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हिन्दीपर राजनीति अनुचित

स्वराष्ट्रमंत्री अमित शाहने पिछले दिनों हिन्दी दिवसके अवसरपर हिन्दीको राष्ट्रभाषा बनाये जानेपर जोर देते हुए कहा था कि हिन्दी ही पूरे देशको एकजुट रख सकती है। इसे लेकर शुरू हुआ सियासी घमासान सोमवारको और तेज हो गया। एक ओर जहां विपक्षी दलोंने इसका विरोध किया वहीं दूसरी ओर सत्तारूढ़ भाजपामें भी विरोधके स्वर मुखर होने लगे, जो उचित नहीं है। दुनियाके सभी देशोंकी अपनी एक राष्ट्रभाषा है। एक देश एक कानूनकी तरह, एक देश एक राष्ट्रभाषाका होना बहुत जरूरी है। जिस देशकी राष्ट्रभाषा जितना ही सशक्त होगी वह देश उतना ही समृद्ध और मजबूत होगा। दुनियामें भारतकी अलग पहचान बनानेके लिए देशकी एक भाषाका होना सबसे जरूरी है। महात्मा गांधीने संकल्प लिया था कि हिन्दीको राष्ट्रभाषा बनाना चाहिए। पूरे राष्ट्रमें एक देश, एक भाषाका संकल्प प्रशंसनीय है। हिन्दी विश्वकी तीसरी बड़ी भाषा है जो पूरी दुनियामें बोली जाती है। हिन्दी सिर्फ एक भाषा ही नहीं, बल्कि देशको एक सूत्रमें पिरोनेका सशक्त माध्यम भी है। जो लोग हिन्दीका विरोध कर रहे हैं, वह राष्ट्रभाषाका विरोध कर रहे हैं। आज देशको एकताकी डोरमें बांधनेका काम यदि कोई एक भाषा कर सकती है तो वह हिन्दी भाषा है। हिन्दीको राष्ट्रभाषा बनाकर हम अपनी संस्कृति और संस्कारोंका संरक्षण कर सकते हैं। पूर्व प्रधान मन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी, प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी और पूर्व परराष्ट्रमंत्री सुषमा स्वराजने संयुक्त राष्ट्र संघमें हिन्दीमें सम्बोधित कर हिन्दीका मान बढ़ाया। भारत विभिन्न भाषाओंका देश है और हर भाषाका अपना महत्व है। सभी भाषाओंका सम्मान किया जाना चाहिए लेकिन पूरे देशकी एक भाषा होना अत्यन्त आवश्यक है। इससे देशवासियोंमें एक भावनात्मक रिश्ता बनता है, जो देशको शक्तिशाली बनानेमें अहम भूमिका निभाता है। जो लोग विरोध कर रहे हैं उन्हें आत्मचिन्तन करनेकी जरूरत है। हिन्दी राजनीतिका विषय नहीं है। इसपर किसी प्रकारकी सियासत उचित नहीं। हम सभी देशवासियोंको हिन्दीका समर्थन और सम्मान करना चाहिए।
साखपर आंच
भारतीय सेनापर पूरे देश और देशवासियोंको काफी गर्व है। हमारी सेनाओंके पराक्रम और शौर्यसे लोग अवगत हैं। देशकी सुरक्षामें उनका अतुलनीय योगदान है। भारतीय सेनाकी साख और कौशलकी दुनियाके भी अनेक देश दाद देते हैं। इसके बावजूद सेनाके चन्द अधिकारियोंकी अमर्यादित हरकतोंपर सवाल उठना और न्यायालयसे उन्हें सजा सुनाया जाना अत्यन्त ही शर्मनाक है। ऐसे ही सेनाके एक बड़े अधिकारी मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) एस.पी.मुर्गुई हैं, जिन्हें रिश्वतखोरीके मामलेमें राउज एवेन्यू अदालतमें केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के विशेष न्यायाधीशने तीन सालकी सजा सुनायी है। न्यायाधीशने अपने फैसलेमें सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि सेनामें भ्रष्टाचार बर्दाश्त  नहीं किया जा सकता है क्योंकि वह समाजका आत्मविश्वास हिला देता है। २२ अगस्तको दिये गये अपने आदेशमें सीबीआई अदालतने ८० वर्षीय पूर्व मेजर जनरलको रक्षा उपकरणोंकी खरीदमें ७० हजार रुपये रिश्वत लेनेके मामलेमें दोषी पाया है। उनपर २५ हजार रुपयेका जुर्माना भी लगाया गया है। यह प्रकरण एक न्यूज पोर्टलके स्टिंग आपरेशनके बाद २००१ में सामने आया। सीबीआईने तीन फरवरी २००६ को मामला दर्ज किया था। ३१ अक्तूबर २००७ को आरोपपत्र दायर किया गया। निश्चित रूपसे सेनाके एक बड़े अधिकारीका यह कृत्य निन्दनीय है। इससे सेनाकी प्रतिष्ठा और गरिमापर भी आंच पहुंचती है। सेनामें किसी भी स्तरपर भ्रष्टाचारको असह्य बताते हुए न्यायालयने कड़ा सन्देश दिया है। इस प्रकरणमें सजा सुनाये जानेमें काफी विलम्ब भी हुआ है। भारतीय सेना अपने जवानों और अधिकारियोंके प्रति सतर्क रहती है जिससे कि सेनाके अनुशासनपर कोई आंच नहीं आने पाये, फिर भी निगरानी तंत्रको और मजबूत करनेकी आवश्यकता है। भारतीय सेनाकीे मर्यादा, गरिमा और अनुशासनके साथ कोई भी समझौता नहीं किया जा सकता।