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अर्थव्यवस्थाकी विरोधाभासी चाल

वर्तमान सरकार ईमानदार है। बुनियादी संरचनामें निवेश तेजीसे हुआ है। अत: देशकी ग्रोथ रेटको बीते समयके सात प्रतिशतसे बढ़कर वर्तमानमें नौ, दस या बारह प्रतिशत होना चाहिए था। सरकारकी कार्यकुशलताके कारण अर्थव्यवस्थामें जो तेजी आनी थी, वह तेजी नहीं आयी है। यही संकट है।
ग्रोथ रेटका पुन: छहसे सात प्रतिशतपर आ जाना वास्तवमें इसको मन्दीके बने रहनेके रूपमें देखा जाना चाहिए। सरकारकी ईमानदारीका दोहरा प्रभाव पड़ रहा है। एक तरफ सड़क आदि बनानेमें प्रगति हुुई है तो दूसरी तरफ आधार, जीएसटी और नोटबन्दीने उन शुभ प्रभावोंको काट दिया है। लेकिन अर्थव्यवस्थाका यह संकट पूरी तरह दिख नहीं रहा है क्योंकि संकटग्रस्त कम्पनियोंको खरीदनेके लिए विदेशी निवेशक भारी मात्रामें आ रहे हैं जिससे कि हमारा रुपयेका मूल्य टिका हुआ है। हमें गलत अहसास हो रहा है कि अर्थव्यवस्थामें सबकुछ ठीक है।
इस समय अर्थव्यवस्थामें दो प्रकारके विपरीत संकेत मिल रहे हैं। तीन शुभ संकेत हैं। पहला शुभ संकेत है कि जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद यानी देशकी आयकी विकास दर पुन: पटरीपर आ रही है। बीते समयमें यह छह प्रतिशतसे नीचे चली गयी थी जो अब पुन: छहसे सात प्रतिशतके बीचमें पुरानी चालपर आ गयी है। दूसरा शुभ संकेत है कि वर्ष २०१६-१७ में ६० अरब डालर सीधा विदेशी निवेश भारतमें आया था जो ऐतिहासिक अधिकतम है, जिससे संकेत मिलता है कि विदेशी निवेशकोंको भारतीय अर्थव्यवस्थापर भरोसा बन रहा है। तीसरा शुभ संकेत है कि डालरके सामने रुपया ६५ रुपये प्रति डालरके इर्द-गिर्द टिका हुआ है। इसके विपरीत तीन ऐसे संकेत भी मिलते हैं जो अर्थव्यवस्थाकी खस्ता हालतका बयान करते हैं। पहला, बैंकों द्वारा दिये जानेवाले लोनमें वर्ष २०१६-१७ में मात्र ५.१ प्रतिशतकी वृद्धि हुई थी जो पिछले ६० वर्षोंकी न्यूनतम वृद्धि है। यानी हर वर्ष बैंकों द्वारा दिये गये लोनमें जो बढ़त होती है वह इस समय गिर रही है। खस्ता हालतका दूसरा संकेत है कि संघटित क्षेत्रमें रोजगार उत्पन्न होनेमें भारी गिरावट आयी है। वर्ष २०११ तक अर्थव्यवस्थामें आठ लाख रोजगार प्रति वर्ष बन रहे थे जो वर्तमानमें दो लाखपर आ टिका है। खस्ता हालतका तीसरा संकेत है कि बैंकों द्वारा दिये गये ऋणमें नान परफार्मिंग एसेट यानी खटाईमें पड़े ऋणकी मात्रा लगातार बढ़ रही है। इन दोनों विरोधाभासी संकेतोंको समझनेके लिए हम प्रयास करेंगे। आकलनमें अर्थव्यवस्थामें मूलत: मन्दी छायी हुई है। प्रमाण यह है कि बैंकों द्वारा दिये जा रहे लोनमें गिरावट आयी है, रोजगार सृजनमें गिरावट आयी है तथा बैंकोंके नान पफार्मिंग ऐसेट बढ़ रहे हैं। देशके कुछ बड़े उद्यमियोंकी बातोंमें निराशा झलकती। जैसे एयरटेल कम्पनीके मालिक सुनील भारती मित्तलने एक सार्वजनिक समारोहमें कहा कि विदेशी निवेशक ६० अरब डालर सीधा विदेशी निवेश भारतमें हर वर्ष ला रहे हैं यह दिखाता है कि वह भारतको निवेशका एक अच्छा स्थान मान रहे हैं। फिर उन्होंने कहा तब भारतीय उद्यमियोंमें उत्साह क्यों नहीं है यह हमें पूछनेकी जरूरत है। इसका अर्थ यह हुआ कि कहीं न कहीं जो विदेशी निवेश आ रहा है उसमें कुछ समस्या है। गहराईसे पड़ताल करनेपर पता लगता है कि देशमें आनेवाला विदेशी निवेश संकटग्रस्त घरेलू कम्पनियोंको खरीदनेके लिए अधिक और नये निवेश करनेके लिए कम आ रहा है। जैसे यदि मान लीजिये भारतकी कोई कम्पनी संकटमें है तो विदेशी निवेशक उसको कम दाममें खरीद लेते हैं और इसके लिए वह विदेशी निवेश ला रहे हैं। वह इसलिए विदेशी निवेश नहीं ला रहे हैं कि भारतकी अर्थव्यवस्थामें तेजी है ओर यहां आनेवाले समयमें मालकी बिक्री बढ़ेगी और कारोबार करनेका अवसर बढ़ेगा, बल्कि जैसे अस्पतालमें भर्ती परिजनको देखनेके लिए लोग यात्रा करते हैं उस तरह विदेशी निवेश आ रहा हैं, इसलिए नहीं कि परिवारके लोग पर्यटनके लिए आये हैं और उनसे मिलने जायं। दी वायर नामक न्यूज पोर्टलके अनुसार अमेरिकी कम्पनी अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट और दूसरी कनेडियन कम्पनियोंने विशेष फण्ड बनाये हैं जो कि भारतकी संकटग्रस्त कम्पनियोंको खरीदनेमें निवेश कर रही हैं। एक और संकेत इस बातसे मिल रहा है कि वर्ष २०१५ में देशमें आनेवाले विदेशी निवेशका केवल २५ प्रतिशत वर्तमान कम्पनियोंको खरीदनेमें लगा था। वर्ष २०१६ में यह हिस्सा बढ़कर ४५ प्रतिशत हो गया। यानी विदेशी निवेश नयी कम्पनियोंको स्थापित करनेमें कम ओर पुरानी कम्पनियोंको खरीदनेमें ज्यादा आ रहा है।
दूसरा कथित सकारात्मक संकेत सकल घरेलू उत्पादमें वृद्धिका था। यह बात सही है कि जीडीपीकी ग्रोथ रेट छह प्रतिशतसे बढ़कर वर्तमानमें सात प्रतिशतके करीब पुन: आ गयी है। लेकिन यह प्रसन्न होनेकी बात नहीं है। वर्तमान सरकार ईमानदार है। बुनियादी संरचनामें निवेश तेजीसे हुआ है। अत: देशकी ग्रोथ रेटको बीते समयके सात प्रतिशतसे बढ़कर वर्तमानमें नौ, दस या बारह प्रतिशत होना चाहिए था। सरकारकी कार्यकुशलताके कारण अर्थव्यवस्थामें जो तेजी आनी थी वह तेजी नहीं आयी है। यही संकट है। सरकारकी कार्यकुशलताके कारण जो सुधार होना था वह सरकारकी ही दूसरी नकारात्मक पालिसियोंके कारण कट गया है। इन नकारात्मक पालिसियोंमें नोटबन्दी ओर जीएसटीको गिनता हूं।
अत: ग्रोथ रेटका पुन: छहसे सात प्रतिशतपर आ जाना वास्तवमें ढपली बजानेवाली बात नहीं है। इसको मन्दीके बने रहनेके रूपमें देखा जाना चाहिए। तीसरा कथित सकारात्मक बिन्दु रुपयेके मूल्यका टिका रहना है। इसका कारण यह है कि हमारे निर्यात दबावमें हैं और निर्यातोंसे डालर हम कम मात्रामें अर्जित कर रहे हैं। परन्तु हमारी संकटग्रस्त कम्पनियोंको खरीदनेके लिए विदेशी निवेश ज्यादा मात्रामें आ रहा है और डालरोंकी उस आवकके कारण हमारा बाहरी मुद्रा खाता बराबर हो गया है। ऐसा समझें कि परिवार संकटमें है। परिवारके लोग बीमार हैं। उन्हें देखनेके लिए कई डाक्टर टैक्सीसे आ रहे हैं तो दूरसे ऐसा दिखेगा कि परिवारमें बड़ी चहल-पहल है और इसे कोई शुभ संकेत भी मान सकता है, इस प्रकारकी परिस्थिति है।
सारांश यह है कि मूल रूपसे देशकी अर्थव्यवस्था संकटमें है। ग्रोथ रेट न्यून है और सरकारकी ईमानदारीका दोहरा प्रभाव पड़ रहा है। एक तरफ सड़क आदि बनानेमें प्रगति हुुई है तो दूसरी तरफ आधार, जीएसटी और नोटबन्दीने उन शुभ प्रभावोंको काट दिया है। लेकिन अर्थव्यवस्थाका यह संकट पूरी तरह दिख नहीं रहा है क्योंकि संकटग्रस्त कम्पनियोंको खरीदनेके लिए विदेशी निवेशक भारी मात्रामें आ रहे हैं जिससे कि हमारा रुपयेका मूल्य टिका हुआ है। हमें गलत अहसास हो रहा है कि अर्थव्यवस्थामें सबकुछ ठीक है जबकि अर्थव्यवस्था मूल रूपसे गड़बड़ दिशामें चल रही है।