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बढ़ती महंगीसे जनता परेशान-ललित गर्ग

हालके दिनोंमें पेट्रोल और डीजलकी कीमत साल २०१४ के बाद सबसे ऊंचे स्तरपर पहुंच गयी है जबकि अन्तरराष्ट्रीय बाजारमें कच्चे तेलकी कीमतें तीन साल पहलेके मुकाबले आधी रह गयी हैं, बावजूद इसके देशमें पेट्रोल, डीजलकी कीमत लगातार बढ़ती जा रही है।
बार-बार पेट्रोल और डीजलके दाम बढ़ाना सरकारकी नीयतमें खोटको ही दर्शाता है, इस तरहकी सरकारकी नीति बिल्कुल गलत है। इससे जनताका भरोसा टूटता है और यह भरोसा टूटना सरकारकी विफलताको जाहिर करता है। देखनेमें आ रहा है कि सरकार अपनी नीतियोंसे उच्च वर्ग एवं मध्यम वर्गपर कठोरता बरत रही है, लेकिन वंचित वर्ग भी इस कठोरताका शिकार हो रहा है। नेतृत्व चाहे किसी क्षेत्रमें हो। राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, वह सुविधानुसार अपनी ही परिभाषा गढ़ता रहा है। लोकतंत्रको भीड़तंत्र बनने दिया जा रहा है। अपने स्वार्थके लिए नेतृत्व हमेशासे ही झूठा श्रेय लेता आ रहा है और भीड़ आरती उतारती रही है। लेकिन इस तरहकी स्थितियोंमें कोई भी राष्ट्र कभी भी मजबूत नहीं बनता।


पेट्रोल और डीजलके दाम बढऩेका सीधा असर आम आदमीकी थालीपर पड़ता है। गरीबोंके साथ यह क्रूर मजाक है। महंगी बढऩेका कारण बनता है पेट्रोल और डीजलके दामोंमें वृद्धि होना। इससे मध्यम एवं निम्न वर्गके लोगोंकी हालत तबाही जैसी हो जाती है, वह अपनी परेशानीका दुखड़ा किसके सामने रोयें। बार-बार पेट्रोल और डीजलके दाम बढ़ाना सरकारकी नीयतमें खोटको ही दर्शाता है, इस तरहकी सरकारकी नीति बिल्कुल गलत हैै। इस तरहकी नीतियोंसे जनताका भरोसा टूटता है और यह भरोसा टूटना सरकारकी विफलताको जाहिर करता है। जिसके पास सब कुछ, वह स्वयंभू नेता और जिसके पास कुछ नहीं, वह निरीह जनता। इसी परिभाषाने तथाकथित नेताओंको बड़बोला बना दिया है, पेट्रोल और डीजलके बढ़े दामोंकी नाराजगीके बीच नये बने केन्द्रीय पर्यटन राज्यमंत्री अल्फोंस कनन्नथानमने ऐसा बयान दिया है जो जलेपर नमक छिड़कनेका काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि पेट्रोल-डीजल खरीदनेवाले लोग कोई भूखे रहनेवाले नहीं हैं, वह कार और मोटरसाइकिलोंसे चलते हैं। उन्हें डीजल और पेट्रोलका पैसा खर्च करनेमें क्यों तकलीफ होनी चाहिए। तेलकी कीमत बढ़ानेका फैसला सरकारने जानबूझ कर किया है। इससे मिलनेवाले राजस्वका उपयोग गरीबोंके लिए आवास, शौचालय बनाने और बिजली पहुंचानेपर खर्च किया जाता है। यह तर्क इसलिए लोगोंके गले नहीं उतर रहा कि पहले ही सरकारने अलग-अलग मदोंमें कई तरहके उपकर लगा रखे हैं।
नोटबंदीके बाद जीएसटीके घाव अभी भरे ही नहीं कि ऊपरसे इस तरहके बयान सरकारकी तानाशाहीको दर्शाते हैं। देशमें ऐसे कितने लोग हैं जो कारों एवं मोटरसाइकिलोंपर चलते हैं। क्या गरीबोंके नामपर गरीबीका मजाक नहीं उडाया जा रहा है। क्या इसका असर किसानों, मजदूरों, गरीबों और मेहनतकशोंपर नहीं पड़ेगा। आम जनतापर जबरन लादा जा रहा है इस तरहका भार। अतार्किक ढंगसे गलत निर्णयों एवं नीतियोंको जायज ठहरानेकी कोशिशोंसे सरकारकी छवि खराब ही होती है। आखिर दाम बढ़ाने एवं करोंके निर्धारणमें कोई व्यावहारिक तर्क तो होना चाहिए। यह विडम्बनापूर्ण बयान है कि पेट्रोल-डीजलकी कीमतें बढऩेसे केवल आम वाहन चालकोंपर असर नहीं पड़ता, असर उनपर भी पड़ता है, बजट उनका भी डांवाडोल होता है, परेशान वह भी होते हैं, लेकिन इसका ज्यादा असर आम जनजीवनपर पड़ता है क्योंकि इससे ढुलाई, सार्वजनिक परिवहन और फिर उपभोक्ता वस्तुओंकी कीमतें भी बढ़ती हैं। अभी जब विकास दरने नीचेका रुख किया हुआ है और महंगी ऊपर चढ़ रही है, पेट्रोल-डीजलकी बढ़ती कीमतें उनसे पार पानेमें मुश्किलें ही पैदा करेंगी। कोई भी सरकार स्पष्ट बहुमतमें होनेका अर्थ यह नहीं कि वह मनमानी करे। मंत्रीजीका यह तर्क कि गरीबोंके कल्याणकी योजनाओंके लिए यह वृद्धि की गयी है, गले नहीं उतरती। क्योंकि पेट्रोल और डीजलसे मिलनेवाले राजस्वका कितना हिस्सा अबतक गरीबोंके उत्थानके लिए उपयोग किया गया है, इसका कोई जवाब शायद उनके पास नहीं होगा।
नेतृत्वकी पुरानी परिभाषा थी, 'सबको साथ लेकर चलना, निर्णय लेनेकी क्षमता, समस्याका सही समाधान, कथनी-करनीकी समानता, लोगोंका विश्वास, दूरदर्शिता, कल्पनाशीलता और सृजनशीलता।Ó लेकिन अल्फोंसके बयान एवं अतार्किक पेट्रोल-डीजलकी कीमतोंमें वृद्धिने इस परिभाषापर पानी फेर दिया है। २०१४ चुनावोंसे पहले बीजेपीका नारा था, 'बहुत हुई महंगीकी मार, अबकी बार मोदी सरकारÓ सरकार बने तीन साल बीत चुके हैं लेकिन जो महंगी कांग्रेस राजमें भाजपाके लिए डायन थी वह अब देवी बन गयी है। लगातार महंगी बढ़ती ही जा रही है लेकिन पता नहीं किन विवशताओंके चलते विपक्ष भी सरकारके खिलाफ मुंह खोलनेको तैयार नहीं है। कच्चे तेलकी कीमत मनमोहन सरकारकी तुलनामें आधी हो गयी है लेकिन मोदी सरकारमें लगातार पेट्रोल-डीजलके दाम बढ़ते ही जा रहे हैं। मोदी सरकारकी जनलुभावन योजनाओंमें इस तेल नीतिने पलीता लगा दिया है। जब भाजपा सरकार बनी थी तो तेलकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजारमें ६००० रुपये प्रति बैरल थी, अब वह ३०० रुपये बैरल हो गयी है। इस हिसाबसे आज भारतमें पेट्रोल ३०-३५ रुपये लीटर बिकना चाहिए लेकिन उसे ८० रुपये लीटर कर दिया गया है। पेट्रोलपर सवा सौ प्रतिशत और डीजलपर पौने चार सौ प्रतिशत कर ठोक दिया गया है। यह सरासर लूटपाट नहीं है तो क्या है? संप्रग सरकारके समय जब अंतरराष्ट्रीय बाजारमें कच्चे तेलकी कीमतें लगातार बढऩेकी वजहसे पेट्रोल-डीजलके दाम बढ़ानेका फैसला किया गया था, तब भाजपाने किस तरह संसदमें हंगामा किया था। आजके अनेक मंत्री एवं भाजपा नेताओंने किस तरह विरोध प्रदर्शन किया, सोशल मीडियापर उन तस्वीरोंको देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। एक बार तो अटल बिहारी वाजपेयीने संसद परिसरमें बैलगाड़ीपर बैठकर जुलूस निकाला था।
अब जब कच्चे तेलकी कीमतें काफी कम हैं, डीजल-पेट्रोलके दाम बढ़ाकर गरीबोंके उत्थानका हवाला देना तर्कसंगत नहीं है, जबकि नेताओं और नौकरशाहोंकी फिजूलखर्ची और ठाठ-बाटमें कोई कमी नहीं आयी है। सरकारकी नीतियोंपर संदेह होने लगा है, इन स्थितियोंमें कैसे नया भारत निर्मित होगा। कैसे भ्रष्टाचारपर अंकुश लगेगा। देखनेमें आ रहा है कि सरकार अपनी नीतियोंके माध्यमसे उच्च वर्ग एवं मध्यम वर्गपर कठोरता बरत रही है, लेकिन आखिरकार वंचित वर्ग इस कठोरताका शिकार हो रहा है। जनताको अमीर बना देंगे, हर हाथको काम मिलेगा, सभीके लिए मकान होंगे, सड़कें, स्कूल-अस्पताल होंगे, बिजली और पानी होगा। सरकारकी इन योजनाओं एवं नीतियोंके जनता मीठे स्वप्न लेती रहती है। कोई भी सरकार हो, जनताको ऐसे ही सपने दिखाये जाते हैं, परन्तु यह दुनियाका आठवां आश्चर्य है कि कोई भी सपना या लक्ष्य अपनी समग्रताके साथ प्राप्त नहीं हुआ। नेतृत्व चाहे किसी क्षेत्रमें हो। राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, वह सुविधानुसार अपनी ही परिभाषा गढ़ता रहा है। न नेता का चरित्र बन सका, न जनताका और न ही राष्ट्रका चरित्र बन सका। सभी भीड़ बनकर रह गये। लोकतंत्रको भीड़तंत्र बनने दिया जा रहा है। अपने स्वार्थ, प्रतिष्ठाके लिए आंकड़ोंकी ओटमें नेतृत्व झूठा श्रेय लेता रहा और भीड़ आरती उतारती रही। लेकिन इस तरहकी स्थितियोंमें कोई भी राष्ट्र कभी भी मजबूत नहीं बनता।