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देशको सिंचित करेगी अटल वाणी

राजनीतिके महान पुरोधा एवं पूर्व प्रधान मंत्री भारतरत्न अटल बिहारी बाजपेयीके निधनसे देशकी अपूरर्णीय क्षति हुई है। उन्होंने अपने जीवनका प्रत्येक क्षण राष्ट्रसेवाके यज्ञमें अर्पित कर दिया। उनका उद्घोष था, 'भारतके लिए हंसते-हंसते प्राण न्योछावर करनेमें गौरव और गर्वका अनुभव करूंगा।‘
अटलजीके भाषणोंका ऐसा जादू था कि लोग उन्हें सुनते ही रहना चाहते थे। उनके व्याखानोंकी प्रशंसा संसदमें उनके विरोधी भी करते थे। उनके अकाट्य तर्कोंका लोहा सभी मानते थे। उनकी वाणी सदैव विवेक और संयमका ध्यान रखती थी। बाजपेयीजीके ओजस्वी भाषणोंसे देशके प्रथम प्रधान मंत्री नेहरू भी प्रभावित हुए थे। १९५७ में  बाजपेयीजीके संसदमें दिये ओजस्वी भाषणको सुनकर पंडित नेहरूने अटलजीके प्रधान मंत्री बननेकी भविष्यवाणी की थी। आज भले ही अटलजी हमारे बीच नहीं हैं, परंतु उनके द्वारा स्थापित आदर्श सदैव संपूर्ण देशको सिंचित करती रहेगी। 
पूर्व प्रधान मंत्री भारतरत्न अटल बिहारी बाजपेयीका उद्ïघोष था, 'हम जियेंगे तो देशके लिए, मरेंगे तो देशके लिए। इस पावन धरतीका कंकड़-कंकड़ शंकर है, बूँद-बूँद गंगाजल है। भारतके लिए हंसते-हंसते प्राण न्योछावर करनेमें गौरव और गर्वका अनुभव करूंगा।‘ अटलजी भारतीय राजनीतिमें लगभग पांच दशकोंतक आदर्शवादके महान स्तंभ एवं  प्रहरीके रूपमें सक्रिय रहे। अटलजीका जन्म मध्यप्रदेशके ग्वालियरमें २५ दिसंबर १९२५ को हुआ। अपनी प्रतिभा, साहसपूर्ण नेतृत्व क्षमता, लोकप्रियता और दूरदर्शिताके कारण वह चार दशकोंसे भी अधिक समयसे भारतीय संसदके सदस्य रहे। वह एकमात्र  राजनेता थे, जिन्होंने चार अलग-अलग राज्योंका संसद में प्रतिनिधित्व किया। वह पहले १६ मईसे १ जून १९९६ तक प्रधान मंत्री रहे। इसके बाद १९ मार्च १९९८ से २२ मई २००४ तक भारतके प्रधान मंत्री रहे। वे हिंदी कवि, पत्रकार एवं अत्यंत प्रखर वक्ता भी रहे। अटलजी भारतीय जनसंघकी स्थापना करनेवाले महापुरुषोंमेंसे एक हैं और १९६८ से १९७३ तक उसके अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने लंबे समयतक अनेक पत्र- पत्रिकाओंका संपादन किया। बाजपेयीजी अपनी अद्वितीय नेतृत्व क्षमताके कारण राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन अर्थात एनडीए सरकारके पहले प्रधान मंत्री थे, जिन्होंने गैर-कांग्रेसी प्रधान मंत्रीके रूपमें अपना पांच वर्षका संपूर्ण कार्यकाल पूरा किया। उन्होंने २४ दलोंके गठबंधनसे सरकार बनायी थी।
अटलजीके पिता पंडित कृष्ण बिहारीजी ग्वालियरमें अध्यापक थे। अटलजी और उनके पिता दोनोंने कानूनकी पढ़ाईमें एक साथ प्रवेश लिया। हुआ यह कि जब अटलजी कानून पढऩे डीएवी कालेज कानपुर आना चाहते थे तो उनके पिताने कहा, मैं भी तुम्हारे साथ कानूनकी पढ़ाई शुरू करूंगा। वे तब शासकीय सेवासे निवृत्त हो चुके थे। पिता-पुत्र दोनों नामांकनके लिए प्राचार्यसे मिले तो उनके आश्चर्यका ठिकाना न रहा। दोनों लोगोंका प्रवेश एक ही सेक्शनमें हो गया। बचपनसे ही अटलजीकी स्वतंत्रता आंदोलनमें विशेष रुचि थी। उन दिनों ग्वालियर रियासत दोहरी गुलामीमें थी। सन्ï १९४२ में जब गांधीजीने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा दिया तो ग्वालियर भी अगस्त क्रांतिकी लपटोंमें आ गया। इस आंदोलनमें अटलजी भी जेल गये थे। उस समय अटलजी नाबालिग थे। इसलिए उन्हें जेलके 'बच्चा बैरक’ में रखा गया। २४ दिनोंकी अपनी इस प्रथम जेल यात्राका संस्मरण अटलजी हंस-हंसकर सुनाते थे। १९५५ में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा, परंतु सफलता नहीं मिली। लेकिन हिम्मत नहीं हारी और १९५७ में बलरामपुरसे जनसंघके प्रत्याशीके रूपमें विजयी होकर लोकसभामें पहुंचे। १९५७ से १९७७  तक जनता पार्टीकी स्थापनातकके बीस वर्ष लगातार जनसंघ संसदीय दलके नेता रहे। मोरारजी देसाईकी सरकारमें १९७७ से १९७९ तक परराष्ट्रमंत्री रहे और विदेशमें भारतकी शानदार छवि बनायी।
१९८० में जनता पार्टीसे असंतुष्ट होकर पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टीकी स्थापना की। ६ अप्रैल १९८० को अटलजी भाजपाके प्रथम अध्यक्ष बने। १९८४ के चुनावमें भाजपा लोकसभामें केवल दो सीटें प्राप्त कर सकी थी, जिसके बाद अटलजीने पार्टीको मजबूत बनानेके लिए जी-तोड़ परिश्रम किया तथा १९८९ में भाजपा ८८ सीटें जीती। १९९१ में पुन: मध्यावधि चुनाव हुए, जिसमें भाजपाने १२० सीटें जीती। १९९३ में अटलजी संसदमें विपक्षके नेता बने और १९९५ में भाजपाके मुंबई अधिवेशनमें अटलजीको प्रधान मंत्री पदका उम्मीदवार घोषित किया गया। बाजपेयीजी ११वीं लोकसभामें लखनऊसे सांसदके रूपमें विजयी हुए और १६ मई १९९६ को प्रधान मंत्री पदकी शपथ ली, परंतु बहुमत न होनेके कारण २८ मई १९९६ को त्यागपत्र दिया। १९९८ में पुन: भाजपा लोकसभामें दूसरी सबसे बड़ी पार्टीके रूपमें उभरी। १९ मार्च १९९८ को दूसरी बार प्रधान मंत्री पदकी शपथ ली। इस तरह १९९६ में १३ दिन तथा १९९८ में १३ माह देशके प्रधान मंत्री बने। १३ अक्तूबर १९९९ को अटलजीने तीसरी बार देशके प्रधान मंत्री पदकी शपथ ली और इस सरकारने अपना पांच वर्षोंका कार्यकाल पूरा किया।
अटल सरकारने ११ मई और १३ मई १९९८ को पोखरणमें पांच भूमिगत परीक्षण विस्फोट करके भारतको परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया। इस कदमसे भारत निर्विवाद रूपसे वैश्विक शक्तिके रूपमें उभरा। यह संपूर्ण कार्य अत्यंत गोपनीय तरीकेसे किया गया, जिससे अति विकसित जासूसी उपग्रहों एवं तकनीकसे संपन्न देशोंको भी इसकी भनक नहीं लगी। इसके फलस्वरूप पश्चिमी देशोंने भारतपर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाये फिर भी भारतने दृढ़तापूर्वक इन सबका सामना करते हुए आर्थिक विकासकी नयी कहानी लिखी।
१९९९ में बाजपेयीजीने पाकिस्तानसे संबंध सुधारनेके लिए लाहौर बससे यात्रा की, लेकिन इस यात्राके बाद पाकिस्तानने कारगिल क्षेत्रमें घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियोंपर कब्जा कर लिया। अटल सरकारने धैर्यपूर्वक ठोस काररवाई करते हुए भारतीय क्षेत्रको मुक्त कराया। भारतके सभी चार कोनोंको सड़क मार्गसे जोडऩेके लिए अटलजीने स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजनाकी शुरुआत की, जिसके अंतर्गत दिल्ली, मुंबई, कोलकाता एवं चेन्नईको जोड़ा गया। इस परियोजनाका देशके विकासमें महत्वपूर्ण योगदान है।
अटलजीके भाषणोंका ऐसा जादू था कि लोग उन्हें सुनते ही रहना चाहते थे। उनके व्याखानोंकी प्रशंसा संसदमें उनके विरोधी भी करते थे। उनके अकाट्य तर्कोंका लोहा सभी मानते थे। उनकी वाणी सदैव विवेक और संयमका ध्यान रखती थी। बारीकसे बारीक बात वे हंसीकी फुलझडिय़ोंके बीच कह देते थे। बाजपेयीजीके ओजस्वी भाषणोंसे देशके प्रथम प्रधान मंत्री नेहरू भी प्रभावित थे। १९५७ में  बाजपेयीजीके संसदमें दिये ओजस्वी भाषणको सुनकर पंडित नेहरूने उनको भविष्यका प्रधान मंत्रीतक बता दिया और आगे चलकर पंडितों नेहरूकी भविष्यवाणी सच भी साबित हुई। अटलजीका कवि रूप भी शिखरको स्पर्श करता है। 'मेरी इक्यावन कविताएं’ अटलजीका प्रसिद्ध काव्य संग्रह है। उनके संघर्षमय जीवनने काव्यमें सदैव ही अभिव्यक्ति पायी है। अटलजीको ऐतिहासिक राष्ट्र सेवाके लिए २७ मार्च २०१५ को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जीने उनके घर जाकर भारतरत्नसे सम्मानित किया। उन्हें भारतरत्न देनेकी घोषणा अटलजीके जन्मदिनके शुभ अवसरपर २५ दिसंबर २०१४ को की गयी थी। इसके पूर्व १९९२ में वे पद्मविभूषणसे सम्मानित हो चुके थे। बहुमुखी प्रतिभाके धनी अटलजीके महान आदर्शोंने भारतीय लोकतंत्रको एक नया आयाम प्रदान किया। आज भले ही अटलजी हमारे बीच नहीं हैं, परंतु उनके द्वारा स्थापित आदर्श एवं विचार सदैव संपूर्ण देशको सिंचित करती रहेगी।