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रोड शोकी राजनीति

लोकसभा चुनावकी अधिसूचना अभी जारी नहीं हुई है, लेकिन उत्तर प्रदेशका सियासी पारा अभीसे चढऩा शुरू हो गया है। राजनीतिक अंकगणितके हिसाबसे सबसे अहम उत्तर प्रदेशकी सियासी बिसातपर राजनीतिक दल अपनी गोटी बैठानेमें जुट गये हैं। उत्तर प्रदेशमें लोकसभाकी ८० सीटें हैं, जो राष्टï्रीय राजनीतिकी दिशा एवं दशा तय करती हैं। केन्द्रकी सत्ताका रास्ता उत्तर प्रदेशके दरवाजेसे ही होकर गुजरता है, इसलिए सभी राजनीतिक दलोंकी निगाहें इसपर टिकी हैं। इसी सन्दर्भमें कांग्रेस महासचिव बननेके बाद प्रियंका गांधी वाड्राने प्रदेशकी राजधानी लखनऊसे अपनी सक्रिय राजनीतिकी शुरुआत करते हुए सोमवारको रोड शो किया। इस दौरान कांग्रेसके राष्टï्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और पश्चिमी उत्तर प्रदेशके प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया भी उनके साथ रहे। एयरपोर्टसे प्रदेश मुख्यालयतक रोड शोके दौरान प्रियंका और राहुल गांधीने कई जगह रुक कर समर्थकोंको सम्बोधित किया। प्रियंकाके लखनऊ आनेसे एक दिन पूर्व ही उनका एक आडियो सन्देश यहां पहुंच गया था जिसमें उन्होंने प्रदेशवासियोंका एक नयी राजनीतिक शुरुआत करनेका आह्वïान किया है। प्रियंकाके सक्रिय राजनीतिमें उतरनेके बाद कांग्रेस उत्तर प्रदेशमें मिशन २० को अन्तिम रूप देनेमें जुट गयी है। कांग्रेसकी कोशिश है कि प्रियंकाके लिए ऐसी सीट चुनी जाय जिससे देशभरमें बड़ा सन्देश जाय। वैसे भी पार्टियोंकी रोड शोकी राजनीति कोई नयी नहीं है। चुनावके समय इस तरहके रोड शोका आयोजन जनतामें अपनी पार्टीकी पैठ बनानेके लिए राजनीतिक दल करते ही रहते हैं। प्रियंकाके रोड शोको भी इसी रूपमें देखा जा रहा है जिसमें युवाओंको आकर्षित करनेका प्रयास किया गया है। इसमें उन्हें कहांतक सफलता मिलती है, यह तो आनेवाला समय ही बतायेगा लेकिन इतना जरूर है कि प्रियंकाके आनेसे हाशियेपर आ गयी कांग्रेसको संजीवनी मिली है। वैसे देखा जाय तो महागठबन्धनसे अलग होकर कांग्रेसका अपने बलबूते चुनाव लडऩेसे मतोंका धु्रवीकरण तेजीसे होगा। अब देखना दिलचस्प होगा कि ऊंट किस करवट बैठता है।
हिन्दीका गौरववर्धन
हिन्दी विश्वकी प्रमुख भाषाओंमें प्रतिष्ठिïत है और इसका सम्मान निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। भारतके लिए यह गौरवका विषय है। अमेरिका, रूस और जापान सहित विश्वके ४० देशोंके ६००से अधिक विश्वविद्यालयों और कालेजोंमें हिन्दीकी पढ़ाई होती है। हिन्दी आज वैश्विक भाषा बन गयी है। इसी क्रममें अबूधाबीने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए हिन्दीको अरबी और अंग्रेजीके बाद अपनी अदालतोंमें तीसरी आधिकारिक भाषाके रूपमें शामिल कर प्रशंसनीय और अनुकरणीय कार्य किया है। अबूधाबी न्याय विभागके इस निर्णयसे अदालतोंके समक्ष दावोंके बयानके लिए एकसे अधिक भाषाका विकल्प मिल सकेगा। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषी लोगोंको मुकदमोंकी प्रक्रिया, उनके अधिकारों और कर्तव्योंके बारेमें सीखनेमें सहायता पहुंचाना है। संयुक्त अरब अमीरातकी कुल आबादीमें लगभग २६ लाख भारतीय लोग हैं। यह बड़ा प्रवासी समुदाय है। फिजीमें सरकारी कामकाजकी चार भाषाएं हैं, जिनमें एक हिन्दी  है। नेपाल, पाकिस्तान, बंगलादेश, त्रिनिदाद और टोबैगो, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका और मारीशसमें भी हिन्दी प्रमुखतासे बोली जाती है। अबूधाबीके न्याय विभागका आदेश भारतके लिए एक मजबूत सन्देश भी है, जहांके उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालयका कार्य अंग्रेजीमें होता है। भारतमें हिन्दी बोलनेवालोंकी संख्या सर्वाधिक है, लेकिन अदालतकी मुख्य भाषा अंग्रेजी है। राष्टï्रपति रामनाथ कोविंदने फैसलोंकी सत्यापित प्रति हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओंमें उपलब्ध करानेपर जोर दिया है। पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालयने भी कहा था कि फैसलोंकी प्रति हिन्दीमें देनेकी शुरुआत की जायगी। प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोईने आश्वस्त किया है कि इसकी शुरुआत हिन्दीसे की जायगी और बादमें अन्य भाषाओंमें विस्तारित किया जायगा। नि:सन्देह अब समय आ गया है कि देशके सभी न्यायालयोंका कामकाज हिन्दीमें हो। हिन्दी आम जनकी भाषा है इसलिए यह न्यायपालिकाकी भी भाषा होनी चाहिए।