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अजातशत्रुका तिरोधान

भारतीय राजनीतिके अजातशत्रु लोकप्रिय जन-नेता पूर्व प्रधान मन्त्री अटल बिहारी वाजपेयीका गुरुवारको सायंकाल पांच बजकर पांच मिनटपर दिल्लीके अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान (एम्स) में निधन राष्ट्रकी अपूरणीय क्षति है। उन्हें ११ जूनको एम्समें भरती कराया गया था और स्वास्थ्यमें निरन्तर उतार-चढ़ाव बना हुआ था। बुधवारको उनकी स्थिति काफी खराब हो गयी, जिसमें सुधार नहीं हो पाया। ९३ वर्षीय भाजपा नेता वाजपेयीको जीवनरक्षक प्रणालीपर रखा गया था। उनकी किडनी और मूत्रनलीमें संक्रमण हो गया था। उनके स्वास्थ्यकी जानकारी प्राप्त करनेके लिए बुधवारसे ही प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी, उनके मंत्रिमण्डलके सदस्यों, विभिन्न राज्योंके मुख्य मन्त्रियोंका निरन्तर तांता लगा रहा। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू भी एम्स पहुंचे थे। साथ ही कांग्रेस सहित अनेक राजनीतिक दलोंके नेताओंके आनेका भी क्रम बना रहा। अटल बिहारी वाजपेयीने तीन बार प्रधान मन्त्री पदका दायित्व सम्भाला था और अपनी सूझबूझ और दूर दृष्टिसे देशको कुशल नेतृत्व प्रदान किया। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे अच्छे कवि, पत्रकार और प्रखर वक्ता थे। उनके प्रशंसकोंकी बहुत बड़ी संख्या है। सभी दलोंके बीच सम्मान उनके व्यक्तित्वको शिखरपर प्रतिष्ठिïत करता है। दृढ़ निश्चय और संवेदनशीलताके वे धनी व्यक्ति थे। दस बार लोकसभा और दो बार राज्यसभाके चुनावमें विजयी होना उनके कुशल और लोकप्रिय राजनेता होनेका प्रमाण है। १९९९ में वह पहले ऐसे गैरकांग्रेसी प्रधान मन्त्री बने, जिन्होंने पांच वर्षका कार्यकाल पूरा किया। १९७७ में जनता पार्टीकी सरकारमें परराष्टï्रमंत्रीके रूपमें संयुक्त राष्ट्रसंघमें हिन्दीमें दिया गया उनका भाषण ऐतिहासिक माना जाता है। भारतीय जनसंघकी स्थापनामें उनकी प्रमुख भूमिका रही। १९६८ से १९७३ तक वे जनसंघके भी अध्यक्ष थे। आजीवन राजनीतिमें सक्रिय रहे अटल बिहारी वाजपेयीने राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन आदि पत्र-पत्रिकाओंका सम्पादन भी किया। वाजपेयी देशके उन चन्द प्रधान मन्त्रियोंमेंसे एक थे, जिन्हें हमेशा बेबाक फैसलोंके लिए स्मरण किया जायगा। राजनीतिमें उनका प्रवेश १९४२ में भारत छोड़ो आन्दोलनमें भाग लेनेके साथ हुआ। राष्ट्रसेवाओंका सम्मान करते हुए उन्हें २०१५ में भारतरत्न अलंकरणसे विभूषित किया गया। वाजपेयीके निधनसे उनके प्रशंसकोंको गहरा आघात पहुंचा है। ऐसे लोकप्रिय जन-नेताको शत-शत नमन।
एक साथ चुनाव
'एक राष्ट्र एक चुनाव’ के मुद्देपर चर्चाएं शुरू हो गयी हैं। जिस प्रकार 'एक राष्ट्र एक कर’ की व्यवस्था जीएसटीके माध्यमसे लागू की जा रही है उसी प्रकार देशमें एक साथ लोकसभा और राज्य विधानसभाओंके चुनाव भी सम्पन्न करनेकी व्यवस्था उचित है। केन्द्र सरकार इस दिशामें सोचती भी है। अभी हाल ही में आगामी लोकसभाके साथ ही ११ राज्योंमें भी विधानसभाओंके चुनाव कराये जानेकी बातें सामने आयी थीं लेकिन इसके व्यावहारिक पक्षपर विचार किये बिना ऐसा सम्भव प्रतीत नहीं होता है। मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावतने कहा कि निर्वाचन आयोगने २०१५ में स्वयं यह सुझाव दिया था लेकिन कानूनमें परिवर्तन किये बिना यह सम्भव नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि कुछ विधानसभाओंके कार्यकालमें विस्तार अथवा कटौती की आवश्यकता होगी तो इसके लिए संवैधानिक संशोधनकी जरूरत पड़ेगी। भारतीय जनता पार्टीके अध्यक्ष अमित शाहने विधि आयोगको पत्र लिखकर एक साथ चुनाव करानेका समर्थन किया था। आवश्यकता इस बातकी है कि इस मुद्देपर सर्वदलीय बैठक हो और राष्ट्रीय स्तरपर बहस भी शुरू की जाय। एक साथ चुनाव करानेसे खर्चमें काफी कमी आयेगी और अन्य परेशानियोंसे भी मुक्ति मिलेगी। मौजूदा स्थितिमें निर्वाचन आयोगको हर वर्ष चुनाव करानेकी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है, क्योंकि अलग-अलग विधानसभाओंके कार्यकाल भी अलग हैं। पूरा प्रशासनिक तंत्र इसीमें व्यस्त रहता है। इसलिए यदि देशमें सर्व सहमतिकी राय बने तो संविधानमें आवश्यक संशोधनके लिए कदम आगे बढ़ाया जाय। वैसे एक साथ चुनाव कराना राष्टï्रहितमें है। जो भी हो, चुनावसे सम्बन्धित यह मुद्दे प्रासंगिक हैं। बस आम सहमतिकी जरूरत है।