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किसानोंको गुमराह करनेकी साजिश

कृषिक्षेत्रमें व्यापक सुधारों औरकिसानोंको लाभ पहुंचानेकीनीयतसे केन्द्र सरकार तीनबिल लायी है।विपक्ष संसदसे सड़कतक इसकाविरोध कर रहाहै। विरोधके स्वरसरकारके अन्दरसे भी उठेहैं। एनडीएका पुरानासाथी अकाली दलसरकारसे नाराज है केंद्रीयमंत्री हरसिमरत कौरने इस्तीफातकदे दिया है।

छोटीजोतके किसानोंका मतहै कि सरकारनेकॉण्ट्रैक्ट फार्मिंगका जो फैसलालिया है, वहसही है। यहफैसला पहले हीहो जाना चाहिएथा। वास्तवमें कृषिभूमि सीलिंग कानूनकीवजहसे किसानोंको नुकसानहुआ है। छोटेजमीनवाले किसान ही तोशहरकी ओर भागे,लाकडाउन हुआ तोवह फिर गांवलौटे। ऐसेमें यदिसरकारने यह कदमपहले उठाये होतेतो किसान औरअर्थव्यवस्था दोनों ज्यादा मजबूतहोते।  विपक्षकोघटिया राजनीति औरकिसानोंको बरगालनेसे बाज आनाचाहिए। यह विधेयककृषि क्षेत्रमें बड़ेबदलावेकी दिशामें बड़ा कदमसाबित होगा।  

अकालीदलके कोटेसे केंद्रीयकैबिनेट मंत्री हरसिमरत कौरनेविरोधमें अपने पदसेइस्तीफातक दे दियाहै। हरियाणा, पंजाबऔर राजस्थानके किसानसंघटन विरोध जतारहे हैं। विपक्षीदल और किसानसंघटन किसानोंको यहकहकर बरगला रहेहैं कि इनबिलोंकी आड़में सरकार न्यूनतमसमर्थन मूल्यकी व्यवस्था खत्मकरनेकी दिशामें काम कररही है। सरकारनिजी कम्पनियोंको लाभदेने और किसानोंकोभूमिहीन करनेकी नीयतसे यहबिल लायी है।नये तथाकथित कृषिसुधार लागू होनेसेकिसान और उसकीउपजपर प्राइवेट कम्पनियोंकाकब्जा हो जायगाऔर सारा फायदाबड़ी कम्पनियोंको मिलेगा।असलमें यह अध्यादेशकिसानोंकी बजाय बिचैलियोंकेलिए नुकसानदायक हैं।इसलिए विपक्ष, किसानसंघटन और व्यापारियोंकीमजबूत लॉबी किसानोंकीआड़में विरोधी माहौल तैयारकर रही है।जिस बिलका ज्यादाविरोध हो रहाहै, वह अध्यादेश'कृषि उपज व्यापारऔर वाणिज्य (संवर्धनऔर सुविधा) अध्यादेश२०२० है। यहबिल कृषि उपजकीबिक्री हेतु पहलेकीवर्तमान व्यवस्थाके समानांतर एकनयी व्यवस्था बनानेकीदिशामें क्रांतिकारी कदम है।यह अध्यादेश राज्योंकेकृषि उत्पाद मार्केट(एपीएमसी) कानूनोंके अंतर्गत अधिसूचितबाजारोंके बाहर किसानोंकीउपजके फ्री व्यापारकीसुविधा देता है।इस अध्यादेशके प्रावधानराज्योंके एपीएमसी एक्ट्सके प्रावधानोंकेहोते हुए भीलागू रहेंगे। सरकारकाकहना है किइस बदलावके जरियेकिसानों और व्यापारियोंकोकिसानोंकी उपजकी बिक्री औरखरीदसे संबंधित आजादी मिलेगी।जिससे अच्छे माहौलपैदा होगा औरदाम भी बेहतरमिलेंगे। इस अध्यादेशकामूल मकसद एकदेश, एक कृषिबाजारकी अवधारणाको बढ़ावा देनाऔर एपीएमसी बाजारोंकीसीमाओंसे बाहर किसानोंकोकारोबारके साथ हीअवसर मुहैया करानाहै, ताकि किसानोंकोफसलकी अच्छी कीमतमिल सके। इसकेअलावा, यह अध्यादेशइलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंगको भी बढ़ावादेगा। यानी उपजकीऑनलाइन खरीद-फरोख्दभी की जासकेगी। बिलमें यह भीव्यवस्था है किकोई भी व्यापारकरनेपर राज्य सरकार किसानों,व्यापारियों और इलेक्ट्रॉनिकट्रेडिंग प्लेटफॉम्र्ससे कोई बाजारफीस, सेस याप्रभार नहीं वसूलेगी।

विशेषज्ञोंकाकहना है कियह अध्यादेश किसानोंकोउनकी उपज देशमेंकहीं भी बेचनेकीआजादी देता है,इस तरह इससेवन नेशन, वनमार्केटका मॉडल लागूहो जायगा। इसअध्यादेशके समर्थकोंका मानना हैकि इससे किसानोंकीआमदनी बढ़ेगी, जबकिविरोधी कह रहेहैं कि इसअध्यादेशसे मंडी एक्टकेवल मंडीतक हीसीमित कर दियागया है औरमंडीमें खरीद-फरोख्तपरशुल्क लगेगा जबकिबाहर बेचने-खरीदनेपरइससे छूट मिलेगी।इस नियमसे खासकरमंडी व्यापारी औरआढ़ती बहुत नाराजहैं। उनका कहनाहै कि इससेबाहरी या प्राइवेटकारोबारियोंको फायदा पहुंचेगा। जमीनीहकीकत यह हैकि नयी व्यवस्थानया विकल्प है,जो वर्तमान मंडीव्यवस्थाके साथ-साथचलती रहेगी। किसानोंकोएपीएमसीके अलावा अपनी उपजबेचनेका विकल्प मिला है,देशमें जहां भावज्यादा मिले किसानवहां अपनी उपजबेच सकता है।असलमें नुकसान होगा तोबिचौलियों,आढ़तियोंका जो मंडियोंमेंकमीशन लेते हैं।नेताओंकी चिंता मंडियोंपर कमजोरहोनेको लेकर है।हरियाणा और पंजाबमेंआढ़तियों यानी बिचैलियोंकादबदबा जगजाहिर है।इनकी ताकतवर लॉबीकेआगे असली किसानअपने मनकी बातनहीं कह पारहा है। तमामकिसानोंका यह माननाहै कि मंडीकीवजहसे किसानोंका नुकसानहुआ है औरबाजार खुलनेसे किसानोंकोजरूर लाभ होगा।

मूल्यआश्वासन तथा कृषिसेवाओंपर किसान (सशक्तिकरण औरसंरक्षण) समझौता अध्यादेश कांट्रैक्टफार्मिंगकी बात करताहै। छोटे किसानोंकोध्यानमें रखते हुएयह फैसला कियागया है। वर्तमानमेंकुछ राज्योंमें अनुबंधखेतीके लिए एपीएमसीकेद्वारा पंजीकरण किये जानेकीजरूरत होती है।मतलब यह हैकि अनुबंध समझौतोंकोएपीएमसीके साथ दर्जकिया जाता हैजो इन अनुबंधोंसेउत्पन्न होनेवाले विवादोंको हलकरनेका काम करतीहै। इसके अलावा,अनुबंध खेती करनेकेलिए एपीएमसीको बाजारशुल्क और लेवीकाभुगतान किया जाताहै। मॉडल एपीएमसीअधिनियम, २००३ केतहत राज्योंको अनुबंधखेतीसे संबंधित कानूनोंको लागूकरने संबंधी अधिकारप्रदत्त किये जातेहैं। इस अधिनियमकेपरिणामस्वरूप २० राज्योंद्वारा अपने एपीएमसीअधिनियमोंमें अनुबंध खेती हेतुसंशोधन किये गयेहैं, इतना हीनहीं, पंजाबमें तोअनुबंध खेतीपर अलगसे एककानूनका निर्माण किया है।

छोटीजोतके किसानोंको मतहै कि सरकारनेकॉण्ट्रैक्ट फार्मिंगका जो फैसलालिया है, वहसही है। उनकायह भी कहनाहै कि यहफैसला पहले हीहो जाना चाहिएथा। वास्तवमें कृषिभूमि सीलिंग कानूनकीवजहसे किसानोंको नुकसानहुआ है। आंकड़ोंकेमुताबिक देशके ८५ फीसदीकिसान दो एकड़कृषि भूमिके नीचेहै। सीलिंग कानूनकेतहत हर राज्यअपने हिसाबसे कृषिभूमिकी सीमा तयकरता है। किसानोंकाभी मानना हैकि जमीनके छोटेटुकड़ेके साथ किसानोंकाजीना नामुमकिन जैसाहै। छोटे जमीनवालेकिसान ही तोशहरकी ओर आयेथे और अपनापेट पाल रहेथे, लॉकडाउन हुआतो वह फिरगांव लौट गये।ऐसेमें यदि सरकारनेयह कदम पहलेउठाये होते तोकिसान और अर्थव्यवस्थादोनों ज्यादा मजबूतहोते। जमीनी हकीकतयह भी हैकि छोटे किसानोंकोबैंक भी कर्जनहीं देता हैऔर दोसे चारएकड़की जमीनपर सालभर कैसेगुजारा होगा यहअपने आपमें सोचनेवालाविषय है। खेतीएक नुकसानदायक कामहै और इसमेंबड़ी कम्पनियां नहींआती है।

सरकारकामानना है कियह अध्यादेश किसानोंकोशोषणके भयके बिनासमानताके आधारपर प्रोसेसर्स, एग्रीगेटर्स,थोक विक्रेताओं, बड़ेखुदरा कारोबारियों, निर्यातकोंआदिके साथ जुडऩेमेंसक्षम बनायगा। इससेकिसानोंकी आयमें सुधार होगा।सरकारका मानना है किइस बिलसे बिचैलियोंकीभूमिका खत्म होगीऔर किसानोंको अपनीफसलका बेहतर मूल्यमिलेगा। हालांकि, विरोध करनेवालोंकादावा है किअब निजी कम्पनियांखेती करेंगी जबकिकिसान मजदूर बनजायगा। किसान नेताओंका कहनाहै कि इसमेंएग्रीमेंटकी समयसीमा तो बतायीगयी है लेकिनन्यूनतम समर्थन मूल्यका जिक्रनहीं किया गयाहै।

आवश्यकवस्तु अधिनियममें संशोधनकेजरिये अनाज, दलहन,तिलहन, खाद्य तेलों, प्याजऔर आलू जैसीवस्तुओंको आवश्यक वस्तुओंकी सूचीसेबाहर कर दियागया है। यानीअब इनका स्टोरेजकिया जा सकेगा।सरकारका मानना है किकिसानोंकी अच्छी पैदावार होनेकेबावजूद कोल्ड स्टोरेज यानिर्यातकी सुविधाओंके अभावमें औरवस्तु अधिनियमके चलतेअपनी फसलके सहीदाम नहीं लेपाते हैं। विपक्षकाकहना है किउपजके स्टोरेजसे कालाबाजारीभी बढ़ेगी औरबड़े कारोबारी इसकालाभ उठायंगे। वहींजब मंडी सिस्टमखत्म हो जायगातो किसान पूरीतरफ कॉण्ट्रैक्ट फार्मिंगपरनिर्भर हो जायगा।इसका नतीजा यहहोगा कि बड़ीकम्पनियां ही फसलोंकीकीमत तय करेंगी।कांग्रेसने तो इसेनया जमींदारी सिस्टमतकबता दिया है।

इसमेंकोई दो रायनहीं है कितमाम लाभकारी प्रावधानोंकेबावजूद प्रत्येक व्यवस्था औरकानूनमें सुधारकी गुंजाइश बनीरहती है। चूंकिन्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्थाकेवल गेंहू, धानजैसी कुछ फसलोंऔर कुछ राज्योंतकही वास्तविक रूपसेसीमित रही हैअत: एमएसपीकी वर्तमानव्यवस्थाको और सुदृढ़बनाया जाना चाहिए।किसानोंसे एमएसपीसे नीचे फसलोंकीखरीद वर्जित होऔर इसके उल्लघंनपरसख्त कानूनी कार्यवाहीहोनी चाहिए। विपक्षऔर किसान संघटनोंकेविरोधके बीच सरकारइन सुधारोंको कैसेलागू करवाती हैं,यह देखना अहमहोगा। मुद्दाविहीन विपक्षकिसानोंको इन अध्यादेशकीआड़में बरगलाकर अपनी सियासतचमका रहा है।विपक्षको घटिया राजनीति औरकिसानोंको बरगालनेसे बाज आनाचाहिए। असलमें यह बिलकृषि क्षेत्रमें बड़ेबदलाव लानेकी दिशामेंबड़ा कदम साबितहोंगे।