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दुराग्रहपूर्ण हस्तक्षेप

नागरिकता संशोधन विधेयक भारतका आन्तरिक मामला है लेकिन इस अत्यन्त महत्वपूर्ण मुद्देपर अमेरिका और पाकिस्तानका अनावश्यक हस्तक्षेप न केवल निन्दनीय है, बल्कि यह उनकी विकृत मानसिकताका भी परिचायक है। जम्मू-कश्मीरमें अनुच्छेद ३७० हटाये जानेके बाद इसी प्रकारका अनावश्यक हस्तक्षेप किया गया था जिसमें पाकिस्तानको काफी फजीहत उठानी पड़ी। अब फिर ऐसी हरकतें शुरू करना इस बातका प्रमाण है कि पहलेकी गलतियोंसे कोई सबक नहीं ली गयी। अमेरिकी एजेंसी अन्तरराष्टï्रीय धार्मिक स्वतन्त्रतापर अमेरिकी आयोग (यूएससीआईआरएफ) ने नागरिकता संशोधन विधेयकके लोकसभासे भारी बहुमतके साथ पारित किये जानेपर काफी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और कहा है कि यदि यह विधेयक राज्यसभासे पारित हो जाता है तो भारतके स्वराष्टï्रमंत्री और अन्य राजनीतिक नेतृत्वके खिलाफ पाबन्दी लगनी चाहिए। अमेरिकाकी यह टिप्पणी अत्यन्त ही दुराग्रहपूर्ण है। नागरिकता संशोधन विधेयकके प्रावधानों और उसकी मंशाको समझे बिना ही इस प्रकारकी टिप्पणी करनेका कोई औचित्य नहीं है। भारतके परराष्टï्र मंत्रालयने टिप्पणीको सिरेसे खारिज करते हुए इसे दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। अमेरिकाने इस मुद्देपर गुमराह करनेकी भी कोशिश की है। जहांतक पाकिस्तानके प्रधान मन्त्री इमरान खानका सवाल है उन्होंने भी जो प्रलाप किया है वह घृणित है। इमरानने नागरिकता संशोधन विधेयकके लोकसभासे पारित होनेके बाद आपत्ति जताते हुए कहा है कि यह पाकिस्तानके साथ अन्तरराष्टï्रीय मानवाधिकार कानून और द्विपक्षीय समझौतोंके सभी मानदण्डोंका उल्लंघन करता है। पाकिस्तान ऐसा देश है जहां अल्पसंख्यकोंका सर्वाधिक उत्पीडऩ और दमन होता है। उस देशके प्रधान मन्त्री इमरान खान किस मुंहसे कहते हैं कि यह विधेयक मुस्लिम विरोधी है। इमरान खान मुस्लिम समाजको गुमराह करनेकी नाकाम कोशिश कर रहे हैं, जिसका उन्हें कोई नैतिक अधिकार नहीं है। पाकिस्तान और अमेरिकाने जो दुराग्रहपूर्ण टिप्पणियां की हैं उसके लिए उन्हें क्षमा याचना करनी चाहिए। साथ ही पाकिस्तान अपने यहां अल्पसंख्यकोंका उत्पीडऩ बन्द कर उनके मानवाधिकारोंकी रक्षा करे।
कर वृद्धिके आसार
महंगीसे जूझ रही जनतापर आर्थिक बोझ बढ़ानेकी तैयारी की जा रही है। इसके लिए वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) की दरें बढ़ानेकी दिशामें सरकार सक्रिय हो गयी है जिससे कि उसकी आमदनीमें वृद्धि हो सके। जीएसटी दरें बढऩेके साथ कई उत्पाद महंगे हो जायंगे। जीएसटी अधिकारियोंकी दिल्लीमें हुई बैठकमें करकी दरें बढ़ानेपर विस्तृत चर्चा हुई। पांच प्रतिशतवाले स्लैबको बढ़ाकर छहसे आठ प्रतिशत किया जा सकता है। साथ ही १२ प्रतिशतवाले स्लैबको १५ प्रतिशत करनेपर भी सहमति बन रही है। तम्बाकू उत्पादोंपर सेसकी दरोंमें वृद्धि की जा सकती है। १८ दिसम्बरको होनेवाली बैठकमें नयी दरोंको स्वीकृति मिल सकती है। वस्तुत: जीएसटी राजस्व लक्ष्यसे लगातार पीछे है जिससे सरकारकी चिन्ता बढ़ी है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमणने पिछले दिनों जीएसटी दरोंमें बदलाव करनेका संकेत भी दिया था। उसीके अनुरूप इस दिशामें विभागीय सक्रियता बढ़ी है। जीएसटी राजस्वमें कमी आनेके कई कारण हैं। अर्थव्यवस्थामें सुस्तीके साथ ही करोंकी चोरी भी बड़ा कारण है। सरकारको करोंकी चोरीपर अंकुश लगानेकी दिशामें अधिक सक्रियता दिखानेकी जरूरत है। करकी दरें बढ़ाना अन्तिम विकल्प है। दरें बढऩेसे उपभोक्ताओंपर आर्थिक बोझ बढ़ता है। जीएसटीका दायरा बढ़ाया जा सकता है। इसमें पेट्रोलियम उत्पादोंको भी शामिल किया जाना चाहिए जिसकी मांग पहलेसे ही की जा रही है लेकिन सरकार इस दिशामें आगे बढऩेके पक्षमें नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पेट्रोल और डीजलकी बिक्रीसे सरकार विभिन्न मदोंमें करोंकी वसूली करती है। यदि पेट्रोल और डीजल जीएसटीके दायरेमें आ जाय तो उपभोक्ताओंको बड़ी राहत मिलेगी। जो भी हो, जीएसटी दरें बढ़ानेसे सरकारकी आमदनी तो बढ़ेगी लेकिन यह उपभोक्ताओंके लिए कष्टïकारी साबित होगा। इसलिए दर बढ़ाते समय उपभोक्ता हितोंको भी ध्यानमें रखना चाहिए।