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मोदीका वैश्विक वर्चस्व

आतंकवादपर भारतकी जो नरम नीति थी, मोदीने उसे बदल दिया है। मोदीने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब बंधक प्रकरणमें कोई समझौता नहीं करेगा।                     
 मीडियामें एक फोटो धड़ल्लेसे छायी रही, जिसमें मोदी और  डोनाल्ड ट्रम्प एक-दूसरेके हाथमें हाथ रखकर खूब मजाक कर रहे हैं। दो राष्ट्रोंके मध्य संबंधोंमें बदलावको कैसे देखा जाय तथा विशेषकर उभरते भारतीय नेताके वैश्विक नजरियेको कैसे समझा जाय। विश्वमें प्रदर्शित इस मैत्रीका मर्मस्पर्शी चित्रण जहां साझा है, वहीं वह उस यादको भी दिलाता है जब दस साल पहले इसी अमेरिकाने मोदीको अपने देशमें यात्रा करनेके लिए वीजा देनेसे इनकार कर दिया था। अब वह शक्ति मोदीसे मैत्रीमें आलिंगनबद्ध हो गयी लगती है। सम्मानकी जिस दृष्टिके साथ विश्व आज हमें देख रहा है, वह सम्मान चंद्रयान जैसी परियोजनाके कारण और बढ़ गया है। पूर्वमें अन्य देश भारत अथवा भारतीयोंकी ओर इतना ध्यान नहीं देते थे। किन्तु जब अटल बिहारी वाजपेयीने पोखरणमें परमाणु परीक्षणकी इजाजत दी तो पहली बार विश्वका ध्यान भारतकी ओर गया और वह कहने लगे, ओह, आप भारतीय  अब परमाणु शक्तिसे संपन्न हैं। अब जब मैं भारतीयके रूपमें विदेश जाता हूं तो वह मेरा यह कहकर अभिवादन करते हैं, वाह, मोदीके देशके नागरिक। विश्व उसकी ओर ध्यान देता है जिसके पास शक्ति होती है तथा उसे सम्मान देता है जो इसके परिक्षेत्रमें बदलाव लानेमें सक्षम हो। अमेरिका, भारतकी ओर पहले इतना ध्यान कभी नहीं देता था जितना अब दे रहा है। यह मोदीकी सोचके कारण संभव हो पाया है, न कि उस तरह जिस तरह पाकिस्तानके विश्वसे संबंधोंके कारण जिसमें वह अपने हित साधनेमें लगा रहता है। डोनाल्ड ट्रम्प एक ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जो खुलकर आतंकवाद तथा इसे पोषित करनेवाले देशोंकी आलोचना करते हैं।
फाउंडेशन आफ नेशनल सिक्योरिटीने भारतके नजदीक देशोंकी परिगणना करते हुए ८६ के स्कोरपर परिगणित किया है। इसके अनुसार ६२ के स्कोरके साथ रूस सबसे निकट है, इसके बाद ५८ के स्कोरके साथ अमेरिका है, फिर ५१ के स्कोरके साथ फ्रांस है, जबकि ब्रिटेन, जर्मनी और जापान इनके बाद आते हैं। दो घटनाक्रमोंके कारण भारत तथा विश्वके संबंधोंमें व्यापक बदलाव आया है। पहला, बालाकोटमें एयर स्ट्राइक तथा दूसरा, भारतीय संविधानके अनुच्छेद ३७० को हटानेके लिए संकल्पका कार्यान्वयन। जैसा कि विदित है कि अनुच्छेद ३५ ए संविधानमें बिना किसी वैधानिक समर्थनके ही आ गया था, जिससे यह गैर-कानूनी बन गया। अनुच्छेद ३७० को हटानेपर विरोधमें पाकिस्तानके प्रधान मंत्री इमरान खानने भारी हो-हल्ला किया, लेकिन प्रयासोंके बावजूद उन्हें विश्वमें इसपर समर्थन नहीं मिल पाया। जी-७ समूहने पाकिस्तानको दुत्कार कर बाहर कर दिया तथा यहांतक कि मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात जैसे मुस्लिम देशोंने भी इमरानका समर्थन नहीं किया, बल्कि उनकी निंदा करते हुए उन्हें अपना घर संभालनेकी सलाह दी। अब पाकिस्तान विश्वमें अलग-थलग पड़ गया है जिससे चिढ़कर निरंतर भारतको युद्धकी धमकियां देनेमें लगा है। वह तिलमिला गया है। इमरान और उनके सहयोगी मंत्री अब भारतको परमाणु युद्धकी धमकी दे रहे हैं तथा विश्वको भी चेता रहे हैं कि यदि पाकिस्तानने परमाणु हथियारोंका प्रयोग किया तो उससे विश्व भी बुरी तरह प्रभावित होगा। इमरान अब निराश और भयभीत महसूस कर रहे हैं क्योंकि उनका अस्तित्व इस बातपर टिका है कि वह किसी तरह भारतपर बढ़त बनाये रखें। उधर पाकिस्तानकी सेना भी अधीर हो उठी है। ऐसी स्थितिमें विश्व मोदी तथा भारतको आतंक एवं उसके खतरेके रास्तेमें बड़ी बाधाके रूपमें देख रहा है। दूसरी ओर मोदी दूसरों देशोंके मध्य अपनी सकारात्मक छवि भी बना रहे हैं। यह मोदी तथा भारत, दोनोंके लिए एक बड़ी उपलब्धि थी कि अपनी सत्ताके शुरुआती दिनोंमें ही वह विश्वको यह बात मनानेमें सफल रहे कि यूएनने योगको अंतरराष्ट्रीय दिवसके रूपमें मान लिया है तथा अब योग एक आंदोलन बनकर उभरा है। मोदी विश्वसे अपने विचार मनवाने अर्थात उन्हें मान्यता दिलानेमें सफल रहे हैं। उनका फिटनैस मूवमेंट अब एक बड़ा आंदोलन बन गया है।
आतंकवादपर भारतकी अबतक जो नरम नीति थी, मोदीने उसे बदल दिया है। ऐसे भी देश हैं जिन्होंने बंधक प्रकरणोंसे निबटनेके लिए समझौता वार्ताको कानून बनाये हैं। मोदीने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब बंधक प्रकरणमें कोई समझौता नहीं करेगा। यही कारण था कि भारतने पाकिस्तानसे एयर फोर्सके अधिकारी कमांडर अभिनंदनकी रिहाईके लिए समझौता वार्ता करनेसे इनकार कर दिया था। उसने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया कि यदि भारतीय सैन्य कमांडर अभिनंदनको कोई क्षति पहुंचायी गयी तो पाकिस्तानको इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। इसी कारण भारतीय वायु सेनाके इस अधिकारीका पाकिस्तान कुछ भी बिगाड़ नहीं पाया। उल्लेखनीय है कि इससे पहले मुफ्ती मुहम्मद सईदकी पुत्रीकी रिहाई तथा काबुल बंधक प्रकरणमें बंधक बनाये गये यात्रियों (हाइजैक किये गये विमानके यात्रियों) की रिहाईके बदलेमें भारतको आतंकवादियोंको छोडऩा पड़ा था। आतंकवादके मसलेसे निबटनेके लिए भारतकी नयी कड़ी नीतिने नजरियेमें एक बदलाव लाया है तथा इससे दोनों देशोंके संबंधोंमें भी परिवर्तन आया है। विश्व अब भारतकी संबंधोंकी शक्ति तथा शांतिपूर्ण दर्शनको मान्यता देता है। यह नीति भारतके प्राचीन मूल्योंपर आधारित रही है।
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दलबदलुओंपर जनता कसे शिकंजा
 निर्मल रानी       
रा जस्थानकी राजनीतिमें गत दिनों एक बार फिर स्वार्थी एवं सत्ताकी घोर चाहत रखनेवाली राजनीतिका बदनुमा चेहरा देखनेको मिला। हुआ यह कि राजस्थानमें बहुजन समाज पार्टीके सभी छह  विधायक कांग्रेस पार्टीमें शामिल हो गये। दलबदलकी इस घटनाके बाद राजस्थान विधानसभामें कांग्रेसके विधायकोंकी संख्या अब सौसे बढ़कर १०६ हो गयी है। हालांकि पहले भी राज्यमें अशोक गहलोतकी कांग्रेस सरकारको बसपाका बाहरसे समर्थन हासिल था। कानूनी तौरपर इस घटनाको दलबदल नहीं, बल्कि एक दलके विधायकोंका दूसरे दलमें 'विलय’ का नाम दिया जाता है। ऐसे 'विलय’ जैसे फैसलोंमें किसी प्रकारकी कानूनी अड़चन भी नहीं होती। परन्तु क्या नैतिकताके मापदंडपर भी ऐसा तथाकथित 'विलय’ या दलबदल खरा उतरता है। आज लगभग पूरे देशमें बड़े पैमानेपर ऐसी खबरें सुनी जा रही हैं कि कलका कांग्रेसी या सपाई या किसी अन्य दलका कोई नेता विधायक या सांसद भारतीय जनता पार्टीमें शामिल हो गया।
प्रतीत होता है कि निर्वाचित होनेके बाद सत्ता पक्षमें बैठे बिना 'माननीय’ की राजनीति ही अधूरी है। जाहिर है सत्ताकी पंक्तिमें खड़े होनेके बाद निर्वाचित 'माननीयों’ के मंत्री बननेकी संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं। यही लगभग प्रत्येक नेताकी तमन्ना भी होती है कि वह चुनाव भी जीते और फिर उसे मंत्रिमंडलमें भी शामिल किया जाय। आश्चर्यकी बात तो यह है कि दलबदल या विचार परिवर्तनके बाद भी ऐसे माननीय बड़ी ही बेशर्मीके साथ अपनी छाती चौड़ी कर पुन: अपने उन्हीं मतदाताओंके पास वोट मांगने जाते हैं जिनसे पिछली बार किसी दूसरे दलके उम्मीदवारके रूपमें वोट मांगा था। अक्सर जनता उन्हें पुन: दूसरे दल का प्रत्याशी होनेके बावजूद जिता भी देती है। इधर 'नेताजी’ के पास भी अपनी इस दलबदल या विचारधाराके परिवर्तनका एक बहुत ही सधा हुआ जवाब तैयार रहता है। वह अपने मतदाताओंको समझाते हैं कि 'यह दलबदल या निष्ठा परिवर्तन केवल जनताकी भलाईके लिए किया गया है, ताकि क्षेत्रका विकास हो सके। जाहिर है प्रगति एवं विकास कार्योंके लिए सत्ताका साथ या संरक्षण जरूरी होता है।‘ ऐसे तर्कोंको सुनकर भले ही जनता स्वयंको राजनीतिक दृष्टिसे ठगा हुआ क्यों न महसूस करे परन्तु 'क्षेत्रके विकास’ के तर्कको सुनकर वह भी यह जानते हुए भी खामोश हो जाती है कि 'नेताजी’ द्वारा उसे ठगा ही गया है।
ऐसे दलबदलुओंके पास सिद्धांत अथवा विचारधारा नामकी कोई चीज ही नहीं होती, बल्कि इनके लिए इससे भी महत्वपूर्ण इनका राजनीतिक भविष्य होता है। यदि इन्हें इस बातका आभास हो जाय कि उनकी पार्टी इस बार उन्हें चुनाव मैदानमें उतारने नहीं जा रही है और किसी और नेताको प्रत्याशी बनाये जानेकी संभावना है। उसी समयसे अपने राजनीतिक भविष्यकी चिंता करने लगते हैं और टिकटके लिए अन्य दलोंकी और ताकने झांकने लगते हैं। यदि कोई जीत भी जाय और विपक्षमें है तो वह मंत्री बननेकी शर्तपर दल बदलकर लेता है या कानूनी अड़चनोंसे बचनेके लिए अपनी पार्टीमें विभाजन करवा देता है। इसी प्रकार कई बड़े नेता गठबंधनमें शामिल होनेके लिए अवसरवादिताकी पूरी परख रखते हैं। कब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधनका हिस्सा बनना है और कब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधनमें शामिल होना है यह हुनर एवं 'दूरदर्शिता’ इन्हें बखूबी आती है। लोक जनशक्ति पार्टीके नेता राम विलास पासवान ऐसे 'दूरदर्शी’ नेताओंके लिए एक 'आदर्श’ नेता हैं। इन्हें राजनीतिका 'मौसम वैज्ञानिक’ भी कहा जाता है। देशमें कई नेता ऐसे भी हैं जिन्होंने सत्तामें रहते हुए अपने पदोंका भरपूर दुरुपयोग किया। अकूत संपत्ति अर्जितकी और घोर अनियमिताओंका सहारा लेते हुए खूब मनमानी की। ऐसे नेताओंके सरपर सीबीआई या अन्य जांच एजेंसियोंकी नजरें रहती हैं। उन्हें भय रहता है कि कहीं हमारा रुतबा और आजादी खत्म न हो जाय और कहीं हम सलाखोंके पीछे न डाल दिये जायं। ऐसे नेता भी सत्ता पक्षके नेताओंसे अपने रुसूखके आधारपर सांठगांठ कर अपना 'राजनीतिक धर्म परिवर्तन’ कर लेते हैं। वैसे भी हमारे देशमें स्वार्थी एवं रीढ़-विहीन नेताओंकी संख्या बहुत ज्यादा है। बेशक वह खादीके सफेद कपड़ों में लिपटे रहते हैं परन्तु उन्हें इस सफेदी एवं खादीके महत्वका ज्ञान ही नहीं। लोकसेवा, वैचारिक एवं सैद्धांतिक सोच, दक्षिण पंथ, वामपंथ जैसी बातोंकी इनको समझ ही नहीं है। आजका कौन-सा नेता अगले दिन दूसरी पार्टीका हाथ थाम ले, कुछ नहीं कहा जा सकता।
दलबदल करना या घटक बदलना बेशक नेताओंका अधिकार क्षेत्र है। परन्तु अपने मतदाताओंसे छल एवं धोखा करनेका अधिकार उन्हें हरगिज नहीं है। यह कानूनके खिलाफ भले ही न हो परन्तु नैतिकताके बिल्कुल विरुद्ध जरूर है। यह सरासर अपने मतदाताओंकी उस रायकी मुखालिफत है जो उन्होंने चुनावमें अपने नेताके पक्षमें मतदान कर व्यक्त की है। यदि किसी निर्वाचित माननीयके लिए दलबदल करना उसकी मजबूरी है भी तो उसे या तो पहले अपने पदसे त्याग पात्र देना चाहिए या फिर किसी भी तरीकेसे अपने मतदाताओंकी राय लेकर ही उसे दलबदल या घटक परिवर्तन करना चाहिए। दूसरी तरफ मतदाताओंको भी ऐसे दलबदलू, सिद्धांतविहीन नेताओंको चुनावमें ऐसा सबक सिखाना चाहिए, ताकि वह राजनीतिक दलबदल करना तो क्या राजनीतिके मैदानसे ही खुदको दूर करनेकी बात सोचनेके लिए मजबूर हो जायं। जब जनता इन दलबदलुओंको उनकी औकात दिखने लगेगी निश्चित रूपसे मौकापरस्तीकी सियासतको लगाम लगने लगेगी अन्यथा 'थालीके ये बैंगन’ हमेशा अपनी सुविधानुसार दलबदल भी करते रहेंगे और मतदाताओंको अपना गुलाम समझते रहेंगे।