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कोलेजियममें पारदर्शिता जरूरी

भारतीय लोकतंत्र एवं संविधानका संरक्षक सुप्रीम कोर्ट दुर्भाग्यवश इस समय कोलेजियम सिस्टमके विवादोंको लेकर चर्चामें है। मूल संविधानमें कोलेजियम सिस्टमका कोई वर्णन नहीं है। कोलेजियम व्यवस्थाको समझनेके लिए सुप्रीम कोर्टमें जजोंकी नियुक्ति प्रक्रियाको समझना आवश्यक है।
न्यायधीशोंकी नियुक्तिसे पहले उनकी पृष्ठभूमिके व्यापक छानबीनकी जरूरत है। इसमें अमेरिकासे हम सीख सकते हैं। वहां न्यायधीशके रूपमें नामित किये जानेवाले व्यक्तिको सार्वजनिक कर दिया जाता है। सीनेटकी न्यायिक समिति देशसे जानकारी मांगती है। लोगोंको अपना पक्ष रखनेका मौका मिलता है। इस प्रकार असंदिग्ध सत्यनिष्ठावाले व्यक्तिको जजके रूपमें नियुक्त होनेका मौका मिलता है। कोलेजियम सिस्टम भी जरूरतके मुताबिक संशोधन करके इस व्यवस्थाको अपना सकता है। वर्तमानमें कोलेजियम प्रणालीको देखा जाय तो मुख्य कारण पारदर्शितामें कमी है।       
कोलेजियमके १२ दिसंबरके फैसलेको सार्वजनिक नहीं करनेसे रिटायर जस्टिस मदन बी. लोकुरने भी निराशा प्रकट की है। १२ दिसंबरको जस्टिस लोकुर कालेजियमका हिस्सा थे, परन्तु १० जनवरीके बैठकके पूर्व वह सेवानिवृत्त हो चुके थे। कालेजियम व्यवस्थाको समझनेके लिए सुप्रीम कोर्टमें जजोंकी नियुक्ति प्रक्रियाको समझना आवश्यक है। भारतीय संविधानके अनुच्छेद-१२४ में कहा गया है कि मुख्य न्यायधीशकी नियुक्ति राष्ट्रपति अन्य न्यायधीशों एवं उच्च न्यायालयोंके न्यायधीशोंकी सलाहके बाद करते हैं, जबकि मुख्य न्यायधीशके अतिरिक्त अन्य न्यायधीशोंकी नियुक्तिमें मुख्य न्यायधीशका 'परामर्शÓ आवश्यक है। उपरोक्त उपबंधमें 'परामर्शÓ शब्दकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा अलग-अलग समयमें भिन्न-भिन्न व्याख्याएं दी गयी हैं। फस्र्ट जजेज केस (१९८२) में सुप्रीम कोर्टने कहा कि परामर्शका मतलब सहमति नहीं वरन विचारोंका आदान-प्रदान है। लेकिन सेकेंड जजेस केस (१९९३) में सुप्रीम कोर्टने अपने पूर्वके फैसलेको परिवर्तित कर दिया और कहा कि परामर्शका मतलब सहमति प्रकट करना है। साथ ही कहा गया कि राष्ट्रपतिके लिए मुख्य न्यायधीश द्वारा दी गयी सलाह बाध्यकारी होगी, लेकिन मुख्य न्यायधीश यह सलाह अपने दो वरिष्ठतम सहयोगियोंसे विचार-विमर्शके बाद देंगे। इस तरह सुप्रीम कोर्टमें जजोंकी नियुक्तिके लिए कोलेजियम सिस्टमका प्रारंभ हुआ। परन्तु इसमें सहयोगियोंकी भूमिकाके बारेमें बहुत कुछ साफ नहीं था, इसलिए इसके क्रियान्वयनमें शुरूसे ही व्यावहारिक दिक्कतें आने लगी। यह सब कुछ उस समय सतहपर आ गया, जब १९९८ में चीफ जस्टिस मदन मोहन पुंछीने जजोंकी नियुक्तिके लिए मनमाने ढंगसे अपनी सिफारिशें राष्ट्रपतिको भेज दी।
सरकारने उसे रोक लिया और कोलेजियमके बारे में अनुच्छेद-१४३ के अंतर्गत सुप्रीम कोर्टसे राय मांगी। तब नौ सदस्यीय संविधान पीठकी ओरसे न्यायमूर्ति एस. पी. भरुचाने कांलेजियम व्यवस्थाको विस्तारसे परिभाषित किया। इसे ही १९९८ का थर्ड जजेज केस भी कहते हैं। इस संविधान पीठके अनुसार सुप्रीम कोर्टमें जजोंकी नियुक्ति करनेवाली कोलेजियममें मुख्य न्यायधीशके अलावा चार वरिष्ठ न्यायधीश होंगे, निर्णय यथासंभव सर्वानुमतिसे लिया जायगा और किसी नामपर कोलेजियमके दो सदस्य असहमत हों तो उसका नाम नहीं भेजा जायगा। सैद्धांतिक रूपसे यह व्यवस्था अबतक कायम है। स्पष्ट है कि १९९३ के तीन सदस्यीय कोलेजियमके तुलनामें १९९८ में कोलेजियमका विस्तार हो गया तथा सदस्योंकी संख्या पांच हो गयी। वहीं हाईकोर्टमें जजेजकी नियुक्तिके संबंधमें थर्ड जजेज केसमें कहा गया कि कोलेजियममें सुप्रीम कोर्टके मुख्य न्यायधीशके अतिरिक्त दो अन्य वरिष्ठतम न्यायधीश होंगे। इस प्रकार अकेले भारतके मुख्य न्यायधीशकी रायसे परामर्श प्रक्रिया पूरी नहीं होगी। थर्ड जजेज केस(१९९८) के अनुसार सुप्रीम कोर्टके जजेजकी संख्या मुख्य न्यायाधीश सहित पांच है। इस कोलेजियमने १२ दिसंबरकी बैठकमें तय किया कि दिल्ली हाईकोर्टके चीफ जस्टिस राजेंद्र मेनन और राजस्थान हाईकोर्टके चीफ जस्टिस प्रदीप नंदराजोगका प्रमोशन सुप्रीम कोर्टमें होगा, परन्तु उस बैठकके बाद सरकारको बैठकका फैसला नहीं भेजा गया। करीब एक माह बादको कोलेजियमकी बैठकमें उपरोक्त दोनों नामोंको बदल दिया गया। इस बीच होता यह है कि कोलेजियमके एक सदस्य जस्टिस मदन बी. लोकुर ३१ दिसंबरको सेवानिवृत्त हो गये। १० जनवरीको कोलेजियमकी पुन: बैठक हुई। इस बैठकमें जस्टिस मदन बी. लोकुरकी जगह जस्टिस अरुण मिश्र हुए और १२ दिसंबरके फैसलेको बदल दिया गया तथा जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और दिल्ली हाईकोर्ट जज संजीव खन्नाके नामको भेजा गया, जिन्होंने सुप्रीम कोर्टके जजके रूपमें शपथ भी ले ली है। इस संपूर्ण मामलेको लेकर न्यायपालिकाके भीतरसे ही विरोधके मजबूत स्वर उभरे हैं। स्वयं जस्टिस मदन बी. लोकुरने कहा कि वह इस बातसे निराश हैं कि १२ दिसंबरका फैसला सार्वजनिक नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्टके मौजूदा जज जस्टिस एच.के. कौलने चीफ जस्टिस रंजन गोगोईको पत्र लिखकर इसपर एतराज जाहिर किया। उन्होंने कहा कि वरिष्ठताको लांघकर जूनियरको जज नहीं बनना चाहिए। इस मामलेमें पारदर्शिताकी आवश्यकता है। दिल्ली हाईकोर्टके सेवानिवृत्त जज कैलाश गंभीरने राष्ट्रपतिको पत्र लिखकर मांग की कि वह कोलेजियमके फैसलेको स्वीकृति नहीं दें, क्योंकि जस्टिस खन्नाको सुप्रीम कोर्टमें भेजनेके लिए ३२ सीनियर जजोंके वरिष्ठताकी अनदेखी की जा रही है।
इस संपूर्ण विवादके बाद पुन: कई लोग सुप्रीम कोर्टमें नियुक्तिके लिए राष्ट्रीय न्यायिक आयोगका समर्थन कर रहे हैं। ९९वां संविधान संशोधन अधिनियम २०१४ तथा न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम २०१४ ने सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयोंके जजोंकी नियुक्तिके लिए बने कोलेजियम प्रणालीको एक नये निकाय राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) से प्रतिस्थापित किया। लेकिन वर्ष २०१५ में सुप्रीम कोर्टने ९९वें संविधान संशोधन तथा एनजेएसी अधिनियमको असंवैधानिक घोषित कर दिया। इसे रद करनेके दो प्रमुख कारण रहे। पहला, न्यायिक नियुक्तियोंमें गैर-न्यायिक सदस्योंके होनेके कारण न्यायपालिकाके लोग अल्पमतमें आ जायंगे। एनजेएसीमें छह सदस्योंका प्रस्ताव था। देशके चीफ जस्टिसके अतिरिक्त इसमें सुप्रीम कोर्टके दो वरिष्ठ न्यायधीश, कानूनमंत्री और विभिन्न क्षेत्रोंसे जुड़ी दो जानीमानी हस्तियोंको बतौर सदस्य शामिल करनेकी बात थी। यदि सुप्रीम कोर्टकी आपत्तियोंके संदर्भमें एनजेएसीके प्रावधानोंको देखें तो इसमें एक प्रावधान यह भी था कि यदि एनजेएसीके कोई दो सदस्य किसी नियुक्तिको वीटो कर देते हैं तो वह नियुक्ति नहीं होगी। इसका मतलब हुआ कि यदि किसी नियुक्तिपर तीनों न्यायधीशोंको कोई एतराज नहीं होता, लेकिन अन्य दो सदस्य वीटो लगाकर नियुक्ति रोक सकते थे। इसके साथ ही एनजेएसीके खारिज होनेका दूसरा प्रमुख कारण था कि इससे न्यायिक स्वतंत्रताको चोट पहुंचेगी, जो संविधानके मूल ढांचेको प्रभावित करेगी। ऐसेमें अब कोलेजियमके विकल्पपर एनजेएसीकी चर्चा पूर्णत: आवश्यक है। वर्ष १९९३ से पहलेकी सरकारोंने सुप्रीम कोर्टमें जजोंके नियुक्तिके लिए अनुच्छेद-१२४ के प्रावधानोंको कुछ इस तरहसे लिया था कि जजोंकी नियुक्तिके लिए मुख्य न्यायधीश या न्यायपालिकासे विचार-विमर्श करना भले आवश्यक हो, लेकिन उसकी सलाहसे सहमत होना जरूरी नहीं है। इसलिए उस वक्त केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्टमें जिसे और जैसा चाहती थीं, नियुक्त कर देती थीं। कोलेजियम व्यवस्था १९९३ से पहलीवाली व्यवस्थासे तो बेहतर है लेकिन इसमें व्यापक सुधारकी आवश्यकता है। २०१५ में पुन: लागू कोलेजियम व्यवस्थाको सही ठहराया जा सकता था, यदि यह आदर्श न भी होती तो भी कमसे कम पारदर्शी होती। जस्टिस काटजूने जजोंसे जुड़ी ऐसी कई बातें सार्वजनिक की, जिनसे लगता है कि इसने कुछ नियुक्तियां अतार्किक आधारपर की थी।
इसके अलावा जस्टिस दिनाकरणका उदाहरण हमारे सामने है, जिनपर लगे तमाम आरोपोंके बाद भी उनकी नियुक्तिकी अनुशंसा सुप्रीम कोर्ट कोलेजियमने कर दी  थी। न्यायधीशोंकी नियुक्तिसे पहले उनकी पृष्ठभूमिके व्यापक छानबीनकी जरूरत है। इसमें अमेरिकाके अनुभवोंसे हम सीख सकते हैं। वहां न्यायधीशके रूपमें नामितको सार्वजनिक कर दिया जाता है। सीनेटकी न्यायिक समिति देशके आम और खास लोगोंसे उस व्यक्तिके बारेमें जानकारी मांगती है। लोगोंको अपना पक्ष रखनेका मौका मिलता है। तय सीमाके अन्दर उसपर विचार कर निर्णय होता है और सत्यनिष्ठावाले व्यक्तिको जजके रूपमें नियुक्त होनेका मौका मिलता है। कोलेजियम सिस्टम भी जरूरतके मुताबिक संशोधन करके इस व्यवस्थाको अपना सकता है। वर्तमान विवादको भी देखा जाय तो मुख्य कारण पारदर्शितामें कमी है। १२ दिसंबरको कोलेजियममें जस्टिस मदन बी. लोकुर सदस्य थे, जो ३१ दिसंबरको सेवानिवृत्त हुए। यदि कोई अतिरिक्त सूचना मिली भी तो भी कोलेजियमकी बैठक उनके रिटायर होनेसे पहले हो सकती थी। परन्तु नहीं हुई। इसलिए दो जजोंकी जगह दो नये जजोंके नाम तय करनेसे शककी स्थिति उत्पन्न हुई। १२ दिसंबरके कोलेजियमके तीन जज मुख्य न्यायधीश नंदराजोगके साथ काम कर चुके थे और एक मुख्य न्यायधीश मेननके साथ काम कर चुके थे, जबकि तीन अन्य दिल्ली हाईकोर्टमें जज होनेके कारण उनके कामकाजसे परिचित थे। ऐसेमें आखिर वह 'अतिरिक्त सूचनाÓ क्या थी, जिसके कारण दोनों ही जजोंके नाम कट गये। कॉलेजियमके सामने दूसरी चुनौती है कि वह न्यायधीशोंकी जवाबदेही कैसे सुनिश्चित करें। संविधानमे न्यायधीशोंकी छोटी-मोटी गलतियोंकी कोई सजा नहीं होती है। उनपर या तो महाभियोग लग सकता है या कुछ भी नहीं हो सकता। महाभियोगकी काररवाई इतनी जटिल है कि वह संभव नहीं हो पाता। इसलिए दोषी न्यायधीशोंके खिलाफ प्राय: कोई काररवाई नहीं हो पाती है। कोलेजियम तंत्रमें कई ईमानदार बदलाव लाने होंगे, जिसमें पारदर्शिताको सर्वोपरि स्थान देना होगा।