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सख्त होगा कानून

बच्चियोंसे बलात्कारके मामलेमें सख्त सजाके प्रावधानोंपर सरकारने अहम फैसला लिया है। कैबिनेटने उस अध्यादेशको मंजूरी दे दी जिसके तहत १२ वर्षसे कम उम्रकी बच्चीसे बलात्कारके मामलेमें दोषीको मृत्युदण्ड दिये जानेका नियम लागू हो जायगा। बैठकमें यह भी फैसला लिया गया कि इस मामलेकी जांच और सुनवाईमें तेजी लायी जायगी। अभी बाल यौन अपराध निरोधक कानून (पॉस्को) के तहत कमसे कमसे सात वर्ष एवं अधिकतम आजीवन कारावासकी सजाका प्रावधान था। सरकारका यह फैसला ऐसे समयमें आया है जब मासूम बच्चियोंके साथ दरिन्दगीकी बढ़ती घटनाओंसे देशभरमें आक्रोश है। इससे पहले मध्यप्रदेश सरकारने पिछले वर्ष नवम्बरमें ही बलात्कारियोंको फांसीकी सजा देनेका ऐलान कर केन्द्र सरकारको कानूनमें संशोधनका प्रस्ताव भेजा था। छत्तीसगढ़, झारखण्ड, हरियाणा, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश सरकारने भी फांसीपर विचार करनेकी बात की थी। उन्नाव एवं कठुआकी घटनाओंके बाद देशमें उबाल है। सरकारपर दबाव था। इस बीच ऐसे तथ्य भी हैं जिनके कारण विषय और प्रासंगिक हो गया है। ऐसा नहीं है कि देशमें पहलेसे कानून नहीं है। कानून भी है, सजाका प्रावधान भी है। लेकिन जटिलताएं अनेकों हैं। देशमें बलात्कारके मामलेमें फांसीकी आखिरी सजा १४ वर्ष पहले पश्चिम बंगालमें दी गयी थी। इस मामलेमें १५ वर्षतक मुकदमा चला। १५ वर्षीय स्कूली छात्राके साथ बलात्कार और उसकी हत्याके आरोपी धनंजय चटर्जीको फांसीपर लटकाया गया था। परन्तु इसके बाद भी बलात्कारकी घटनाओंमें कहीं भी कमी नहीं आयी। प्रश्न अब भी अपनी जगह मौजूद है कि फांसीकी सजाका प्रावधान बना देने भरसे क्या यह घटनाएं बन्द हो जायंगी? एक बार संसदमें पूर्व स्वराष्टï्रमंत्री लालकृष्ण आडवाणीने कहा था कि कानून चाहे जितने बना लिये जायं, जबतक मामलोंके निस्तारणके लिए एक 'टाइम फ्रेमÓ तय नहीं होगा, तबतक कुछ नहीं हो सकता। इसलिए नये नियममें इसका भी ध्यान रखा गया है। परन्तु विचारणीय पहलू यह है कि दिल्लीके निर्भया काण्डमें जिन लोगोंको सजा मिली क्या उसपर अमल हो सका? देशभरमें शीलभंगकी वारदातोंके आंकड़ोंपर नजर डालें तो पता चलता है कि कड़े कानूनके बावजूद वारदातमें कमी नहीं आ रही है। यह आंकड़े कानूनका माखौल उड़ाते हैं और महिला सुरक्षाको लेकर किये जानेवाले तमाम दावोंकी पोल भी खोलते हैं। निर्भया काण्डके बाद भी देशमें ऐसा ही माहौल था। जनताके आक्रोशका ही असर था कि वर्मा कमीशनकी सिफारिशोंके आधारपर सरकारने आईपीसी और सीआरपीसीमें तमाम बदलाव करके सख्त कानून बनाया। परन्तु इतनी सख्ती और आक्रोशके बावजूद बलात्कारके मामले नहीं रुके। महत्वपूर्ण यह है कि इसके लिए मजबूत सुरक्षातंत्रकी आवश्यकता है, जिसमें समाजसे लेकर पुलिसतककी भूमिकापर गम्भीरतापूर्वक विचार करना होगा, तभी त्वरित न्याय मिल सकता है। सम्भव है कानूनमें अतिरिक्त संशोधन एवं सख्तीसे अपराधियोंमें भय व्याप्त हो और ऐसे मामलोंपर विराम लगे।
तेलकी कीमतोंमें वृद्धि

अन्तरराष्टï्रीय बाजारमें कच्चे तेलकी कीमत बढऩेसे घरेलू बाजारमें पेट्रोल एवं डीजलके दामोंमें भारी उछालके साथ ५५ महीनेके अधिकतम स्तरपर पहुंच गया है। पेट्रोल एवं डीजलकी बढ़ती कीमतोंसे आम जनताकी परेशानियां बढऩी तय है। सरकारपर दबाव पड़ रहा है कि एक्साइज ड्ïयूटीमें कमी कर उपभोक्ताओंको राहत दी जाय। यदि कीमतें इसी प्रकार बढ़ती रहीं तो महंगी बढऩेका खतरा ज्यादा होगा। कहा जा रहा है कि कच्चा तेल ही नहीं, अमेरिकी डालरके मुकाबले रुपयेकी गिरावट भी पेट्रोलियम उत्पादोंकी कीमतको हवा दे रही है। दरअसल रुपया गिरनेसे आयातित कच्चे तेलका देशमें मूल्य और बढ़ जाता है। इसके अलावा सऊदी अरबकी तरफसे कच्चे तेलकी कीमतोंको ऊंचा रखनेकी खबरसे भी कीमतें आकाश छूने लगी। हालांकि सऊदी अरबने इन खबरोंसे इनकार किया है। अब जबकि अन्तरराष्टï्रीय बाजारमें कीमतोंमें बेतहाशा वृद्धि हो रही है तब उपभोक्ताओंको राहत देनेके लिए सरकारको पेट्रोलियम उत्पादोंको जीएसटीके दायरेमें लाना चाहिए। इससे जनताको राहत मिलेगी। चंूकि पेट्रोलियम उत्पादोंसे राज्य सरकारोंको भारी मुनाफा होता है इसलिए वह इसे जीएसटीके दायरेमें लानेसे कतरा रही हैं। इससे पहले वित्त मंत्रालयके सूत्रोंके हवालेसे ऐसी खबर है कि खजानेकी मौजूदा हालातको देखते हुए सरकार एक्साइज ड्ïयूटीमें राहत देनेकी स्थितिमें नहीं है। अत: यह बोझ आम जनतापर पडऩा तय माना जा रहा है।