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गुजरातमें मोदीकी कड़ी परीक्षा-तारकेश्वर मिश्र

मंत्री नरेन्द्र मोदी इस समय गुजरातके चुनावी भंवरमें फंसे दिख रहे हैं। सत्ता और सियासतके गलियारोंमें चर्चाएं सुनें तो लगता है कि प्रधान मंत्री मोदी इस समय घबराहट और परेशानीकी मनोदशामें हैं। स्थितियां उनके हाथसे फिसल रही हैं। जनताकी नाराजगी (मोहभंग नहीं) उन्हें महसूस हो रही है।
कांग्रेसको गुजराती लोग 'मुस्लिमवादी पार्टीÓ मानते रहे हैं, लिहाजा कांग्रेस पूरी तरह भाजपाके विकल्पमें आज भी मौजूद नहीं है। गुजरातमें कांग्रेसका संघटन चरमराया है, यह खुद राहुल गांधी मानते रहे हैं, जबकि भाजपा प्रत्येक बूथपर कार्यकर्ताओंकी फौजके साथ मौजूद है। वहीं राहुल गांधीके लिए यह बहुत बड़ी बात है जिससे वह साबित कर पायंगे कि उनमें नेतृत्व क्षमता है। राहुल गांधीको पार्टीकी कमान देनेकी चर्चा है। ऐसेमें यदि वह यहां कांग्रेसकी जीत दर्ज करा देते हैं तो पार्टीमें ऊर्जा और उत्साहका संचार होगा। लगातार चुनाव हारनेके कारण मायूस कांग्रेस कार्यकर्ताओंमें अपने नये नेतृत्वके प्रति भरोसा बढ़ेगा। गुजरातमें मोदीकी होम पिचपर उन्हें मात देकर राहुल तमाम आवाजोंको चुप करा सकते हैं।
आगामी २०१९ के आम चुनावोंकी हार प्रधान मंत्री मोदीको अभीसे आशंकित कर रही है। प्रधान मंत्री मोदीके पास समय बहुत कम है और काम असंख्य हैं। कुछ संवेदनशील वादोंके पूरा न कर पानेके मद्देनजर प्रधान मंत्री चिंतित नहीं हैं। इन सबके बीच गुजरात भी चिंताका सबब बना है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वह कांग्रेस और राहुल गांधीको आसान राजनीतिक वॉकओवर दे देंगे। प्रधान मंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दोनों ही नौसीखिये नहीं हैं कि तीन युवा नेताओं-अल्पेश ठाकोर, हार्दिक पटेल और जिग्नेशके कांग्रेसको समर्थन देनेपर ही भाजपाकी पराजय स्वीकार कर लेंगे। वह आखिरी पलोंतक तोड़-फोड़ करेंगे और पाटीदार आंदोलनमें उन्होंने महत्वपूर्ण सेंध लगाकर उसे विभाजित भी कर दिया है। प्रधान मंत्रीकी चिंता इससे स्पष्ट है कि बीते ३७ दिनोंमें उन्होंने गुजरातके पांच दौरे किये हैं लेकिन वह हर बार कोशिशें करते दिखे हैं कि औसत गुजरातीकी नाराजगी कम हो। गुजरात नरेंद्र मोदीका गृह प्रदेश है। वह इस सूबेके १३ साल तक लोकप्रिय मुख्य मंत्री रहे हैं। गुजरातके विकास मॉडलके सहारे ही वह देशकी सत्ताके शिखरपर पहुंचे हैं। इसलिए यहांके चुनाव नतीजे सीधे तौरपर उनके सियासी कदका इम्तिहान है। प्रधान मंत्री बननेके बादसे लगातार जीत रहे मोदीके सामने यह सिलसिला बरकरार रखनेकी चुनौती है। यदि वह चुनाव जीतते हैं तो उनका और उनकी सरकारका इकबाल बुलंद होगा। जनतामें उनकी पैठ और गहरी होगी। उनके विकासके मॉडलपर मुहर लगेगी। हारते हैं तो उनकी राह मुश्किल होगी, क्योंकि सरकार नोटबंदी और जीएसटीको लेकर बैकफुटपर है। ऐसे तीन अहम मुद्दे हैं जहां मोदी और बीजेपीको पास होना है। पहली बात यह कि इस चुनाव मोदी लहरका टेस्ट कहा जा रहा है। अब २०१९ के चुनावमें डेढ़ सालसे भी कम वक्त रह गया है। गुजरात बीजेपीका गढ़ है इसलिए यह इसे २०१९ का सेमीफाइनल और मोदी लहरका टेस्ट माना जा रहा है। अबतक मोदी लहर बिहार छोड़कर हर राज्यमें दिखा है। यदि गुजरातके नतीजे भी उनकी उम्मीदोंके मुताबिक आते हैं तो मोदीके लिए इससे बड़ी खुशखबरी नहीं हो सकती।
दूसरा सवाल कि मोदीके बिना गुजरातमें बीजेपीकी हैसियत क्या है। विधानसभाके बीते चार विधानसभा चुनावमें यह पहला चुनाव है, जो मोदीके नेतृत्वमें नहीं लड़ा जा रहा है। अब सीएमकी कुर्सीपर विजय रुपाणी हैं। मोदीने अपने नेतृत्वमें तीनों चुनावमें बीजेपीको जीत दिलायी और बड़ी जीत दिलायी। यदि मोदी बतौर पीएम गुजरातमें फ्लॉप होते हैं यह कहा जायगा कि उनके विकासका मॉडल नकली साबित हुआ है। नोटबंदी और जीएसटीपर एक कारोबारी राज्यका फैसला क्या रहता है। नोटबंदीके बाद बीजेपी उत्तर प्रदेशका चुनाव जीत चुकी है। लेकिन जीएसटी लागू किये जानेके बाद यह पहला विधानसभा चुनाव है। खासकर इसे लेकर व्यापारियों और कारोबारियोंमें खासी नाराजगी है। दूसरी तरफ हालके दिनोंमें नोटबंदीको लेकर भी सवाल खड़े किये गये हैं। इसलिए इस चुनावमें बीजेपी हारती है तो यह कहा जायगा कि यह हार नोटबंदी और जीएसटीकी वजहसे हुई है।
प्रधान मंत्री मोदीने अपने प्रवासोंके दौरान  करोड़ों-अरबोंकी परियोजनाओंके उद्ïघाटन और शिलान्यास किये हैं। यानी विकासकी एक निरंतरता बनी रही है। बेशक जीएसटी और नोटबंदीने व्यापारियोंको बहुत नुकसान पहुंचाया है। करीब ४० फीसदी कारोबार ठप हुआ है। प्रधान मंत्रीने जीएसटीमें संशोधन करा व्यापारियोंके सवालोंको संबोधित किया है। बेशक गुजरातमें भाजपा १९९५ से लगातार सत्तारूढ़ है, लिहाजा सत्ता विरोधी मूड और लहर स्वाभाविक है, लेकिन जनताका मूड कांग्रेसके पक्षमें है, ऐसा मानना भी बेवकूफी होगी। रही बात तीन युवा नेताओंके कांग्रेसको समर्थन देनेकी तो दलित नेता जिग्नेश साफ कर चुके हैं कि वह कांग्रेसमें शामिल नहीं होंगे। ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर पहले भी कांग्रेसमें थे और उसके टिकटपर चुनाव हार चुके हैं। उनकी घरवापसी हो रही है तो कोई हैरतकी बात नहीं है। पाटीदार नेता हार्दिक पटेलने 'अहंकारीÓ भाजपाको हरानेके मद्देनजर कांग्रेसका समर्थन करनेका बयान दिया है।
पाटीदार आंदोलनके ही वरुण, रेशमा, नरेंद्र पटेल आदि १५ महत्वपूर्ण समर्थकों और सहयोगियों समेत करीब ७० युवा चेहरे भाजपाके पालेमें आ चुके हैं और यह सिलसिला अभी जारी है। वह पाटीदार आंदोलनके सक्रिय कार्यकर्ता भी रहे हैं और बुनियादी तौरपर जनता भी हैं। अकेले हार्दिक क्या भाड़ फोड़ लेंगे? जिन तीन बिरादरियोंके कांग्रेसको समर्थन देनेका दावा किया जा रहा है, वह भी बुनियादी तौरपर गलत है। हकीकत यह है कि तीनों युवा नेताओंका अपनी-अपनी बिरादरीके एक हिस्सेपर ही असर है।
पाटीदार समिति तो विभाजित है। किसके आह्वानपर कितनी बिरादरी भाजपाके खिलाफ वोट देगी, अभी निश्चित नहीं है। उसका भी एक विशेष कारण है। दरअसल गुजरातमें पटेल समुदाय बुनियादी तौरपर व्यापारी है और हिंदुत्वको लेकर भी बेहद प्रतिबद्ध है। इस तरह पाटीदार भाजपाके साथ जुड़े रहे हैं। इस बार कुछ सेंध तो लगेगी, लेकिन कांग्रेसको गुजराती लोग 'मुस्लिमवादी पार्टीÓ मानते रहे हैं, लिहाजा कांग्रेस पूरी तरह भाजपाके विकल्पमें आज भी मौजूद नहीं है। गुजरातमें कांग्रेसका संघटन चरमराया हुआ है, यह खुद राहुल गांधी मानते रहे हैं, जबकि भाजपा प्रत्येक बूथपर कार्यकर्ताओंकी फौजके साथ मौजूद है।
वहीं राहुल गांधीके लिए यह बहुत बड़ी बात है जिससे वह साबित कर पायंगे कि उनमें नेतृत्व क्षमता है। राहुल गांधीको पार्टीकी कमान देनेकी चर्चा है। ऐसेमें यदि वह यहां कांग्रेसकी जीत दर्ज करा देते हैं तो पार्टीमें एक नयी ऊर्जा और उत्साहका संचार होगा। लगातार चुनाव हारनेके कारण मायूस कांग्रेस कार्यकर्ताओंमें अपने नये नेतृत्वके प्रति भरोसा बढ़ेगा। राहुल गांधीके लिए गुजरात जीतना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि पार्टीके अंदरसे भी उनके नेतृत्वको लेकर आवाजें उठती रही हैं। गुजरातमें मोदीकी होम पिचपर उन्हें मात दे, राहुल उन आवाजोंको चुप करा सकते हैं। उनकी  लीडरशिपपर संदेह है वह चुप होंगे और पार्टीके अंदर उनकी चुनाव हरानेवाली छवि भी खत्म होगी। राहुलके लिए यह चुनाव इसलिए भी एक मौका बताया रहा है क्योंकि वह एक ऐसे राज्यके चुनाव मैदानमें जहां बीजेपी काफी दिनोंसे सत्तामें है और सरकार विरोधी लहरें भी मुखर हैं। पटेलोंकी नाराजगी जगजाहिर है। यदि ऐसे मौकेको राहुल गंवा देते हैं तो उनके नेतृत्व क्षमतापर गहरे सवाल खड़े हो जायंगे। मुमकिन है कि कुछ ऐसी आवाजें सुनायी पड़े जो राहुलके लिए सहज नहीं हो।
गुजरातमें यदि राहुल स्थानीय युवा नेताओंको अपने पालेमें कर बीजेपीको मात देते हैं तो फिर उनपर दूसरे क्षेत्रीय पार्टियों और नेताओंका भी भरोसा बढ़ेगा। राहुल गांधीके नेतृत्वमें एक नये गठजोड़की संभावनाएं बनेगी जहां युवा नेतृत्व २०१९ के लिए चुनौतीके तौरपर खड़े होते दिखेगा। कांग्रेसमें मुख्य मंत्री स्तरका कोई चेहरा भी नहीं है। हालांकि भाजपा भी प्रधान मंत्री मोदीके भरोसे ही है, लेकिन मुख्य मंत्री कोई भी हो, काम तो मोदीको करने हैं। वह लगातार गुजरातको कुछ न कुछ देते दिख रहे हैं, यह सच भी भाजपाके पक्षमें जाता है। फिलहाल अहम सवाल तो यह पूछा जा रहा है कि अल्पेश और हार्दिक एक साझा मंचपर राजनीति कैसे कर सकते हैं? आरक्षण दोनोंका अहम मुद्दा है और कांग्रेसने कोई आश्वासन नहीं दिया है। सरकार किसके हिस्सेमेंसे आरक्षण देगी? ओबीसी करीब ३५ फीसदी हैं, जबकि पाटीदार उससे आधे करीब १८ फीसदी हैं।  सवाल यह भी है कि प्रधान मंत्री खुद ओबीसी हैं, उनसे बड़ा ओबीसी नेता कौन हो सकता है? फिलहाल प्रधान मंत्री चिंतित इसलिए हैं कि यदि गुजरातमें चुनाव परिणाम उम्मीदोंके अनुरूप नहीं रहा तो २०१९ का मिशन गड़बड़ा सकता है। २०१४ के लोकसभा चुनावमें सभी २६ सीटें भाजपाकी झोलीमें आयी थीं, लिहाजा नतीजे उसके आसपास ही रहने चाहिए। अभी तो हवाकी गति बेहद मद्धिम है, उसने गति पकडऩी है। हवाका रुख आनेवाले दिनोंमें और भी साफ होगा।