Tel: 0542 - 2393981-87 | Mail: ajvaranasi@gmail.com


आलोचनाका केन्द्र बना ईरान

महिला खिलाडिय़ोंके विवादित 'ड्रेस कोडÓ को लेकर ईरान फिर आलोचनाका केंद्र बन गया है। ताजातरीन घटना भारतीय शतरंज चैंपियन सौम्या स्वामीनाथनसे जुड़ी है जिन्हें एशियाई शतरंज चैंपियनशिपसे केवल इसीलिए बाहर होना पड़ा है, क्योंकि उन्होंने ईरानमें सिर ढकने जैसे नियमको माननेसे इनकार कर दिया।
ईरानकी ही तरह प्रत्येक देशको अपनी संस्कृति तथा अपने देशके नियम एवं कानून सहेजकर रखने तथा इसे लागू करनेका पूरा अधिकार है। परंतु जहां अंतरराष्ट्रीय स्तरपर लोगोंकी शिरकतका सवाल हो वहां अपने पूर्वाग्रह और प्रतिबद्धताएं किसी दूसरेपर थोपना बिल्कुल सही नहीं है। खास तौरपर अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संबंधों, खेल-कूद, साहित्य, फिल्म जैसे क्षेत्रोंमें तो बिल्कुल नहीं। लिहाजा कोशिश यही होनी चाहिए कि कोई भी देश अपने धर्म एवं संस्कृतिकी रक्षा करे, परंतु दूसरोंपर थोपनेकी कोशिश न करे और मानवाधिकारोंकी रक्षाका भी पूरा ध्यान रखे।
ईरानमें २६ जुलाईसे ४ अगस्त २०१८ के मध्य होनेवाली एशियाई शतरंज चैंपियनशिपसे सौम्या स्वामीनाथनको केवल इसीलिए बाहर होना पड़ा है क्योंकि उन्होंने ईरानमें महिलाओं हेतु लागू हिजाबकी अनिवार्यता अर्थात् महिलाओं द्वारा सिर ढकने जैसे नियमको माननेसे इनकार कर दिया है। मानवाधिकारोंकी पैरवी करनेवालोंके अनुसार ईरान द्वारा गैर ईरानी लोगोंपर इस प्रकारके नियम थोपना मानवाधिकारोंका उल्लंघन है। हिजाबकी अनिवार्यता, महिला खिलाडिय़ोंके पहनावे संबंधित ड्रेस कोड तथा खाने-पीनेमें हराम एवं हलाल जैसी धार्मिक एवं शरई प्रतिबद्धताओंको लेकर ईरान पहले भी कई बार चर्चामें रह चुका है। अपने देशमें ईरानी नेतृत्व अपने नागरिकोंके लिए क्या कानून बनाता है और किस प्रकारके नियम लागू करता है इसे लेकर दुनिया इतनी अधिक विचलित नहीं होती परंतु जब ऐसे नियमों एवं कानूनोंसे दूसरे देशोंके लोग अथवा उनका कैरियर या भविष्य प्रभावित होने लगे तो निश्चित रूपसे ऐसी अनिवार्यताएं, कायदे-कानून एवं पूर्वाग्रह चिंता एवं चर्चाका विषय बन जाते हैं।
सर्वविदित है कि ईरान जहां पश्चिमी संस्कृतिका प्रबल विरोधी है वहीं दूसरी ओर ईरानी नेतृत्व अपने देशमें तथा अपने प्रभाववाले क्षेत्रोंमें इस्लामी एवं शरई कायदे-कानूनोंको जहांतक संभव हो सके लागू करने एवं करानेकी कोशिश करता है। ईरानी संस्कृति महिलाओंको घर-परिवार, देश एवं समाजकी इज्जत-आबरू मान-मर्यादाके रूपमें देखते हुए इसे सम्मानजनक तरीकेसे सहेजनेकी पक्षधर है। ईरानी संस्कृति औरतोंके हिजाब पहनने या सिर ढककर रखनेको इसी श्रेणीमें गिनती है। परंतु निश्चित रूपसे ईरानकी ही तरह दुनियाके प्रत्येक देशकी अपनी अलग संस्कृति भी है और किसी भी बातको सोचने एवं समझनेका अपना नजरिया भी। आज संसारका कारोबार एवं परस्पर संबंध इसी आधारपर टिके हैं कि दुनिया एक-दूसरेकी संस्कृति तथा उनकी मान्यताओंका आदर एवं सम्मान करती है। जहां ऐसा नहीं हो पाता वहां समाज तथा राष्ट्रके स्तरपर दरार भी पड़ जाती है। लिहाजा ऐसे अवसरोंपर अपने किसी पूर्वाग्रही सोचपर अड़े रहनेसे बेहतर है कि परिस्थितियोंवश कुछ समझौते किये जायं ताकि अपना पूर्वाग्रह एवं प्रतिबद्धताएं भी बरकरार रहें तथा इन्हें न स्वीकार करनेवाला दूसरा पक्ष भी पूरी तरह संतुष्ट रह सके एवं उसके अधिकारोंका भी हनन न हो सके।
ईरानसे ही जुड़ी इसी प्रकारकी एक महत्वपूर्ण घटना जनवरी २०१६ में फ्रांसमें उस समय पेश आयी थी जब ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी अपने फ्रांस दौरेपर गये हुए थे। गौरतलब है कि दुनियाके अधिकांश देशोंमें खास तौरपर पश्चिमी देशोंमें बीफ तथा सुअरका मांस सामान्य रूपसे खाया जाता है। शराबका प्रचलन भी इन्हीं देशोंमें अत्यधिक है। जाहिर है किसीको किसी भी देशके ऐसे खान-पानसे कोई आपत्ति नहीं है और न होनी चाहिए। परंतु इस्लामी देशोंमें अथवा इस्लाम धर्म एवं शरीयाका पालन करनेवालोंके लिए सुअर एवं शराबका सेवन अच्छा नहीं समझा जाता। यह चीजें इस्लाममें साफ तौरपर हराम हैं। २६ जनवरी २०१६ को जब ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी फ्रांसके राष्ट्रपति फ्रांसिस ओलांदेके साथ एक उच्चस्तरीय भोजपर आमंत्रित थे तो उन्हें सूचित किया गया कि उनकी खानेकी मेजपर परोसी जानेवाली खाद्य सामग्रीमें हराम भोजन भी शामिल है। यहांतक कि उनकी मेजपर शराब भी परोसी जानी थी। जब राष्ट्रपति रूहानीको इस बातकी सूचना मिली तो उन्होंने उस रात्रि भोजमें शरीयाके अनुसार हराम सामग्रीको खानेकी मेजसे हटाये जानेका आग्रह किया। दूसरी ओर फ्रांसकी संस्कृतिमें इन वस्तुओंका किसी मेहमानकी मेजपर होना वहां की जानेवाली मेजबानीका अहम हिस्सा है। इस विवादका नतीजा यह हुआ कि फ्रांसने खानेकी मेजसे इन कथित हराम सामग्रीको हटानेसे इनकार कर दिया।
नतीजतन राष्ट्रपति रूहानीको अपनी मेजपर बैठकर अकेले ही खाना पड़ा। इतना ही नहीं, बल्कि एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल स्तरका भोज एवं इससे जुड़ी शिखर वार्ता ऐसे ही पूर्वाग्रहको लेकर स्थगित भी करनी पड़ी। परंतु जहांतक खिलाडिय़ोंपर लागू होनेवाले पोशक संबंधी नियमों अथवा ड्रेस कोडकी बात है तो निश्चित रूपसे इसके ऐसे अंतरराष्ट्रीय मापदंड होने चाहिए जो दुनियाके सभी देशोंको स्वीकार्य हों और यदि दुनियाका कोई भी देश उन ड्रेस कोडको माननेकी स्थितिमें न हो या इसका विरोध करें तो ऐसे खेलोंको उस देशमें आयोजित ही नहीं करना चाहिए। भारतीय शतरंज चैंपियन ग्रैंड मास्टर सौम्या स्वामिनाथन हिजाबकी ईरानमें अनिवार्यताके चलते किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगितासे स्वेच्छासे बाहर होनेवाली पहली महिला खिलाड़ी नहीं हैं। इससे पहले २०१६ में भारतीय शूटर हिना सिद्धूने भी ईरानमें आयोजित एशियाई एयरगन प्रतियोगितासे स्वयंको अलग कर लिया था। ऐसे कई अन्य देशोंके खिलाड़ी ईरानी ड्रेस कोडका पालन न करनेके चलते स्वयंको विभिन्न खेल प्रतियोगिताओंसे अलग कर चुके हैं। जाहिर है अपनी अथक मेहनत एवं प्रयासके बाद किसी प्रतियोगितामें भाग लेनेका अवसर मिलना और खेलके समय इस प्रकारके पूर्वाग्रही नियमोंके चलते प्रतियोगितामें भाग न ले पाना किसी भी खिलाड़ीके लिए सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दिन कहा जा सकता है। इसके लिए खेल-कूदके अंतरराष्ट्रीय नियम, मापदंड, ड्रेसकोडकी अनिवार्यता तथा दुनियाके देशोंको विश्वासमें लिये बिना खेल-कूदके नियम खास तौरपर ड्रेस कोड बनाये जाने जैसे कारण जिम्मेदार हैं। निश्चित रूपसे ईरानकी ही तरह प्रत्येक देशको अपनी संस्कृति तथा अपने देशके नियम एवं कानून सहेज कर रखने तथा इसे लागू करनेका पूरा अधिकार है। परंतु जहां अंतरराष्ट्रीय स्तरपर लोगोंकी शिरकतका सवाल हो वहां अपने पूर्वाग्रह, अनिवार्यताएं अथवा प्रतिबद्धताएं किसी दूसरेपर थोपना हरगिज मुनासिब नहीं है। खास तौरपर अंतराष्ट्रीय राजनीतिक संबंधों, खेल-कूद,सांस्कृतिक कला साहित्य, फिल्म, मनोरंजन जैसे क्षेत्रोंमें तो बिल्कुल नहीं। आज अरब देशों, मध्य एशिया तथा ईरान जैसे देशोंमें महिलाएं पश्चिमी देशोंकी तुलनामें काफी पीछे हैं। जाहिर है उसकी मुख्य वजह यही है कि उन्हें धार्मिक रीति-रिवाजों, इस्लाम एवं शरियाके अनुसार अपना रहन-सहन, पहनावा तथा सीमित आजादीके साथ रहनेके लिए बाध्य किया जाता है। यही बाध्यताएं तुलनात्मक दृष्टिसे महिलाओंको पुरुषोंके कंधेसे कंधा मिलाकर चलनेमें बाधा साबित होती हैं। लिहाजा कोशिश यही होनी चाहिए कि दुनियाका कोई भी देश बेशक अपने धर्म एवं संस्कृतिकी रक्षा तो जरूर करे परंतु उसे दूसरोंपर थोपनेकी कोशिश भी न करे और मानवाधिकारोंकी रक्षाका भी पूरा ध्यान रखे।