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साइबर जासूसीके गम्भीर खतरे

एलएसीपरशांति भंगकी चीनकीकोशिशें लगतार जारी हैं।एक ओर बातचीतकादौर जारी हैतो वहीं, एलएसीपरतनावका अनुपात बढ़ता जारहा है। इसबीच खबर हैकि चीन भारतकेमहत्वपूर्ण लोगोंकी जासूसी करवारहा है। मामलासाइबर जासूसीसे जुड़ाहै। ऐसेमें इसमामलेकी गम्भीरता और भीबढ़ जाती है।

आजयुद्ध परम्परागत तौर-तरीकोंके बजाय तकनीकनिपुणताके बूते लड़ेजा रहे हैं।हमें अपने विशिष्टïलोगों और महत्वपूर्णसंस्थानोंकी सुरक्षा रणनीतिपर नयेसिरेसे विचार करनेकी जरूरतहै। विशेषज्ञोंका कहनाहै कि यहडेटा वॉरका जमानाहै। हम जबडेटाको टुकड़ोंमें देखते हैंतो नहीं समझपाते हैं किआखिर इससे कोईक्या हासिल करसकता है? लेकिनइन्हीं जानकारियोंसे किसी खासमकसदसे हथियारके रूपमें इसेइस्तेमाल किया जासकता है। देशकेआन्तरिक मुद्दों, राष्टï्रीयनीति, सुरक्षा, अर्थव्यवस्थासभीमें सेंधमारी की जासकती है।  

असलमेंचीनी कम्युनिस्ट पार्टीएवं सेनासे जुड़ीएक आईटी कम्पनीप्रधान मंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यन्यायाधीश, विपक्षी नेताओं तथाराज्योंके मुख्य मंत्रियोंसे जुड़ीमहत्वपूर्ण जानकारी जुटाती रहीहै। गोपनीय ढंगसेडेटा जुटाना चीनके'हाइब्रिड वारफेयरकी कुत्सितप्रयासोंका महत्वपूर्ण भाग है,जिसके जरिये गैरसैन्य तौर-तरीकोंसेकिसी देशको नुकसानपहुंचानेके प्रयास किये जातेहैं। जाहिर हैकि यह डेटाजुटाकर भारतके खिलाफ इन्हेंसूचना हथियारके रूपमेंही प्रयुक्त कियाजायेगा। ऐसे समयमेंजब पूरी दुनियाऔर भारत कोरोनासंक्रमणके भयावह संकटसे जूझरहा है, चीनकीकुत्सित चालें बताती हैंकि यह देशकितना निर्मम हैऔर अपने साम्राज्यवादकेविस्तारके लिये किसीभी सीमातक जासकता है। ऐसापहली बार नहींहुआ है जबचीनी सरकारपर किसीदेशके लोगोंका डेटाचुरानेका आरोप लगाहै। रिपोट्र्सके मुताबिक,चीनकी सत्तारूढ़ पार्टी,सेना और निजीकम्पनियों अमूमन ही ऐसेऑपरेशन चलाती हैं, जिसमेंदेशोंका टारगेट किया जाताहै। साइबर जासूसीचीनकी पुरानी आदतहै। मार्च २००९में भी इसतरहकी खबरें थीं।तब चीनकी जासूसटोली 'घोस्टनेटपुरीदुनियाके कम्प्यूटरोंपर चोरी-छिपेनजर रख रहीथी और उसनेतिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाईलामासमेत कई सरकारीऔर निजी कार्यालयोंकेमहत्वपूर्ण दस्तावेज चुराये थे।उस समय 'दन्यूयार्क टाइम्सने कनाडाकेअनुसंधानकर्ताओंके हवालेसे यह सनसनीखेजखुलासा हुआ था।टोरंटो विश्वविद्यालयके अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केन्द्रकी टीमनेअखबारको सौंपी अपनी रिपोर्टमेंकहा था किइस जासूस टोलीनेपिछले दो वर्षोंमें१०३ देशोंमें १२कम्प्यूटरोंमें हैकिंग की है।जासूस टोलीने ब्रसेल्स,लंदन और न्यूयार्कमेंदूतावासों, विदेश मंत्रालयों, सरकारीकार्यालयों तथा भारतमेंनिर्वासनका जीवन जीरहे दलाईलामाके कम्प्यूटरोंसेमहत्वपूर्ण और गोपनीयसूचनाएं चुरायीं। हालांकि अमेरिकीसरकारके कार्यालय इससे बचेरहे। अनुसंधानकर्ताओंका माननाहै कि चीनमेंस्थित कम्प्यूटरोंके जरियेयह जासूसी चलरही है।

ताजाघटनाक्रममें चीनकी साइबर जासूसीगतिविधियोंका मकसद भारतकेराजनीतिक ढांचेमें घुसपैठ करनाहै। ताकि भारतकेमुकाबलेमें उसे अपरहैंड मिल सके।शिन्हुआकी थ्रेट इंटेलिजेंस सर्विसवैसी ही है,जिसका इस्तेमाल आजकललॉ एनफोर्समेंट एजेंसियांकिसी क्रिमिनलको पकडऩेमेंकरती हैं। यहसर्विसेस किसी देशकेभीतर कारगर साबितहो सकती है।मीडियाके माध्यमसे जो खबरेंलगातार सामने रहीहैं उनके मुताबिकचीनकी जासूस कम्पनियांसिर्फ भारतका हीडाटा इक_ानहीं कर रहीहैं, बल्कि दससेज्यादा देशोंमें करीब . लाखलोगोंकी जासूसी की है।चौंकानेवाला तथ्य यहहै कि अकेलीजेह्नुआ डाटा कम्पनीकरीब ३० लाखवैश्विक हस्तियोंपर निगरानी रखेहुए हैं। अमेरिकामेंसबसे अधिक करीब५२,००० लोगों,ब्रिटेनमें शाही परिवारसमेत ४०,०००से अधिक लोगों,ऑस्ट्रेलियाके करीब ३५,००० नागरिकोंऔर संघटनोंकी जासूसीकर चीनी कम्पनीनेएक पुख्ता डाटाबेसतैयार कर लियाहै। चीनमें ऐसाडाटा सरकार औरकम्युनिस्ट पार्टीको मुहैया करानाकम्पनियोंकी बाध्यता है। सरकारमेंचीनकी सेना भीशामिल है। चीननेजासूसीके तरीके बदले हैंऔर फेसबुक, ट्विटरऔर ह्वाट्सएप सरीखेसोशल मीडियाके जरियेसूचनाएं, समाचार, विचार, आलेख,नीतिगत फैसलों और चीनकेबारेमें देशका औसत अभिमतआदिका डाटा इक_ कियागया है। चीनकेलिए ऐसी जासूसीभी सामरिक रणनीतिसेकमतर नहीं है।

आजकलयुद्ध सिर्फ मैदानपरही सेनाओंके बीचनहीं लड़े जाते,बल्कि साइबरसे अन्तरिक्षतकयुद्धके मैदान खुले हैं।जाहिर तौरपर देशकामन पढऩे औरभावी रणनीतियोंके निर्धारणकेघटकोंको समझकर चीन अपनीचालोंको चलनेकी तैयारीमें है।ऐसेमें भले हीदेरसे ही सही,भारत सरकारने पिछलेदिनों चीनके जिनदो सौ एपपरप्रतिबंध लगाया है, वहइस दिशामें उठायागया सही कदमथा। इससे आगेदेखें तो चीननेभारतीय बाजारोंको स्मार्टफोनोंसे पाटदिया है, जिनकेमाध्यमसे आम एवंखास लोगोंके डेटापरआसानीसे हाथ डालाजा सकता है।इसमें दो रायनहीं है किचीन उन्नत तकनीकऔर कृत्रिम बुद्धिमत्ताकेजरिये उस मुकामपरपहुंच गया हैकि अमेरिका समेतपूरी दुनियामें उसपरराजनीतिक-सामरिक जासूसीके आरोपलग रहे हैं।निस्संदेह साइबर रूटके जरियेभारतके प्रमुख नागरिकों एवंसंस्थाओंकी जासूसी राष्ट्रीय चिंताकाविषय है। भारतअपने स्तरपर तोकाररवाई करेगा ही, लेकिनइस विषयको दुनियाकेबहुविध मंचोंपर भी साझाकिया जाना चाहिए,क्योंकि चीन कईदेशोंमें जासूसीका खतरनाक अभियानछेड़े हुए है।नागरिकोंकी सूचनाओंकी गोपनीयताके साथही राष्ट्रीय सुरक्षासेजुड़ी नीतियोंपर नयेखतरेके सन्दर्भमें विचार करनेकीजरूरत है। इसकेलिए सूचना प्रौद्योगिकीअधिनियममें कड़े प्रावधानशामिल किये जायं,तभी साइबर सुरक्षाकेप्रयासोंको कवच प्रदानकिया जा सकेगा।इतना ही नहीं,देशको इस बातपरविचार करना होगाकि आनेवाले समयकायुद्ध महज परम्परागततौर-तरीकोंसे हीनहीं लड़ा जायेगा।तीनों सेनाओंको साइबरयुद्ध और कृत्रिमबुद्धिमत्ता लैस तकनीकोंसेमुकाबलेके लिए तैयारकरनेकी जरूरत है। उल्लेखनीयहै कि चीनीकम्पनी चीफ ऑफडिफेंस स्टाफ, आर्मी, नेवीऔर एयरफोर्स प्रमुखोंसमेत महत्वपूर्ण सुरक्षासंस्थानोंकी निगरानी भी कररही थी।

सरकारकोसूचना प्रौद्योगिकी औरआमतौरपर संचारसे जुड़ी चीनीकम्पनियों या चीनीभागीदारीकी कम्पनियोंपर पाबंदी थोपदेनी चाहिए। समीक्षाबादमें होती रहेगी।अब देशहितमें लगताहै कि दोसौ चीनी एप्सकोबंद करना अथवा४जी या ५जीकेकार्योंमें चीनकी भागीदारीको खत्मकरना कितना जरूरीथा? क्योंकि यहमामले राष्ट्रीय सुरक्षासेसीधे जुड़े हैं।निस्संदेह इस हाईटेकषड्यंत्रके दूरगामी घातक परिणामहो सकते हैं।दरअसल, आज युद्धपरम्परागत तौर-तरीकोंकेबजाय तकनीक निपुणताकेबूते कई मोर्चोंपरलड़े जा रहेहैं। हमें अपनेविशिष्ट लोगों और महत्वपूर्णसंस्थानोंकी सुरक्षा रणनीतिपर नयेसिरेसे विचार करनेकी जरूरतहै। चीनकी साइबरजासूसीके खबरोंके बाद अबयह देखना अहमहोगा कि भारतसरकार इसका जवाबकिस तरह देगी?कांग्रेसने लोकसभामें तार्किक मांगकी है किपरराष्ट्र मंत्रालयको दिल्लीमें चीनकेराजदूतको तलब करनाचाहिए और अपनाशुरुआती विरोध दर्ज करानाचाहिए। विशेषज्ञोंका कहना हैकि यह डेटावॉरका जमाना है।हम जब डेटाकोटुकड़ोंमें देखते हैं तोनहीं समझ पातेहैं कि आखिरइससे कोई क्याहासिल कर सकताहै? लेकिन इन्हींछोटी-छोटी जानकारियोंकोएक साथ जुटाकरऔर उनका किसीखास मकसदसे हथियारकेरूपमें इस्तेमाल किया जासकता है। देशकेआन्तरिक मुद्दों, राष्टï्रीयनीति, सुरक्षा, राजनीति,अर्थव्यवस्था सबसेमें सेंधमारीके प्रयासकिये जा सकतेहैं।