Mob: +91-7905117134,0542 2393981-87 | Mail: info@ajhindidaily.com


नवीनतम समाचार » तेलकी कीमतोंमें वृद्धि

तेलकी कीमतोंमें वृद्धि

अंतरराष्टरीय बाजारमें कच्चे तेलकी कीमतोंमें भारी कमीके बाद भी देशमें पेट्रोल-डीजलकी कीमतमें वृद्धि जारी है। तेलकी कीमतें सालके उच्चतम स्तरपर पहुंच गयी है। पहली बार है जब डीजल पेट्रोलसे ज्यादा दामपर बिका।
अमूमन डीजलकी कीमत पेट्रोलसे कम होती है। शायद यह इतिहासमें पहली बार ही हुआ है जब डीजल पेट्रोलसे ज्यादा दामपर बिका। गत ७ जूनके बादसे जहां डीजलके दाम लगातार २२ दिनोंतक बढ़े हैं। वहीं पेट्रोलके दाम २१ दिन बढ़े हैं। विशेषज्ञोंका कहना है कि अर्थव्यवस्थामें मांग बढऩेके साथ महंगी भी बढऩेका खतरा है। डीजल मूल्य वृद्धिसे माल परिवहनकी दर बढ़ेगी तो बाजारमें रोजमर्राकी आवश्यकताकी वस्तुएं भी महंगी होना लाजिमी है। तेलकी कीमतोंमें वृद्धिका प्रमुख कारण केंद्र सरकार द्वारा पिछले महीने उत्पाद शुल्कमें वृद्धि करना माना जा रहा है। पेट्रोल और डीजलके बढ़ते दामोंकी आंच अब किचनतक भी पहुंच चुकी है। सब्जियोंमें महंगीका तड़का लग चुका हैं। इसका सीधा असर मध्यम वर्गपर ही पड़ेगा। निम्न वर्गको तो सरकार नकदके साथ गैस सिलेंडर और राशन अब भी दे रही है। मध्यम वर्गको अब भी ठेंगा दिखाया जा रहा है। डीजलके दामोंमें आयी तेजी निश्चित तौरपर महंगीको बढ़ानेका काम करेगी और इसका असर जमीनपर दिखाई भी देने लगा है। पेट्रोल-डीजलके दामोंमें वृद्धिसे न केवल आम उपभोक्ताको, बल्कि ट्रांसपोर्ट यूनियन भी नाखुश है। वह पहलेसे ही कोरोना माहामारीके कारण आर्थिक परेशानीसे जूझ रहे हैं। डीजल-पेट्रोलके दाम बढऩेसे सिर्फ आम आदमी ही नहीं, बल्कि पूरी आर्थिक गतिविधियां डगमगा रही हैं। तेलके दाम बढऩेसे ढुलाई महंगी हो गयी है, नतीजतन रोजमर्राकी जरूरतकी हर चीजके दाम बढ़ गये हैं।
नियमानुसार प्रतिदिन सुबह छह बजे पेट्रोल और डीजलकी कीमतोंमें बदलाव होता है। सुबह छह बजेसे ही नयी दरें लागू हो जाती हैं। पेट्रोल एवं डीजलके दाममें एक्साइज ड्यूटी, डीलर कमीशन और अन्य चीजें जोडऩेके बाद इसका दाम लगभग दोगुना हो जाता है। विदेशी मुद्रा दरोंके साथ अंतरराष्टï्रीय बाजारमें क्रूडकी कीमतें क्या हैं। इस आधारपर रोज पेट्रोल और डीजलकी कीमतोंमें बदलाव होता है। इन्हीं मानकोंके आधारपर पेट्रोल रेट और डीजल रेट रोज तय करनेका काम तेल कम्पनियां करती हैं। बड़ा सवाल है कि आखिर पेट्रोल-डीजलकी कीमतें बढ़ क्यों रही हैं, जबकि कच्चे तेलकी कीमतें भी काफी हदतक घट गयी हैं। जानकारोंके मुताबिक तेल कम्पनियोंने भारतमें पेट्रोल-डीजलके भाव तब बढ़ाने शुरू किये जब कच्चा तेल काफी नीचे १९ डालर प्रति बैरलके आसपास था। अब कच्चे तेलका रेट बढ़ रहा है। ब्रेंट क्रूड ४० डालर प्रति बैरलके आसपास पहुंच गया है। तेल कम्पनियोंके पास जो इन्वेंट्री है उसमें भी उन्हें नुकसान हो रहा है। मांग कम हो गयी है और उनके मार्जिन माइनसमें आ गये हैं। वह इस नुकसानकी भरपाई अपना मार्जिन बढ़ाकर करेंगी। एक्साइज ड्यूटीमें सरकारने करीब १३ रुपयेतककी बढ़त कर दी है। इसका भी पूरा बोझ ग्राहकोंपर नहीं डाला गया है। ऐसेमें स्वाभाविक है कि आगे रेट और बढ़ाने पड़ेंगे। कुछ ही महीने पहले केन्द्र सरकारने एक्साइज ड्यूटीमें वृद्धि की थी।
सरकारने पेट्रोलपर दस रुपये और डीजलपर १३ रुपये एक्साइज ड्यूटी बढ़ायी थी। इसमेंसे आठ रुपये रोड और इंफ्रास्ट्रक्चर सेस है। तेल कम्पनियां डीजल-पेट्रोलकी कीमतें लगातार बढ़ाकर इस एक्साइज ड्यूटीका भार भी ग्राहकोंपर डालना चाहती हैं। मौजूदा समयमें पेट्रोलपर ३२.९८ रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी लग रही है, जबकि ३१.८३ रुपये प्रति लीटर एक्याइज ड्यूट डीजलपर लग रही है। पेट्रोल-डीजलकी कीमतमें ६४ फीसदी हिस्सा यानी करीब ५०.६९ रुपये प्रति लीटर ग्राहक टैक्सके तौरपर चुका रहे हैं। पेट्रोलपर केंद्रका उत्पाद शुल्क ३२.९८ रुपये और १७.७१ रुपये राज्योंके बिक्री करका है। डीजलपर टैक्स कीमतका ६३ फीसदी यानी करीब ४९.४३ रुपये प्रति लीटर है। इसमें ३१.८३ रुपये केंद्रीय उत्पाद शुल्क और १७.६० रुपये राज्योंका वैट है। डीजल मूल्यवृद्धिका सीधा असर मध्यम वर्गपर पड़ रहा है। पेट्रोलियम मूल्य वृद्धिसे नौकरीपेशा मध्यम वर्गको भी अपना निजी वाहन चलानेमें परेशानी हो रही है। परन्तु कोरोना वायरस संक्रमणकी दहशतसे मध्यम वर्ग सार्वजनिक परिवहन सेवाका उपयोग नहीं कर पा रहा और मजबूरीमें इस वर्गको अपने निजी वाहनसे ही कार्यस्थलपर आना जाना पड़ रहा है। जो महंगा साबित हो रहा है। वहीं देशमें लाकडाउन चल रहा था। भले ही इस दौरान पेट्रोल पंप खुले थे, लेकिन कफ्र्यू जैसे हालात होनेसे लोग सड़कोंपर नहीं निकल रहे थे, जिससे डीजल-पेट्रोलकी मांग बहुत कम थी। अब जब अनलॉक शुरु हो चुका है तो पेट्रोलपम्प अपने सारे नुकसानकी भरपाई करनेमें लगे हैं। यह एक बड़ी वजह है, जिसके चलते कम्पनियां हर रोज डीजल-पेट्रोलकी कीमतें बढ़ाती ही जा रही हैं। देखा जाय तो दोषी तेल कम्पनियां ही हैं, जो लगातार डीजल-पेट्रोलकी कीमतें बढ़ाकर अपना मुनाफा बढ़ा रही हैं। हालांकि, कांग्रेस विरोध प्रदर्शन करते हुए मोदी सरकारपर दबाव बनाना चाहती है, ताकि वह एक्साइज ड्यूटी कम करे, जिससे डीजल-पेट्रोलकी कीमतें खुद ही कम हो जायंगी। लॉकडाउनमें हुए घाटे और जीएसटी कलेक्शनमें हुई कमीके मद्देनजर ऐसी किसी भी संभावनाके बारेमें सोचना भी बेवकूफी ही होगा।
विशेषज्ञोंके अनुसार अंतरराष्टï्रीय बाजारमें कच्चे तेलकी कीमत ४० डालर प्रति बैरलके आसपास चल रहा है। भारतीय बास्केटमें कच्चे तेलकी औसत कीमत ६० से ६५ डालरके आसपास रही है। उससे मौजूदा दर बहुत ही कम है। ऐसे कच्चे तेलमें बड़ी कमीकी आगे कोई संभवना नहीं है। ऐसेमें यदि पेट्रोल-डीजलकी बढ़ती कीमतसे आम जनताको राहत देना तो सरकारको उत्पाद शुल्क और वैटमें कटौती करनी होगी। ऐेसेमें यह मान कर चलिये कि पेट्रोल-डीजलकी कीमतें ऐतिहासिक ऊंचाईकी ओर बढऩेकी वजहसे अगले दिनोंमें महंगीका तगड़ा झटका जनताको लगने वाला है। खासकर डीजलका रेट बढऩा ज्यादा नुकसानदेह है। भारतमें डीजलका इस्तेमाल कृषि, ट्रांसपोर्ट जैसे जरूरी काममें किया जाता है। डीजलके रेट बढऩेसे कृषि पैदावारके रेट बढ़ेंगे और तमाम सामानकी ढ़लाई भी बढ़ जायगी। ट्रकोंका भाड़ा बढ़ जायगा। इसकी वजहसे महंगी बढऩेके पूरे आसार हैं। आनेवाले समयमें आम आदमीकी जेब और कटनेवाली है। कुल मिलाकर आम आदमीकी मुश्किलें कम होनेकी बजाय आनेवाले दिनोंमें बढ़ऩेवाली हैं।
-----------------------------
विश्व अर्थव्यवस्थापर कोरोनाकी छाया
 सलीम सुहरवर्दी
            
       
लाकडाउनकी घोषणा करते समय प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदीने कहा था कि भगवान श्रीकृष्णने महाभारतकी जंग अ_ïारह दिनमें जीती थी और हम इस जंगको इक्कीस दिनमें जीतेंगे। लेकिन मोदी कोरोना महामारीको इक्कीस दिनमें पराजित नहीं कर सके और उन्हें चार बार लाकडाउन लगानेके बाद अनलाक-१ लगाना और अब अनलाक-२ लगाना पड़ा। मोदीको यह भी मानना पड़ा कि कोरोनाकी कोई दवा नहीं है। लोग काढ़ा पियें और प्राणायाम करें। महान पश्चिमी वैज्ञानिक लार्ड बट्रेण्ड रसेलने अपने एक लेखमें लिखा है कि मनुष्यकी शक्ति सीमित है और ईश्वरकी शक्ति असीम है। ईश्वर जो चाहता है वह करता है मनुष्य बहुत-सी जगह मजबूर हो जाता है। कोरोना उसी तरह दैवी आपदा है जिस तरह कभी प्लेग, चेचक, ट्यूबर क्लोसिस, मलेरियाको माना जाता था। विश्व स्वास्थ्य संघटनने वर्षों पूर्व मलेरिया और पोलियोके उन्मूलनके लिए पूरी दुनियामें अभियान शुरू किया था। मच्छर आज भी मलेरियाका कारण बने हुए हैं। इसी तरह कोरोना महामारीसे लडऩेके लिए उसने चेहरेपर मास्क लगाने, सेनिटाइजरसे बार-बार हाथ धोने और सामाजिक दूरी बनाकर रहनेका परामर्श दिया। उसके परामर्शपर दुनियाके अधिकांश देशोंने अमल किया। भारत, अमेरिका, ब्रिटने, स्पेन, ब्राजील, पाकिस्तान, इटली, फ्रांस सहित अधिकांश देशोंने लाकडाउन किया। जापान दुनियाका अकेला देश है जिसने बिना लाकडाउनके कोरोनापर विजय प्राप्त की। जापानके प्रधान मंत्री मोदीके गहरे मित्र हैं लेकिन शायद लाकडान करनेके पूर्व उनसे परामर्श नहीं किया, अन्यथा भारतमें लाकडाउनकी जरूरत नहीं पड़ती। कोरोना महामारीसे सारी दुनिया लगभग साढ़े चार लाख व्यक्तियोंकी मृत्यु हो चुकी है। सर्वाधिक मौत अमेरिकामें हुई। वहां एक लाखसे अधिक लोग मरे। अमेरिकोके बाद ब्राजील, स्पेन, इटली, फ्रांस, टर्की, चीन, ईरान, न्यूजीलैण्ड, भारत, जर्मनी, पाकिस्तान, ईरानमें हजारों लोगोंकी जान ली। अमेरिकाके राष्टï्रपति डोनाल्ड ट्रम्पने कहा कि हमें ज्यादासे ज्यादा दुआकी जरूरत है। पाकिस्तानके प्रधान मंत्री इमरान खानको इस्लामी विद्वानोंके दबावमें आकर लाकडाउन हटाना पड़ा और मस्जिदों नमाजें पूर्वकी भांति होने लगीं। बंगलादेशमें एक मौलानाके जनाजेमें एक लाख लोग शामिल हुए।
लाकडाउनके कारण विश्व अर्थव्यवस्थापर बुरा प्रभाव पड़ा। बेरोजगारी और भुखमरीका सामना करना पड़ा। किंग्स कालेज लंदन और आस्ट्रेलिया नेशनल यूनिवर्सिटीके शोधार्थियोंके अध्ययनके अनुसार कोरोना संकटके चलते दुनियामें एक अरबसे अधिक लोग अत्यन्त गरीब हो सकते हैं। दक्षिणी एशियाका इलाका गरीबीकी मार झेलनेवाला दुनियाका सबसे बड़ा क्षेत्र होगा। इसका प्रमुख कारण भारतकी बड़ी आबादीका गरीब होना है। गरीबीके दलदलमें फंसनेवाले नये लोगोंमें तीस प्रतिशत यानी ११.९ करोड़ अफ्रीकाके सहारा मरुस्थलीय देशामें हों। दक्षिण अमेरिकामें महामारीके चलते भुखमरीका संकट उत्पन्न हो गया है। अमेरिका और ब्राजीलके बाद रूस सबसे संक्रमित देश है। इसराइलमें संक्रमणके नये मामले आये हैं। इस लाकडाउनमें सारे उद्योग, व्यापार बन्द हो गये। चालीस करोड़से अधिक असंघटित मजदूर बेरोजगार हो गये। बुनकर, जरदोज, किसान, ठेला व्यावसायी, रिक्शा, टेम्पो, ट्राली चलाक, बढ़ई, दर्जी, नाविक, धोबी, माली, पूरी तरह तबाह हो गये। देशकी अर्थव्यवसथा पूरी तरह चौपट हो गयी। नोटबंदीसे इतना नुकसान नहीं हुआ था जितना लाकडाउनने कर दिया। बिना दवाके कोरोनासे लडऩा महंगा पड़ा। कोरोनासे लडऩेके चक्करमें खांसी, दमा, टीवी, कैंसर, बुखार आदिका इलाज बन्द कर दिया गया जिसके कारण कोरोनासे कम और अन्य बीमारियोंसे अधिक लोग मर गये। विश्व स्वास्थ्य संघटनने ६५ वर्षके बुजुर्गो और दस वर्षतकके बच्चोंके घरसे निकलनेपर पाबन्दी लगा दी। इस पाबन्दीपर आम जनताने तो अमल किया और सरकारको पूरा सहयोग दिया, लेकिन महत्वाकांक्षी राजनीतिज्ञोंने इसपर अमल नहीं किया। ६५ वर्षकी आयु पूरी कर चुके सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, राज्यपालोंको स्वत: अपना पद छोड़कर नये लोगोंको अवसर देना चाहिए था।
लाकडाउन, अनलाकमें उलझकर स्वार्थी राजनीतिज्ञ अपने एजेण्डेको जन-जनतक पहुंचानेमें लगे हुए हैं। पाकिस्तान, चीन और नेपाल भारतीय भू-भागपर कब्जा करनेमें लगे हुए हैं। भारतको युद्धके लिए उकसा रहे हैं। हमारी सेनाके जागरूक रहनेके बावजूद लद्दाखमें चीनी सैनिकोंके साथ मुठभेड़में भारतके बीस सैनिकोंको जान गंवानी पड़ी। नेपाल हमारे तीन इलाकों कालापानी, लिपुलेख और लिम्पयाधुरापर चीनकी शहपर अपना दावा कर रहा है। पाकिस्तान भी कश्मीरमें अशान्ति पैदा करना चाहता है। कोरोना महामारीने वीटो पावर रखनेवाले अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन सबके घमण्डको चूर कर दिया है। अणु बम, परमाणु बम, मिसाइल्स, राफेल, मिग, सुखोई जैसे लड़ाकू विमान, जंगी पंडुब्बियां बनानेवाले देश, कोरोनासे लडऩेके लिए दवाका निर्माण न कर सके। इससे ज्यादा शर्मकी बात और क्या हो सकती है।