष तक चलने के बाद आर्थिक कठिनाइयों के कारण इसे बन्द करना पड़ा।

(३) मर्यादा- १९२१ में ज्ञानमण्डल ने इस मासिक पत्रिका का अधिग्रहण किया और श्री सम्पूर्णानन्द के सम्पादकत्व में इसका प्रकाशन शुरू हुआ।

(४) साप्ताहिक आज’- १८ जुलाई, १९३८ सेसाप्ताहिक आजका प्रकाशन प्रारम्भ हुआ।

(५) समाज- इस का प्रकाशन १९४७ में शुरू हुआ। इसके सम्पादक मण्डल में आचार्य नरेन्द्रदेव भी थे। १अक्तूबर, १९५० से इसका प्रकाशन बन्द कर दिया गया।

(६) चित्ररेखा- यहउ च्च कोटि की कहानी की पत्रिका थी। ज्ञानमण्डल से इसका प्रकाशन नवम्बर, १९४७ में शुरू हुआ। कुछ ही अंक प्रकाशित करने के बाद इसे बन्द कर देना पड़ा।

(७) अंग्रेजीदैनिक टुडे’- ३० जुलाई, १९३१ को इसदैनिकका प्रकाशनारम्भ हुआ था। श्री सम्पूर्णानन्द इसके सम्पादक थे। अपनी छोटी-सीजिन्दगीमें ही यह पत्र अहिन्दी-भाषियों में काफी लोकप्रिय हुआ।

(८) अवकाशहिन्दी पाक्षिक-अप्रैल, १९७९ मेंश्रीरामनवमीके दिन श्री शार्दूल विक्रम गुप्तके सम्पदकत्वमें इसका प्रकाशन शुरूहुआ। लगभग दस सालतक यह पत्रिका खूल चली। इसकी प्रसार संख्या सवा लाख तक पहुंच चुकी थी। बाद में इसे बन्द कर दिया गया।

ज्ञानमण्डल (प्रकाशन संस्थान)

राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त के हृदय में हिन्दी के प्रति असीम अनुराग था। उनकी आकांक्षा थी कि विश्व का समस्त ज्ञान हिन्दीमें भी प्रस्तुत किया जायऔर हिन्दी साहित्यकी उन्नतिमें समुचित योगदान करनेके उद्देश्यसे ऐसी संस्थास्थापित की जाय जो एकमात्र इसी उद्देश्यको लेकर प्रकाशन-कार्य आरम्भ करे। अपनी इसआकांक्षाको मूर्तिमान करनेके लिए उन्होंने सन्ï १९१६ मेंज्ञानमण्डल नामक प्रकाशन संस्था की स्थापना की और इस कार्यके लिए ज्ञानमण्डलके हीनामसे एक बड़ा मुद्रणालय भी स्थापित किया। प्रकाशन विभागमें सबसे पहले हिन्दीकेप्रख्यात विद्वान पद्म सिंह शर्माको नियुक्त किया गया जिन्होंने बिहारी सतसई पर सतसई संहारनामक समीक्षा ग्रंथ की रचना की। इसके बाद इस विभागका कार्यभार रामदास गौड़ को सौंपा गया। बाद में मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव ने इस विभाग का दायित्व ग्रहण किया। डाक्टर सम्पूर्णानन्द, मुंशीप्रेमचन्द्र आदिका भी सहयोग लिया गया। जनवरी १९५४ में देवनारायण द्विवेदीआमन्त्रित किये गये। इस प्रकार ज्ञानमण्डलमें उच्च स्तरके हिन्दी ग्रंथोंकेप्रकाशनकी शुरुआत हुई। अबतक ज्ञानमण्डलसे जो महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित हुए, उनका संक्षिप्तविवरण इस प्रकार है-

बृहत् हिन्दी कोश- यह हिन्दीका सर्वश्रेष्ठï कोश है। इसकीप्राथमिकता असंदिग्ध है। संशोधित परिवर्धित सातवां संस्करण उपलब्ध है।

ज्ञान शब्द कोश- यह वृहत् हिन्दी कोश का संक्षिप्त संस्करण है। जिज्ञासु अध्येताओं के लिए यह उपयोगी है।

हिन्दी साहित्य कोश (दो भाग)- इसके अब तक कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इसकी उत्कृष्ट प्रस्तुतिके लिए इसे भारत सरकारने प्रथम पुरस्कार प्रदान किया है।

अंगेजी-अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश- यह अत्यन्तउपयोगी और प्रमाणिक कोश है। इसका संकलन-सम्पादन अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के कोशकार डाक्टर हददेव बाहरी ने किया है।

अंग्रेजी-अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोष(संक्षिप्त संस्करण)- यह उक्त कोशका लघु रूप हैं जो विद्यार्थियों और अध्येताओं के लिए उपयोगी है।

वृहद अंग्रेजी-हिन्दी कोश (दो भाग)- इसमें ज्ञान-विज्ञान के सूक्ष्मति सूक्ष्म क्षेत्रों के सरल-जटिल, साहित्यिक और पारिभाषिक शब्दावलियोंकाविवेचनात्मक ढंगसे समावेश किया गया है। यह अत्यन्त उपयेगी कोश है। इसकासंशोधित-परिवर्धित संस्करण उपलब्ध है।

पौराणिक कोश- धार्मिक पौराणिक ग्रंथों के सन्दर्भों, पात्रों, स्थानों तथाकथाओंके सम्यक ज्ञानकी दृष्टिïसे यह कोश बहुत ही उपयोगी है।

भाषा विज्ञान कोश- डाक्टर भोलानाथ तिवारी कृत यह कोश अपने ढंग का अनूठा है। भाषा विज्ञान के अध्येता के लिए परम उपयोगी और संग्रहणीय है।

वाङ्मयार्णव- महामहोपाध्याय पाण्डेय रामावतार शर्मा कृत यह पद्यवद्ध संस्कृत विश्वकोष है। यह संस्कृत वाङ्मयका आमूल्य रत्न है।

काव्य प्रकाश- मम्मट कृत मूल्यवान कृति का यह भाष्य है। सभी संस्कृत पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण अंग है।

ध्वन्यालोक- ध्वनि सिद्धान्त के अद्वितीय प्रतिपादन-विवेचन में यह संस्कृत का श्रेष्ठ लक्षण ग्रंथ है।

(क) निरुक्तम् (पेपर बैंक)- यह निघण्टु के व्यख्या ग्रंथ का श्रेष्ठ विवेचन है। वेद के अर्थ में रुचि रखने वाले विद्वानों और अध्येताओं के लिए उपयोगी ग्रंथ है।

(ख) निरुक्तम् (प्रथम अध्याय)

सूरसागर- इस ग्रंथकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सूरसागर को मुख्य काव्य वस्तु-श्री कृष्णलीला को उस संशिलट सुगठित कथा-प्रबन्ध के स्वरूप में उद्घाटित किया गया है जो स्वयं इस महान भक्त कवि द्वारा परिकल्पित था।

हिन्दुत्व- इस अनुपम ग्रंथ को धर्मकोश की संज्ञा दी गयी है। इसमें हिन्दू धर्म और संस्कृति विषयक समस्त जानकारी उपलब्ध है। यह ग्रंथ पठनीय औरसंग्रहणीय है।

अशोक के अभिलेख- डाक्टर राजबली पाण्डेय कृत इस ग्रंथ में सम्राट अशोक के उपलब्ध सभी अभिलेखों का संग्रह एवं विद्वत्तापूर्ण सम्पादन किया गया है। इसमें अभिलेखों के हिन्दी रूपान्तर के साथ पाद टिप्पणियों तथा ऐतिहासिक टिप्पणियों का उल्लेख है।

वास्तु मर्म- इस पुस्तक में जन्म-कुण्डली के ग्रहों और वास्तु(भवन) के प्रभाव का प्रामाणिक विवरण है। वास्तु के मूल ग्रंथों समरांगण-सूत्रधार, वास्तु राजल्लभ, मानसार, विश्वकर्मा प्रकाश, वृहत्ï संहिता के भवननिर्माण सम्बन्धी मूल श्लोकों का सानुवाद प्रस्तुतिकरण किया गया है।

स्वतन्त्रता संग्राम- प्रस्तुत पुस्तक में स्वातन्त्र्य संघर्ष और उसकी मूलभूत उपलब्धियों का प्रामाणिक विवरण है। राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी और अध्येताओं के लिए यह उपयोगी और संग्रणीय ग्रंथ है।

चिद्विलास- इस पुस्तक में विद्वान लेखक डाक्टर सम्पूर्णानन्द ने अद्वैतवा दके गूढ़ रहस्यों का सुबोध शैली में प्रतिपादन-विवेचन किया है। यह केवल पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी है।

पालि साहित्य का इतिहास- डाक्टर भिक्षु धर्मरक्षित कृत इस पुस्तक में पालि भाषा और साहित्य के प्रामाणिक इतिहास के अतिरिक्त तत्सम्बन्धी अन्य सामग्री भी संकलित है।

पालि व्याकरण- पालि भाषा के विद्यार्थियों के लिए यह अत्यन्त उपयोगी पुस्तक है। इसमें पालि भाषा का व्याकरण सरल और सुबोध ढंग से विवेचन किया गयाहै।

महापरिनिब्बान सुत्तं- दीघनिकाय के १६वें सूत्रपर प्रतिपादित इस ग्रंथ को उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने पालि पाठ्ïय पुस्तकके रूपमें स्वीकृत किया है।

पालि पाठशाला- पालि साहित्य के जिज्ञासाओं की दृष्टिïसे लिखी गयी यहपुस्तक अपने ढंगकी मौलिक रचना है।

समाचार पत्रों का इतिहास- पचास वर्षों तक पत्र और पत्रकारिता से सम्बद्ध मूर्धन्य विद्वान पण्डित अम्बिका प्रसाद बाजपेयी ने इसग्रंथ में भारतीय समाचार पत्रों का एक सौ वर्ष का इतिहास प्रस्तुत किया है। हिन्दी, मराठी, बंगला आदि भाषाओं के पत्रों का कैसा स्वरूप रहा है, उसका विशद्ï ज्ञान इसपुस्तकमें संचित है।

मालवीय जी महाराज की छायामें- इस पुस्तक में युग विभूति महामना पण्डित मदन मोहन मालवीय के महान व्यक्तित्व और कृतित्व सम्बन्धी दुर्लभ संस्मरण है।

राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त- तीन खण्डोंमें विभाजित इसपुस्तकमें विदुषी लेखिका डाक्टर ज्योत्सना श्रीवास्तवने राष्ट्ररत्न- श्रीशिवप्रसाद गुप्तके जीवन-दर्शन, उनकी विचारधारा तथा उनके अनुपम राष्ट्रप्रेम का मूल्यांकन किया है। यह पुस्तक राजनीति के विद्यार्थियों और जिज्ञासुओं के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है।

सूफीमत-साधना और साहित्य- सूफीमत की साधना और तत्सम्बन्धी साहित्य के ज्ञान के लिए यह पुस्तक परम उपयोगी है। इसके अध्ययन से इस्लाम धर्म की उत्पत्ति और व्यक्ति का पर्याप्त ज्ञान हो जाता है।