Tel: 0542 - 2393981-87 | Mail: ajvaranasi@gmail.com


एच-1-बी वीजाधारकोंका बढ़ेगा वेतन, भारतीय पेशेवरोंको होंगे बड़े नुकसान

वाशिंगटन। अमरीका में भारतीय पेशेवरों को मिलने वाले अवसरों में भारी कमी हो सकती है। अमरीकी कांग्रेस ने एच-1बी वीजा नियमों पर सख्ती वाले प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। एच-1बी वीजा का सबसे अधिक इस्तेमाल भारतीय पेशेवर करते हैं। अमरीका की प्रमुख संसदीय समिति ने एच1-बी वीजाधारकों के न्यूनतम वेतन में बढ़ौतरी कर दी है। समिति ने एच1-बी वीजाधारकों का न्यूनतम वेतन 60,000 डॉलर (करीब 39 लाख रुपए) से बढ़ाकर 90,000 डॉलर (करीब 59 लाख रुपए) करने के विधेयक को मंजूरी दे दी है। इससे भारतीय पेशेवरों को फायदा होगा लेकिन साथ ही इस विधेयक में भारतीय आइटी पेशेवरों में लोकप्रिय एच1-बी वीजा में कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए हैं। अमरीकी संसद की न्यायिक समिति ने बुधवार को प्रोटेक्ट एंड ग्रो अमरीकन जॉब्स एक्ट (एचआर 170) को पारित किया। जरूरी कार्रवाई के लिए विधेयक को संसद के पूर्ण सदन के पास भेज दिया गया। अमरीकी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से पहले विधेयक का इसी तरह का संस्करण सीनेट से पारित करना होगा। विधेयक में अमरीकी नागरिकों की जगह एच1-वीजा वाले कर्मचारी रखने पर नियोक्ताओं पर पाबंदी लगाई गई है। इसके अलावा एच1-बी वीजाधारकों को रखने के लिए अमरीकी श्रमिकों की छंटनी नहीं हो सकेगी। भारतीय आइटी कंपनियों के संगठन नैसकॉम ने इसका जोरदार विरोध किया है।

वीजा सख्ती से होंगे 2 बड़े नुक्सान
इस विधायक के कानून बनते ही दो सबसे बड़ी चीजें होंगी जिनसे भारतीय पेशेवरों को झटका लग सकता है। एच-1 बी वीजा पर निर्भर कंपनियां अमरीकी पेशेवरों की जगह पर एच-1बी पेशेवरों को नौकरी पर नहीं रख सकेंगी। इससे पहले एच-1बी पर निर्भर कंपनियों को इसकी छूट थी। वहीं इसके साथ ही जिन कंपनियों में एच-1बी पेशेवर काम करते हैं उनमें एच-1बी निर्भर और उनकी सहयोगी कंपनियों की छंटनी नीति को भी बढ़ा दिया गया है। यानी अमरीकी पेशेवरों की तुलना में ही एच-1बी वीजा पेशेवरों की भी छंटनी करनी होगी।
-----------------
१,३०,००० कंपनियोंके पास नहीं है पैन, किया करोड़ोंका लेन-देन
pancard के लिए चित्र परिणाम
नयी दिल्ली। सरकार ने जिन 2.24 लाख कंपनियों का पंजीकरण रद्द किया है उनमें से 1.30 लाख कंपनियों के पास स्थायी खाता संख्या (पैन) नहीं है। इसके बावजूद इन कंपनियों ने करोड़ों रुपए का लेन-देन किया। कंपनी मामलों के मंत्रालय की एक जांच में यह बात सामने आई है। सूत्रों ने बताया कि केवल 93,000 कंपनियों के पास ही पैन था। 50,000 रुपए से अधिक के लेन-देन के लिए पैन अनिवार्य होता है और चूंकि इन कंपनियों के पास पैन नहीं था इसलिए उनके लेन-देन का पता लगाना मुश्किल है। सूत्रों ने बताया कि जांच से साफ है कि इन कंपनियों में कुछ गड़बड़ तो जरूर थी। कम से कम इतना तो तय है कि उन्होंने कर का भुगतान नहीं किया। कंपनी रजिस्ट्रार का कहना था कि इन कंपनियों ने अपना वित्तीय ब्यौरा दाखिल नहीं किया इसलिए उनका पंजीकरण रद्द कर दिया गया। अब मंत्रालय ने यह अंदाजा लगाना भी शुरू कर दिया है कि कितनी पंजीकृत कंपनियों के पास पैन है। 2.24 लाख कंपनियों का पंजीकरण रद्द होने के बाद भी देश में 11.3 लाख कंपनियां पंजीकृत हैं। मंत्रालय के सामने यह समस्या भी है कि कई बैंकों ने अब तक यह नहीं बताया है कि जिन कंपनियों का पंजीकरण रद्द हुआ है उन्होंने नोटबंदी के बाद कितनी रकम का लेन-देन किया। सूत्रों का कहना है कि भारतीय स्टेट बैंक ने मंत्रालय को इन कंपनियों की लेन-देन की जानकारी मुहैया नहीं करवाई है। बैंक ने इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं की। नोटबंदी के बाद पैन के आवेदनों में 300 प्रतिशत का उछाल आया है। केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष सुशील चंद्रा ने कहा था कि पहले जहां हर महीने पैन के लिए 2.5 लाख आवेदन आते थे वहीं पिछले साल नवम्बर में नोटबंदी की घोषणा के बाद यह संख्या 7.5 लाख पहुंच गई है। मंत्रालय ने विभिन्न बैंकों द्वारा मुहैया करवाए गए आंकड़ों में भी अनियमितता पाई है। 13 बैंकों द्वारा दी गई जानकारी का विश्लेषण करने पर पता चला कि नोटबंदी के बाद करीब 4500 करोड़ रुपए जमा करवाए गए और निकाले गए। कई कंपनियों के 100 से अधिक बैंक खाते हैं। एक कंपनी के पूरे 2134 बैंक खाते निकले।