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ऐप प्रतिबंधसे बौखलाया चीन

कहते हैं कि किसीकी हेकड़ी और औकात दोनों ही नाप दी जाय तो उसे अपनी हैसियत समझ आती है। चीनके साथ ऐसा ही हुआ। वह भी तब जब अभी उसके साथ हुए अधिकतर व्यापारिक समझौते प्रतिबंधित नहीं हुए हैं। महज ५९ चीनी ऐप क्या बैन हो गये उसको अपना डूबता भविष्य नजर आने लगा।
 साइबर दुनियाका बेताज बादशाह बननेकी तरफ बढ़ रहा चीन अपने ऐसे ऐप्सके जरिये न केवल निजी जानकारियां हासिल करता है, बल्कि वह उस ऐपके जरिये कहां और किससे हुई बातचीततक सुन सकता है। महज ५९ चीनी ऐप्स प्रतिबंधित क्या हुए चीनकी बौखलाहट दिख गयी। लेकिन बड़ा सवाल है कि चीन खुद अपने देशवासियोंको दूसरोंके ऐप्स और वेबसाइट्सके इस्तेमालकी इजाजत देता है। स्वयं विश्वपर आधिपत्य रखना तो चाहता है लेकिन जब खुदपर आती है तो चीनियोंको देशभक्ति सिखाता है।     
जल्द प्रतिक्रिया न देने और खामोशीसे काम करनेवाली चीनी सरकारके मुंह इस मामलेमें अचानक खुल गये। यह वही चीन है जिसकी नीयत उसी समय समझ आ गयी थी जब सर्जिकल स्ट्राइकके बाद इसके लिए जिम्मेदार पाकिस्तानका नाम उसने अपने एक ऐपमें नहीं आने दिया। जबकि वहां कार्यरत भारतीय कर्मचारीने इसके लिए अपने वरिष्ठसे पूछा तो उसने मुस्कुराते हुए कहा कि देख लो परन्तु ऐसा कर नहीं पाओगे क्योंकि सारा कंट्रोल उन चाइनीज मशीनोंसे है जिनका सर्वर चीनमें लगा है। ऐप्सके कंटेंट जांचनेके लिए ऑटोमेटिक इण्टेलीजेंसका सहारा लिया जाता है जिससे हर वह मैटरियल खुद हट जाता है जिसको उसे डेवलप करनेवाला नहीं चाहता है। जाहिर है भारतीय कर्मचारी बेबस था। लेकिन कोई अकेला मामला नहीं है। कुछ चीनी ऐपने पहले भी कई मौकोंपर प्रधान मंत्रीके बयानतक हटाये थे। इधर देशके आईटी मंत्रालयने चीनकी हरकतोंको भारतकी राष्ट्रीय सुरक्षाके लिहाजसे शत्रुताका भाव बताते हुए ऐपके जरिये आम भारतीयोंके आंकड़ोंको सहेजना और उनके सूक्ष्म विश्लेषण करनेके प्रयासोंको देशकी संप्रभुत्ता और अखण्डतापर आघात बताते हुए बहुत ही गम्भीर मामला कहते हुए न केवल चिन्ता जतायी, बल्कि आईटी कानूनों और नियमोंके तहत धारा ६९-ए के तहत तत्काल प्रभावसे ऐसे ऐप्सको तुरंत बैन भी कर दिया। यदि आपने भी कभी कोई चीनी ऐप अपने मोबाइलपर डाउनलोड किया होगा तो पाया होगा कि प्राइवेसीसे इतर वह कई जानकारियोंकी इजाजत मांगता है जिन्हें हम बिना दूरकी सोचे आसानीसे दे भी देते हैं। साइबर दुनियाका बेताज बादशाह बननेकी तरफ बढ़ रहा चीन अपने ऐसे ऐप्सके जरिये न केवल निजी जानकारियां हासिल करता है, बल्कि वह उस ऐपके जरिये कहां और किससे हुई बातचीततक सुन सकता है। निश्चित रूपसे अनभिज्ञ लोग खुद ही अनुमति देकर अपने सारे डेटा आसानीसे चीनी सर्वरमें इकठ्ठा करवा रहे हैं।
महज एक अकेले आदेशसे ५९ चीनी ऐप्स प्रतिबंधित क्या हुए चीनकी बिलबिलाहट समझ आ गयी जबकि यह तो शुरुआत है। हो क्यों न दुनियाभरमें हर तरहसे अकेला व्यापारिक साम्राज्य स्थापित करनेकी मंशा रखनेवाले चीनको उसके गंदे धंधेसे हो रहा नुकसान भी नागवार गुजरा और वह अब अंतरराष्ट्रीय कानूनोंका हवाला देकर अपनी सफाई और दुहाई देने लगा। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि चीन खुद अपने देशके लोगोंको क्यों नहीं दूसरोंके ऐप्स और वेबसाइट्सके इस्तेमालकी इजाजत देता है। खुद तो दुनियाभरमें अपनी दखल अपने ऐसे ऐप्सके जरिये रखना तो चाहता है लेकिन जब खुदपर आती है तो चीनियोंको उनकी देशभक्ति सिखाता है। आज दुनियाभरसे यह सवाल उठ रहे हैं कि क्यों नहीं चीनमें गूगल, फेसबुक, वाट्सऐप, ट्वीटर, इन्टाग्रामका उपयोग किया जा रहा है। सबको पता है कि इसका जवाब न तो चीनने पहले दिया था और न आगे ही देगा। अब अंतरराष्ट्रीय कानूनोंकी दुहाई देनेवाले चीनसे दुनियाको पूछना चाहिए कि वह खुद कहांके कानूनोंसे नियंत्रित है।
यह सच है कि चीनी ऐप्सका जाल पूरी दुनियामें फैला हुआ है। शायद ही कोई देश इससे अछूता हो। इन ऐप्सके जरिये लगभग हर देशमें उसने लम्बा निवेश किया है। एक अनुमानके हिसाबसे अकेले टिकटॉकको ही लें तो यहां कमसे कम हजार भारतीय नौकरी करते हैं। जाहिर है चीनी ऐप्सने भारतमें ही हजारों करोड़का निवेश कर रखा है। बैनसे उसकी सांसें उखडऩा स्वाभाविक है। चीनकी साजिश अपने लोकप्रिय ऐप्सके जरिये ही चलती हो ऐसा भी नहीं। कम लोगोंको पता होगा कि दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरू एवं दूसरे आईटी प्रमुख भारतीय शहरोंमें चीनी कम्पनियां वहांके स्थानीय निवासियोंसे ऐप्स डेवलेप कराती हैं और मार्केटमें उन्हींके नामसे लाती हैं। जब यह ऐप्स लोकप्रिय होने लग जाते हैं और अपने अनुबंधोंके तहत उन्हें टेकओवर कर लेती हैं। इस तरह कई बार महज भारतीय नामके धोखेकी वजहसे अनजाने ही लोग भारतीय ऐप्स समझकर चीनी ऐप्स अपने मोबाइलपर डाउनलोड कर लेते हैं। वेंचर इंटेलिजेंसके अनुसार अलीबाबा, टेंसेंट, हिलहाउस कैपिटल और टीआर कैपिटल सहित चीनी निवेशकोंने पिछले चार वर्षोंमें भारतके स्टार्टअप कम्पनी क्षेत्रमें ५.५ अरब डालरका भारी भरकम निवेश किया है, जबकि अकेले टिकटॉकके भारतमें ही बीस करोड़से अधिक यूजर हैं वहीं अलीबाबाका यूसी मोबाइल इंटरनेट ब्राउजरको बीते साल सितंबरतक अकेले भारतमें ५५ करोड़से ज्यादा लोग इस्तेमाल करते थे जो अब कहीं ज्यादा होंगे। इस ब्राउजरके अब भी पूरी दुनिया १.२ अरब उपयोगकर्ता बताये जा रहे हैं, जो चीनके अलावा हैं। इन आंकड़ोंसे चीन ने अपनी धरतीमें बैठकर फैलाये जा रहे कारोबार और साइबर स्पेस व्यापारमें नये साम्राज्यको किस तरहसे फैलाया और नियंत्रित किया है, समझा जा सकता है।
अब कुछ भी हो, भारतने एक बड़े वाल्यूमके चीनी कारोबारमेंसे महज ५९ ऐप्सपर प्रतिबंध लगा चीनकी धड़कन जरूर बढ़ा दी है। लेकिन भले ही जिन जगजाहिर मौजूदा कारणोंसे सराकरने राष्ट्रीय सुरक्षाके प्रति शत्रुताका भाव रखनेवाले ऐसे तत्वों द्वारा आंकड़ोंके संकलन, इसकी जांच-पड़ताल और प्रोफाइलिंगको आखिर भारतकी संप्रभुता और अखंडतापर आघात माना है वह बेहद संवेदनशील और चिन्ता बढ़ानेवाली बात है। जाहिर है यह सब काफी पहले हो जाना था फिर भी जो हुआ अच्छा ही हुआ क्योंकि इन ऐप्सके कई भारतीय विकल्प भी हैं जिनका धड़ल्लेसे भारतीय मोबाइल यूजर उपयोग कर रहे हैं। ऐप स्टोरपर कई सारे भारतीय विकल्प अब धड़ल्लेसे डाउनलोड हो रहे हैं जिनमें मित्रों, चिंगारी तो गूगलके फाइल गो, गूगलके गूगल मीट, वाट्सऐप, गुगल ड्युओनेमें चीनी प्रतिबंधित ऐप्सका बड़ा स्थान ले लिया। यदि प्रतिबंधित ऐप्सपर नजर डालें तो टिकटॉक, वीचैट, कैम स्कैनर, बीगो लाइव, हेलो, लाइकी, वीगो वीडियो, क्लैश ऑफ किंग्स, एमआई वीडियो कॉल-शाओमी, एमआई कम्युनिटीके साथ ही ई-कॉमर्स प्लेटफार्मका ऐप क्लब फैक्टरी और शीइन भी हैं। इनमें भारतमें टिकटॉकके प्रति लोगोंकी दीवानगी देखते ही बनती थी। टिकटॉकके चक्करमें खुदका अलग वीडियो पोस्ट करनेकी होड़में कितने लोगोंकी जान चली गयी वहीं दफ्तरोंमें कैमस्कैनरसे डाक्युमेण्टकी कम्बाइण्ड पीडीएफ फाइल बनानेका सबसे सरल ऐप होनेकी वजहसे पूरे देशमें न जाने कितने विभागों और गोपनीय दस्तावेजोंमें सेंध लगा चुकी होगी, जो अलग बड़ी चिन्ताका विषय है।
निश्चित रूपसे चीनके ऐप्सका भविष्य अब भारत सरकारके रहमों करमपर ही निर्भर होगा। हालांकि इसके लिए चीनने हाथ-पैर मारने जरूर शुरू कर दिये हैं। एक समिति इन ऐप्सको कारण-बताओ नोटिस देकर पूछा है कि चीनी एजेंसियोंने उनसे कितनी बार डेटा मांगे और उसका क्या इस्तेमाल किया। पता तो यह भी चला है कि यह आदेश फिलाहाल अंतरिम है जिसमें संयुक्त सचिव स्तरके एक पैनलको सभी प्रतिबंधित ऐप्स कम्पनियोंके प्रतिनिधियोंसे स्पष्टीकरण सुननेको कहा है। सुनवाईके बाद यह समिति अपनी रिपोर्ट दूसरी सचिव-स्तरीय समितिको सौंपेगी जो प्रधान मंत्री कार्यालयतक हर अपडेट पहुंचायगी। यह भी तय है कि इन ऐप्स कंपनियोंसे यह भी पूछा जायगा कि उन्होंने उपभोक्ताओंके डेटा कितनी बार लिये और कहां रखे तथा मकसद क्या है। फिलहाल भारतीय ऐप्स डेवलपरके लिए यह बहुत ही सुनहरा मौका है कि वह अपनी प्रतिभा एवं दमखमसे दुनियाके साइबर व्यापारमें अपनी हैसियत दिखायें।