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महान वटवृक्ष राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त

राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति राष्ट्ररत्न शिवप्रसादजीके जीवनके हर तन्तुमें विद्यमान रही है। समाज और राष्ट्रकी सेवा आपका व्रत रहा है। आपने पराधीनताके बन्धनको तोडऩेके लिए जो संघर्ष किया और जितना कष्टï झेला, उसकी मिसाल मिलना कठिन है। जीवनके घनघोर संकटके समय भी आप सत्य, न्याय और देशप्रेमकी भावनासे विचलित नहीं हुए। आपकी स्वराज्य और राष्ट्रनिर्माणकी परिकल्पना व्यापक और बहुत ही गहरी रही है। आपने राष्ट्रके गौरववर्धन और भारतीयोंकी गरिमाकी प्रतिष्ठाके लिए अपने तन-मन-धनसे जो कुछ किया, वह वन्दनीय है। आपका विलक्षण व्यक्तित्व और कालजयी कृतित्व है। आपकी स्मृति सदा जीवित-जागृत रहेगी और प्रेरणाका अजस्र स्रोत बनी रहेगी। आप हमारे लिए विशाल वटवृक्षके समान हैं। जन्मतिथिपर आप जैसे महान विभूतिको शत-शत प्रणाम।     
नामधन्य राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त महान देशभक्त और स्वतन्त्रता संग्रामके नायक थे। मातृभूमिकी स्वतन्त्रता और गौरववृद्धिके लिए असीम उत्साह, सर्वस्वत्याग और उत्सर्गकी भावनाके साथ आपने जिस तरह राष्रीत्य संग्रामका नेतृत्व किया, उसकी दूसरी मिसाल मिलना कठिन है। आपकी स्वराज्य और राष्ट्रनिर्माणकी परिकल्पना व्यापक और बहुत गहरी रही है। राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति आपके जीवनके हर तन्तुमें विद्यमान रही है। राष्ट्रके गौरववर्धन और भारतीयोंके गरिमामय जीवनके लिए इस महापुरुषने अपने तन-मन-धनसे जो किया, वह वन्दनीय है। ज्ञानमण्डल, 'आज’, काशी विद्यापीठ और भारतमाताका मन्दिर आपकी अक्षय कीर्तिके साक्षी हैं। भारतकी स्वतन्त्रताका संकल्प कैसे साकार हो, इस चिन्तनमें निमग्न राष्ट्ररत्न गुप्तजीने विश्व भ्रमण किया और स्वतन्त्र राष्टï्रोंकी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक उन्नतिका अवलोकन किया। विश्व यात्राके समय आप केवल स्वतन्त्रताका स्वप्न ही नहीं देख रहे थे अपितु भारतके राष्ट्रीय विकास योजनाओंकी भी परिकल्पना करते थे। कभी स्वतन्त्रताका सोल्लास उपभोग करते नागरिकोंको देख आपको भारतीयोंकी दुर्दशापर ग्लानि होती थी तो कभी भावुक हो जाते थे। एक ऐसा ही क्षण मिस्रकी यात्राके समय आया जब पांच हजार वर्ष बाद भी शवोंको सुरक्षित देखकर आपका मन स्पंदित हो उठा। आपने अपनी पुस्तक 'पृथ्वी प्रदक्षिणाÓ में अपने मनोभावोंको शब्दोंमें इस प्रकार व्यक्त किया है- 'संसारमें वही जाति जीवित रहेगी जो दूसरोंके लिए जीती है। हे भारतके निवासियों! क्या तुम्हारा यह दावा सत्य है? यदि सत्य है तो इसका प्रमाण दो, उठो, जागो, प्रभात हो गया। संसार तुम्हारी ओर देख रहा है। तुम संसारको यह सन्देश दो जिसके लिए तुम सदासे जीवित हो और सर्वदा जीवित रहना चाहते हो। जीवित शक्तिका प्रमाण मुर्दे नहीं देते किन्तु जीवित व्यक्ति ही देते हैं।‘ आपके इस सन्देशका उद्देश्य गुलामीकी जंजीरमें जकड़े भारतके सुप्त जनमानसको जागृत करना रहा है।
विश्व यात्रा कर स्वदेश लौटनेपर राष्ट्ररत्न गुप्तजीने तीन महान कार्य किये- 'ज्ञानमण्डल, 'आज’ और काशी विद्यापीठकी स्थापना।‘ इनके माध्यमसे देशके स्वतन्त्रता आन्दोलनको जो बल मिला, वह भुलाया नहीं जा सकता है। सन्ï १९२०-२१ में जब महात्मा गांधीने असहयोग आन्दोलन शुरू किया तब राष्ट्ररत्न गुप्त जीने उनके आन्दोलनमें अपनेको समर्पित कर दिया। गांधी जीने सरकारकी सहायतासे चलनेवाले स्कूलोंके बहिष्कारका आह्वïान किया था। सरकारी नौकरी छोडऩा और अदालतोंका बहिष्कार कर वकील भी देशकी सेवामें संलग्न हों, यह भी असहयोग आन्दोलनका हिस्सा था। गांधी जीने हिन्दीके प्रचार-प्रसारपर बल दिया ताकि वह देशकी राष्ट्रभाषा बन सके। वे कहते थे कि जिस देशकी अपनी भाषा नहीं वह गूंगा है। राष्ट्ररत्न गुप्तजीने असहयोगके सभी कार्यक्रमोंको अपनाया पर विशेषकर शिक्षण संस्थाओंके बहिष्कार तथा हिन्दीके प्रचार-प्रसारके लिए आपने समर्पित भावसे कार्य किये। आपने 'आज’ के माध्यमसे जहां जनतामें स्वाभिमान जाग्रत किया वहीं त्याग और बलिदानके लिए उसे प्रेरित भी किया। स्वतन्त्रता आन्दोलनमें 'आज’ ने जो योगदान किया, वह स्वर्ण अक्षरोंमें अंकित करने योग्य है। उन दिनों काशी विद्यापीठ राष्ट्रीय आन्दोलनका केन्द्रबिन्दु बन गया था। सरकारी सेवा छोड़कर आन्दोलनमें कूदनेवाले व्यक्तियोंके लिए यह पालन-पोषण स्थल बन गया। सरकारी सेवा त्याग कर डाक्टर सम्पूर्णानन्द और वकालत छोड़कर आचार्य नरेन्द्रदेव काशी विद्यापीठमें आ गये। पूर्व प्रधान मन्त्री लालबहादुर शास्त्री काशी विद्यापीठसे सम्बद्ध थे। अन्य कितने ही लोग काशी विद्यापीठसे जुड़े, उन सभीको राष्ट्ररत्न गुप्तजीने ससम्मान आश्रय प्रदान किया। भारत माताका अनोखा मन्दिर आपकी अनन्य राष्ट्रीयताका प्रतीक है। इन कार्योंसे आपकी महानीयता सहज ही प्रमाणित हो जाती है।
राष्ट्ररत्न गुप्त जीने एक ओर जहां विदेशी सत्ताको उखाड़ फेंकनेके लिए संघर्ष तेज किया, वहीं दूसरी ओर देशको एकताके सूत्रमें बांधनेके लिए कमजोरियोंको दूर करनेका प्रयास भी किया। आपका विश्वास था कि इससे जनतामें आत्मविश्वास और आत्मबल उत्पन्न किया जा सकता है। देशमें जो राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां थीं वे स्वराज्य और राष्ट्रीय जागरणके मार्गमें बाधक थीं। देशकी अपनी भाषा समृद्ध नहीं थी, समाज रूढि़वादी था, सम्प्रदायिकताका जहर फैलता जा रहा था। आपने सामाजिक बुराइयोंके विरुद्ध संघर्षका बीड़ा उठाया। अछूतोद्धारके लिए आन्दोलनका सूत्रपात किया। विधवा विवाह और अन्तरजातीय विवाहको प्रोत्साहित किया। इतना ही नहीं, स्वतन्त्रता और राष्ट्रोन्नतिके लिए आप देशको एकताके सूत्रमें बांधना परम आवश्यक मानते थे। इसके लिए आपने अथक प्रयास किया। देशकी महान विभूति राष्ट्ररत्न गुप्तजी अपनी दानशीलता और उदारताके लिए तो प्रसिद्ध थे ही राष्ट्रकी स्वतन्त्रताके लिए बलिदानियोंके प्रति आपमें अनुपम सम्मान भी था। १३ अप्रैल, १९१९ के वैशाखी पर्वपर जलियांवाला हत्याकाण्डसे आप अत्यन्त मर्माहत थे। आप उस दिवसको देशका महान दिवस मानते थे। राष्ट्ररत्न शिव प्रसादजी जब फ्रांसमें थे, उनको कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू और श्री श्रीप्रकाशजीका पत्र मिला। आप यूरोप यात्रा बीचमें ही समाप्त कर स्वदेश लौट आयें। काशी पहुंचते ही आप असहयोग आन्दोलनमें कूद पड़े। टाउनहालकी सार्वजनिक सभाको सम्बोधित करते हुए आपने जनताको अन्तिम बलिदानके लिए प्रस्तुत रहनेका आह्वïान किया। देशमें नमक कानून तोडऩेका आन्दोलन उस समय जोर-शोरसे चल रहा था। राष्ट्ररत्न शिव प्रसादजीका नेतृत्व मिलते ही जनतामें जोश आ गया। चौक थानाके सामने नमक कानूनको तोड़ा गया। जगह-जगह इसकी पुनरावृत्ति हुई। लाठी और गिरफ्तारीका दौर-दौरा भी इसे नहीं रोक सका। केवल काशी ही नहीं, पूरे युक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) में नमक सत्याग्रह फैल गया। राष्ट्ररत्न शिव प्रसादजीको गिरफ्तार कर लिया गया। एक वर्ष कारावासकी सजाके बाद आप २६ जनवरी, १९३१ को रिहा हुए। लेकिन लक्ष्यकी सिद्धिके बिना चैन कहां?
ब्रिटिश सरकारके काले कानूनके विरोधमें कांग्रेस कार्य समितिने दिसम्बर १९३१ में नये सिरेसे सत्याग्रह आरम्भ करनेका प्रस्ताव पारित किया। फिर क्या था दमनचक्र चल पड़ा। महात्मा गांधी, सरदार पटेल, सुभाषचन्द्र बसु आदि राष्टï्रीय नेता गिरफ्तार कर लिये गये। सरकारी दमनके विरोधमें ५ जनवरी, १९३२ को देशमें हड़तालका आह्वïान किया गया। काशी भला कैसे अछूती रह सकती थी। राष्ट्ररत्न शिवप्रसादजी और डाक्टर सम्पूर्णानन्द आदि प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिये गये। प्रात: काल पुलिस दल शिवप्रसादजीकी गिरफ्तारीके लिए सेवा उपवन पहुंचा। प्राय: आधे घण्टेमें आप स्नान, सन्ध्योपासन आदिसे निवृत्त होकर बाहर आये। आपकी सहधर्मिणीने आपको तिलक लगाया। आपने उक्त अवसरपर बुलन्द आवाजमें सन्देश देते हुए कहा कि काशीकी जनताको इस बारकी लड़ाईमें सब कुछ न्यौछावर कर देना चाहिए जिससे स्वतन्त्रता मिले बिना यह बन्द न हो और यही हुआ।
बादमें १८ जनवरीको बनारसके तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट चन्द्रमणिकी इजलासमें बन्दियोंके मामलेकी सुनवाई हुई। इस अवसरपर राष्ट्ररत्न शिव प्रसादजीने जिस निर्भीकतासे अपना वक्तव्य दिया, वह उत्सर्गकी भावनासे ओतप्रोत रहा है। पिताका नाम पूछनेपर आपने कहा कि मैंने जुर्म किया है, मेरे पिताके नामसे इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। आपने कहा कि मैं जात-पात नहीं मानता। जनताको उभाडऩा मेरा पेशा है। मैं पब्लिक एजीटेटर हूं। मैं इस सरकारको नहीं मानता। इसलिए कानून मेरे ऊपर लागू नहीं है। ४ तारीखको मैं सभामें मौजूद था। मुझे इस तमाशे (मामलेकी सुनवाई) में भाग लेना नहीं है। वस्तुत: यह आपकी उग्र क्रान्तिकारिता, अदम्य साहस और क्षमताका परिचायक है। सभी बन्दी धारा १८८ के अन्तर्गत दोषी करार दिये गये। राष्टï्ररत्न शिवप्रसादजी और सम्पूर्णानन्दको छ:-छ: मास सपरिश्रम कारावास तथा दो-दो सौ रुपये जुर्मानेका दण्ड दिया गया। १९३० के आन्दोलनके समय आपने कांग्रेस शिविरके लिए लक्खीचौतरा स्थित अपनी कोठी दे दी और कार्यकर्ताओंके भोजनकी व्यवस्था भी की गयी थी।
वास्तवमें राष्ट्ररत्न शिव प्रसादजी राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्रामके महान नायक थे। आजादीकी लड़ाई आपने जिस साहस और शौर्यके साथ लड़ी, उसका उदाहरण दुर्लभ है। आप सजा पूरी करनेके बाद जुलाई १९३२ में जेलसे मुक्त हुए। लेकिन जब देशमें जनतापर अत्याचार हो रहा हो, जनभावनाओंका दलन किया जा रहा हो, राष्ट्ररत्न शिव प्रसादजी कैसे विश्राम कर सकते थे। आपने १७ अगस्तको जनताके दमनकी सरकारी नीतिके विरोधमें विशाल जुलूसका नेतृत्व किया। आपको पुन: गिरफ्तार कर एक वर्ष कैदकी सजा दी गयी और लखनऊ जेल भेज दिया गया। यह जेल यात्रा आपके लिए घातक सिद्ध हुई। आप पक्षाघातसे पीडि़त हो गये। अक्तूबरमें आपको जेलसे मुक्त कर दिया गया। काशीमें सुयोग्य वैद्योंने राष्ट्ररत्न शिवप्रसादजीकी चिकित्सा की पर आपका स्वास्थ्य नहीं सुधरा। फिर भी आप अपने शिव संकल्पसे नहीं डिगे। पहियेदार कुर्सीपर बैठकर काशी विद्यापीठ जाते और कांग्रेसके कार्योंमें भी सम्मिलित होते थे। आपके निवास स्थानपर कांग्रेसके नेता, क्रान्तिकारियों और समाजसेवियोंका तांता लगा रहता था। जरूरतमन्दोंकी मुक्तहस्तसे सहायता करते थे। पर १९३७ में अपनी एकमात्र सन्तान पुत्रीके निधन और कुछ समयके बाद सहधर्मिणीकी मृत्युने आपका मनोबल तोड़ दिया। कुछ ही वर्षके बाद २४ अप्रैल, १९४४ को आपने महाप्रयाण किया।
वस्तुत: भारतीय स्वतन्त्रता संग्रामके निर्णायक दौरका आरम्भ १९३० से ही शुरू हुआ। अंग्रेज सरकारने इसे दबानेकी जितनी भी कोशिश की उतनी ही तेजीसे यह उग्र होता गया। बनारस इस आन्दोलनका एक प्रमुख केन्द्र बन गया था। देशभरके स्वतन्त्रता सेनानी यहां आते और राष्ट्ररत्न शिव प्रसादजीसे मुलाकात करते, परामर्श करते और जरूरत होनेपर आर्थिक मदद भी प्राप्त करते थे। सविनय अवज्ञा सत्याग्रहने विदेशी शासनकी चूलें हिला दी और इसके लिए आपने अपना सर्वस्व त्याग कर जो योगदान किया, वह भारतीय स्वतन्त्रताके इतिहासमें स्वर्णाक्षरोंमें अंकित रहेगा। राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति राष्ट्ररत्न शिवप्रसादजीके जीवनके हर तन्तुमें विद्यमान रही है। समाज और राष्ट्रकी सेवा आपका व्रत रहा है।
आपने पराधीनताके बन्धनको तोडऩेके लिए जो संघर्ष किया और जितना कष्टï झेला, उसकी मिसाल मिलना कठिन है। जीवनके घनघोर संकटके समय भी आप सत्य, न्याय और देशप्रेमकी भावनासे विचलित नहीं हुए। आपकी स्वराज्य और राष्ट्रनिर्माणकी परिकल्पना व्यापक और बहुत गहरी रही है। आपने राष्ट्रके गौरववर्धन और भारतीयोंकी गरिमाकी प्रतिष्ठाके लिए अपने तन-मन-धनसे जो कुछ किया, वह वन्दनीय है। आपका विलक्षण व्यक्तित्व रहा है और कालजयी कृतित्व है। आपकी स्मृति सदा जीवित-जागृत रहेगी और प्रेरणाका अजस्र स्रोत बनी रहेगी। जन्मदिनपर आप जैसे महान विभूतिको शत-शत प्रणाम।