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नेटवर्थके हिसाबसे शेयर बाजारमें निवेशकी तय हो सकती है सीमा

मुंबई। द सिक्योरिटीज ऐंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) शेयरों और इक्विटी डेरिवेटिव्स में निवेशकों के एक्सपोजर यानी निवेश करने की सीमा को उनकी नेटवर्थ से जोड़ सकता है। इस मामले से वाकिफ तीन लोगों ने यह जानकारी दी है। सेबी इसलिए यह कदम उठा रहा है ताकि लोग शेयरों में हद से अधिक निवेश न करें। शेयर को बॉन्ड के मुकाबले अधिक रिस्की माना जाता है। 
मार्केट पार्सिटिपेंट्स के मुताबिक, सेबी ने इस प्रपोजल के बारे में स्टॉक ब्रोकर्स को जानकारी दी है। एक ब्रोकर ने कहा, रेगुलेटर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स और ब्रोकर्स से निवेशकों की एसेट्स को सर्टिफाई कराना चाहता है और उसे देखते हुए उनके इक्विटी एक्सपोजर की सीमा तय की जाएगी। यह प्रस्ताव कुछ अमीर देशों के अक्रेडिटेड इन्वेस्टर के कॉन्सेप्ट की तरह है। अक्रेडिटेड इन्वेस्टर उसे माना जाता है जो आमदनी, नेटवर्थ, एसेट साइज, गवर्नेंस स्टेटस या प्रफेशनल एक्सपीरियंस की शर्तें पूरी करता है। अमेरिका में इस सिस्टम को उन निवेशकों को बचाने के लिए अपनाया है, जो अनरजिस्टर्ड कंपनियों में निवेश के आर्थिक खतरों को बर्दाश्त नहीं कर सकते।
अगर भारत में यह प्रस्ताव लागू होता है तो इसका बड़े पैमाने पर निवेशकों पर असर होगा। खासतौर पर इससे ऐग्रिकल्चर या बिजनस कम्यूनिटी के लोग प्रभावित हो सकते हैं, जो अपनी वास्तविक आमदनी की जानकारी नहीं देते। ब्रोकरों का कहना है कि इन लोगों की डिक्लेयर्ड नेटवर्थ या आमदनी उनकी वास्तविक नेटवर्थ से काफी कम हो सकती है। सेबी ने इसे लागू करने को लेकर मार्केट पार्टिसिपेंट्स के साथ बातचीत की है। पता चला है कि ब्रोकरों ने सेबी से हाई नेटवर्थ इन्वेस्टर (एचएनआई) को इस प्रस्ताव से अलग रखने की अपील की है। उन्होंने ब्रोकरों के क्लायंट की नेटवर्थ तय करने पर भी सवाल उठाए हैं। इस  खबर के लिए पूछे गए सवालों का सेबी ने जवाब नहीं दिया। ब्रोकरों को डर है कि इस प्रस्ताव के लागू होने से उनके बिजनस में कमी आएगी। एक बड़ी ब्रोकरेज कंपनी के सीईओ ने कहा, कई छोटे निवेशक मार्जिन फंडिंग के जरिये शेयर बाजार में पैसा लगाते हैं। ऐसे लोग नेटवर्थ की शर्त पूरी नहीं कर पाएंगे। इसलिए उन्हें अपने सौदे काटने पड़ेंगे। मुंबई की एक ब्रोकरेज ने कहा कि निवेशकों को नेटवर्थ सर्टिफिकेट लेने के बाद उस हिसाब से अपने पोर्टफोलियो में बदलाव करना होगा। उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव के लागू होने पर डायरेक्ट इक्विटी से पैसा म्यूचुअल फंड में शिफ्ट हो सकता है। सेबी को ऐसे कई मामलों का पता चला है कि जिनमें खासतौर पर इक्विटी डेरिवेटिव्स में निवेशकों ने डिक्लेयर्ड इनकम से बड़ी पोजिशन ले रखी है। दरअसल, निफ्टी या स्टॉक फ्यूचर्स में वास्तविक वैल्यू से काफी कम पैसे देकर पोजिशन ली जा सकती है।
हवाईअड्डोंके लिए मुद्रास्फीतिसे संबद्ध शुल्क ढांचेकी योजना
नयी दिल्ली। सरकार की हवाईअड्डों के लिए मुद्रास्फीति से संबद्ध पूर्व-निर्धारित शुल्क ढांचा तैयार करने की योजना है। इसका मकसद तेजी से बढ़ रहे विमानन क्षेत्र में निवेश के आड़े आ रही समस्या को हल करना है। वर्तमान में देश के भीतर हवाईअड्डों के लिए लागत आधारित शुल्क ढांचा है। इसके तहत प्रत्येक हवाईअड्डे के लिए हर पांच साल में दरें तय की जाती हैं, जिसे रियायत अवधि के तौर पर जाना जाता है। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) के चेयरमैन गुरुप्रसाद महापात्रा ने पीटीआई-भाषा से कहा, ''हवाईअड्डों के शुल्क में बड़े पैमाने पर अंतर होने से घरेलू और विदेशी विमानन कंपनियों के समक्ष एक बड़ी चुनौती खड़ी होती है क्योंकि उन्हें इसकी वसूली यात्रियों से करनी होती है।ÓÓउन्होंने कहा कि बहुत से घरेलू एवं वैश्विक निवेशकों और ऋणदाताओं ने भारतीय बाजार में निवेश नहीं करने की एक बड़ी वजह यही बतायी है। जबकि भारत दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता विमानन बाजार है। सार्वजनिक क्षेत्र का भारतीय विमानन प्राधिकरण देश के 120 हवाईअड्डों का प्रबंधन देखता है। उल्लेखनीय है कि इस संबंध में सरकार ने 18 जुलाई को लोकसभा में भारतीय विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण (एरा) अधिनियम में संशोधन के लिए एक विधेयक पेश किया है। इसमें हवाईअड्डों के लिये नये शुल्क ढांचे का प्रावधान किया जायेगा साथ ही प्रमुख हवाईअड्डों की परिभाषा में भी बदलाव किया जायेगा। एरा एक स्वतंत्र आर्थिक नियामक है जो कि हवाईअड्डों, एयरलाइंस और यात्री सभी के हितों की सुरक्षा करता है।