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अगस्ता घोटालेके खुलेंगे राज

इतालवी कंपनी फिनमैकेनिकाकी ब्रिटिश सहयोगी कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड मामलेके बिचौलिये मिशेलको भारत लाना मोदी सरकारकी बड़ी कामयाबी है। मिशेलपर ३६०० करोड़ रुपयेके हेलीकॉप्टर घोटालेमें अगस्ता वेस्टलैंडको ठेका दिलाने और भारतीय अधिकारियोंको रिश्वतका भुगतान करनेका आरोप है।
सवाल है कि जब देशमें पहले भी रक्षा सौदोंमें गड़बडिय़ां और घोटालेके मामले उजागर हो चुके हैं तो मनमोहन सरकारकी जिम्मेदारी थी कि वह इस सौदेपर नजर रखे और हथियारों और सुरक्षा उपकरणोंकी खरीदके लिए पारदर्शी नीति बनायें। लेकिन ऐसा न कर यही साबित किया कि उनके लिए देशकी सुरक्षासे ज्यादा महत्वपूर्ण दलालोंका बचाव करना था। देखना दिलचस्प होगा कि मिशेलकी गिरफ्तारीसे देशकी सुरक्षासे घात करनेवाले देशद्रोहियों एवं रिश्वतखोरोंके चेहरे बेनकाब होते हैं या नहीं?
इतालवी कंपनी फिनमैकेनिका की ब्रिटिश सहयोगी कंपनी अगस्ता वेस्टलैंडमें दलालीके खेलमें नौकरशाहोंके साथ नेताओंकी भी मिलीभगत है। उम्मीद है कि मिशेलकी गिरफ्तारीसे बहुत कुछ सामने आयेगा। सीबीआई कह भी चुकी है कि अगस्ता वेस्टलैंडकी ओरसे दलालीकी रकम क्रिश्चयन मिशेलकी कंपनियोंमें दिये जानेके पुख्ता सुबूत हैं, लिहाजा मिशेलके लिए अपना और रिश्वतखोरोंका बचाव करना आसान नहीं होगा। इस हेलीकॉप्टर खरीद घोटालेमें गिरफ्तार पूर्व वायु सेना अध्यक्ष एस.पी. त्यागी कह चुके हैं कि हेलीकॉप्टर खरीदका निर्णय उन्होंने अकेले नहीं लिया, बल्कि इसकी जानकारी तत्कालीन प्रधान मंत्री कार्यालयको भी थी। संभव है कि सीबीआई तत्कालीन प्रधान मंत्री डा. मनमोहन सिंहसे भी पूछताछ करे। यदि ऐसा होता है तो न सिर्फ कांग्रेसकी मुश्किलें बढ़ेगी, बल्कि दस जनपथको भी कई सवालोंका जवाब देना होगा। ऐसा इसलिए कि इटलीकी अदालत मिलान कोर्ट ऑफ अपील्स अगस्ता वेस्टलैंडके प्रमुख जिउसेपे ओरसीको भारतमें नेताओं और अफसरोंको रिश्वत देनेका दोषी पा चुकी है। अदालतने अपने फैसलेमें यह भी कहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, उनके सहयोगी तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायण और तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंहके समक्ष कंपनीने लॉबिंग की और सोनिया गांधीके राजनीतिक सचिवको सौदा पूरा करानेके लिए १५ से १६ यूरो मिलियन दिये गये।
गौरतलब है कि इस फैसलेमें सोनिया गांधीका नाम चार बार आया है और उन्हें 'सिग्नोरा गांधीÓ कहा गया है। सिग्नोराका तात्पर्य श्रीमती होता है। यहां ध्यान देना होगा कि यह घोटाला अति विशिष्ट हस्तियोंके लिए इटलीकी अगस्ता वेस्टलैंड कंपनीसे ३६०० करोड़ रुपयेके १२ एडब्लू-१०१ हेलीकॉप्टरोंके सौदेसे जुड़ा है जिसमें २८३ करोड़ रुपयेकी दलालीका मामला सामने आया। गौरतलब है कि अदालतने इस घोटालेमें २००४-०७ के दौरान वायुसेना प्रमुख रहे एस.पी. त्यागीको भी भ्रष्टाचारका दोषी पाया और यह उजागर हुआ कि हेलीकॉप्टर बनानेवाली कंपनी फिनमेकैनिका एयरोस्पेसने बिचौलिये गुड्डो राल्फ हाशकेके जरिये उनके पास दलालीकी रकम पहुंचायी। सेबीके रिकार्डपर गौर करें तो हाशके २००९ तक एमजीएफ एमारके बोर्ड ऑफ डाइरेक्टरमें शामिल था जिसमें राहुल गांधीके अति निकटस्थ कनिष्क सिंहकी हिस्सेदारी थी। बिचौलिये हाश्के द्वारा स्वीकार किया जा चुका है कि दलालीके रूपमें उसे सौदेका ३.५ फीसदी यानी २० मिलियन यूरो (१४४ करोड़ रुपये) मिला और उसका ६० फीसदी हिस्सा यानी १२ मिलियान यूरो त्यागी बंधुओं (संजीव, डोक्सा एवं संदीप त्यागी) तक पहुंचाया। दलालीकी रकम ट्यूनीशियाके रास्ते भारत भेजी गयी। पूर्व वायुसेना प्रमुख एस.पी. त्यागी स्वीकार कर चुके हैं कि बिचौलियेसे उनकी मुलाकात हुई और जांचकर्ताओं द्वारा जिन तीन लोगोंका नाम लिया गया वह उनके रिश्तेदार हैं। गौरतलब है कि आरोपी तीन लोगोंमें एक एस.पी. त्यागीका भतीजा भी है जिसने उन्हें बिचौलिये कार्लो गेरोसासे मिलवाया। त्यागीका कहना है कि उनकी मुलाकात दलालीके सिलसिलेमें नहीं, बल्कि हेलीकॉप्टरके तकनीकी पहलूको समझनेके लिए हुई। यह जांचका विषय है कि दलालीके इस खेलमें एस.पी. त्यागीकी भूमिका रही या नहीं लेकिन उनकी गिरफ्तारी बिना किसी ठोस सुबूतके नहीं हुई होगी।
हालांकि मामला उजागर होनेके बाद डा. मनमोहन सिंहकी सरकारने यह सौदा २०१४ में रद कर दिया और हेलीकॉप्टरोंकी अगली खेपपर रोक लगा दी। लेकिन उनकी सरकारने देशको तबतक अंधेरेमें रखा जबतक कि फिनमैकेनिका कंपनीके सीईओ और चेयरमैन गियुसिपी ओरसीको गिरफ्तारी नहीं हो गयी। मनमोहन सरकार ईमानदार तब कही जाती जब सौदेमें दलालीका मामला सामने आनेके बाद अगस्ता वेस्टलैंड कंपनी और भारतीय संपर्कोंको खंगाला जाता। मजेकी बात यह कि जब लोकसभामें विपक्षी दलोंने इस मसलेपर सरकारसे असलियत जानना चाहा तो तत्कालीन रक्षा राज्यमंत्री पल्लम राजूने कहा कि हेलीकॉप्टर सौदा पूरी तरह पारदर्शी है और इसमें किसी तरहकी दलाली नहीं खायी गयी। लेकिन कंपनीके सीईओ और चेयरमैन गियुसिपी ओरसीको गिरफ्तारीके बाद तत्कालीन मनमोहन सरकारके हाथ-पांव फूल गये थे। ओरसीपर आरोप है कि उसने वेस्टलैंड हेलिकॉप्टरोंकी डील हासिल करनेके लिए दलालोंकी मदद ली और इसके लिए उनको ५१ मिलियन यूरो यानी ३५० करोड़ रुपये दलालीके रूपमें दिये।
दलालीका मामला सतहपर तब उभरा जब बिचौलिये हाशके और उसके बिजनेस पार्टनर कार्लो गेरोसाके बीच रकमको लेकर झगड़ा हुआ। इस झगड़ेकी भनक इटली सरकारको लगी और मीडियाने तूल दे दिया। यहां जानना जरूरी है कि अगस्ता वेस्टलैंड कंपनीमें इटली सरकारकी भी ३० फीसदीकी हिस्सेदारी है। इटली सरकारकी हिम्मत और ईमानदारीकी दाद देनी चाहिए कि उसने अपनी ही कंपनीके सीईओको गिरफ्तार कर मिसाल कायम की। उसे इस बातकी चिंता नहीं रही कि देश-दुनियामें उसकी साखको धक्का पहुंचेगा। तत्कालीन मनमोहर सरकारको इटली सरकारसे सबक लेनी चाहिए थी। लेकिन दुखद है कि वह सबक लेनेके बजाय अपनी बचाव करती रही। तब वह कहती रही थी कि सौदेके शर्तोंमें बदलाव वाजपेयी सरकारके दौरान हुआ इसलिए इस दलालीके खेलके लिए यूपीए सरकार जिम्मेदार नहीं हैं। लेकिन सवाल यहां सौदेके शर्तोंमें बदलाव का नहीं, दलालीमें खाये गये रकमका है।
२००४ में एनडीए सरकार चली गयी और शर्तोंमें बदलावपर अमल २००५ में यूपीए सरकारके दौरान हुआ। तथ्य यह भी है कि इटलीकी जांच एजेंसीने २००५ से २०११ के बीच ही दलालीकी बात कही है। लेकिन बेशर्मीकी हद है कि कांग्रेसके सिपाहसालार अपनी सरकारके कुकर्मोंका ठीकरा कहीं और फोड़कर बचाव मुद्रामें हैं। मान भी लिया जाय कि एनडीए सरकारने सौदेकी शर्तोंमें परिवर्तन किया तो क्या यूपीए सरकारकी जिम्मेदारी नहीं थी कि वह पुन: शर्तोंकी समीक्षा कर नये नियम बनाये? यदि उसने ऐसा नहीं किया तो मतलब साफ है कि वह एनडीए सरकारके दौरान लिये गये निर्णयसे संतुष्टï थी। अब जब हेलीकॉप्टर सौदेमें मिशेलकी गिरफ्तारी हो चुकी है और दलालीका मामला उजागर होनेकी नौबत आ चुकी है तो कांग्रेस पार्टी कुतर्क गढ़ रही है। दरअसल उसे अपने नेताओंके फंसनेका डर सताने लगा है। उनके मनमें भय व्याप्त है कि यदि जांचकी आंच दस जनपथतक पहुंची तो जवाब देते नहीं बनेगा।
फिलहाल कांग्रेस पार्टी चाहे जिस तरह अपना बचाव करे लेकिन यह सच है कि उसके इशारेपर ही हेलीकॉप्टर सौदेमें दलालोंने अपनी कारस्तानीको अंजाम दिया। अन्यथा कोई कारण नहीं कि तत्कालीन मनमोहन सरकार हेलीकॉप्टर सौदेमें दलालोंकी संलिप्तताकी जानकारीके बाद भी हाथपर हाथ धरी बैठी रही। देश जानना चाहता है कि आखिर सरकारकी खुफिया एजेंसियां क्या करती रही? सवाल यह भी है कि जब देशमें पहले भी रक्षा सौदोंमें गड़बडिय़ां और घोटालेके मामले उजागर हो चुके हैं, तो क्या मनमोहन सरकारकी जिम्मेदारी नहीं थी कि वह इस सौदेपर नजर रखे? क्या उसकी जिम्मेदारी नहीं थी कि वह हथियारों और सुरक्षा उपकरणोंकी खरीदके लिए ठोस पारदर्शी नीति बनाये? लेकिन उसने ऐसा न कर यही साबित किया कि उसके लिए देशकी सुरक्षासे ज्यादा महत्वपूर्ण दलालोंका बचाव करना था। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्रिश्चयन मिशेलकी गिरफ्तारीसे देशकी सुरक्षासे घात करनेवाले देशद्रोहियों एवं रिश्वतखोरोंके चेहरे बेनकाब होते हैं या नहीं? उचित होगा कि जांच एजेंसिया उन सभी लोगोंकी धरपकड़ तेज करें जो दलाली और रिश्वतके खेलमें साझीदार रहे हैं।