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जीवनके रास्ते बन्द

दुष्कर्म और हत्या मामलेमें चारों दोषियों अक्षय ठाकुर, विनय शर्मा, मुकेश सिंह और पवन गुप्तके लिए अब जीवनके सभी रास्ते बन्द हो गये। कानूनी दांवपेंचके चलते उनकी फांसीकी सजा बार-बार टलती रही लेकिन अब उनके लिए कोई विकल्प शेष नहीं है। बहुचर्चित निर्भया प्रकरणमें दोषियोंको बचानेके लिए जो कुछ भी कानूनी लड़ाई लड़ी गयी, सब अर्थहीन हो गयी। अन्तत: सत्य और न्यायकी जीत हुई। सभी दोषियोंको २० मार्चको प्रात: ५.३० बजे फांसीके तख्तेपर लटका दिया जायगा। इस प्रकरणमें गुरुवारको चौथी बार 'डेथ वारण्टÓ जारी किया गया, जो एक विलक्षण दृष्टïान्त है। राष्टï्रपति रामनाथ कोविंदने बुधवारको चौथे दोषी पवन गुप्तकी भी दया याचिका खारिज कर दी। अन्य तीन दोषियोंकी दया याचिकाएं पहले ही खारिज कर दी गयी थीं। पटियाला हाउस कोर्टने गुरुवारको सुनवाईके बाद नया 'डेथ वारण्टÓ जारी किया। अब यह निश्चित हो गया कि दोषियोंको पक्के तौरपर २० मार्चको फांसीके तख्तेपर लटकाया ही जायगा। कानूनी विशेषज्ञोंने भी स्वीकार किया है कि इस प्रकरणमें अब कोई विकल्प नहीं बचा है। निर्भया काण्ड असाधारण किस्मका प्रकरण है जिसने पूरे देशको हिला दिया। १६ दिसम्बर, २०१२ को दक्षिणी दिल्लीमें एक चलती बसमें निर्भयासे सामूहिक दुष्कर्मके साथ ही उससे पाशविक बर्बरता भी की गयी और २९ दिसम्बर, २०१२ को सिंगापुरके माउण्ट एलिजाबेथ अस्पतालमें उसकी मौत हो गयी। निर्भया प्रकरणमें न्याय मिलनेमें काफी विलम्ब हुआ। इसमें दोषियोंकी ओरसे कानूनी दावपेंचकी लम्बी लड़ाई लड़ी गयी। दोषियोंके अधिवक्ताओंने इस लड़ाईमें कोई भी रास्ता नहीं छोड़ा। निर्भयाकी मां आशा देवीके साहस और धैर्यकी अवश्य सराहना की जानी चाहिए, जिन्होंने हिम्मत नहीं हारी। गुरुवारको उन्होंने न्यायालयके आदेशपर अवश्य प्रशंसा जतायी लेकिन उनके मनमें यह भी आशंका थी कि फांसी टालनेके लिए कोई और पैंतरा सामने आ सकता है। उन्होंने कहा कि मेरी जीत उस दिन होगी जब चारों दोषी फांसीपर लटकाये जायंगे। आशा देवीकी आशंका अकारण नहीं है। अत्यन्त जघन्य किस्मके अपराधोंमें जबतक त्वरित न्यायकी व्यवस्था पक्की नहीं होगी तबतक अपराधियोंमें भय नहीं उत्पन्न होगा। इस दिशामें सरकार, कानूनविदों और अधिवक्ता समाजको भी गहन चिन्तन करना होगा।
भ्रष्टचारपर कड़ा प्रहार

अंग्रेजोंकी विरासतमें मिले भ्रष्टïाचारने भारतमें महामारीका रूप धारण कर लिया है। जीवनका कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जो इसके प्रभावसे मुक्त हो। भ्रष्टïाचारके सम्बन्धमें डाक्टर राममनोहर लोहियाने १९६३ में जो कहा था वह आज भी प्रासंगिक बना हुआ है। उन्होंने कहा था कि सिंहासन और व्यापारके बीच सम्बन्ध भारतमें जितना भ्रष्टï और बेइमान हो गया है, उतना दुनियाके इतिहासमें कहीं नहीं हुआ है। भारतमें राजनीतिक और नौकरशाहीका भ्रष्टïाचार बहुत व्यापक है। हालांकि प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदीने सरकारमें आनेके बाद भ्रष्टïाचारपर कड़ा प्रहार किया है, लेकिन इनकी जड़ें इतनी गहरी है कि इसका पूरी तरह सफाया आसान नहीं है। भ्रष्टïाचारसे देशकी अर्थव्यवस्था तो प्रभावित होती ही है। साथ ही प्रत्येक व्यक्तिपर भी इसका विपरीत असर भी पड़ता है। इसीको देखते हुए मोदी सरकारने अर्थव्यवस्थामें पारदर्शिता और जवाबदेही लानेके लिए जहां देशकी ३.३८ लाख निष्क्रिय कम्पनियोंके बैंक खातेपर रोक लगा दी है वहीं बैंकोंमें धोखाधड़ी रोकनेके लिए सार्वजनिक क्षेत्रके बैंकोंको कड़े दिशा-निर्देश जारी किये हैं। वित्तीय वर्ष २०१६-१७ से इस साल ३१ जनवरीतक धोखाधड़ी करनेवालोंपर ६२६ मामले दर्ज किये गये हैं। सरकारने बैंकोंकी आडिटकी गुणवत्ता तय करनेके लिए राष्टï्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरणका गठन किया है। सरकारने भ्रष्टïाचारके खिलाफ जीरो टालरेंसकी नीतिपर चलते हुए भ्रष्टïाचारसे लडऩेके लिए कई उपाय किये हैं लेकिन केवल सरकारके कदम उठानेसे संक्रामक रोग बन चुका भ्रष्टïाचार खत्म होगा, इसमें सन्देह है। समाजके विभिन्न स्तरोंपर फैले भ्रष्टïाचारको रोकनेके लिए जहां कठोर दण्डकी व्यवस्था की जानी चाहिए, वहीं आनेवाली पीढ़ीतक सुआचरणके फायदे पहुंचानेके लिए लोगोंको स्वयंमें ईमानदारी भी विकसित करनी होगी।