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समान नागरिक संहिता समयकी मांग

समान नागरिक संहिताके मसलेपर सर्वोच्च न्यायालयने पुन: चिंता जाहिर की है। न्यायमूर्ति दीपक गुप्त और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोसकी पीठने कहा है कि बार-बार ताकीद किये जानेके बावजूद देशमें समान नागरिक संहिता लागू करनेका प्रयास नहीं किया गया। मात्र गोवामें यह सीमित अधिकारोंके संरक्षणके साथ लागू है।
समान नागरिक संहिताकी आवश्यकतापर बल देते हुए न्यायमूर्ति पहले भी कह चुके हैं कि संविधानको लागू हुए वर्षों गुजर गये और कई सरकारें आयीं एवं गयीं फिर भी अनुच्छेद ४४ में निहित संविधानके उक्त निर्देशको कार्यान्वित करनेके कर्तव्यका पालन किसीके द्वारा नहीं किया गया। सन् १८४० में ब्रिटिश राजमें गठित समितिने समान नागरिक कानून बनानेकी वकालत की थी। आजादीके उपरांत देशके तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू एवं संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकरने भी इसकी जरूरतपर बल दिया।
समान नागरिक संहिताके मसलेपर सर्वोच्च अदालतने एक फैसलेमें कहा कि समान नागरिक संहिताके मामलेमें गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां कुछ सीमित अधिकारोंके संरक्षणको छोड़कर समान नागरिक संहिता लागू है। गौरतलब है कि सर्वोच्च अदालतने जोस पाउलो कौटिह्नों बनाम मारिया लिजा वैलेंटिना परेरा मामलेकी सुनवाई करते हुए इस बातका जिक्र किया कि गोवामें शादी पंजीकरण करनेवाले मुस्लिम बहुविवाह नहीं कर सकते। इस्लाम माननेवालोंके लिए वहांपर पहलेसे ही मौलिक तलाकका प्रावधान नहीं है। शीर्ष पीठने यह भी कहा कि संविधान निर्माताओंने राज्यके नीति-निर्देशक तत्वोंके तहत अनुच्छेद ४४ के जरिये यह उम्मीद जतायी थी कि राज्य पूरे देशमें समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करे लेकिन उसका अनुपालन नहीं हुआ। पिछले वर्ष जब केंद्र सरकारने देशमें समान नागरिक संहिता लागू करनेके लिए इस मसलेपर विधि आयोगको रिपोर्ट देनेके लिए पत्र लिखा तो वितंडा खड़ा हो गया। विपक्षी दलों द्वारा इसे अल्पसंख्यकोंके वैयक्तिक विधिमें हस्तक्षेप करार दिया। फिर १ सितंबर, २०१८ को विधि आयोगने कहा कि अभी इसके लिए सही वक्त नहीं आया है। तब विधि आयोगने हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई पर्सनल लॉमें संशोधन कर महिलाओंसे भेदभाव मिटानेकी बात कही थी। यह पहली बार नहीं है जब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा देशमें समान नागरिक संहिताकी जरूरत बताया गया है। सरला मुद्गल बनाम भारत संघ मामलेमें भी सर्वोच्च अदालत कह चुका है कि संविधानके अनुच्छेद ४४ पर नया दृष्टिकोण अपनायें जिसमें सभी नागरिकोंके लिए एक 'समान नागरिक संहिता’ हो। सर्वोच्च अदालतने ऐसा करना राष्ट्रीय एकता एवं अखंडताकी अभिवृद्धि दोनों दृष्टिसे आवश्यक बताया। जानवलामत्तम बनाम भारत संघके ममालेमें भी सर्वोच्च न्यायालय समान नागरिक संहिताके न बनानेको लेकर अपना दुख जता चुका है। ११ मई, १९९५ को सर्वोच्च न्यायालयने अपने एक फैसलेमें पूछा था कि सभी नागरिकोंके लिए समान नागरिक संहिता बनानेके लिए क्या कदम उठाये गये हैं तथा क्या प्रयास हुए? लेकिन आश्चर्य कि सर्वोच्च न्यायालयके इन तमाम आदेशोंके बाद भी समान नागरिक संहिता बनानेकी पहल नहीं हुई।
समान नागरिक संहिताकी आवश्यकतापर बल देते हुए न्यायमूर्ति पहले भी कह चुके हैं कि संविधानको लागू हुए वर्षों गुजर गये और कई सरकारें आयीं एवं गयीं फिर भी अनुच्छेद ४४ में निहित संविधानके उक्त निर्देशको कार्यान्वित करनेके कर्तव्यका पालन किसीके द्वारा नहीं किया गया। सन् १८४० में ब्रिटिश राजमें गठित समितिने समान नागरिक कानून बनानेकी वकालत की थी। आजादीके उपरांत देशके तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू एवं संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकरने भी इसकी जरूरतपर बल दिया। लेकिन आश्चर्य कि १९५६ में हिंदू विवाह कानून, उत्तराधिकार कानून, नाबालिग एवं अभिभावक कानून और गोद लेने एवं गुजारा भत्ता कानून लागू कर दिया गया लेकिन अल्पसंख्यक समुदायोंको इस परिधिमें लानेसे बचा गया। १९८५ में जब शाह बानोका मामला उछला तब भी इसकी आवश्यकता महसूस की गयी। लेकिन तब भी इसे नजरअंदाज कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि शाह बानो एक ६२ वर्षीय मुसलमान महिला और पांच बच्चोंकी मां थी, जिन्हें १९७८ में उनके पतिने तलाक दे दिया था। शाह बानोंने अपनी और बच्चोंकी जीविकाका कोई साधन न होनेके कारण पतिसे गुजारा लेनेके लिए अदालतका दरवाजा खटखटाया। अदालतने निर्देश दिया कि शाह बानोका निर्वाह-व्ययके समान जीविका दी जाय। लेकिन उस समय प्रधान मंत्री राजीव गांधीने अदालतकी भावनाका सम्मान करनेके बजाय कट्टरपंथियोंकी मांग मानते हुए इसे धर्मनिरपेक्षताके उदाहरणके स्वरूपमें प्रस्तुत किया। यही नहीं १९८६ में कांग्रेस पार्टीने जिसे संसदमें बहुमत हासिल था, एक कानून पारित कर शाह बानो मामलेमें सर्वोच्च न्यायालयके फैसलेको उलट दिया। इस कानूनके मुताबिक सुनिश्चित कर दिया कि 'हर वह आवेदन जो किसी तलाकशुदा महिलाके द्वारा अपराध दंड संहिता १९७५ की धारा १२५ के अंतरगत किसी न्यायालयमें इस कानूनके लागू होते समय विचाराधीन है, अब इस कानूनके अंतरगत निबटाया जायगा चाहे उपर्युक्त कानूनमें जो भी लिखा हो।‘ यह रेखांकित करता है कि तत्कालीन सरकार तुष्टीकरणकी सारी सीमाएं लांघ गयी। शाह बानो ही नहीं, बल्कि नूर शाबा खातून बनाम मोहम्मद कासिमके मामलेमें भी सर्वोच्च न्यायालय कह चुका है कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिलाको अपने बच्चोंके लिए जब तक कि वह बालिग नहीं हो जाते है, पतिसे भरण-पोषण पानेका अधिकार है। न्यायालयने स्पष्ट किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ और भारती दंड प्रक्रिया संहिताकी धारा १२५ दोनोंके अधीन पतिका दायित्व पूर्ण है जबकि बच्चे तलाक शुदा पत्नीके साथ रहते हैं। २० जून २००० को कलकत्ता उच्च न्यायालयने भी एक मुस्लिम महिलाको जिसे उसके पतिने तलाक दे दिया था, को तबतक अपने पतिसे भरण-पोषण पानेका हक बताया जबतक कि वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती है। मुस्लिम समाजको विचार करना चाहिए कि जब दुनियाके सभी आधुनिक देश जिनमें मुस्लिम देश भी शामिल हैं, में समान नागरिक संहिता लागू है और वहां तीन तलाकको गैरवाजिब बताया गया है तो फिर भारतमें भी ऐसा कानून क्यों नहीं बनना चाहिए? सीरिया, ट्यूनिशिया, मोरक्को, पाकिस्तान, ईरान, बंगलादेश तथा मध्य एशियाई गणतंत्र समेत अन्य कई और मुस्लिम देशोंमें वैयक्तिक विधिका संहिताकरण किया गया है। अच्छा होता कि भारतीय मुसलमान अपनी वैयक्तिक विधिका संहिताकरण करनेकी मांग स्वयं उठाता ताकि स्त्रियोंकी दशा सुधारनेमें मदद मिलती।
भारतका संविधान राज्यके नीति-निर्देशक तत्वमें सभी नागरिकोंको समान नागरिकता कानून सुनिश्चित करनेके प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। संविधानका अनुच्छेद ४४ इस धारणापर आधारित है कि सभ्य समाजमें धर्म एवं वैयक्तिक विधिमें कोई संबंध नहीं होता है। अत: समान नागरिक संहिता बनानेसे किसी समुदायके सदस्योंके अनुच्छेद २५, २६ एवं २७ के अधीन प्रतिभूत मूल अधिकारोंपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। विवाह, उत्तराधिकार और इस प्रकारकी सामाजिक प्रकृतिकी बातें धार्मिक स्वतंत्रतासे बाहर हैं और उन्हें विधि बनाकर विनियमित किया जा सकता है। समान नागरिक संहिताका अर्थ भारतके सभी नागरिकोंके लिए समान नागरिक कानूनसे है। समान नागरिक संहिता एक पंथनिरपेक्ष विधि है जो सभी धर्मोंके लोगोंके लिए समान रूपसे लागू होता है। विवाह एवं उत्तराधिकार संबंधी हिंदू विधि इस्लाम एवं ईसाइयोंकी भांति ही धर्मसम्मत है। जब हिंदुओंने संविधानकी भावनाका सम्मान करते हुए एवं देशकी एकता एवं अखंडताको बनाये रखनेके लिए अपनी धार्मिक मान्यताओंका परित्याग कर दिया और उनका संहिताबद्ध किया गया तो अन्य धर्मावलंबियों एवं मतावलबियोंको इस तरहके आचरणका पालन क्यों नहीं करना चाहिए? संविधान सभी समुदायोंके लिए लिए समान नागरिक संहिता बनानेका निर्देश देता है न कि सिर्फ हिंदुओंके लिए। यह सही है कि समान नागरिक संहिता बनानेके लिए अल्पसंख्यकोंकी वैयक्तिक विधियोंको तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि समान नागरिक संहिताका ही विरोध किया जाय। यह आचरण न केवल समाजके साथ छल है, बल्कि संविधानकी भावनासे भी खिलवाड़ है।