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उपभोक्ताओंका शोषण


'एक देश, एक करÓ की दिशामें केन्द्र सरकारने आर्थिक सुधारोंके तहत वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) लागू किया है। निश्चित रूपसे यह बड़ी उपलब्धि है। इसे लागू हुए छह माहसे अधिक समय व्यतीत हो गया है। जीएसटी परिषदने अनेक बार करकी दरोंमें कमी की है जिससे कि केन्द्र और राज्य सरकारें आम जनताको राहत प्रदान कर सकें। लेकिन दुर्भाग्यकी बात यह है कि जिन राहतोंकी घोषणाएं की गयीं उनका लाभ उपभोक्ताओंको नहीं मिल रहा है। मात्र ४७ कम्पनियोंने ही मूल्योंमें कमी की है। कम्पनियां लाभ कमानेमें सक्रिय हैं, जब मूल्य बढ़ानेकी बात आती है तो वह उसमें पीछे नहीं रहतीं। एक जुलाई २०१७ से १९ जनवरी २०१८ तक ६३१ कम्पनियोंने दाम बढ़ा दिये। केन्द्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मंत्रालयमें ५० हजारसे अधिक कम्पनियां और आयात करनेवाले प्रतिष्ठïान पंजीकृत हैं। बड़ी संख्यामें कम्पनियोंका रवैया उपभोक्ताहितोंके विरुद्ध है। खाद्य एवं उपभोक्तामामलोंकेमंत्रीरामविलासपासवाननेअनेकबारचेतावनीदीहैकिकरोंमेंकीगयीकटौतीकापूरालाभउपभोक्ताओंकोमिलनाचाहिए।इसमेंशिथिलताबर्दाश्तनहींकीजायेगी।केन्द्रीयवित्तमंत्रीअरुणजेटलीभीइसप्रकारकावक्तव्यदेचुकेहैंलेकिनइनकम्पनियोंपरइसकाकोईविशेषप्रभावनहींपड़ाहै।अधिकमूल्यवसूलेजानेकेबारेमेंउपभोक्ताओंकीशिकायतेंलगातारबढ़तीजारहीहैं।जीएसटीघटनेकेबादभीअधिकतमखुदरामूल्य(एमआरपी)मेंकोईबदलावनहींहोताहै।बिनास्टीकरलगायेअधिकमूल्यवसूलेजारहेहैं।यहआमउपभोक्ताओंकाशोषणहै।कम्पनियोंकीउपभोक्ताविरोधीमानसिकतासेजनतात्रस्तहै।महत्वपूर्णप्रश्नयहहैकिइसप्रवृत्तिसेजनताकोकैसेमुक्तिदिलायीजाय।इसमेंसबसेबड़ीजिम्मेदारीकेन्द्रऔरराज्यसरकारोंतथाउनकेप्रशासनिकतंत्रकीहै।जबतकदोषीकम्पनियोंकेखिलाफसख्तदण्डात्मककाररवाईनहींहोगीतबतकउपभोक्ताहितोंकीरक्षासम्भवनहींहै।करोंमेंछूटकालाभप्राप्तकरनाउपभोक्ताओंकाअधिकारहै,जिससेउन्हेंवंचितनहींकियाजासकताहै।जोशिकायतेंउपभोक्तामंत्रालयकोमिलरहीहैंउनपरत्वरितकाररवाईहोनीचाहिए।जोदूकानदारयाकम्पनियांअधिकमूल्यवसूलरहीहैंउनकेविरुद्धतत्कालशिकायतेंदर्जहोनीचाहिए।उपभोक्ताहितोंकीरक्षामेंस्वयंउपभोक्ताओंकोभीसक्रियहोनाहोगा।

एक कदम आगे

 

विश्वमें भारतकी निरन्तर बढ़ती साखका एक ताजा प्रतिफल राष्टï्रके लिए गौरवका विषय है। परमाणु अप्रसारकी महत्वपूर्ण व्यवस्था आस्ट्रेलिया समूह (एजी) का भारत औपचारिक रूपसे सदस्य बन गया है। परराष्टï्र मंत्रालयने कहा है कि एजीने भारतको ४३वें भागीदारके रूपमें शामिल किया है। यह परस्पर लाभदायक होगा और अप्रसारके उद्देश्योंकी दिशामें सहयोग करेगा। एजी परमाणु निर्यातको नियन्त्रित करनेवाला तीसरा महत्वपूर्ण संघटन है, जिसका चीन सदस्य नहीं है। एजी यह सुनिश्चित करता है कि परमाणु सामग्रीका आयात कर कोई देश परमाणु या जैविक हथियार नहीं बनाने पाये। एजीकी सदस्यता मिलनेके बाद परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारतकी दावेदारी और मजबूत हो गयी है। एनएसजीमें भारतकी सदस्यताके मार्गमें सबसे बड़ा रोड़ा चीन है। इसमें ४८ राष्टï्र सदस्य हैं जिनमें ज्यादातर भारतके पक्षधर हैं लेकिन चीन भारतके खिलाफ वीटोका इस्तेमाल करता रहा है। चीन पाकिस्तानका समर्थन करता है, जो उसकी कुटिल रणनीतिका हिस्सा है। पाकिस्तानको लेकर स्थितियां अब बदल रही हैं। आतंकवादको संरक्षण देनेके कारण पाकिस्तानकी स्थिति बदतर हो गयी है। वैसे भी पाकिस्तान एनएसजीका कभी सदस्य नहीं बन सकता। एजीमें भारतका सदस्य बनना चीनको रास नहीं आयगा लेकिन उसपर मनोवैज्ञानिक दबाव अवश्य पड़ेगा। सम्भव है इसका कुछ सकारात्मक परिणाम निकले। परराष्टï्रमंत्री सुषमा स्वराज चीनको एनएसजीके मुद्देपर भारतके पक्षमें करनेमें जुटी हैं। एजीकी सदस्यताका लाभ भारतको अवश्य मिलेगा। अब भारतका अगला लक्ष्य एनएसजीकी सदस्यता है, जिसके लिए प्रयास जारी है। वैश्विक स्तरपर परिस्थितियां भारतके अनुकूल हैं। एजीकी सदस्यता इस दिशामें एक कदम है।