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हृदयविदारक दुर्घटना

दशहरेके दिन अमृतसरमें हुए ट्रेन हादसेसे पूरा देश सिहर उठा। इतनी संख्यामें ट्रेनसे कटकर मृत्युने देशवासियोंके हृदयको विदिर्ण कर दिया। पिछले चार वर्षोंके दौरान दूसरी बार हुए इस हादसेके बाद जहां लोग इसके कारणोंकी पड़ताल कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दशहरेके दिन शुक्रवार लोगोंके लिए 'ब्लैक फ्राइडे’ बनकर आया। रेल हादसा देशव्यापी समस्याकी ओर इशारा करता है। धार्मिक आयोजनोंमें आंख मूंदकर दौड़ पडऩे, कभी भगदड़, कभी रेलिंग या पुल टूटनेका शिकार हो जानेकी घटनाएं हमारे यहां अक्सर होती रहती हैं। लेकिन यहां मामला उससे भी आगेका है। पंजाबमें अमृतसरके पास शुक्रवार शाम बड़ा रेल हादसा हो गया। रेल पटरियोंपर खड़े होकर रावणदहन देख रही भीड़को तेज रफ्तार ट्रेन रौंदती हुई निकल गयी। यह हादसा जोड़ा फाटकके पास हुआ। वहां लगभग तीन सौ लोग थे जो पटरियोंके निकट मैदानमें रावण दहन देख रहे थे। रावणके पुतलेमें पटाखे फूटनेके बाद भीड़ पीछेकी तरफ भागी। इसी बीच जालंधर-अमृतसर लोकल ट्रेन आ गयी और लोगोंको रौंदती हुई निकल गयी। इससे ठीक पहले दूसरे ट्रैकसे अमृतसर-हावड़ा एक्सप्रेस गुजरी थी। इतने बड़े हादसेपर सामान्य-सी बात निकलकर आती है कि यदि ट्रेन आपरेशन मैन्युअलका पालन किया गया होता तो अमृतसर हादसा टल गया होता। दोनों ट्रेनके चालकोंकी घोर लापरवाही है। वहीं गेटमैनकी भूमिका भी संदिग्ध है। यदि यह सभी चौकन्ने होते तो बहुतसे लोगोंकी जान बचायी जा सकती थी। जिस रेलवे क्रासिंगके पास यह हादसा हुआ वहां दशहरेका मेला पिछले छह वर्षोंसे लग रहा है। इसकी जानकारी अवश्य ही स्थायीय प्रशासनसे लेकर स्टेशन मास्टर, गेटमैनके साथ ही चालकोंको भी रही होगी। गेटमैनकी लापरवाही भी चालकोंसे कम नहीं मानी जा सकती। जब गेटमैन देख रहा था कि मेलेमें आये लोग रेलवे ट्रैकपर खड़े होकर वीडियो बना रहे हैं तब भी उसने 'मैग्नेटो फोनÓ के जरिये स्टेशन मास्टरको इसकी जानकारी क्यों नहीं दी। इसके अलावा किसी भी चालकको आठसे दस वर्षोंके अनुभवोंके बाद ही यात्री ट्रेन चलानेको दी जाती है। उन्हें पता था कि इस स्थानपर प्रत्येक वर्ष दशहरापर भीड़ जुटती है। इसके बावजूद दोनों ट्रेनें अपनी पूरी गतिसे गुजरीं, जबकि टे्रन आपरेशनल मैन्युअल जनरल रूल साफ कहता है कि रेलवे ट्रैकपर किसी तरहकी बाधा, इनसानी गतिविधि, पशु आदि नजर आयें तो चालकको न सिर्फ गाड़ी धीरे करनी चाहिए, बल्कि रोक देनी चाहिए। इसकी सूचना तुरन्त पासके स्टेशन मास्टरको देनी चाहिए। जाहिर है कि चालकोंने इन सामान्य नियमोंका पालन भी नहीं किया। इसके अलावा किसी प्रकारके समारोहकी सूचना स्थानीय प्रशासन रेलवेको देती है। प्रशासन भी चौकन्ना नहीं था। इस तरहके सार्वजनिक कार्यक्रममें बैरिकेटिंगके साथ आरपीएफके जवान तैनात किये जाते हैं और ट्रेन आनेके समयकी उद्ïघोषणा की जाती है। यदि सभी नियमोंका पालन किया गया होता तो यह हृदयविदारक घटना न होती। सम्भवत: भविष्यमें दोषियोंको सजा भी मिल जायगी। कुछ दिन बाद इस घटनाको लोग भूल भी जायंगे या सिर्फ चुनिन्दा अवसरोंपर मृतकोंको भावभीनी श्रद्धांजलि भी दे दी जायेगी परन्तु दुर्घटनामें मारे गये मृतकोंके परिजनोंको यह उम्रभर दुख पहुंचायेगा। जब रावणदहन होगा उनके जख्म हरे होंगे। छोटी-सी मानवीय चूकने सैकड़ों परिवारोंको दुखके अन्धेरेमें धकेल दिया। हालांकि सरकारने मुआवजोंकी घोषणा की है परन्तु अपनोंको खोनेके दर्दसे मृतकोंके परिजनोंको कौन उबार सकता है।
गुणवत्तापरक शिक्षा
हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था बहुत विशाल है। केन्द्र और राज्य सरकारें मिलकर इन चुनौतियोंसे निबटनेका कार्य करती हैं। यदि आज किसीसे भी शिक्षाकी गुणवत्तापर बात की जाय तो निष्कर्ष यही निकलता है कि शिक्षा व्यवस्थामें आमूल-चूल परिवर्तनकी आवश्यकता है। ऐसेमें स्कूली शिक्षाकी गुणवत्ताको मजबूती देनेमें जुटी सरकारने केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) को मान्यता देनेके नियमोंमें बड़ा बदलाव किया है। अब सीबीएसईके स्कूलोंको पढ़ाई-लिखाईकी गुणवत्ताके आधारपर प्रत्येक पांच वर्षमें आकलन होगा। स्कूलोंको स्थायी मान्यता नहीं मिलेगी। इससे पहले शिक्षाके बाजारीकरणके चलते स्कूलोंमें बेहतर सुविधाओंपर ही प्रबन्धनका जोर रहता था। सुविधा देनेमें अग्रणी होनेका दावा सभी करते थे। हालांकि इसका सारा बोझ अभिभावकोंपर ही पड़ता था परन्तु पढ़ाई-लिखाईकी ओर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता था। एक बार यदि किसी स्कूलको सरकारकी ओरसे मान्यता मिल गयी तो वह मनमानीपर उतर आता था। परन्तु अब ऐसा नहीं होगा। देशके माध्यमिक स्कूलोंमें लगभग पांच करोड़ छात्र पढ़ते हैं। इनमेंसे दो करोड़ कक्षा नौसे बारहके बीच पढ़ते हैं। शेष तीन करोड़ कक्षा छहसे आठमें पढ़ते हैं। परन्तु लोगोंका राज्यस्तरीय बोर्डसे मोहभंग हो रहा है। स्कूलोंकी हालत खराब है। बिहारके माध्यमिक शिक्षाकी हालत सभीको पता है। वहांकी मेरिटमें सर्वाधिक अंक लेकर पास छात्राकी शैक्षिक जानकारी शून्य मिली। जांचके बाद उसे जेल भी जाना पड़ा। बिहारकी ही तरह उत्तर प्रदेशके भी हालात हैं। यहां भी माध्यमिक शिक्षा बोर्डके स्कूलोंकी शिक्षा गुणवत्ता अधोपतनकी ओर है। वहीं शिक्षकोंकी सुविधाओंमें बेतहाशा वृद्धि हुई है। इसके बावजूद गुणवत्तामें लगातार कमी दर्ज हो रही है। ऐसेमें सरकार द्वारा लाये गये नये नियमसे सम्भवत: शिक्षाके क्षेत्रमें उल्लेखनीय सफलता मिले, क्योंकि अब सरकारका ध्यान पूरी तरहसे पढ़ाई-लिखाईकी गुणवत्तापर है। सरकारके सराहनीय प्रयाससे सभीको गुणवत्तापरक शिक्षा मिल सकेगी।