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ल्ंाबी चुनावी प्रक्रियासे मुश्किलें

इस बारकी सबसे लंबी चुनाव प्रक्रियाने मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। इससे आमजनके जीवनपर बड़ा असर पड़ा। साथ ही कारोबारी और उद्योग जगतपर भी गहरा असर पड़ा है। लम्बी चुनाव प्रक्रिया उबाऊ हो जाती है। इसके अलावा मूल मुद्दे लुप्त हो जाते हैं और व्यर्थकी प्रतियोगिता शुरू हो जाती है।
१९८० में चार दिवसीय लोकसभा मतदान देशका सबसे छोटा चुनाव था। इस तरहकी लंबी चुनावी प्रक्रियासे कुछ लोग लाभान्वित होते हैं और कुछ को नुकसान भी होता है। यही अब नियति बन गयी है। जिनका चुनाव शुरूमें ही हो जाता है, उनके लिए ज्यादा समस्या नहीं है, लेकिन जिन उम्मीदवारोंको बादवाले चुनावमें मतदानका सामना करना पड़ता है, उन्हें काफी कठिनाई होती है। एक तो उन्हें लंबे समयतक प्रचार करना पड़ता है। जिससे उनका खर्च काफी बढ़ जाता है। इसके अलावा उन्हें विपरीत मौसमका सामना भी करना पड़ता है।              
अबतककी सबसे लंबी चुनाव प्रक्रियाने खिलाड़ी भावनाकी जगह शत्रुताके भावने ले लिया। विभिन्न दलोंने अपने जो घोषणापत्र मतदानके पहले जारी किये थे उनमें किये गये वादे उनके नेताओंको ही याद नहीं रहे। इसकी वजह भी यही है कि लम्बे चुनाव अभियानके चलते राजनीतिक दलों और उसके नेताओंकी जमीनी पकड़ और विश्वसनीयतामें जबरदस्त कमी आयी है। बेहतर हो इस चुनावके बाद चुनाव आयोग इस बारेमें विचार करते हुए चुनाव कार्यक्रमको संक्षिप्त करनेकी कार्ययोजना बनाये। इसके अलावा एक देश एक चुनावके मुद्देपर भी राष्ट्रीय विमर्श शुरू होना चाहिए क्योंकि हर समय चुनावकी वजहसे देशका वातावारण लगातार विषाक्त होता जा रहा है। विकास परियोजनाओंमें विलम्बके साथ ही संवेदनशील मुद्दोंपर अनिर्णयकी स्थितिका एक कारण भी चुनाव ही हैं वरना राम जन्मभूमि जैसा विवाद कभीका सुलझ गया होता। लंबा चुनाव कार्यक्रम होनेसे राजनीतिक गुंडोंको अधिक शरारत पैदा करनेके लिए एक स्थानसे दूसरे स्थानपर जानेके लिए अब अधिक समय मिल रहा है। अभियान कटु और अधिक तीखे होते गये। यदि इंडोनेशिया और ब्राजील जैसे विशाल आबादीवाले देश एक ही दिनमें अपना चुनाव पूरा कर सकते हैं तो भारत अपनी दुर्जेय चुनाव मशीनरीके साथ चुनावी प्रक्रियाको छोटा क्यों नहीं कर सकता है? पिछले कुछ वर्षोंमें समग्र चुनाव खर्चमें भारी वृद्धिके बावजूद, सामान्य अर्थव्यवस्थाको बाजारमें धनकी अचानक आपूर्तिमें वृद्धिसे लाभ ही होता है। आर्थिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं। कई अस्थायी रोजगार अवसर पैदा हो जाते हैं। कुछ उपभोक्ता वस्तुओंकी मांग बढ़ जाती है। हालांकि कुछ नुकसान भी होते हैं। सार्वजनिक परिवहनकी उपलब्धता कम हो जाती है और सार्वजनिक परिवहन अधिक महंगे और दुखदाई हो जाते हैं। लंबी चुनाव प्रक्रियासे औद्योगिक उत्पादन, निर्माण और बुनियादी ढांचे और निश्चित रूपसे स्कूल और कालेजकी शिक्षा भी प्रभावित होती है। इसके अलावा केंद्र और राज्योंमें उम्मीदवारों और राजनीतिक दलोंके लिए आदर्श आचार संहिताके अमलमें आनेके कारण सभी विकास कार्य भी ठप होने लगते हैं।
चुनाव आचार संहिता लागू हो जानेके बाद जहां एक ओर सरकारी स्तरपर नीतिगत फैसले लंबित हैं, वहीं आधिकारिक मशीनरीके चुनावमें व्यस्त होनेसे छोटे-मोटे काम और मंजूरियां भी ठप हैं। कारोबारी अब खुलकर इसपर विरोध जताने लगे हैं और सरकारसे मांग की है कि आम चुनाव दोसे तीन चरणोंमें एक महीनेके भीतर खत्म होना चाहिए। १० मार्चको चुनाव आचार संहिता लागू होनेके बादसे केंद्र, राज्य और नगर निगमोंके स्तरपर सभी नीतिगत फैसले लंबित हो गये, जबकि १ अप्रैलसे नये वित्त वर्षकी शुरुआतके मद्देनजर अधिकांश कारोबारियोंको कई औपचारिकताएं पूरी करनी थीं। खासकर जीएसटीसे जुड़ी कई प्रक्रियाएं अधरमें हैं और काउंसिलकी आखिरी बैठकमें हुए कई फैसले नोटिफाई नहीं हो पाये हैं। दिल्ली जीएसटीके एक अधिकारीने बताया, ऑनलाइन बैकएंड काम बंद नहीं हुआ है, लेकिन स्टाफ चुनावी ड्यूटीपर होनेसे असेसमेंट, अपील और फील्ड सर्वे प्रभावित होते हैं। विभागपर चुनावी खर्चोंकी मॉनिटरिंग और असेसमेंटकी जिम्मेदारियां भी हैं। अप्रैल महीनेके टैक्स डिपॉजिट और रिटर्न फाइलिंगमें सुस्ती दिखी।
इंडस्ट्री, एनवायरमेंट और नगर निगमोंमें लाइसेंस और मंजूरियोंको जारी और रिन्यू करनेका काम ठप हुआ। सबसे ज्यादा मुश्किलें सीलिंग और फायर एनओसीके जदमें आयीं यूनिटोंको पेश आयी। एन्फोर्समेंट एजेंसियां उनके खिलाफ काररवाईमें नहीं हिचक रहीं, जबकि संबंधित विभागोंमें कोई सुनवाई नहीं हो रही। नगर निगमोंमें औद्योगिक श्रेणियोंके लिए प्रॉपर्टी टैक्सकी दरें अचानक बढ़ गयी, जबकि निगम चाहकर भी इसे नहीं रोक सकते। चुनाव कार्यके लिए वाहनोंको जब्त किये जानेका असर जहां परिवहन सेवाओंपर पड़ा, वहीं बाहरसे माल नहीं आनेसे कारोबार भी प्रभावित हुए। वाहनोंकी कमी होनेपर लोग रेलसे यात्रा तय करते हैं। वहांके स्टेशनोंतक आने-जानेके लिए वाहनकी आवश्यकता पड़ेगी ही। ऐसेमें परेशानी अत्यन्त बढ़ गयी। चुनावको लेकर कई कार्य प्रभावित हुए। इसके आलावा बीमारी, शादी आदिके लिए बैंकसे आमजनोंको ज्यादा रुपये निकालने पड़ते हैं। जबकि ऐसे लोगोंपर निर्वाचन आयोग एवं आयकरकी खास नजर रहती है। पुलिसकी भी ड्यूटी चेकिंगमें लगायी जाती है।
चुनावकी लंबी प्रक्रियासे बहुत सारी परेशानियां खड़ी हो जाती हैं। यह सब १९९० के दशकमें मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषनके समय शुरू हुआ था। चुनावके दौरान हिंसाको रोकनेके लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलोंकी तैनाती करनेवाले वह पहले मुख्य चुनाव आयुक्त थे। पहली बार आदर्श आचार संहिताको प्रभावी ढंगसे लागू करने, चुनावोंमें बाहुबल और धन शक्तिपर लगाम लगाने, मामलोंको दर्ज करने और मतदान नियमोंका पालन नहीं करनेके लिए उम्मीदवारोंको गिरफ्तार करने और उम्मीदवारोंके साथ नापाक गठबंधन करनेके लिए अधिकारियोंको निलंबित करनेका श्रेय शेषणको ही जाता है। बादमें सुप्रीम कोर्टने सरकारसे चुनावके दौरान सुरक्षाबलोंकी उपलब्धता सुनिश्चित करनेके लिए भी कहा। टी.एन. शेषणकी विरासत जारी है, हालांकि चुनाव प्रक्रिया लगातार अधिक महंगी, जटिल और विवादास्पद होती जा रही है। २०१४ के संसदीय चुनावके दौरान कुल १,२०,००० अर्धसैनिक बलोंको तैनात किया गया था। देशके विभिन्न हिस्सोंसे बड़ी संख्यामें वदीर्धारी कर्मियोंकी आवाजाहीमें काफी समय लगता है। पोलिंग स्टाफ और मशीनोंके मामलेमें भी ऐसा ही है। चुनावी प्रणालीकी तथाकथित सफाई आंशिक रूपसे सफल हो सकती है, लेकिन इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनोंकी उपस्थितिके बावजूद चुनावी हिंसा, बूथ जाम, बूथ कैप्चरिंग, गुप्त धन खर्च और 'वैज्ञानिकÓ वोट रिगिंगके मामले काफी बढ़ गये हैं।
१९८० में चार दिवसीय लोकसभा मतदान देशका सबसे छोटा चुनाव था। इस तरहकी लंबी चुनावी प्रक्रियासे कुछ लोग लाभान्वित होते हैं और कुछ को नुकसान भी होते हैं। यही अब नियति बन गयी है। जिनका चुनाव शुरूमें ही हो जाता है, उनके लिए ज्यादा समस्या नहीं है, लेकिन जिन उम्मीदवारोंको बादवाले चुनावमें मतदानका सामना करना पड़ता है, उन्हें काफी कठिनाई होती है। एक तो उन्हें लंबे समयतक प्रचार करना पड़ता है। जिसके कारण उनका खर्च काफी बढ़ जाता है। इसके अलावा उन्हें चिलचिलाती गरमीका सामना भी करना पड़ता है। सुरक्षाबलोंको भी एक स्थानसे दूसरे स्थानतक जाने और आनेमें काफी मुश्किलोंका सामना करना पड़ता है। अनेककी तो तबीयत ही खराब हो जाती है। उनपर सरकारका पैसा भी काफी खर्च होता है। इसलिए इस तरहकी लंबी चुनावी प्रक्रियासे बचा जाना चाहिए। अन्तिम चरणोंमें जब गर्मीका पारा काफी चढ़ जाता है तो मतदानका प्रतिशत भी कम हो जाता है। यह लोकतंत्रके लिए अच्छा नहीं है।