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प्लास्टिक प्रदूषण उच्च स्तरपर

भारतमें प्लास्टिक प्रदूषण अपने उच्च स्तरपर पहुंच चुका है। देशके छोटे-बड़े शहर पॉलीथीनसे पटे पड़े हैं। पॉलीथीनका बढ़ता हुआ उपयोग भविष्यके लिए भी खतरनाक होता जा रहा है।                      
 पालीथीनका बढ़ता हुआ उपयोग न केवल वर्तमानके लिए, बल्कि भविष्यके लिए भी खतरनाक होता जा रहा है। दुनियाभरके महासागरोंमें हर साल ८० लाख टन प्लास्टिक फेंका जाता है यानी हर दिन और हर मिनट एक ट्रक कूड़ा (प्लास्टिक) समुद्रमें फेंका जाता है। महासागर संरक्षणको लेकर २०१५ में आयी एक रिपोर्टके मुताबिक इसमेंसे आधेसे ज्यादा कूड़ा एशियाके पांच देशों- चीन, इंडोनेशिया, फिलीपीन, थाईलैंड और वियतनामसे आता है। जिस प्लास्टिकका आविष्कार वैज्ञानिकोंने मानव जातिकी सुविधाके लिए किया था, वह भस्मासुर बनकर समूचे पर्यावरणके विनाशका कारण बनती जा रही है। इसकी सबसे बड़ी खूबी ही दुनियाके लिए सबसे खतरनाक बात बन गयी है, और वह है नष्ट न होना। इसके चलते हमारी धरतीसे लेकर समुद्रतक हर तरफ प्लास्टिक ही प्लास्टिक है। पीनेके पानीमें हम प्लास्टिक पी रहे हैं, नमकमें प्लास्टिक खा रहे हैं। सालाना लाखसे अधिक जलीय जीव प्लास्टिक प्रदूषणसे मर रहे हैं। अमेरिकामें सालाना औसत व्यक्ति १०९ किग्रा प्लास्टिकका इस्तेमाल करता है। इसके मुकाबले भारतमें एक औसत भारतीय सालाना ११ किग्रा प्लास्टिकका इस्तेमाल करता है। फिलहाल देशमें प्लास्टिकके इस्तेमालपर लगाम कसनेके लिए सिर्फ एक कानून है कि कोई उत्पादक या दुकानदार ५० माइक्रानसे कम मोटी प्लास्टिक इस्तेमाल नहीं कर सकता है। यह कानून अन्य सभी प्रकारके प्लास्टिक बैगपर लागू नहीं होता इसलिए प्लास्टिकका उपयोग कम नहीं होता। वैश्विक स्तरपर पिछले सात दशकोंमें प्लास्टिकके उत्पादनमें कई गुणा वृद्धि हुई है। इस दौरान तकरीबन ८.३ अरब मीट्रिक टन प्लास्टिकका उत्पादन किया गया। इसमेंसे लगभग ६.३ अरब टन प्लास्टिक कचरेका ढेर बन चुका है, यह और बात है कि इसमेंसे केवल नौ फीसदी हिस्सेको ही अभीतक रिसाइकिल किया जा सका है। यदि भारतके संदर्भमें बात करें तो यहां हर साल तकरीबन ५६ लाख टन प्लास्टिक कचरेका उत्पादन होता है। जिसमेंसे लगभग ९२०५ टन प्लास्टिकको रिसाइकिल किया जाता है।
वास्तवमें हम सभी पॉलीथीनका उपयोग करनेके खतरनाक पहलुओंको नजरअंदाज करते आ रहे हैं। हम सभी इसके खतरनाक पहलुओंसे अवगत हैं, इसके बाबजूद बहुतसे लोग पॉलीबैग्सका प्रयोग करना बंद नहीं कर रहे हैं। सरकार द्वारा भी लोगों को पॉलीथीनके दुष्परिणाम एवं पॉलीथीन रोकनेके लिए जागरूक किया जा रहा है परन्तु सरकारके तमाम प्रयासोंके बावजूद भी पॉलीथीनके उपयोगपर अंकुश नहीं लग पा रहा है। प्लास्टिक बैग, पॉलीथीनका प्रयोग बंद कर अन्य विकल्प अपनाये जा सकते हैं। कुछ वर्षों पहलेतक मिट्टी, धातु, कांचके बने बर्तन ही इस्तेमाल होते थे। इन्हें कई बार इस्तेमाल कर सकते थे। धीरे-धीरे सस्ते प्लास्टिक उत्पादोंने इनकी जगह ले ली। अनुमान है कि लोग प्रति मिनट दस लाख प्लास्टिक बोतलें इस्तेमाल करते हैं। यदि फिरसे उन्हीं पदार्थोंकी तरफ मुड़ा जाय तो प्लास्टिक उत्पादनपर लगाम लगायी जा सकती है। अधिकतर प्लास्टिक उत्पाद सिर्फ एक बार इस्तेमाल करके फेंक दिये जाते हैं। ऐसे उत्पादोंका इस्तेमाल बंद करना होगा। ऐसे उत्पादोंको चुनना होगा जो ज्यादा समयतक इस्तेमाल किये जा सकें और उनका जीवनकाल पूरा होनेके बाद उन्हें रिसाइकिल करके किसी दूसरे काममें लाया जा सके। विशेषज्ञोंके अनुसार पॉलिथीनके प्रयोगसे सांस सम्बंधित बीमारी और त्वचा रोग हो सकते हैं। कैंसरका भी खतरा बढ़ रहा है। पॉलिथीनसे कई विषैली गैसें निकलती हैं जो मनुष्यकी सेहतके साथ पर्यावरणके लिए भी खतरनाक हैं। इसके प्रयोगसे गर्भस्थ शिशुका विकास रुक सकता है। यह जल्दी वातावरणमें नहीं घुलती है। नतीजतन जहां-तहां फेंकी गयी पॉलिथीन मिट्टीमें नीचे दबनेके बाद दो परतोंके बीच अवरोध बन जाती है जिससे भूमि बंजर होने लगती है। इसके अलावा नालियों, नालोंमें फंसकर जगह-जगह जलभरावका कारण बन जाती है। पॉलीथीनके कारण शहर गंदा दिखाई देता है। जानवरोंके पेटमें पॉलीथीन पहुंचकर उनकी मौतकी वजह बन रही है। ऐसा नहीं है कि इस प्लास्टिकके बढ़ते दखलके बीच सब हाथपर हाथ धरे बैठे हैं। कई देशोंमें अलग-अलग तरीकोंसे इस दैत्यको हरानेकी जंग जारी है। ब्रिटेन और अमेरिकी वैज्ञानिकोंने एक ऐसा एंजाइम विकसित किया है जो प्लास्टिकको गला कर खत्म कर सकता है। इसका नाम पीईटी-ऐज है।
वैज्ञानिकोंने इस एंजाइमका परीक्षण प्लास्टिक बोतलोंपर किया, जिसके नतीजे सकारात्मक रहे। उम्मीद है कि इसके जरिये प्लास्टिकको बड़े पैमानेपर रिसाइकिल किया जा सकेगा, जिससे पर्यावरणमें मौजूद प्लास्टिकका कचरा कम हो सकेगा। भारत सरकारने भी प्लास्टिक प्रदूषणको खत्म करनेकी मुहिम शुरू कर दी है। पिछले दिनों मथुरामें प्रधान मंत्रीने अपने संबोधनमें कहा कि, 'सिंगल यूज प्लास्टिकसे छुटकारा पाना ही होगा। हमें कोशिश करनी है कि दो अक्तूबरतक अपने दफ्तरों, घरोंको सिंगल यूज प्लास्टिकसे मुक्त करें।‘ महात्मा गांधीकी १५०वीं जयंतीपर सरकार सिंगल यूज प्लास्टिककी कुछ चीजोंपर प्रतिबंध की घोषणा कर सकती है। कोई दो राय नहीं है कि सरकारी आदेश या अभियानभरसे पॉलीथीन या प्लास्टिक प्रदूषणपर पूर्ण प्रतिबंध लगा पाना संभव है। सरकारी योजनाओंमें नागरिकोंका सहयोग एवं भागीदारी बेहद जरूरी है। वास्तवमें पॉलीथीनके प्रयोगके लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं। जिस दिन मिलकर चाह लेंगे उस दिन पॉलीथीनका प्रयोग पूर्णतौरपर बंद हो जायगा।
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पाकिस्तानी मिसाइलोंके नाम आक्रांताओंसे प्रभावित
तनवीर जाफरी      
'पाकिस्तानने अपनी रक्षा प्रणालीमें जिन मिसाइलोंको 'सुसज्जित’ कर रखा है उनमेंसे कुछ मिसाइलोंके नाम हैं- बाबर, गौरी और गजनी’। पाकिस्तान द्वारा अपनी मिसाइलोंका इस प्रकारका नामकरण किया जाना जाहिर है उसके इरादों, नीयत एवं उसकी आक्रामकताको दर्शाता है। पाकिस्तान द्वारा यह नाम अनायास ही नहीं रखे गये, बल्कि सही मायनेमें पाकिस्तान इसी प्रकारके आक्रांताओं एवं लुटेरे शासकोंसे ही प्रेरित एवं प्रभावित रहा है, जबकि भारतमें इन शासकोंकी गिनती लुटेरे आक्रांताओंमें की जाती है। खास तौरपर महमूद गजनवीको तो भारतमें आक्रमणके दौरान लूटपाट मचाने एवं सोमनाथके प्राचीन मंदिर तोडऩेवाले एक आक्रामक शासकके रूपमें जाना जाता है। गौरतलब है कि गजनवीने सबसे बड़ा आक्रमण १०२६ ई. में काठियावाड़के सोमनाथ मंदिरपर था। विध्वंसकारी महमूदने सोमनाथ मंदिरका शिवलिंग तोड़ दिया था और मंदिरको ध्वस्त कर दिया था। इस हमलेमें हजारों लोग मारे गये थे जबकि गजनवीके लुटेरे सैनिक मंदिरका सोना और भारी खजाना लूटकर ले गये थे। अकेले सोमनाथसे उसे अबतक की सभी लूटोंसे अधिक धन मिला था। गजनवी जैसे लुटेरे आक्रांताओंने भारतमें ही नहीं, बल्कि पूरे विश्वमें अपने ऐसे ही लूटपाटके कारनामोंसे इस्लाम एवं मुसलमानोंकी छविको धूल धूसरित करनेका काम किया था। यही वह दौर था जबकि सन् ६१ हिजरीमें करबलामें यजीदके लश्करकी तर्जपर धर्मके नामपर अपने इस्लामी साम्राज्यको बढ़ानेकी चेष्टा करते हुए लूटपाट तथा धर्मस्थलोंको तोडऩे जैसी अनेक इबारतें लिखी गयीं। कहना गलत नहीं होगा कि ऐसे ही शासकोंने अन्य धर्मोंके लोगोंके दिलोंमें मुसलमानोंके प्रति नफरत पैदा की तथा इस्लाम धर्मकी छवि धूमिल की।
जिस प्रकार यजीदके समर्थक उसके प्रशंसक एवं उसे अपना प्रेरणा स्रोत माननेवाले लोग ६१ हिजरीके दौरमें करबलाकी घटनाके समय मौजूद थे उसी तरह यजीद एवं यजीदियतके रस्तेपर चलनेवाले आतंकी सरगनाओंके समर्थक एवं उनके प्रशंसक आज भी मौजूद हैं। यजीद भी तलवारके बलपर इस्लामी हुकूमतको फैलानेका दावा तो करता था परन्तु हकीकतमें वह इस्लामका इतना बड़ा दुश्मन था जिसने रसूल-ए-पाक हजरत मुहम्मदके परिवारके लोगोंको ही करबला (इराक) में शहीद कर पूरे इस्लामी जगतके चेहरेपर कला धब्बा लगानेकी कोशिश की। इसी साम्रज्यवादी सोचका प्रतिनिधित्व अलकायदा, दाइश, आईएस एवं तालिबान जैसे इनके अनेक सहयोगी संघटन भी कर रहे हैं। देखनेमें रंग रूप एवं पहनावेमें चूंकि यह भी कट्टर मुसलमान ही प्रतीत होते हैं लिहाजा इस्लाम विरोधी शक्तियोंको इनकी हर 'कारगुजारियों’ को मुसलमानों एवं इस्लामसे जोडऩेमें  ज्यादा वक्त नहीं लगता। निश्चित रूपसे पाकिस्तानकी तबाही एवं वहां अल्पसंख्यकोंके साथ वहां होनेवाले जुल्मो जब्रका मुख्य कारण ही यही है कि पाकिस्तान इस्लामके वास्तविक नायकों अर्थात नबी, पैगम्बरसे ज्यादा गजनवी, अब्दाली, लाडेन, जवाहरी, मसूद अजहर एवं हाजि सईद जैसे उन लोगोंसे प्रेरित होता है जो इस्लाम एवं मुसलमानोंको हमेशा ही कलंकित करते रहे हैं।
अभी पिछले दिनों एक बार फिर कश्मीरके ताजा तरीन सुरते-ए-हालके सन्दर्भमें बात करते हुए पाकिस्तानके धार्मिक संघटन जमात-ए-इस्लामी प्रमुख सिराज उल हकने अपनी गिनती 'गजनवीकी औलादों’ में की है। खबरोंके मुताबिक जमात प्रमुख सिराज उल हकने यह भी कहा कि 'कश्मीर पाकिस्तानके लिए जिन्दगी और मौतका सवाल है। उसने बड़े ही गौरवान्वित लहजेमें अपने लिए यह भी कहा कि वह 'महमूद गजनवीकी औलाद’ हैं। वह स्वयंको किस रिश्तेसे गजनवी की औलाद बता रहे हैं मुझे नहीं मालूम। क्योंकि शाब्दिक अर्थके लिहाजसे तो विलादत देनेवालेको वालिद और उससे पैदा होनेवाली संतानको औलाद कहा जाता है। हो सकता है उनका शजरा गजनवीसे मिलता भी हो परन्तु यदि वह महज एक मुसलमान होनेके नाते उस आक्रांतासे अपना रिश्ता जोड़ रहे हैं तो उन्हें यह बताना जरूरी है कि यह लुटेरे और आक्रांता कभी भी भारतीय मुसलमानोंके नायक अथवा प्रेरणा स्रोत नहीं रहे। यह क्या कोई भी मुस्लिम सुल्तान या शासक, बादशाह अथवा नवाब कभी भी इस्लाम धर्मका नायक कभी भी न हुआ है, न हो सकता है, न ही उसे इस्लामी नायक एवं मुसलमानोंका प्रेरणास्रोत माना जा सकता है। भले ही उसने नमाज, रोजा, हज आदिका पालन भी क्यों न किया हो। इस्लाम पैगम्बर हजरत मोहम्मद एवं उनके परिजनों हजरत अली, बीबी फातिमा, हजरत इमाम हसन एवं हजरात इमम हुसैन जैसे हजरत मुहम्मदके घरानेवालोंसे प्रेरणा हासिल करनेवाला धर्म है। इस्लामए पैगम्बरों, इमामों एवं मुहम्मदके घरानेवालोंको अपना आदर्श माननेवाला धर्म है। इस्लाम उस त्याग, तपस्या और कुर्बानीका धर्म है जो करबलामें हजरत इमाम हुसैनकी शहादतकी शक्लमें सिर चढ़कर बोला। इस्लाम हुसैनियतके बलपर जिन्दा है यजीदियतके बलपर नहीं। यजीदियतके लक्षण तो यही हैं जो गजनवी, अब्दाली, लाडेन, जवाहरी, मसूद अजहर एवं हाफि सईद जैसे लोगोंमें और इनके चहेतोंमें दिखाई दे रहे हैं।
यहां पाकिस्तानके जमात प्रमुख सिराज उल हकके कश्मीरके सन्दर्भमें दिये गये बयानके विषयमें यह बताना भी जरूरी है कि कश्मीरमें कश्मीरियोंके साथ उनकी 'गजवीयत’ से भरी हमदर्दी कश्मीर और कश्मीरियतको नुकसान तो जरूर पहुंचा सकती है, फायदा हरगिज नहीं। कश्मीरके विषयपर भारतमें ही सरकारकी कश्मीर नीतिसे असहमति रखनेवालों द्वारा सरकारकी हर संभव आलोचना हो रही है। कश्मीरियों और कश्मीरियतका साथ देनेवाले लोग भारतीय समाजमें बड़ी संख्यामें हैं। परन्तु पाकिस्तानके लोगोंकी हमदर्दी खस तौरपर उनकी हमदर्दीका 'गजवियाना’ अंदाज कश्मीरी लोगोंके लिए नुकसानदेह होगा। जहांतक कश्मीरके विषयपर भारतीय मुसलमानोंके पक्षका प्रश्न है तो पिछले दिनों जमीयत उलेमा-ए-हिंदके महासचिव महमूद मदनी गत १२ सितंबरको जमीयत उलेमा-ए-हिंदके इस प्रस्तावके पारित होनेकी घोषणा कर चुके हैं कि 'कश्मीर भारतका अभिन्न अंग है, जम्मू-कश्मीरके लोग भी भारतीय ही हैं। वह हमसे किसी प्रकार अलग नहीं हैं।‘
महमूद मदनी यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि बावजूद इसके कि 'पाकिस्तान वैश्विक स्तरपर यह बात उछालनेकी कोशिश कर रहा है कि भारतीय मुसलमान भारतके खिलाफ हैं। हम पाकिस्तानकी इस कोशिशका विरोध करते हैं। भारतके मुसलमान अपने देशके साथ हैं। हम अपने देशकी सुरक्षा और एकताके साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। भारत हमारा देश है और हम इसके साथ खड़े रहेंगे।‘ मदनीने ये भी कहा कि देशमें रहते हुए बहुतसे मुद्दोंपर हमारी असहमति हो सकती हैं, लेकिन जब देशकी बात आती है तो हम सब एक हैं। अत: पाकिस्तानी नेताओं और 'गजनवीकी औलादों’ को कश्मीरी मुसलमानोंके हजमें घडिय़ाली आंसू बहानेके प्रदर्शनसे बाज आना चाहिए और अपने देशके अल्पसंख्यकोंकी सुरक्षापर अपनी ऊर्जा खर्च करनी चाहिए। यदि वह अपनी गजनवीयत भरी सोचका इस्तेमाल पाकिस्तानतक ही सीमित रखें तो ज्यादा बेहतर है। उनकी खामोशीमें ही कश्मीरियोंका हित निहित है।