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बहुलतावादमें है भारतकी आत्मा

संघके कार्यक्रममें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब दाने कहा कि भारतकी आत्मा बहुलतावाद और उदारतामें बसती है। भारतीय समाजमें बहुलतावाद तमाम विचारोंके मिलनसे आया है और वह अत्यन्त प्रासंगिक है।
सेकुलरिज्म और सर्वसमावेशी विचार हमारी आस्थाके विषय हैं। यह हमारी मिश्रित संस्कृति है जिसके कारण हम एक राष्ट्र बन सके। प्राय: एक घंटेके भाषणमें उन्होंने कहा कि हिन्दू एक उदार धर्म है। राष्टï्रवाद किसी धर्म और भाषामें बंटा हुआ नहीं है। उन्होंने सहनशीलताको समाजकी ताकत बताया। उन्होंने कहा कि यह तो सवा अरब लोगोंकी सदा बहार सर्वभौमिकताका परिणाम है जो १२२ भाषाएं इस्तमाल करते हैं, सात विभिन्न धर्मोंको मानते हैं और जहां आर्य, मंगोल और द्रविड़ सभ्यताओंके लोग एक झंडेके नीचे भारतीय बनकर रहते हैं। उन्होंने कहा कि हम सहमत और असहमत भी हो सकते हैं। लेकिन विचारोंकी बहुतायतको नजरन्दाज नहीं किया जा सकता है। प्रणब दाने विस्तारसे भारतके सुनहरे इतिहासको याद करते हुए कहा कि भारत लम्बे समयसे दुनियासे जुड़ा हुआ एक खुला समाज रहा है। दुनियाभरके व्यापारी एवं विद्वान यहां आते रहे हैं। तक्षशिला, नालन्दा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयोंमें सारे संसारके छात्र शिक्षा ग्रहण करते थे। पिछले ढाई हजार वर्षोंमें अनेकों शासक एवं संस्कृतियां आयी और चली गयी लेकिन भारतकी मूल आत्मा अक्षुण्य रही। उन्होंने जवाहरलाल नेहरूकी प्रसिद्ध पुस्तक 'डिस्कवरी आफ इंडियाÓ का भी जिक्र किया और कहा कि मैं नेहरूके इस विचारसे सहमत हूं कि राष्टï्रवाद सिर्फ हिन्दू, मुस्लिम, सिख एवं भारतमें रह रहे अन्य समूहोंके मिलनसे ही आ सकता है। वास्तवमें इन सभी संस्कृतियोंके मेलसे ही राष्ट्रका निर्माण होता है। उन्होंने नेहरू और सरदार पटेलकी सेवाओंको महत्वपूर्ण बताया और कहा कि सरदार पटेलने देशी रियासतोंको इक_ा कर भारतको एक बनानेमें बड़ी मदद की। उन्होंने कहा कि विचारोंकी विविधताको हम नकार नहीं सकते हैं। हम असहमत हो सकते हैं लेकिन उसे खारिज नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि देशभक्तिका मतलब राष्ट्रके प्रति निष्ठा है। हिन्दू एक उदार धर्म है, इस बातको हमेशा याद रखना चाहिये।
आरएसएसके शिविरमें पूर्व राष्ट्रपतिने आरएसएसके संस्थापक डाक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवारकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। आगंतुक पुस्तिकामें उन्होंने लिखा कि मैं भारत माताके इस महान सपूतको सम्मान और श्रृद्धांजलि देने आया हूं। प्रणब दाके प्रस्तावित नागपुर दौरेको लेकर कई कांग्रेसी नेताओंने उनकी कटु आलोचना की थी। यहांतक कि उनकी बेटी शरमिष्ठाने भी उन्हें नागपुर जानेसे मना किया था। परन्तु प्रणब दा इन बातोंसे विचलित नहीं हुए। नागपुर जाकर उन्होंने भारतकी संस्कृति और राष्टï्रवादकी विस्तार वह विवेचना की। पूर्व राष्ट्रपतिके संबोधनके बाद वह कांग्रेसी नेता जो उनके कटु आलोचक थे, ने अपना विचार बदला और कहा कि प्रणब दाने इतिहासको अपनी नजरोंसे परखा है जो प्रशंसनीय है। राष्टï्रीय स्वयं सेवक संघके प्रमुख मोहन भागवतने भी प्रणब मुखर्जीका स्वागत करते हुए उनके विचारोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। देशके प्राय: सभी प्रमुख समाचारपत्रोंने लिखा कि प्रणब मुखर्जी और मोहन भागवतके विचारोंमें कोई अन्तर नहीं था और सच कहा जाय तो दोनोंने भारतीय संस्कृतिकी विस्तारसे व्याख्या की है।
भारतकी संस्कृति और इतिहासके बारेमें प्रणब दाके विचार अत्यन्त तर्कसंगत हैं। पूर्व उप प्रधान मंत्री और भाजपाके वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणीने प्रणब दाके भाषणकी कोटि-कोटि प्रशंसा की और कहा कि यह ऐतिहासिक भाषण था जिसे वर्षोंतक याद किया जाता रहेगा। प्रणब मुखर्जीको मैं लम्बे अरसेसे जानता हूं। उनमें यह क्षमता है कि वह अपनी बात बेबाकीसे कह सकते हैं। १९९५ में जब मैं कंबोडियामें भारत का राजदूत था तब प्रणब दा वहां भारतके परराष्टï्रमंत्रीके रूपमें आये थे और उन्होंने एक सभामें जिसमें कंबोडियाके प्रधान मंत्री और दूसरे मंत्री शामिल थे तथा विभिन्न देशोंके राजदूत भी उपस्थित थे, विस्तारसे कहा था कि कंबोडियाका विश्व प्रसिद्ध 'अंकोरवाट मंदिरÓ दक्षिण भारतके कारीगरोंने ही बनाया था किसी अन्यने नहीं। इसके पहले कंबोडियामें एक बहस चल रही थी कि इस मंदिरको सदियों पहले फ्रांसिसियोंने बनाया था। प्रणब मुखर्जीने उनके सारे तर्कोंको ध्वस्त कर यह साबित कर दिया था कि संसारका सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर अंकोरवाट भारतके सहयोगसे ही बना था और इस सिलसिलेमें भारतवासियोंका योगदान भुलाया नहीं जा सकता है। मैं अनेक अवसरोंपर प्रणब दासे मिला हुआ हूं। उनका इतिहासका ज्ञान अदभुत है और उनकी समृति प्रखर है। उन्होंने विस्तारसे अपने भाषणमें कहा कि किस प्रकार 'इस्ट इंडिया कपंनीÓ ने भारतको लूटा और फिर बादमें भारतकी राजगद्दी महारानी विक्टोरियाको सौंप दी। उचित तो यह होता कि प्रणब मुखर्जी और मोहन भागवतके भाषणको कोई एनजीओ छपवा कर देशके विभिन्न स्कूल और कालेजोंमें बंटवा देता। क्योंकि इससे ज्यादा प्रमाणिक दस्तावेज भारतके आधुनिक इतिहासमें उपलब्ध नहीं है। कुल मिलाकर यह तो मानना ही होगा कि प्रणब दाने किसी आलोचनाकी परवाह नहीं करते हुए नागपुर जाकर अपने मनकी बात सीधे और सच्चे तरीकेसे देशके सामने रख दी है। 'प्रणब दाÓ का यह भाषण लोग वर्षोंतक याद करते रहेंगे।
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बर्बाद हो रहे अन्नसे बढ़ता प्रदूषण
रीता सिंह

       
सन्ï २०१५ के ग्लोबल हंगर इंडेक्सके मुताबिक भारतमें हर वर्ष ३००० से अधिक लोगोंकी मौत भुखमरीसे होती है। मरनेवालोंमें सर्वाधिक संख्या बच्चोंकी है। याद होगा गत वर्ष दुनियाभरके देशोंमें भुखमरीके हालातका विश्लेषण करनेवाली गैर सरकारी अंतरराष्ट्रीय संस्था 'इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) की एक रिपोर्टसे उद्ïघाटित हुआ कि एशियाई देशोंमें भारतकी स्थिति बस पाकिस्तान और बंगलादेशसे ही बेहतर है। चीन, नेपाल और म्यांमार जैसे पड़ोसी देश भारतसे बेहतर स्थितिमें हैं। संयुक्त राष्ट्रकी हालिया रिपोर्टसे भी उद्ïघाटित हुआ है कि विश्वमें भुखमरीके शिकार लोगोंकी तादाद कम होनेके बजाय लगातार बढ़ रही है। रिपोर्टके मुताबिक वर्ष २०१५ में ७७ करोड़ लोग भूख पीडि़त थे जो २०१६ में बढ़कर ८१ करोड़ हो गये। इसी तरह २०१५ में अत्यधिक भूख पीडि़त लोगोंकी संख्या आठ करोड़ और २०१६ में दस करोड़ थी, वह २०१७ में बढ़कर १२.४ करोड़ हो गयी है। यह आंकड़ा रेखांकित करनेके लिए पर्याप्त है कि संयुक्त राष्ट्र समेत अन्य वैश्विक संस्थाओंके पास भुखमरीसे निबटनेका कोई ठोस रोडमैप नहीं है। विडंबना यह है कि यदि इसपर काबू नहीं पाया गया तो २०३५ तक दुनियाकी आधी आबादी भूख और कुपोषणकी चपेटमें होगी। संयुक्त राष्ट्रके रिपोर्टके मुताबिक भुखमरीके शिकार अधिकांश लोग विकासशील देशोंमें रहते हैं और इनमेंसे भी सर्वाधिक एशिया और अफ्रीकामें रहते हैं। इसमें भी सर्वाधिक संख्या भारतीयोंकी ही है। गौर करें तो भुखमरीके लिए ढेर सारे कारण हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारण अन्नकी बर्बादी है। भारतकी ही बात करें तो अन्न बर्बाद करनेके मामलेमें यह दुनियाके संपन्न देशोंसे भी आगे है। आंकड़ोंके मुताबिक देशमें हर साल उतना अन्न बर्बाद होता है जितना ब्रिटेन उपभोग करता है। भारतमें कुल पैदा किये जानेवाले भोज्य पदार्थका ४० प्रतिशत बर्बाद होता है। अर्थात हर साल भारतको अन्नकी बर्बादीसे तकरीबन ५० हजार करोड़ रुपयेकी चपत लगती है। साथ ही बर्बाद भोजनको पैदा करनेमें २५ प्रतिशत स्वच्छ जलका इस्तेमाल होता है और साथ ही कृषिके लिए जंगलोंको भी नष्ट किया जाता है। इसके अलावा बर्बाद हो रहे भोजनको उगानेमें ३० करोड़ बैरल तेलकी भी खपत होती है। यही नहीं, बर्बाद हो रहे भोजनसे जलवायु प्रदूषणका खतरा भी बढ़ रहा है। उसीका नतीजा है कि खाद्यान्नोंमें प्रोटीन और आयरनकी मात्रा लगातार कम हो रही है। खाद्य वैज्ञानिकोंकी मानें तो कार्बन-डाइ-ऑक्साइड उत्सर्जनकी अधिकतासे भोजनसे पोषक तत्व नष्ट हो रहे हैं जिसके कारण चावल, गेहूं, जौ जैसे प्रमुख खाद्यानमें प्रोटीनकी कमी होने लगी है।
आंकड़ोंके मुताबिक चावलमें ७.६ प्रतिशत, जौमें १४.१ प्रतिशत, गेहूंमें ७.८ प्रतिशत और आलूमें ६.४ प्रतिशत प्रोटीनकी कमी दर्ज की गयी है। यदि कार्बन उत्सर्जनकी यही स्थिति रही तो २०५० तक दुनियाभरमें १५ करोड़ लोग इस नयी वजहके चलते प्रोटीनकी कमीका शिकार हो जायंगे। उल्लेखनीय है कि यह दावा हार्वर्ड टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थने अपनी रिपोर्टमें किया है। एक अनुमानके मुताबिक २०५० तक भारतीयोंके प्रमुख खुराकसे ५.३ प्रतिशत प्रोटीन गायब हो जायगा। इस कारण ५.३ करोड़ भारतीय प्रोटीनकी कमीसे जूझेंगे। यदि भोज्य पदार्थोंमें प्रोटीनकी मात्रामें कमी आयी तो भारतके अलावा उप सहारा अफ्रीकाके देशोंके लिए भी स्थिति भयावह होगी। इसलिए कि यहां लोग पहलेसे ही प्रोटीनकी कमी और कुपोषणसे जूझ रहे हैं। बढ़ते कार्बन-डाइ-आक्साइडके प्रभावसे सिर्फ प्रोटीन ही नहीं आयरन कमीकी समस्या भी बढ़ेगी। दक्षिण एशिया एवं उत्तर अफ्रीका समेत दुनियाभरमें पांच वर्षसे कम उम्रके ३५.४ करोड़ बच्चों और १.०६ महिलाओंके इस खतरेसे ग्रस्त होनेकी संभावनाएं हैं। इसके कारण उनके भोजनमें ३.८ प्रतिशत आयरन कम हो जायगा। फिर एनीमियासे पीडि़त होनेवाले लोगोंकी संख्या बढ़ेगी। यूनाइटेड नेशनके फूड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशनकी रिपोर्टसे उद्ïघाटित हो चुका है कि सरकारकी कई कल्याणकारी योजनाओंके बावजूद भी भारतमें पिछले एक दशकमें भुखमरीकी समस्यामें तेजीसे वृद्धि हुई है। देशमें आज भी ३० करोड़ लोग हर रोज भूखे पेट सोनेको मजबूर हैं जबकि सरकारी गोदामोंमें हर वर्ष हजारों करोड़ रुपयेका अनाज सड़ जाता है। यदि गोदामोंके अनाजोंको गरीबोंमें वितरित किया जाय तो भूख और कुपोषणसे निबटनेमें मदद मिलेगी।
विश्व बैंकके आंकड़ोंपर गौर करें तो भारतमें कुपोषणका दर लगभग ५५ प्रतिशत है जबकि उप सहारीय अफ्रीकामें यह २७ प्रतिशतके आसपास है। संयुक्त राष्ट्रका कहना है कि भारतमें हर साल भूख और कुपोषणके कारण मरनेवाले पांच सालसे कम उम्रवाले बच्चोंकी संख्या दस लाखसे भी ज्यादा है। दक्षिण एशियामें भारत कुपोषणके मामलेमें सबसे बुरी हालतमें है। एसीएफ की रिपोर्ट बताती है कि भारतमें कुपोषण जितनी बड़ी समस्या है वैसे पूरे दक्षिण एशियामें और कहीं देखनेको नहीं मिला है। अच्छी बात यह है कि केंद्र सरकार भूख और कुपोषणसे निबटनेके लिए राष्ट्रीय पोषण मिशनका खाका तैयार किया है जिसके तहत महिलाओं और बच्चोंको पूरक पोषण दिया जाना सुनिश्चित हुआ है। सरकारने इस मिशनको कामयाब बनानेके लिए जमीनी स्तरपर सूचना प्रौद्योगिकीके जरिये निगरानीकी भी व्यवस्था की है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालयने इस योजनाको अमलीजामा पहनानेके लिए राष्ट्रीय तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियोंकी भागीदारी सुनिश्चित करनेके लिए दिशा-निर्देश जारी किये हैं। सरकारने बच्चोंके पोषक देखभालके लिए एक नयी प्रणाली स्थापित की है और यह प्रणाली व्यक्तिगत परिवारोंको पोषक अभिभावकके रूपमें बच्चोंकी देखभालके संबंधमें है। इससे बाल देखभाल संस्थानोंकी तुलनामें बच्चोंकी बेहतर तरीकेसे देखभाल और सुरक्षा हो सकेगी। इसके लिए सरकारने विश्व बैंककी सहायतासे सुदृढ़ीकरण तथा पोषण सुधार कार्यक्रमसे संबंधित समेकित बाल विकास सेवाएं प्रणालीके आठ राज्यों आंध्रप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेशके २५३४ सर्वाधिक पिछड़े ब्लॉकोंमें दो लाख भवन बनानेकी हरी झंडी दिखायी है। इसके अलावा असम, ओडिसा तथा तेलंगानामें ग्रामीण विकास मंत्रालयके मनरेगा योजनाके अंतर्गत अगले चार वर्षोंमें प्रतिवर्ष ५० हजार भवन बनाया जाना सुनिश्चित हुआ है। लेकिन बात तब बनेगी जब देशमें बर्बाद हो रहे अन्नका सदुपयोग करते हुए करोड़ों लोगोंका पेट भरा जायगा। खाद्य विशेषज्ञोंकी मानें तो भोजनकी बर्बादी रोके बिना भुखमरी, कुपोषण और गरीबीसे नहीं निबटा जा सकता।