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रिजर्व बैंककी सौगात

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने मौद्रिक नीति समीक्षाके अन्तिम दिन गुरुवारको उम्मीदके अनुरूप नीतिगत ब्याज दरमें लगातार तीसरी बार कटौतीकी घोषणा कर आम जनताको बड़ी राहत प्रदान की है। रेपो रेटमें २५ बेसिस प्वाइण्टकी कटौती कर इसे छह प्रतिशतसे घटाकर ५.७५ प्रतिशत कर दिया गया है। रिवर्स रेपो रेट और बैंक रेटको भी समायोजित किया गया है। इसे क्रमश: ५.५० प्रतिशत और ६.० प्रतिशत किया गया है। रिजर्व बैंककी मौद्रिक नीति समितिके सभी सदस्योंने रेपो रेटमें कटौतीके प्रति सहमति जतायी थी। रेपो रेटमें कटौतीका सीधा लाभ जनताको मिलेगा। इससे होम लोन, कार लोन और अन्य लोन सस्ते होंगे। ईएमआईमें सुविधा मिलेगी। उद्योग-व्यापारकी गतिविधियोंमें भी तेजी आयगी। अर्थव्यवस्थामें कुछ माहसे जारी सुस्तीको नयी ऊर्जा मिलेगी। रिजर्व बैंकके गवर्नर शक्तिकान्त दासके अबतकके कार्यकालमें सस्ता ऋण देनेका यह तीसरा प्रयास है। इससे जमाकर्ताओंको बैंक जमापर कम आय होगी, जो उनके लिए कष्टïकारी है। आर्थिक विशेषज्ञोंका मानना है कि रेपो रेटमें कटौती करना रिजर्व बैंकके लिए जरूरी हो गया था, क्योंकि वित्तवर्ष २०१८-१९ की आखिरी तिमाहीमें विकास दर ५.८ प्रतिशत रही, जो शेष पांच सालमें सबसे कम है। जीडीपीके मामलेमें चीन भारतसे आगे है। ३१ मार्च २०१९तक चीनने जीडीपीमें ६.४ प्रतिशतकी वृद्धि अर्जित की है। भारतके लिए यह बड़ी चिन्ताकी बात थी। विनिर्माण और सेवा क्षेत्रका भी प्रदर्शन खराब रहा। ऐसी स्थितिमें रेपो रेटमें कटौती अनिवार्यता बन गयी थी। रिजर्व बैंकने स्थितियोंका आकलन करते हुए जीडीपी वृद्धि दरके अनुमानको भी घटाकर अब सात प्रतिशत कर दिया है। इसका प्रमुख कारण कमजोर वैश्विक परिदृश्य और निजी खपतमें कमी है। यह भारतकी अर्थव्यवस्थाके लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। इसमें सुधारके लिए काफी प्रयास करनेकी जरूरत है, क्योंकि चुनौतियां भी कम नहीं है। रोजगारके अवसरोंको भी बढ़ाना होगा क्योंकि सुस्तीके चलते रोजगारमें कमी आयी है। रिजर्व बैंकने आम आदमीको एक और बड़ी राहत देकर आनलाइन बैंकिंगको बढ़ावा देनेका प्रयास किया है। अब आरटीजीएस और नेफ्टके माध्यमसे धन भेजनेपर कोई शुल्क नहीं देना होगा। इसे नि:शुल्क कर दिया गया है। सभी बैंकोंको अपने ग्राहकको यह लाभ देना होगा। रिजर्व बैंकका यह निर्णय प्रशंसनीय और राहतकारी है।
उपेक्षितोंकी सुधि
अर्थव्यवस्थामें महत्वपूर्ण योगदान देनेवाले रेहड़ी-पटरीवालोंको विशेष पहचान देनेका निर्णय कर सरकारने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इससे जहां उन्हें सरकारकी योजनाओंका लाभ मिलने लगेगा, वहीं उनके जीवन स्तरमें सुधार आयगा क्योंकि आजादीके इतने वर्ष बाद आज भी वह उपेक्षित जीवन जीनेको मजबूर हैं। उनका कोई स्थान नियत नहीं है। कभी अतिक्रमणके नामपर तो कभी वसूलीके चक्करमें उनका शोषण किया जाता रहा है। देशके शीर्ष न्यायालयके स्पष्टï निर्देशके बाद भी इनकी आर्थिक उन्नतिके लिए कोई प्रयास नहीं किये गये, लेकिन मोदी सरकारके दोबारा सत्तामें लौटनेपर इनकी सुध लेकर सरकारने नेक काम किया है। आर्थिक इकाइयों और कामगारोंकी गणनामें इस बार रेहड़ी-पटरीवालोंको भी शामिल कर उनकी आर्थिक स्थितिका आकलन कर नेशनल बिजनेस रजिस्टर तैयार किया जायगा। इसके लिए सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय सातवीं आर्थिक गणनाको लेकर राज्य स्तरपर कर्मचारियोंको प्रशिक्षण देनेके साथ देशव्यापी अभियान शुरू करेगा। इसमें १२ लाख कर्मचारियोंको लगाया जायगा जो इनकी गणना करेंगे। एनएसएसओ और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगोंका मंत्रालयकी इसमें अहम भूमिका रहेगी। इससे पहले छठीं आर्थिक गणना २०१३ में की गयी थी। इस आर्थिक गणनाके तहत छोटे कारोबार और प्रतिष्ठïान चलानेवाले दर्जी, कुम्हार, लोहार जैसे रोजगारमें लगे लोगोंके साथ व्यावसायिक इकाइयों प्रतिष्ठïानोंके कामगारोंकी गिनती की जायगी। रेहड़ी-पटरीवाले, हाकर, सिलाई, कढ़ाई, दस्तकारी, चमड़े आदिके स्व-उद्यममें लगे लोगोंकी आर्थिक स्थिति स्पष्टï होनेसे उन्हें पेंशन, बीमा और स्वास्थ्य क्षेत्रकी योजनाओंका लाभ मिलने लगेगा। इनका आंकड़ा जुटा कर रोजगारको बढ़ावा देनेके लिए इन्हें प्रोत्साहित किया जायगा। इससे उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर होगी और वे बैंकों और वित्तीय संस्थानोंसे कर्ज आसानीसे ले भी सकेंगे। सरकारकी यह पहल प्रशंसनीय है। इससे अर्थव्यवस्थाकी रफ्तारको गति मिलेगी।