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शान्ति समझौतेपर सन्देह

कतरकी राजधानी दोहामें अमेरिका और तालिबानके बीच शान्ति समझौतेपर मोहर लग गयी। अमेरिका अगले १४ महीनेमें अफगानिस्तानसे अपने सभी सैनिकोंको वापस बुला लेगा। इस करारके दौरान भारत सहित दुनियाके ३० देशोंके प्रतिनिधि मौजूद रहे। हालांकि यह करार भारतकी मुश्किलें बढ़ा सकता है।
भारत यात्रापर आये अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्पने प्रधान मंत्री मोदीसे शान्ति समझौतेको लेकर चर्चा की और प्रेस कांफ्रेंसमें भी इसे उद्ïघाटित किया। देखा जाय तो अमेरिकाने पहली बार भारतको तालिबानके साथ किसी बातचीतके लिए आधिकारिक तौरपर निमंत्रित किया और दोहा बेहतर नतीजेमें तब्दील हो गया। फिलहाल जैसा कि ट्रम्पने भी कहा है कि यदि अफगानिस्तान और तालिबान इन प्रतिबद्धताओंपर खरे उतरते हैं तो अफगानिस्तानमें युद्धको समाप्त करना और सैनिकोंको वापस ले जानेका रास्ता बनेगा
अमेरिका और तालिबानके बीच शान्ति समझौतेके अहम बिन्दुओंपर दृष्टिï डालें तो अमेरिका अपनी ओरसे अफगानिस्तानके सैन्य बलोंको प्रशिक्षित करेगा, ताकि भविष्यमें आन्तरिक और बाहरी हमलों एवं स्वयंका बचाव कर सकें। तालिबानने इस समझौतेके तहत अमेरिकाको भरोसा दिलाया है कि वह अलकायदा और दूसरे विदेशी आतंकी समूहोंसे नाता तोड़ लेगा। साथ ही अशगानिस्तानकी जमीनको आतंकवादी गतिविधियोंके लिए इस्तेमाल न करनेके लिए अमेरिकाकी सहायता करेगा। साल २०१८ में अमेरिकाने यह शर्त रखी थी, कि सेनाएं तभी वापस जायेंगी जब तालिबान आतंकी हमले नहीं होनेका विश्वास दिलाये। तालिबानका खुश होना लाजमी है परन्तु समझौतेकी शर्तोंको कठोरतासे पालन करना भी उसकी जिम्मेदारी है। समझौतेसे पहले तालिबानने लड़ाकुओंको हमले रोकनेका आदेश दिया था और इससे दूर रहनेके साफ संकेत भी दिये हैं। भारतको इस बातकी आशंका है कि यदि समझौतेके बाद तालिबानकी सरकार वहां बनती है तो इसमें भारतका हित प्रभावित हो सकता है। गौरतलब है कि तालिबान और पाकिस्तानका गहरा नाता रहा है। यदि तालिबानकी अफगानिस्तानमें स्थिति मजबूत होती है तो पाकिस्तान इस नजदीकीका फायदा उठायेगा। बीते १८ वर्षोंसे अलग-थलग पाकिस्तान तालिबानके रास्ते फिरसे अफगानिस्तानमें घुसपैठ कर सकता है जो भारतके लिए कहीं अधिक हानिकारक है।
ध्यानतव्य हो कि १९९५ से २००१ के बीच अफगानिस्तानमें तालिबानी सत्ता थी जिसे भारतने अधिकारिक और कूटनीतिक रूपसे कभी मान्यता नहीं दी जबकि यह पाकिस्तानके लिए यह स्वर्णिम अवसर था। जाहिर है कि भारतने कभी तालिबानसे बातचीतको प्राथमिकतामें नहीं रखा। परन्तु बीते २४-२५ फरवरीको भारतके दौरेपर आये अमेरिकी राष्टï्रपति डोनाल्ड ट्रम्पने प्रधान मंत्री मोदीसे शान्ति समझौतेको लेकर चर्चा की और प्रेस कांफ्रेंसमें भी इसे उद्ïघाटित किया। देखा जाय तो अमेरिकाने पहली बार भारतको तालिबानके साथ किसी बातचीतके लिए अधिकारिक तौरपर निमंत्रित किया और दोहा एक बेहतर नतीजेमें तब्दील हो गया। फिलहाल जैसा कि ट्रम्पने भी कहा है कि यदि अफगानिस्तान और तालिबान इन प्रतिबद्धताओंपर खरे उतरते हैं तो अफगानिस्तानमें युद्धको समाप्त करना और सैनिकोंको वापस ले जानेका रास्ता बनेगा। जाहिर है तालिबानी लड़ाके अफगानिस्तानमें शान्ति चाहते हैं या अपनी ही जमीनपर हिंसा बनाये रखनेका इरादा रखते हैं। अब यह बात उन्हींपर निर्भर है। यहां चर्चा तालिबानके इतिहास-भूगोलका करना भी लाजमी प्रतीत होता है। तालिबानका उदय ९० के दशकमें उत्तरी पाकिस्तानमें हुआ था जब अफगानिस्तानसे सोवियत संघकी सेना वापस जा रही थी। पष्तूनोके नेतृत्वमें उभरा तालिबान अफगानिस्तानमें १९९४ में सामने आया। वैसे तालिबान सबसे पहले धार्मिक आयोजन और मदरसोंके जरिये अपनी उपस्थिति दर्ज करायी जिसके लिए पैसा सऊदी अरबसे आता था। जब तालिबान जन्म ले चुका था तब अफगानिस्तानकी परिस्थिति कई गुटोंके संघर्षमें थी।
स्थानीय लोगोंने तालिबानियोंका स्वागत किया और ऐसा बन्दूकके नोकपर भ्रष्टïाचार और अर्थव्यवस्थापर अंकुश लगानेके चलते था। तालिबानको बढ़ानेमें पाकिस्तानका हाथ है। दक्षिण-पश्चिम अफगानिस्तानसे तालिबानने तेजीसे अपना प्रभाव जमाया और साल १९९५ में ईरानकी सीमासे सटे हेरात प्रान्तपर कब्जा किया। सिलसिलेवार तरीकेसे बढ़ते हुए काबुल और इसी तरह अफगानिस्तानके लगभग ९० फीसदी इलाकोंपर तालिबानियोंने अपने झण्डे गाड़ दिये। गौरतलब है कि तालिबानके शुरुआती लड़ाकोंने पाकिस्तानके मदरसोंमें शिक्षा ली थी। देखा जाय तो ९० के दशकसे २००१ तक तालिबानका अफगानिस्तानमें सत्ता थी और भारतने कभी इन्हें मान्यता नहीं दी जबकि पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात समेत सऊदी अरबसे इन्हें मान्यता थी।
भारतकी मूल चिंता दक्षिण एशियामें अमन-चैन और बीते दो दशकोंमें जो द्विपक्षीय सम्बंध उभरे हैं उसे लेकर कहीं अधिक है। भारत पहलेसे ही अफगानिस्तानमें अरबों डॉलरकी लागतसे कई बड़ी परियोजनाएं पूरी कर चुका है और कईयोंपर अभी काम चल रहा है। आंकड़े इंगित करते हैं कि वह अफगानिस्तानको लगभग तीन अरब डॉलरकी मदद कर चुका है जिसके चलते वहां संसद भवन, सड़क और बांध आदिका निर्माण हुआ है। इन दिनों अफगानिस्तानके भीतर भारतकी लोकप्रियता कहीं अधिक बढ़े हुए दरपर है और इसकी वजह साफ-साफ देखी जा सकती है। भारत अफगानिस्तानके अन्दर वर्तमानमें भी कई मानवीय और विकाससे सम्बंधित परियोजनाओंपर काम कर रहा है। ११६ सामुदायिक विकास परियोजना इसमें शामिल हैं जिसका क्रियान्वयन वहांके ३१ प्रान्तोंमें देखा जा सकता है। शिक्षा, स्वास्थ, कृषि, सिंचाई, पेयजल, खेल, आधारभूत संरचना आदि इसमें शामिल हैं। काबुलके शहतूत बांध और पेयजल परियोजनापर काम हो रहा है। इसके अतिरिक्त जल पूर्ति तंत्र, विश्वविद्यालय, पुस्तकालय, पॉलिटेक्निक, राष्टï्रीय कृषि विज्ञान आदिका भी निर्माणमें भारत सहयोग कर रहा है। इसलिए भारतकी चिंता वाजिब है। इसके अलावा ईरानके चाबहार पोर्टके विकासमें भारतने भारी निवेश किया है। इससे भारत, अफगानिस्तान, मध्य एशिया, रूस और यूरोपके देशोंसे व्यापार मजबूत करनेकी फिराकमें है। इसे चीनके वन बेल्ट, वन रोड़की काटके तौरपर भी देखा जाता है। गौतरलब है कि भारत वन बेल्ट, वन रोड़का विरोधी है। भारतकी चिंता है कि यदि तालिबानी सत्तासीन होंगे तो उपरोक्त योजनाएं एवं परियोजनाएं खतरेमें पड़ सकती हैं और अफगानिस्तानके रास्ते अन्योंतक उसकी पहुंच बाधित हो सकती है। खतरा यहींतक नहीं है अमेरिका और तालिबानके बीच शान्ति वार्ता अफगानिस्तानमें मौजूद सरकारके लिए भी कठिनाई पैदा कर सकता है।
अमेरिकी एवं विदेशी सैनिकोंकी वापसीकी स्थितिमें तालिबान अपनी जड़ें फिर मजबूत कर सकता है और ऐसा करनेमें बदनाम पाकिस्तान सहारा दे सकता है। फिलहाल अमेरिका और तालिबानकी शान्ति वार्ताके एक दिन बाद ही अफगानिस्तानके राष्टï्रपतिने यह ऐलान किया कि तालिबानी कैदियोंको नहीं छोड़ेंगे जो समझौता लागू करनेमें आड़े आ सकता है। देखा जाय तो अफगानिस्तानमें लगभग बीस सालोंसे चल रहे युद्धको खत्म करनेके लिए अमेरिका वर्षोंसे पूरा जोर लगा रहा है। अलकायदा द्वारा साल २००१ में अमेरिकापर किया गया हमला तत्पश्चात् अमेरिकी सेनाका अफगानिस्तानके भीतर ओसामा बिन लादेनकी खोज इनकी उपस्थितिका मूल कारण बना। हालांकि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तानके एटबाबादमें मारा गया था। दो-टूक यह कि बीस हजार सैनिकोंके वापसीकी चिन्ता अमेरिकाको बरसोंसे परेशान कर रही थी शान्ति वार्ता उसीका नतीजा है। पड़ताल बताती है कि जब सोवियत संघकी सेनाकी वापसी हुई थी तब अफगानिस्तान संघर्षोंमें लिप्त हो गया था और यही दौर तालिबानकी पैदाइशका भी था। अब अमेरिकी सेना दो दशककी उपस्थितिके बाद आगामी चौदह महीनेमें वापस हो जायेगी। इसे देखते हुए अफगानिस्तान सहित दक्षिण एशियाकी शान्ति बरकरार रहेगी इसे लेकर चिंता गहरा जाती है। ऐसेमें भारत इस समझौतेसे आषा तो रखता है परन्तु संदेहसे शायद परे नहीं है।