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महंगे आयातसे आर्थिक संकट

ख्यात वैश्विक संस्था यूएस ग्रेन्स काउंसिलने कहा है कि कच्चे तेलका महंगा आयात भारतके चालू खाता घाटेको लगातार बढ़ा रहा है। इससे आर्थिक संकटकी स्थिति निर्मित हो गयी है। जैव ईंधन, इलेक्ट्रिक वाहन और सार्वजनिक परिवहनको अपनाकर तेल आयातकी निर्भरता घटायी जानी चाहिए।
कच्चे तेलकी खरीदीमें यूरोप एवं उत्तरी अमेरिकाके देशोंकी तुलनामें एशियाई देशोंको अधिक कीमत चुकानी पड़ती है, जिसे 'एशियाई प्रीमियम’ नाम दिया गया है। चीन और भारत दुनियामें बड़े तेल आयातक देश हैं। ऐसेमें एशियाई प्रीमियमकी बजाय उन्हें विशेष डिस्काउंट दिया जाना चाहिए। यदि चीन और भारत अपने गठजोड़का विस्तार करते हुए इसमें दो बड़े तेल उपभोक्ता देश दक्षिण कोरिया और जापानको भी भागीदार बना लें तो दुनियाके चार बड़े तेल उपभोक्ता देश संघटित रूपसे तेल उत्पादक देशोंसे अधिक मोलभाव कर सकेंगे।
कच्चे तेलकी बढ़ती वैश्विक कीमतोंने भारतके आम आदमीसे लेकर संपूर्ण अर्थव्यवस्थाको बुरी तरह प्रभावित किया है। दूसरी ओर एचपीसीएल, बीपीसीएल और इंडियन ऑयल जैसी सरकारी तेल कंपनियोंकी आमदनी घटनेका परिदृश्य सामने आया है, क्योंकि पेट्रोलके दामोंको जून २०१० में और डीजलके दामोंको अक्तूबर २०१४ में सरकारी नियंत्रणसे बाहर कर दिया गया था और ये तेल कंपनियां कच्चे तेलके वैश्विक मूल्योंके आधारपर मूल्य निर्धारित कर रही थीं। सरकारका कहना है कि वर्ष २०१८-१९ में तेलसे सरकारको मिलनेवाले राजस्वमें १०५०० करोड़का घाटा होगा, लेकिन सरकार वित्तीय घाटेको ३.३ प्रतिशतपर बनाये रख सकेगी। निश्चित रूपसे भारतके सामने कच्चे तेलकी लगातार बढ़ती कीमतोंसे आर्थिक मुश्किलोंके तेजीसे बढऩेकी चिंता बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने कहा है कि २०१८ में कच्चे तेलके दाम और बढऩेके आसार हैं। दुनियाभरमें भू-राजनीतिक परिस्थितियोंके कारण ऐसा होनेकी संभावना है। इनमें ईरानपर प्रतिबंध और वेनेजुएलाके तेल उत्पादनमें गिरावट भी शामिल है।
पेट्रोलियम निर्यात करनेवाले देशोंके संघटन (ओपेक) ने उत्पादनमें बड़े इजाफेका संकेत नहीं दिया है, अतएव कीमतें और बढ़ सकती हैं। इस वर्ष और अगले साल तेलकी मांगमें काफी मजबूत इजाफा नजर आ रहा है, जो करीब १५ लाख बैरल प्रतिदिन है। यह ऐतिहासिक रूपमें औसतसे बहुत ज्यादा है। दुनियाकी ख्यात क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीजने कहा कि अमेरिका और चीनके बीच छिड़े व्यापार युद्ध, अंतरराष्ट्रीय स्तरपर कच्चे तेलके बढ़ते दाम और रुपयेकी कीमतमें ऐतिहासिक गिरावटसे अब पेट्रोल और डीजलमें आ रही तेजी भारतीय अर्थव्यवस्थाके लिए सबसे बड़ा खतरा है। विश्व बैंकने भी अपनी नवीनतम रिपोर्ट २०१८ में कहा है कि कच्चे तेलकी बढ़ती कीमतें भारतकी अर्थव्यवस्थाके लिए चिंताका सबब बन रही हैं। हालमें दुनियाके ख्यातिप्राप्त निवेश बैंकों-बैंक ऑफ अमेरिीका, मेरिल लिंच, मार्गन स्टेनली और ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म सीएलएसएने अपनी रिपोर्टोंमें कहा है कि कच्चे तेलकी बढ़ती कीमतोंसे भारतमें महंगी बढ़ेगी और उपभोक्ताओंकी परेशानियां और अर्थव्यवस्थाकी मुश्किलें बढ़ेंगी। ऐसेमें भारतमें तेलकी कीमतोंसे राहतके लिए रणनीतिक कदम जरूरी हैं।
निश्चित रूपसे भारतका ईरानसे तेल आयात जारी रखनेका केंद्र सरकारका निर्णय देशकी महंगे कच्चे तेलकी चिंताओंको कुछ कम करते हुए दिखाई दे रहा है। ईरानके खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंध ४ नवंबरसे प्रभावी होगा, जिसके बाद दुनियाके जो देश ईरानसे कच्चा तेल मंगायंगे, उनपर अमेरिका प्रतिबंधात्मक काररवाई करेगा। सरकारकी तरफसे इस बातका पहली बार संकेत मिलनेके बाद कि भारत अमेरिकी प्रतिबंधके बावजूद ईरानके साथ कारोबारको जारी रखना चाहता है। इंडियन ऑयल कारपोरेशन (आईओसी) और मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (एमआरपीएल) ने नवंबर २०१८ में ईरानसे १२.५ लाख टन कच्चा तेल आयात करनेके लिए समझौता किया है। भारत और ईरान ४ नवंबरके बादसे रुपयेमें कारोबार करनेपर विचार कर रहे हैं। विगत वर्षोंसे ईरान भारतको बेचे गये तेलका भुगतान रुपयेमें लेता रहा है। इस रुपयेका इस्तेमाल ईरान भारतको दवाइयों और अन्य जिंसोंके आयातके भुगतानके लिए करता रहा है। निश्चित रूपसे दुनियाके तीनमेंसे दो सबसे बड़े तेल उपभोक्ता देश चीन और भारत हाथ मिलाकर तेल उत्पादक देशोंपर कच्चे तेलकी कीमत वाजिब किये जानेका दबाव बनानेके लिए संयुक्त रणनीतिको अंतिम रूप दे सकते हैं।
ज्ञातव्य है कि एशियाई देशोंके लिए तेल आपूर्तियां दुबई या ओमानके कच्चे तेल बाजारोंसे संबंधित होती हैं, परिणामस्वरूप कच्चे तेलकी कीमतें अपेक्षाकृत अधिक ली जाती हैं। कच्चे तेलकी खरीदीमें यूरोप एवं उत्तरी अमेरिकाके देशोंकी तुलनामें एशियाई देशोंको कुछ अधिक कीमत चुकानी पड़ती है, जिसे एशियाई प्रीमियम नाम दिया गया है। एशियाई प्रीमियम अमेरिका या यूरोपीय देशोंकी तुलनामें प्रति बैरल करीब छह डालर अधिक है। चीन और भारत दुनियामें बड़े तेल आयातक देश हैं। अतएव उनसे कोई एशियाई प्रीमियम वसूल करनेकी बजाय उन्हें बड़ी मात्रामें तेल खरीदीका विशेष डिस्काउंट दिया जाय। यदि चीन और भारत अपने गठजोड़का विस्तार करते हुए इसमें दो बड़े तेल उपभोक्ता देश दक्षिण कोरिया और जापानको भी भागीदार बना लें तो यह दुनियाके चार बड़े तेल उपभोक्ता देश संघटित रूपसे तेल उत्पादक देशोंसे अधिक मोलभाव कर सकेंगे। चूंकि देश तेजीसे विकास कर रहा है और २०३० तक आनेवाले वर्षोंके दौरान देशकी ऊर्जा संबंधी मांग बहुत तेजीसे बढ़ेगी। इस अवधिमें यह मांग दुनियाके किसी भी अन्य देशकी तुलनामें तेज होगी। कच्चे तेलके आयातपर इसकी निर्भरतामें भी इजाफा होगा। ऐसेमें आवश्यकता इस बातकी होगी कि सरकार एक एकीकृत ऊर्जा नीति तैयार करे। सरकारको बिजलीसे चलनेवाले वाहनोंपर काफी जोर देना होगा। इलेक्ट्रिक कारोंको टैक्स कम करके बढ़ावा देना होगा। सरकारको इलेक्ट्रिक कार और गैससे संचालित होनेवाले वाहनोंको प्रोत्साहन देना होगा। इसके साथ केंद्र एवं राज्य सरकारोंको सार्वजनिक परिवहन सुविधाको सरल और कारगर बनाना होगा। देशमें बढ़ती कारोंकी संख्याको नियंत्रित करना होगा। दुनियाके विकासशील देशोंमें सबसे अधिक कारोंकी संख्या भारतमें है।
निश्चित रूपसे अब हमें कारोंसे हो रही परेशानियोंको ध्यानमें रखकर शहरी यातायातके लिए सार्वजनिक परिवहन व्यवस्थाको कारगर बनाना होगा। पेट्रोल और डीजलके बढ़ते उपभोगसे बचनेके लिए विगत ३ सितंबरको नीति आयोगने सार्वजनिक परिवहनकी नयी रणनीति पेश करने की जो बात कही थी उसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्तुत करना होगा। सार्वजनिक परिवहनके लिए इलेक्ट्रिक, एथेनॉल, मेथेनॉल, सीएनजी और हाइड्रोजन ईंधन सेल जैसे परिवहनके प्रदूषणरहित साधन उपयोगमें लाये जानेसे प्रदूषणमें कमी लायी जा सकेगी तथा पेट्रोल और डीजलकी तेजीसे बढ़ती हुई मांगमें भी कमी आयगी।
देशमें पेट्रोल-डीजलकी मांग घटाने और इनके विकल्प तैयार करनेके लिए कई कारगर प्रयास प्राथमिकतासे करने होंगे। रेलवेमें डीजलकी खपत घटानेके लिए विद्युतीकरणपर जोर देना होगा। भारतमें मुंबई ऑफशोर एवं कृष्णा गोदावरी बेसिन सहित अन्य स्थानोंपर जिस ४२ अरब टन तेल भंडारकी खोज हुई है, उसे प्राथमिकतासे गति देनी होगी। जैव ईंधनका उपयोग बढ़ाना होगा। अभी पेट्रोल और डीजलमें दस फीसदी एथेनॉलका मिश्रण किया जाता है। २०३० तक इसे बढ़ाकर २० फीसदी किये जानेका जो लक्ष्य रखा गया है, उसकी दिशामें तेज कदम उठाने होंगे। इलेक्ट्रिक वाहनोंको बढ़ावा देनेवाली सरकारी योजना फेमके दूसरे चरणकी सफलताके लिए उपयुक्त कदम उठाने होंगे, ताकि इलेक्ट्रिक वाहनोंका देशमें अधिक उपयोग हो सके। इन प्रयासोंसे देशपर कच्चे तेलकी बढ़ती कीमतोंसे जो आर्थिक संकट आया है, उसका मुकाबला किया जा सकेगा।