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जनादेशकी दिशा

सेमीफाइनलके रूपमें देखे जा रहे पांच राज्यों-मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम विधानसभाओंके चुनाव परिणाम जनता और राजनीतिक दल दोनोंके लिए सन्देश है। मंगलवारको घोषित परिणामोंमें तीन राज्यों छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरममें प्रारम्भिक दौरमें ही जनादेशका स्वरूप बिल्कुल स्पष्टï हो गया था। इनमें छत्तीसगढ़में कांग्रेस, तेलंगानामें टीआरएस और मिजोरममें मिजो नेशनल फं्रट (एमएनएफ)का स्पष्टï बहुमतके साथ सरकार बनना सुनिश्चित हो गया लेकिन मध्यप्रदेश और राजस्थानमें मुकाबलेकी स्थिति बनी रही। वैसे राजस्थानमें कांग्रेसने अच्छा प्रदर्शन किया और वह भारतीय जनता पार्टीसे काफी आगे निकल गयी। वहां राजस्थान कांग्रेसके युवा अध्यक्ष सचिन पायलट और अनुभवी राजनेता पूर्व मुख्य मन्त्री अशोक गहलौतके कड़े परिश्रमका पूरा लाभ कांग्रेसको मिला। इसी प्रकार मध्यप्रदेशमें राज्य कांग्रेसके अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया और पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथके प्रयासोंसे कांग्रेसने अच्छा प्रदर्शन किया। इन चुनावोंमें भारतीय जनता पार्टीको उम्मीदसे अधिक क्षति उठानी पड़ी। छत्तीसगढ़के हाथसे निकल जानेकी आशा भाजपाको नहीं थी। रमन सिंह १५ वर्षोंसे मुख्य मन्त्रीके रूपमें अपनी लम्बी सेवाएं दे चुके थे लेकिन जनादेश उनके पक्षमें नहीं रहा। इन चुनावोंके परिणामोंसे कांग्रेसको संजीवनी प्राप्त हुई है और पार्टीका मनोबल भी बढ़ा है। आगामी लोकसभा चुनावोंमें इसका लाभ कांग्रेसको मिल सकता है। प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी, भाजपाके राष्टï्रीय अध्यक्ष अमित शाह सहित भाजपाके अनेक वरिष्ठï नेताओंने पार्टीके पक्षमें सघन प्रचार अभियान चलाया लेकिन अब भाजपाको आत्मनिरीक्षण करनेकी जरूरत है। किन कारणोंसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाया, इसपर मंथन करनेकी आवश्यकता है। कांग्रेसको भी अति आत्मविश्वासमें आनेकी जरूरत नहीं है, क्योंकि पार्टीको अभी आगे काफी संघर्ष करना है। कांग्रेसके राष्टï्रीय अध्यक्ष राहुल गांधीके परिश्रमसे पार्टीका जनाधार अवश्य बढ़ा है। लोकसभाके चुनाव निकट हैं। इस दृष्टिïसे भाजपा और अन्य दलोंको जनादेशकी दिशापर विशेष ध्यान देना होगा। इन चुनाव परिणामोंसे विपक्षी एकताको भी बल मिल सकता है बशर्ते विपक्ष सही नीति और नीयतके साथ आगे आये।
नशेके विरुद्ध नसीहत

युवा पीढ़ीमें नशेके प्रति बढ़ती दुष्प्रवृत्ति समाजके लिए गम्भीर चिन्ताका विषय है। मादक पदार्थोंका सेवन युवाओंकी प्रतिष्ठïा और शानका मापदण्ड बन गया है। युवतियां और विभिन्न उम्रकी महिलाएं भी इसमें पीछे नहीं हैं। इसके लिए पारिवारिक परिवेश और सरकारकी नीतियां दोनों ही काफी हदतक जिम्मेदार हैं। स्वच्छन्द जीवनशैली युवा पीढ़ीको कहां ले जा रही है इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। इस सम्बन्धमें इलाहाबाद उच्च न्यायालयकी तल्ख टिप्पणी कहींसे भी अनुचित नहीं है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गोविन्द माथुर और न्यायमूर्ति वाई.के. श्रीवास्तवकी पीठने सोमवारको कानपुर नगरके पेरेण्ट गार्जियन एसोसियेशनकी एक जनहित याचिकाकी सुनवाईके दौरान कहा कि राज्य सरकारको राजस्व वसूलीकी चिन्ता है जबकि नशेकी लतसे युवा पीढ़ी बर्बाद हो रही है किन्तु इसकी परवाह उसे नहीं है। विवाह और अन्य समारोहोंमें आयोजकोंको कुछ घण्टोंके लिए शराब पिलानेका अस्थायी लाइसेंस देनेकी आबकारी नीतिकी आलोचना करते हुए पीठने यह भी कहा कि शराब, ड्रग्स, हुक्काबारपर नियन्त्रण होना चाहिए। न्यायालयने यह भी पूछा कि क्या सरकार नशेका व्यापार करना चाहती है। इस मुद्देपर २१ दिसम्बरतक राज्य सरकारसे जवाब मांगा गया है। याची अधिवक्ता रमेश उपाध्यायका कहना है कि सरकारकी नीतिके कारण बच्चों, महिलाओं और युवाओंपर खराब असर पड़ रहा है। शादी समारोहोंमें परिवार शामिल होते हैं। नशेकी अनुमति देनेसे बच्चोंमें नशेके प्रति जिज्ञासा बढ़ेगी। आबकारी विभाग मांगे जानेपर रात ७.३० बजेसे १०.३० बजेतकके लिए अस्थायी लाइसेंस देता है। याची अधिवक्ताकी दलील उचित है। शादी या अन्य समारोहोंमें शराब पिलानेका अस्थायी लाइसेंस दिये जानेकी नीति समाज विरोधी है। इस नीतिको तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए। इससे समाजमें गलत सन्देश जा रहा है और युवा पीढ़ी नशेकी ओर तेजीसे उन्मुख हो रही है। उच्च न्यायालयकी टिप्पणी उचित है और उसका सम्मान करते हुए राज्य सरकारको आवश्यक कदम उठानेकी जरूरत है। परिवारके लोगोंको भी इस दुष्प्रवृत्तिको हतोत्साहित करना चाहिए।