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अंतसके प्रश्नसे उपजता सत्य

संसार प्रत्यक्ष है। इसके साथ ही एक संसार हमारे भीतर भी है। इसकी वाह्य सीमा शरीर है। विज्ञानसे सुपरिचित हिस्सा सरल है। श्वांस नलीसे लेकर हृदय और स्नायु तंत्र अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।
शरीरके आन्तरिक चीजोंसे चिकित्सा विज्ञान सुपरिचित है। मनोवैज्ञानिकोंने भी काफी अध्ययन किये हैं लेकिन इस सामान्य यंत्रका तंत्र जटिल है। इस जटिलताके कारण अनेक प्रश्न अभी उलझे हैं। जैसे अवसादका केन्द्र क्या है? तनावका उद्भव कैसे होता है? शरीरके किस केन्द्रसे होता है? प्रीतिका मूल क्या है? क्या पैंक्रियाज या पिट्यूटरीकी तरह दुख रस प्रवाहकी भी कोई ग्रंथि है? शरीरमें निद्राका केन्द्र क्या है? अनिद्राका उद्भव कैसे होता है? बादमें सही सिद्ध होनेवाले स्वप्नोंकी फिल्म कौन बनाता है? सामान्य स्वप्नोंका भी निर्माता कौन है? गीत-संगीत क्यों अच्छे लगते हैं? रूप, रस, गंध, स्पर्श और स्वादके आनंदका केन्द्र क्या है? बाहर और भीतरका सम्यक जानकार ही इन प्रश्नोंके उत्तर दे सकता है। सुख और आनंदके उपकरण बाहर भी हो सकते हैं और भीतर भी। लेकिन भारतीय चिंतन इन्हे भीतर ही मानता रहा है। उपनिषदोंमें भीतरकी जिज्ञासासे जुड़े तमाम प्रश्न है जैसे मनको कौन प्रेरित करता है? इन्द्रियां किसकी प्रेरणासे काम करती हैं? प्राण क्या है? कैसे गति करता है? ऋग्वेदमें भी तमाम मौलिक प्रश्न हैं- हम किससे प्रेरित होकर गलत काम करते हैं आदि। वाह्य संसारका अध्ययन पदार्थ विज्ञानका हिस्सा है लेकिन भीतरका संसार और भी अध्ययन योग्य है। बाहरकी तुलनामें भीतरके संसारका बोध कहीं ज्यादा जरूरी जान पड़ता है। भीतर उदासी है और इसका बाहर कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं है। भीतर क्रोध है लेकिन कभी-कभी क्रोधका भी बाहर कोई कारण नहीं मिलता। बाहर सब कुछ सामान्य है, शरीर निरोगी है। बाहर उल्लासके पर्याप्त कारण नहीं हैं। अवसादके लिए भी जरूरी परिस्थितियां नहीं हैं लेकिन अकारण आ धमकता है उल्लास। बिना बादल ही वर्षा आश्चर्यजनक है। कोई काव्य उगता है भीतर। अनायास। इसका उल्टा भी होता है। अकारण भीतरसे ही आ जाता है अवसाद। विषाद।
भारतीय चिंतनमें ज्ञानके साथ भावकी महत्ता है। ज्ञान यात्रामें तर्क और प्रतितर्क होते हैं। भाव-जगतमें तर्कसे काम नहीं चलता। वाह्य संसारकी वस्तुओं, रूपों, जीवोंके प्रति ज्ञानके साथ हमारा विशेष भाव भी होता है। भावका अध्ययन जटिल है। इस अध्ययनमें कार्य कारणका सिद्धांत प्राय: काम नहीं आता। भावकी समझके लिए 'स्वभाव’ की समझ ही सहायक बनती है। स्वभाव हमारा है। इसकी समझके लिए पदार्थ विज्ञानकी उपयोगिता नहीं होती। हम 'स्व’ हैं। स्वका ही दूसरा नाम है 'मैं’। स्वभाव हमारा केन्द्र है। भारतीय चिंतनका आध्यात्म स्वभावका ही साक्षात्कार है। अध्यात्म बिना जांची-परखी आस्था नहीं है। यह अन्त:करणमें प्रतिपल चल रहे कार्यव्यापारका तटस्थ अध्ययन है। भावका प्रवाह देखना तटस्थतामें ही संभव है। हम दुखभावमें दुखी होते है और सुखभावमें सुखी। क्रोध तीव्र आवेग है। इस आवेगमें हम क्रोधका भाग बनते हैं। तटस्थता ढेर हो जाती है। तटस्थ हो सके तो क्रोधका दर्शन किया जाना बहुत कठिन नहीं। तटस्थता मनकी प्रकृति नहीं है। मनके अध्ययनपर भारतीय पूर्वजों एवं वैज्ञानिकोंने काफी परिश्रम किया है। ऋग्वेदसे लेकर पतंजलितक भारतमें मनोविश्लेषणका लम्बा इतिहास है। पतंजलि बेजोड़ है। उनका समूचा योग विज्ञान चित्तवृत्तियोंकी ही अडिय़ल और चंचल प्रवृत्तिको उखाड़ फेंकनेका शास्त्र है। मन मनमानी करता है, बुद्धि हमारा अर्जन है। देश समाज द्वारा घोषित शुभ-अशुभ बुद्धिका मार्गदर्शन करते हैं। 'स्वभावÓ तो भी अपनी चलाता है। गीतामें श्रीकृष्णने उचित ही स्वभावको अध्यात्म कहा है। स्वभावका दर्शन अध्यात्म है। इस दर्शनके लिए 'अन्तर्यात्राÓ के अलावा और कोई विकल्प नहीं। स्वयंके भीतर पैठकर अन्त:करणकी गति और विधि देखना ही अध्यात्म है। भक्ति कथा, प्रवचन आदिको अध्यात्म कहा जाता है। यह सामान्य अर्थमें अध्यात्म कहे जा सकते हैं। वस्तुत: वह अध्यात्मकी यात्राके पथ संकेत हैं। मूलतत्व है अन्र्तयात्रा। कथा हमको हमारी भीतरकी यात्राके लिए प्रेरित करती है तो अध्यात्म। बाहरका संसार कत्र्तापन-भोक्तापनका क्षेत्र है। हम कत्र्ता हैं, हम कर्म करते हैं, इसलिए हम कर्मफलके भोक्ता भी हैं। अन्तर्यात्राके पहले चरणमें ही कत्र्तापन प्रश्नवाचक हो जाता है। क्रोध हम कहां करते हैं? क्रोध कहीं किसी भिन्न केन्द्रसे आता है। झुलसते हम हैं। क्या हम सोते हैं? निद्रा कही किसी समय अज्ञात क्षेत्रसे आती है। मनमें प्रश्न उठते हैं यह निद्रा कहांसे आती है और हम सबको ऊर्जा सम्पन्न बनाती है? क्या उसे पुकारा जा सकता है? क्या उसे रात्रिके आयोजनका मुख्य अतिथि बनाया जा सकता है? वह पूरी रात रूके, थपकी दे, वह जागे और मैं सोऊं। लेकिन ऐसे प्रश्नोंके उत्तर पदार्थ विज्ञानके पास नहीं हैं। विज्ञान अनिद्रा रोगीको बेहोश कर सकता है और बेहोशी असली निद्रा नहीं होती।
सत्य भीतर है। हिरण्यमय पात्रसे ढका हुआ। गंधका स्रोत पृथ्वीके अन्तस्में है। गंध ऊपर-ऊपर है भीतर गंध कोष है। कामनाएं भीतर है। कामनापूर्तिके कर्म बाहर हैं। काम अतृप्त रहता है। पदार्थोंसे भरे संसारमें प्रत्येक वस्तुका मोलभाव है। भीतर बैठी तमाम प्राकृतिक सम्पदाका कोई बाजर भाव नहीं। भीतरकी सारी वस्तुएं अपनी हैं। उनके दरश मात्रसे आत्मबोध जागता है और बाहरका पीड़ादायी संसार माया हो जाता है। माया अर्थात आभास। वह जैसा दिखाई पड़ता है, वैसा ही न होना माया है। सारी धनसंपदा भीतर ही है। बाहर उसकी छाया माया है। यह पंक्तियां भीतरसे आयी हैं। मेरी अन्तर्यात्राकी पैठ बहुत गहरी नहीं है। इसलिए भीतरके भी भीतर प्रवेशका उद्योग अभी शेष है। सो अनुभूतिका सृजन वैसा नहीं है, जैसा होना चाहिए था। इन पंक्तियोंमें 'भीतर गावÓ की ताकझाक ही प्रकट हुई है। 'भीतरगांव’ यहां हमारे अन्त:करणमें विकसित गांव है। आप सभी भीतरकी यात्रापर निकलें। वहां कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है और न ही टांग खिचाई ही।
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मी टू अभियानसे बिगड़ता सामाजिक तानाबाना
 संजय राय
तकरीबन तीन दर्जन महिलाओं द्वारा 'मी टू’ मुहिमके तहत यौन शोषण और दुव्र्यवहारका आरोप लगाये जानेका दबाव अदालतके सहारे झेलनेकी उम्मीद पाले मोदी सरकारके विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबरने आखिरकार मंत्री पदसे इस्तीफा दे दिया है। अब वह इस लड़ाईको व्यक्तिगत स्तरपर कानूनके सहारे अंजामतक पहुंचायंगे। अकबरके अलावा फिल्म जगत और कई अन्य क्षेत्रोंकी जानीमानी हस्तियां मी टूके आरोपोंके घेरेमें हैं। यह अभियान ऐसे वक्तपर शुरू हुआ है जब देशमें सरकारके सामने महंगी, बेरोजगारी, डीजल और पेट्रोलकी कीमतोंमें बेतहाशा वृद्धि, रुपयेकी दरमें गिरावट जैसी आम जनताकी रोजमर्राकी जिंदगीसे जुड़ी समस्याएं विकराल रूपमें खड़ी हैं। मी टू अभियानने इन सब समस्याओंको पर्देके पीछे ढकेल दिया है और पूरा देश इस मुद्देके सहारे महिला सुरक्षा, महिला सशक्तीकरण जैसे विषयोंपर गंभीर विमर्शमें जुट गया है।
मी टू अभियानने निश्चित रूपसे हमारे समाजकी सडऩको बाहर लानेका काम किया है। लेकिन आजके बदलते समाजमें इज्जतके मानदंडोंमें जो बदलाव आया है, उस संदर्भमें इस विषयको देखना बेहद जरूरी है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब बुरे लोग अच्छे लोगोंका जीवन एक पलमें तबाह कर देंगे और सज्जन आदमी देखते ही देखते खलनायक बन जायेगा। किसी बड़े माफिया या सिंडिकेट द्वारा तैयार किया गया गिरोहबंद समूह मी टूसे पूरे देशमें हर मोर्चेंपर अफरा-तफरी मचानेकी क्षमता रखता है। विशेष रूपसे हालमें आये सर्वोच्च न्यायालयके कुछ ऐसे फैसलोंकी पृष्ठभूमिमें इस समस्याके समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक पहलूपर सोचने तथा गंभीरतासे विचार करनेकी जरूरत है। अदालतने नैतिकताको परे रखकर समलैंगिकता और आपसी सहमतिसे पर-स्त्रीगमनको कानूनकी कसौटीपर उचित बताया है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि समाजपर इस फैसलेका असर आनेवाले कुछ वर्षोंमें अपने पूरे रूपमें दिखाई देगा। महज आरोप लगानेपर आज विदेशमंत्रीको इस्तीफा देना पड़ा है।
जरा सोचिये! नैतिकताकी कसौटीपर परखनेके लिए आज एक मंत्रीको हटाया गया है, कल यदि प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति, सेनाप्रमुख और सर्वोच्च न्यायालयके प्रधान न्यायाधीशपर १००-२०० महिलाओंका कोई गिरोह ट्विटर या फेसबुकके माध्यमसे आरोप लगा दे तो देशमें क्या होगा। इस समस्यासे देश कैसे निबटेगा। इस्तीफे लेकर या फिर नैतिकताकी कोई नयी कसौटी रहेगी। कानून तो सबके लिए बराबर होनेका दावा करता है, लेकिन वास्तवमें ऐसा है नहीं। न्याय पैसेपर बिकता है और न्याय देनेवाले लोग भी दूधके धुले नहीं है। समस्या तो है, लेकिन इसका जो समाधान होना चाहिए, उसपर कोई भी राजनीतिक दल सही तरीकेसे बोलनेको तैयार नहीं है। क्यों? इसका जवाब यही है कि इन दलोंमें ऐसे लोगोंकी भरमार है, जो खुद इस तरहकी हरकतोंमें लिप्त हैं। किसी महिलाके आत्मसम्मानके साथ खेलकर यह लोग आज समाजके नीति निर्माता बने हैं।
ऐसेमें समाजके हर क्षेत्रमें गहराईतक जड़ जमा चुकी महिलाओंके साथ इस तरहकी हरकतोंकी समस्याका समाधान खोजनेमें महिलाओंकी भूमिका काफी अहम है। महिला सशक्तीकरणके नामपर जो माहौल किया जा रहा है, उससे समाजका शायद ही कुछ भला हो। जो महिलाएं सशक्तीकरणके नामपर दो-चार पुरुषोंको निशाना बनाकर सोचती हैं कि इस तरीकेसे समाजमें सुधार होगा, वह वस्तुत: गलत सोचका शिकार हैं। पुरुषोंको भी महिलाओंने ही बनाया है। पुरुषकी प्रथम शिक्षक उसकी मां होती है, फिर शिक्षा संस्थानोंका नंबर आता है। मांकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, लेकिन आजकी जीवनशैलीमें यह भूमिका पूरी तरह गड़बड़ाई हुई है। पुरुष यदि सार्वजनिक स्थलपर महिलाके साथ बदसलूकी करता है तो यह कहीं न कहीं उसके पालन-पोषण और परिवार द्वारा दिये गये संस्कारोंमें खोंटको दर्शाता है। कोई भी संस्कारी पुरुष किसी महिलाके साथ ओछी हरकत करनेकी हिमाकत नहीं कर सकता है। उसे उकसाया जाय तो ही वह विचलित हो सकता है।
देशमें चलाये गये पूर्वके कई सामाजिक अभियानोंकी तरह मी टू मुहिम भी कुछ दिनमें शांत हो जायेगी और कोई दूसरा मुद्दा राष्ट्रीय चर्चाके केंद्रमें आ जायेगा। मी टू मुहिमके समाप्त होनेके बाद भी यह समस्या पूरी तरह समाप्त होनेवाली नहीं है। लेकिन इस मुद्देने हमारे समाजकी सड़ांधको सामने लाकर सोचने और समस्याके समाधानकी दिशामें आगे बढऩेका एक रास्ता खोला है। कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालयने सभी संस्थानोंमें महिलाओंको सुरक्षा देनेके उद्देश्यसे एक दिशा-निर्देश जारी किया था। विशाखा गाइडलाइनके नामका यह दिशा-निर्देश कुछ संस्थानोंमें तो लागू है, लेकिन इन अधिकतर संस्थानोंमें इसे लागू नहीं किया गया है। ऐसे कई मामले सामने आये हैं, जिन संस्थानोंने इसे लागू किया है, वहांपर महिलाओंने ही अपने छुद्र स्वार्थोंके लिए इसको कमजोर बनाकर रख दिया है।
एक स्वस्थ समाजके निर्माणके लिए चर्चा करना और उसके लिए प्रयास करना पूरे देश और विश्वका सामूहिक लक्ष्य है। इसमें महिला और पुरुष दोनोंकी बराबरी भूमिका है। इस भूमिकाको सही तरीकेसे निभानेकी जरूरत है। यदि इस मुद्दे पर संसदमें सभी दल मिलकर स्वस्थ चर्चा करें और चर्चाके जो परिणाम निकलकर आयें उसें सही तरीकेसे समाजमें स्थापित करें तो यह एक अच्छी पहल होगी। माना कि राजनीतिमें भी यह रोग गहरेतक जड़ जमाये हुए है, लेकिन संसद एक ऐसी जगह है जहां देशभरसे हर क्षेत्रके लोग आते हैं। नीतियां यहींसे बनती-बिगड़ती हैं और पूरे समाजको प्रभावित करती हैं।