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गुर्जर आन्दोलनका असर

राजस्थानमें पांच फीसदी आरक्षणकी मांगको लेकर गुर्जर समुदाय 'छठी’ बार आंदोलित हैं। आंदोलनके चलते यातायात बाधित हुआ है। आंदोलनकारियोंने रेल पटरियोंपर कब्जा किया है।
राजस्थानमें गुर्जर समुदाय आन्दोलित है। दरअसल प्रदेशकी नवोदित कांग्रेस सरकारने हालमें संपन्न हुए प्रदेश विधानसभा चुनावके दौरान कांग्रसी नेताओंने गुर्जर नेताओंके साथ बैठक कर उनसे वादा किया था कि उनकी सरकार बीस दिनके भीतर पूर्ववर्ती मांगे पूरी कर दी जायंगी। इसके बाद गुर्जर समुदाय खुश हुआ और उसके प्रदेशमें आयोजित हुए विधानसभा चुनावमें तकरीबन वोट कांग्रेसको दिया। लेकिन कांग्रेस वोट हथियानेके बाद पलट गयी। इस बावत जब गुर्जर नेताओंने सरकारसे संपर्क साधा तो सीधे मुख्य मंत्री अशोक गहलोतकी तरफसे जबाव मिला कि आरक्षण देना प्रदेश सरकारका काम नहीं, इसके लिए केन्द्र सरकारसे सम्पर्क करें। उनके वादाखिलाफीवाले उस बयानके बाद गुर्जर समुदाय एकदम आगबबुला हो गया और गुर्जर समुदाय फिरसे आन्दोलनकी राहपर निकल पड़े, जिसका नतीजा सामने है।
गुर्जर आन्दोलनके चलते प्रदेश एवं आसपासके इलाके बुरी तरहसे प्रभावित हो चुके हैं। गुर्जर समुदाय सबसे पहले रेल पटरियोंको निशासा बनाते हैं। उनको पता है कि राज्यसे दूधकी सप्लाई सबसे ज्यादा होती है। दूधकी खेप रेलगाडिय़ोंसे जाती हैं इसलिए सबसे पहला टारगेट वह रेलको ही करते हैं। रेल प्रशासनने आगामी सभी संभावित स्थितियोंको भंापते हुए १३ फरवरीतक वहांसे आनेवाली रेलगाडिय़ोंको रद कर दिया है। सवाल है आन्दोलनका फायदा निश्चित रूपसे आंदोलनकारियोंको देर-सवेर होगा। लेकिन क्या कोई अन्दाजा लगा पायगा इससे आम लोगोंको कितना नुकसान उठाना पड़ रहा है। गौरतलब है कि गुर्जरोंकी मांगे सालों पुरानी हैं। पहला आन्दोलन सन् २००६ में हुआ था। उसके बाद सन् २००७, २००८, २०१० फिर २०१५ में हुआ। हर बार उनको विभिन्न सरकारों द्वारा सिर्फ आश्वासन ही मिला। कमोबेश इस बार भी कुछ ऐसा ही होनेकी संभावना है। उनके गुस्सेका प्रकोपभागी आमजन हो रहे हैं। आंदोलनकारियोंने आवागमनके सभी रास्तोंपर कब्जा किया हुआ है। तोडफ़ोड़ और आगजनीकी भी खबरें हैं। उनके आंदोलनकी कवरेज मीडियामें कितनी मिल रही है इसपर उनका खास ध्यान रहता है। उनको पता है कि जितनी ज्यादा चर्चा मीडियामें होगी, आन्दोलन उतना सफल माना जायगा।
गुर्जर समुदाय तत्काल प्रभावसे मौजूदा गहलोत सरकारमें सरकारी नौकरियोंमें पांच फीसदी आरक्षणकी मांग कर रहे हैं। जिसे सरकारने फिलहाल सिरेसे नकार दिया है। इसके बाद गुर्जर संघर्ष समितिके सदस्योंने एक महापंचायत बुलायी। महापंचायतमें आन्दोलनका खाका तैयार किया गया। इसके बाद जीएसएसके सदस्य सवाई माधोपुरके पास मलारना डुंगर रेलवे स्टेशन पहुंचे और उन्होंने रेलमार्गपर ट्रेनोंका परिचालन बाधित करनेका निर्णय लिया। आंदोलनके पहले दिन उन्होंने सबसे पहले अवध एक्सप्रेसको रोका फिर उसके बाद और कई मालगाडिय़ोंको सवाई माधोपुरमें रोक दिया।
आन्दोलनकी अगुआई करनेवाले गुर्जर नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसलाका कहना है कि अपने समुदायके लिए उसी तरह पांच फीसदी आरक्षण चाहते हैं, जिस तरह हालमें केन्द्र सरकारने आर्थिक रूपसे पिछड़े लोगोंके लिए दस फीसदी आरक्षणका प्रावधान किया है। ऐसा ही प्रावधान लानेकी उन्होंने प्रदेश सरकारके समक्ष मांग रखी, जिसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। तब मजबूरन उन्हें आंदोलनका रास्ता अख्तियार करना पड़ा। आंदोलनसे अजमेर जिला सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है। प्राइमरी स्कूलोंको भी आन्दोलकारियोंने बंद करवा दिया है। बाजार भी बंद हैं। लोगोंको घरोंसे भी नहीं निकले दे रहे है। आन्दोलनमें इस तरहकी तानाशाही नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्रमें अपनी मांगोंको मनवानेका सबको सामान्य अधिकार है लेकिन मांगोंके लिए अहिंसाका रास्ता अपनाना चाहिए, न की हिंसाका। किसी दूसरेको कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। लेकिन आजका चलन यही है कि लोग दूसरोंको परेशान करके ही अपनी मांग मनवानेमें भलाई समझते हैं। दरअसल इस बार आंदोलनकारी पूरी तैयारियोंके साथ रेल पटरियोंपर बैठे हैं। आरक्षण मिलतेतक वह पटरियोंसे नहीं हटेंगे। इस बावत सरकारका एक प्रतिनिधिमंडल आंदोलनकारियोंके साथ विफल बैठक कर चुका है। इस बार सरकारने भी सख्तीसे निबटनेके लिए पूरे इंतजाम किये हुए हैं। पिछले १३ सालोंमें अबतक ७५४ मुकदमें भी दर्ज हुए, जिनमें ६१४ केस पूर्ववर्ती सरकारोंने वापस भी लिये। ३५ गंभीर मामले ऐसे हैं जिनकी जांच चल रही है। केन्द्र सरकारको आमजनोंकी चिन्ता है, ताकि इस मूवमेंटसे कोई बेकसूर हताहत न हो। इस बावत केन्द्र सरकारने राज्य सरकारसे बात भी की है। किसी भी तरह इस मूवमेंटको खत्म करनेकी कोशिशें भी की जा रही हैं।
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अप्रासंगिक होता संविधान
श्याम सुन्दर मिश्र       
बजट सत्ताप्राप्तिकी मानसिकतासे बुद्धिजीवियोंसे गहन विचार-विमर्शके बाद ही तैयार किये जाते हैं तथा अच्छेसे अच्छे बजटमें भी मीनमेख निकालना विरोधियोंने राजधर्म मान लिया है। अत: आने वाले चुनावोंके परिणाम ही सिद्ध करेंगे कि बजटपर आम जनताने कितना भरोसा किया है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि भिन्न-भिन्न सरकारोंके लोक लुभावन बजटों और घोषणाओंके बावजूद देशमें आज भी भय-भूख और भ्रष्टाचार दिनों दिन परवान चढ़ रहा है। रोटी-कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओंसे आधीसे अधिक आबादी त्रस्त है। सुरक्षाका आलम यह है कि देशमें कहीं भी कोई भी सुरक्षित नहीं है। इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है कि जिस पुलिस तंत्रपर सबकी रक्षा काभार है वह खुदकी रक्षा करनेमें भी विफल सिद्ध हो रही है। न्यायालयोंमें न्यायकी छीछालेदर करनेवालोंकी संख्या निरन्तर बढ़ रही है। तीन-चौथाई माननीयोंपर भ्रष्टाचार एवं व्यभिचारके आरोप लग चुके है। यह बात अलग है कि सत्ताकी हनक एवं राजनीतिक लाभके चलते उनके बचावमें कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जाती। सत्ता पानेके बाद यह कहना भी आम बात हो गयी थी कि घोषणा पत्र कोई दस्तावेज नहीं और बजटपर अमल करनेके लिए टैक्स बढ़ाना परम स्वाभाविक है। परन्तु वर्तमान दौरमें राजनेता ऐसी भूल नहीं करते बजटमें टैक्सोंको घटानेकी घोषणाएं करने एवं सब्जबाग दिखलानेका चलन-सा बन गया है। क्योंकि सत्ता पानेके बाद अनेक ऐसे मुद्दे खोज लेंगे। जिससे पुन: टैैक्स बढ़ानेकी मजबूरी प्रदर्शित कर ही देंगे। अत: ऐसी घोषणाओंसे तनिक भी परहेज नहीं करते जिनसे हमारी अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाय अथवा सामाजिक विद्वेषमें वृद्घि होकर गृह युद्धतककी नौबत आ जाये।
इन प्रवृत्तियोंका सीधा-सा अर्थ है कि आजके राजनेता सत्ता पानेके लिए देशको गिरवी रखनेसे भी परहेज नहीं करते। कोई गरीबोंको एक हजार मासिक देनेकी घोषणा कर रहा है तो कोई तीन हजार। प्रधान मंत्रीका सपना देख रहे राहुल गांधी तो सबको पछाड़ते हुए घोषणा कर चुके हैं कि सत्तामें आनेपर गरीबोंको दस हजार रुपये प्रतिमाह देंगे। सभी जानते हैं कि इस देशमें गरीबीका तगमा किस प्रणालीसे गुजरकर मिलता है और लाभ किसे प्राप्त होता है। साधु-संतोंको बीस हजार रुपया प्रतिमाह देनेकी मांग सपा प्रमुख अखिलेश यादव कर ही चुके हैं। अर्थात सत्ता पानेके लिए संभव-असंभव सभी स्तरकी घोषणाओंका चलन भारतीय राजनीतिमें प्रविष्ट हो चुका है। सत्ताके लिए गाली-गलौज बूथ कैप्चरिंग एवं खून खराबा तो पहलेसे ही प्रचलनमें है। इन हालातोंमें दुनियाका बड़ासे बड़ा अर्थशास्त्री भी भारतीय अर्थव्यवस्थाको गर्तमें जानेसे नहीं बचा सकता। इससे पीड़ादा और क्या हो सकता है कि चारों ओर आराजकता अव्यवस्था देखने, सुनने और भोगनेके बाद भी देशकी जनताका लोकतंत्र संविधान और राजनेताओंसे मोहभंग नहीं हो रहा। समयकी मांग है कि सुप्रीम कोर्टके बुद्धिजीवी जजोंका पैनल नया संविधान बनाये तथा सेना और पुलिस प्रशासन उनके निर्देशोंका पालन करें। दिखाये गये स्वप्नोंकी बात करें तो बुलेट ट्रेनका स्वप्न देखनेवाले भारतवर्षमें रेलकी पटरियां आये दिन चटकी मिलती हैं। फिश प्लेटें खोल दी जाती हैं। सिग्नल व्यवस्था राम भरोसे ही चलती है और काशनकी उपेक्षा आमबात हो चुकी है। आकस्मिक दुर्घटनाए दिनों-दिन बढ़ रही हैं। अत: जल्दी पहुंचनेका हवाला देकर बुलेट ट्रेनकी वकालत किस प्रकार तर्कसंगत है। सरदार पटेलने सभी रियासतोंको एक कर भारतीय गणतंत्रकी स्थापना की किन्तु वर्तमान राजनेताओंने धर्म, जाति, संप्रदाय एवं क्षेत्रवादको मुद्दा बनाकर स्वयात्तताकी अग्नि प्रज्वलित कर दी है। कावेरी जलविवाद हो अथवा सबरी माला जैसा धार्मिक मुद्दा सभी क्षेत्रवादमें सिमटकर रह गये हैं। राज्योंकी हनकका यह आलम है कि केन्द्र सरकारके अधीन देशकी सर्वोच्च जांच एजेंसी भी कोलकाताके पुलिस कमिश्नरसे पूछताछ करनेमें असफल रही और राज्य सरकारकी उपेक्षाके आरोपमें उसके अफसरोंको गिरफ्तार कर लिया गया। इससे सिद्ध हो चुका है अखंड भारत खंड-खंड हो चुका है। जेएनयूमें तो मात्र नारे लगाये गये हैं जब कि कश्मीर हमसे पूरी तरह कट चुका है। जम्मूका मैदानी इलाका और भारतीय सेना कबतक उसे जोड़े रखेगी यह भविष्यके गर्भमें है। एक वर्ग दूसरे वर्गपर वर्चस्व बनानेके लिए किसी भी हदतक जानेको तैयार है। हरर क्षेत्रमें रिश्वत व्यभिचार और भ्रष्टाचार चरमपर है। अमीरी और गरीबीकी खाईं दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है फिर भी लोकतंत्रके जयकारे लगाये जा रहे हैं। लोकलुभावन बजट और घोषणाएं सिर्फ और सिर्फ चुनावी हथकंडा है इसे महत्व न देकर उसे ही चुनना होगा जो कागजी आंकड़ों एवं प्रलोभनोंको दरकिनार कर देशको एक सूत्रमें जोड़ सके। जातिवाद वर्गवाद एवं संप्रदायवादका पूरी तरह खात्मा कर सके। साथ ही त्वरित न्यायकी क्षमता भी रखता हो।
कमसे कम वर्तमान राजनेताओंमें किसीमें भी यह माद्दा नजर नहीं आता। राजनीतिसे परे हटकर देखा जाय तो भारतीय सेना ही इन मुद्दोंपर विजय पानेकी क्षमता रखती है। यदि देशको विघटन एवं गुलामीकी स्थितिसे बचाना है तो सबसे बड़े लोकतंत्रका गाना गानेसे परहेज करते हुए स्वीकार करना ही होगा कि आज लोकतंत्रके मुखौटेमें राजतंत्र ही हावी है और संपूर्ण भारतवर्ष सामंतवादियों एवं बाहुबलियोंका गुलाम है। इस स्थितिमें बदलावके प्रयास नहीं हुए तो परोक्ष रूपसे हमें विदेशियोंका गुलाम बननेसे कोई नहीं रोक सकता। अत: देशभक्तों एवं बुद्धिजीवियोंको व्यवस्था परिवर्तनके लिए नये सिरेसे सोचना ही होगा। आज हर मुद्देको हल करनेके लिए सुप्रीम  कोर्टका दरवाजा खटखटाना ब्रह्मïास्त्र बन चुका है और सभी दल उसके निर्णयके आगे नतमस्तक हो जाते हैं। अत: समयकी मांग यही है कि अंग्रेजोंके समयसे चले आ रहे कानून और तत्कालीन परिस्थितियोंके अनुरूप बने संविधान दोनोंमें ही परिवर्तनका अधिकार सुप्रीम कोर्टको दे दिया जाय। जजोंका पैनल अपने बहुमतसे जिस व्यवस्थाका निर्माण करे देशकी सेनाएं एवं पुलिस प्रशासन उसे मूर्त रूप देनेका हर संभव प्रयास करे। इस प्रकार बुद्धि और बलके समन्वयसे ही देशमें अमन-चैन एवं खुशहाली आ सकती है। विकासके मार्ग खुल सकते हैं और राजशाही मानसिकताका अंत होकर अखंड भारतका स्वप्न साकार हो सकता है।