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जिनपिंगका बिखरता सपना

अंतरराष्ट्रीयराजनीतिमें दशकभरसे चर्चा हैकि दुनियामें राजनीतिकध्रुवीकरण हो रहाहै। शक्ति पश्चिमीदुनियासे खिसककर एशियाकी ओरमुड़ रही है,जिसका सबसे प्रबलदावेदार चीन है।  

चीनकीआर्थिक और सैनिकव्यवस्थामें पिछले चार दशकोंमेंबहुत बदलाव हुआहै। उसे उम्मीदहै कि २०३५तक वह सबसेबड़ी आर्थिक शक्तिबन जायेगा औरशक्तिमें भी वहपहले पायदानपर पहुंचजायेगा। लेकिन ऐसा होताहुआ दिखायी नहींदेता। प्रो. रिचर्डहासका मानना हैकि महाशक्ति बननेकेलिए कई गुणोंकीजरूरत पड़ती है,जिनमें दो गुणविशेष हैं- पहला,दुनियाके किसी भीहिस्सेमें सैनिक हस्तक्षेप तथादूसरा, कहीं भीआणिवक प्रक्षेपास्त्र दागनेकीक्षमता। यह दोनोंक्षमता आज यदिकिसी देशके पासहै तो निश्चितरूपसे वह अमेरिकाही है। दोनोंही मानकोंपर चीनकीमठाधीशी कारगर नहीं दिखती।चीन एशियाका निष्कंटकसंप्रभु बननेकी कोशिशमें है।भारतके साथ उसकासीमा विवाद इसीकानतीजा है। लेकिनभारतने उसे चुनौतीदी है। जबचीन और भारतएक साथ राजनीतिकछावनी बनानेकी तैयारीमेंजुटे थे तोअमेरिकाने भारतको अपना हितैषीमाना था। १३सितंबर, १९४९ केन्यूयॉर्क टाइम्समें एक आलेखछपा था किभारत चीनकी शक्तिकोरोकनेमें कामयाब होगा। भारत६५ वर्षोंतक चीनकीआत्मीयताके लिए सबकुछत्याग करता गया।

सुरक्षापरिषद्की स्थायी सदस्यता औरतिब्बतका त्याग जैसे उदाहरणदुनियाके सामने हैं। फिरभी चीन भारतकेसाथ छल करतारहा। हिमालयके सीमावर्तीदेशोंमें अपनी धाकजमानेके साथ, वहांभारत विरोधकी लहरपैदा करना चीनकेछलका हिस्सा बनगया। हम एकचीनके सिद्धांतको शिद्दतकेसाथ मानते रहे,लेकिन चीन लचरऔर लाचार पड़ोसीकेरूपमें हमारे प्रति अपनीधारणा बनाता गया।बदलावका सिलसिला २०१४ सेशुरू हुआ, जबप्रधान मंत्री नरेंद्र मोदीनेअपनी पहली विदेशयात्रा भूटानसे शुरू कीऔर फिर वहनेपाल गये। यहएक गंभीर संदेशथा चीनके लिए।हिमालयी देश भारतकीविशेष मैत्री औरसंप्रभुताके अंग हैं।शीत युद्धके कोलाहलनेभारतको दोयम दर्जेकेदेशके रूपमें रूपांतरितकर दिया था।भारतीय विदेश नीति पूरीतरहसे पाकिस्तान उन्मुखबन चुकी थी,जिसे बनानेवाले प्रधानमंत्री नेहरू और तत्कालीनरक्षामंत्री मेनन थे।वर्ष १९६२ केयुद्धके पहले जबसेना प्रमुख चीनीआक्रमणके लिए चिंतितथे तो रक्षामंत्रीपाकिस्तानके साथ युद्धपरआमादा थे। उन्होंनेआगरामें यह बातयुद्धके पहले कहीथी। यदि २०१४के पहलेके भारतकेअस्त्र-शस्त्रका आकलन करेंगेतो भारतकी सुरक्षानीति स्पष्ट रूपसेपरिभाषित हो जातीहै। भारतके पासचीनके विरुद्ध लडऩेकीकोई तैयारी हीनहीं थी। डोकलामकेबाद सरकार प्रयासरतहुई। उसके बादही चतुर्भुज आयामबनाये, जिसमें भारत, अमेरिका,जापान और ऑस्ट्रेलियाशामिल हैं। एशिया-पैसिफिकको इंडो-पैसिफिक(हिंद-प्रशांत) केरूपमें रूपान्तरित कर दियागया। पूर्वी एशियामेंचीनकी धारको कुंदकरनेके लिए भारतकोविशेष अहमियत दीजाने लगी। चीनकेपड़ोसी देश भारतकेसाथ सैनिक अभ्यासमेंशरीक होने लगे।बदलेमें चीनने भारतीय उपमहाद्वीपमेंअपनी सैन्य गतिविधिकोऔर मजबूत बनानाशुरू कर दिया।पाकिस्तान पूरी तरहसेचीन की पीठपरजोंककी तरह चिपकचुका है। उसकीअपनी कोई स्वतंत्रनीति नहीं है।लेकिन चिंताकी लकीरनेपालको लेकर खिंचरही है। भारतनेपालको चीनका पिछलग्गू देशबनते हुए नहींदेख सकता।

फिलहालचीनी सेना पिछलेपांच महीनोंसे भारतीयसीमाके भीतर घुसनेकेलिए बेताब है।पिछले दिनों सीमापरजब चीनी सैनिकोंकीसंख्या बढ़ायी गयी तोभारतने भी अपनीताकतको बढ़ाकर दुगना करदिया। यदि भारतनेतिब्बत कार्ड खेलना शुरूकर दिया तोचीनके राष्ट्रपति शीजिनपिंगके दिवास्वप्नपर आघात लगसकता है। पिछलेकुछ महीनेमें चीनकेपांच बड़े नेता,जो पोलित ब्यूरोकेसदस्य हैं, तिब्बतजा चुके हैंऔर भारतके साथसंघर्षके लिए उन्हेंतैयार करनेकी सीखदे रहे हैं।तिब्बतके धर्मगुरु भारतमें हैंऔर तिब्बतकी निर्वासितसरकार भारतसे चलायीजाती है। तिब्बतकेलोग अपनी मातृभूमिकेलिए संघर्षरत हैं।यदि भारतका उन्हेंसाथ मिला तोतिब्बतके जांबाज चीनके सैन्यबलको तोडऩेका कामकर सकते हैं।भारतके लिए भीजरूरी है कितिब्बत कार्डका प्रयोग अबकिया जाये। यदिचीन सफल हुआतो दशकोंतक भारतकोशुतुरमुर्गकी तरह जीनेकेलिए अभिशप्त होनापड़ेगा। यदि चीनकीहार हुई, जिसकीसंभावना पूरी हैतो विश्व राजनीतिमेंभारतका प्रभाव कई गुनाबढ़ जायेगा। शीजिनपिंगने सत्तामें आनेके तुरन्तबाद एक व्यापकचीन साम्राज्य स्थापितकरनेकी बात कहीथी, जो मिंगसाम्राज्यके समय था,अर्थात भारतका लद्दाख, अरुणाचलऔर जम्मू-कश्मीरकाहिस्सा चीनका है। जिनपिंगकायह सपना बिखरनेवालाहै।

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अपनेही देशको लूटरही पाकिस्तानी सेना

डा.अमजद अयूब मिर्जा   

पाकिस्तानमेंपहलेसे ही बुरीतरहसे व्याप्त भ्रष्टाचारनेइसकी छवि औरभी खराब करदी है औरअब अहमद नूरानीकीएक जांच रिपोर्टकेप्रकाशन ने इसकोऔर गहरा करदिया। रिपोर्टने खुलासाकिया है किलैफ्टिनैंट जनरल (रिटायर्ड) आसिमसलीम बाजवाके परिवारकेपास पाकिस्तान तथाविदेशमें अरबोंकी सम्पत्ति है।आसिम बाजवा सीपीईसीकेचेयरमैन होनेके साथ पाकिस्तानकेप्रधान मंत्री इमरान खानकोसूचना देनेके लिएएक विशेष सहायकभी हैं। यहपद एक संघीयमंत्रीके प्रोटोकोलको निभानेके जैसाहै। रिपोर्ट दावाकरती है किबाजवाके भाई, पत्नीतथा दो बेटोंकेपास एक बहुतबड़ा कारोबारी साम्राज्यहै। उन्होंने चारदेशोंमें ९९ कम्पनियोंकोस्थापित किया जिनमें१३३ रेस्तरांके साथएक पिज्जा, फ्रेंचाइजशामिल हैं। जोकि ३९.९मिलियन अमेरिकी डालरकी सम्पत्तिबनती है। यहखुलासे इमरान खानके लिएतबाहकुन हो सकतेहैं क्योंकि वहपहलेसे ही विदेशीनिवेशकोंसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन पानेकी कोशिशमेंहैं। इमरान चाहतेहैं कि विदेशीनिवेशक पाकिस्तानमें अपनी पूंजीलगायें परन्तु पाकिस्तान एकऐसा देश हैजो हजारोंकी कटौतियोंकेकारण मर रहाहै। विदेशी निवेशकोंकोअपनी ओर आकर्षितकरनेकी पाकिस्तानी मुहिमको आसिमबाजवाके मामलेसे झटका लगसकता है। यदिटॉप रैंकवाला एकपूर्व सैन्य जनरलऔर उसके बादनौकरशाह बने आसिमबाजवाको अपने गृहकीअर्थव्यवस्थापर लाभ कमानेकेलिए भरोसा नहीं,तब विदेशी निवेशकोंसेहम यह बातकैसे सोच सकतेहैं। पाकिस्तानमें भ्रष्टाचारअनियंत्रित है औरयह बात किसीसेछिपी नहीं। जनरलजिया-उल-हककेमार्शल लॉ (१९७७-१९८८) के दौरानयह आम ज्ञानकीबात थी किकोई भी व्यक्तिकिसी मिलिट्री जजकोएक लाख रुपयेदेकर अपनी सजामेंकटौती करवा सकताहै। रिश्वतका यहपैसा सजाको दियेजानेके बाद अदाकिया जाता था।अपील प्रक्रियाके दौरानभी रिश्वत लीजाती थी। सिविलपुलिस जो साधारणतौरपर एक कैदीकोएक सैन्य जजकेपास पेशीके लिएले जाती थीवह भी उससेरिश्वत मांगती थी। कोड़ेमारनेको कम करनेकेलिए भी १५०००रुपयेकी रिश्वत ली जातीथी। सैन्य अदालतोंमेंयह पागलपन व्याप्तथा कि वहलम्बी सजाएं देतेथे तथा १०से १५ कोड़ेहर राजनीतिक कार्यकर्तापरबरसानेका हुक्म देते थे।आज भ्रष्टाचार पाकिस्तानीसेनामें भी फैलाहुआ है। एकसिपाही सूबेदारको रिश्वत देताहै यदि उसेगांवमें अपने परिवारकोमिलनेके लिए छुट्टीलेनी होती है।यूनिवॢसटियोंसे लेकर साइंसरिसर्च लैब, इलैक्ट्रिसिटीपावर कम्पनियोंसे लेकरम्यूजियम तथा पार्कोंतकऐसा शायद हीकोई सिविल इंस्टीच्यूशनहोगा जिसका प्रमुखएक पूर्व सैन्यअधिकारी नहीं है।

पाकिस्तानीसेनाकी कारोबारमें भागीदारी उतनीपुरानी है जितनापाकिस्तान खुद है।हालांकि १९८० केदौरान इसका व्यापारिकसाम्राज्य बहुत विस्तृतहो गया औरयह जनरल मुशर्रफके कार्यकाल (१९९८-२००८) के दौरानअपनी चरम सीमापरथा। अपनी किताबमिलिट्री आईएनसीमें आयशा सदीकानेअनुमान लगाया है किसैन्य कारोबार २००७में दस बिलियनपौंडका था जोकि उसी वर्षकुल एफडीआईसे चारगुणा ज्यादा था।सदीकाने दावा कियाहै कि सौउच्च सैन्य जनरलोंकेपास . बिलियन पौंडकी सामूहिकसम्पत्ति है। पाकिस्तानीसेना, वायुसेना तथानौसेना तीनोंके पास सबसेबड़ा व्यापारिक समुदायहै जिनके नामहैं। फौजी फाऊंडेशन,शाहीन तथा बाहरियाफाऊंडेशंज। आर्मी वैल्फेयर ट्रस्ट(१९७१ में स्थापित)पाकिस्तानका सबसे बड़ाऋणदाता असरकारी बैंक है।मिलिट्री नैशनल लॉजिस्टिक सैल(एनएलसी) पाकिस्तानमें सबसे बड़ीशिपिंग तथा मालभाड़ेकी ट्रांसपोर्टर है। ऐसीभी रिपोर्ट आयीकि रिटायरमेंटपर एकमेजर जनरलको २४०एकड़ ही कृषिभूमि प्राप्त होतीहै जिसकी लागतआधा मिलियन पौंडबनती है। इसकेसाथ-साथ सातलाख पौंडकी कीमतवालाशहरी रियल एस्टेटप्लाट भी उन्हेंमिलता है। मार्केटअर्थव्यवस्थाको हड़पनेमें पाकिस्तानी सेनाकेउत्थानने सीधे तौरपरस्थानीय सिविलियन निवेशक तथाउद्योगपतियोंमें टकराव ला दियाहै। इस परिवेशमेंपूर्व प्रधान मंत्रीनवाज शरीफ तथामिलिट्री जनरल सीपीईसीकेबिलियन डालरोंकी कीमतवाले अनुबंधोंकोआवंटित करनेके मामलेमें मूर्खबनाते रहे।

पाकिस्तानीसेना कभी भीनवाज शरीफ याफिर संसदको लाखों-करोड़ों डालरोंके प्रोजैक्टकाचार्ज नहीं सौंपसकती थी इसलिएउन्होंने एक विवादास्पदआम चुनावके माध्यमसेसत्तासे बाहर कियातथा उनकी जगहपरएक राजनीतिक नौसिखियेइमरान खानको सत्तामेंलेकर आयी। लैफ्टिनेंटजनरल (रिटायर्ड) आसिमसलीम बाजवाको सीपीईसीकाचेयरमैन बनाया गया परन्तुसेना इमरान खानपरभरोसा नहीं करती।इस कारण कुछमाह पूर्व उन्होंनेइमरान खानको फिरदौसआशिक आवांको हटानेकेलिए बाध्य कियाजो कि सूचनाकेलिए इमरानके विशेषसहायक थे। उनकीजगहपर आसिम सलीमबाजवाको नियुक्त किया गया।पाकिस्तानी सेना पूरीतरहसे आम नागरिककीनजरोंमें अपनी विश्वसनीयताखो चुकी है।लोग सेनासे नफरतकरते हैं औरइसे पाकिस्तानी संपदाकोलूटनेवाला बताते हैं। वहमानते हैं किउनके निम्र जीवनजीनेका पाकिस्तानी सेना हीबड़ा कारण है।जिद्दी पाकिस्तानी सेना देशकेप्राकृतिक संसाधनोंको लूट रहीहै और ब्लोचतथा सिंधी नागरिकोंकेसाथ सैन्य संघर्षकरनेमें तुली हुईहै और ज्यादास्वायत्तताकी मांग अबपूर्णत: आजादीकी मांगमें तब्दीलहो चुकी है।