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टूटनेके लिए बनते गठबंधन

उत्तर प्रदेशमें मजबूत दिख रहे सपा-बसपा गठबंधनमें बसपा सुप्रीमो मायावतीके बयानके बाद दरार आ गयी है। लोकसभा चुनावमें बसपाको हुए फायदेके बाद भी मायावती सन्तुष्ट नहीं हैं।           
 अपना नुकसान देखकर मायावतीको यह कहनेमें भी गुरेज नहीं रहा कि सपाके यादव वोट बैंकमें सेंधमारी लग चुकी है। मायावतीका इशारा साफ है कि यदि सपा-बसपाके वोटर एक साथ आते तो गठबंधनकी जीतका आंकड़ा बहुत बड़ा होता। परन्तु सपासे नाराज यादव वोटरोंके चलते ऐसा हो नहीं पाया। मायावतीके बयानपर अबतक सपा प्रमुख अखिलेश यादव सधी हुई प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं, लेकिन मायावतीके नये पैंतरेसे यह तो साफ हो ही गया है कि अखिलेशके लिए मायावतीको समझना इतना आसान भी नहीं है। मायावतीने फिलहाल सपासे संबंध तोडऩेकी बात तो नहीं की है लेकिन यह जरूर साफ कर दिया है कि वह अपने हिसाबसे चलेंगी। इसी तरह बसपा सुप्रीमो २००७ के हिट फार्मूले 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखायÓ को फिरसे धार देना चाहती हैं, जिसकी बदौलत प्रदेशमें उनकी बहुमतके साथ सरकार बनी थी।
मायावतीने पार्टी की बैठकमें चुनाव नतीजोंकी चर्चा करते हुए यह दो-टूक दोहराया कि सपाके साथ उनका गठबंधन राजनीतिक मजबूरी है, लेकिन उन्हें इस बातका मलाल भी है कि लोकसभा चुनावमें यादव वोटर सपाके उम्मीदवारोंके साथ नहीं खड़े रहे। मायावती कहती हैं कि सपाके बड़े नेताओंकी हारसे साफ है कि सपाका वोट एकजुट नहीं हुआ। इसके साथ ही मायावतीने अखिलेशको नसीहत दी कि यदि उनके कुछ नेताओंमें सुधार नहीं होता है, समाजवादी पार्टीकी स्थिति ठीक नहीं होती है तो उनके साथ ऐसेमें चलना बड़ा मुश्किल होगा।
मायावतीको यही लगता है कि सपा-बसपाका बेस वोट जुडऩेपर हमें हारना नहीं चाहिए था। परंतु उन्हें अखिलेशसे व्यक्तिगत नाराजगी नहीं है। उनका यह कहना कि हमारा संबंध केवल राजनीतिके लिए नहीं। यह हमेशाके जारी रहेगा। अखिलेश और उनकी पत्नी मेरा आदर करते हैं। कई संकेत देता है। कुछ माहके भीतर होनेवाले ११ विधानसभा सीटोंपर बसपा अकेले ही चुनाव लड़ेगी, पार्टी सुप्रीमोका यह फैसला चौंकानेवाला तो है, लेकिन मायावती यह भी कहती हैं कि यह स्थायी फैसला नहीं है। भले ही अभी सपा-बसपा गठबंधन खत्म नहीं हुआ है, लेकिन इस बातसे इनकार नहीं किया जा सकता है कि उत्तर प्रदेशमें गठंबधनकी सियासतका इतिहास कभी खुशनुमा नहीं लिखा गया। यहां कभी भी गठबंधनकी सियासत लम्बे समयतक परवान नहीं चढ़ सकी। प्रदेशमें १९८९ से गठबंधनकी सियासतका दौर शुरू हुआ था। तबसे लेकर आजतक प्रदेशकी जनताने कई मेल-बेमल गठबंधन देखे हैं। राज्यमें सपा-बसपा, भाजपा-बसपा, कांग्रेस-बसपा, रालोद-कांग्रेस जैसे अनेक गठबंधन बन चुके हैं, लेकिन आपसी स्वार्थके चलते लगभग हर बार गठबंधनकी राजनीति दम तोड़ती नजर आयी। छोटे दलोंकी तो बात ही छोड़ दीजिए कोई भी ऐसा बड़ा दल नहीं रहा जिसने कभी न कभी गठबंधन न किया हो। परन्तु गठबंधनका हश्र हमेशा एक जैसा ही रहा। पहली बार १९८९ में मुलायम सिंह यादव गठबंधन सरकारके मुख्य मंत्री बने थे, तब उन्हें भाजपाका समर्थन मिला था। वह संयुक्त मोर्चासे मुख्य मंत्री बने थे। इसके बाद १९९० में जब राम मंदिर आंदोलनके दौरान लालकृष्ण आडवाणीके रथको रोका गया था, तब भाजपाने केंद्र और राज्य सरकारसे अपना समर्थन वापस ले लिया था। इसके बादमें १९९३ में जब चुनाव हुए थे तब पहली बार बसपा-सपाका गठबंधन हुआ और मुलायमको सीएमके रूपमें प्रोजेक्ट किया गया। ५ दिसंबर १९९३ को मुलायम सिंह मुख्य मंत्री बने। परन्तु कार्यकाल पूरा होता इससे पहले ही मायावतीने २ जून, १९९५ को मुलायम सरकारसे समर्थन वापस ले लिया। इससे मुलायम तिलमिला गये, जिसके बादमें दो जून, १९९५ को लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउसमें मायावतीको सपाके लोगोंने घेर कर काफी अभद्रता की थी। जहांसे बीजेपी नेता ब्रह्मïदत्त द्विवेदीने उनको सुरक्षित बाहर निकाला था।
इसके बाद तीन जून १९९५ को बीजेपीके समर्थनसे मायावती दोबारा मुख्य मंत्री बनीं, लेकिन यह गठबंधन भी जल्द ही उसी साल १८ अक्तूबरको टूट गया। इसके बाद प्रदेशमें राष्ट्रपति शासन लग गया, जो ५ अक्तूबर, १९९३ तक चला। इसके बाद मायावतीने कांग्रेसके साथ मिलकर सरकार बनायी। उस समय तत्कालीन सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादवने कहा था कि कांग्रेसने एक दलितको मुख्य मंत्री बनाकर बहुत बड़ी गलती की है। हुआ भी यही। मायावतीने कांग्रेसके दलित वोट बैंकमें सेंधमारी कर दी। मायावतीकी सरकारको बने आठ-नौ महीने हुए थे, तभी भाजपा नेता कल्याण सिंहकी सियासी बिसातमें उलझकर बसपासे २२ विधायक मायावतीका साथ छोड़कर अलग हो गये थे। इन विधायकोंने भाजपाको समर्थन देकर कल्याण सिंहको दोबारा मुख्य मंत्री बनानेमें महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। परन्तु यह गठबंधन भी लंबा नहीं चला। बसपासे अलग हुए कुछ विधायक बादमें कांग्रेसके करीब हो गये और तबके कांग्रेसी नेता जगदग्बिका पाल मुख्य मंत्रीकी कुर्सीपर विराजमान हो गये, परन्तु अदालतके आदेशके चलते २४ घंटेके भीतर ही उन्हें पदसे हटा दिया गया। आखिरकार २००१ में राजनाथ सिंह जब उत्तर प्रदेशके मुख्य मंत्री थे, तब हुए चुनावमें कांग्रेस और बसपाके बीच गठबंधन हुआ था। परन्तु बसपाको कोई लाभ नहीं हुआ था। कांग्रेसने चुनावके बाद मुलायम सिंह यादवको समर्थन देकर उनकी सरकार बनवा दी। २०१२ में रालोद और कांग्रेसके बीच गठबंधन हुआ था, परन्तु उसका कोई भी सकारात्मक परिणाम नहीं आया। दोनों दलोंने मिलाकर मात्र २८ सीटें ही जीतीं। इसी प्रकार २०१७ में कांग्रेस और सपाका गठबंधन भी बुरी तरहसे फ्लॉप रहा। अबकी लोकसभा चुनावके लिए सपा-बसपा और रालोदमें जो गठबंधन हुआ था, वह भी मायावतीके सख्त तेवरोंके चलते फिरसे चौराहेपर खड़ा नजर आ रहा है।
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नयी शिक्षा नीतिके विरोधका औचित्य?
अरविंद जयतिलक
 नयी शिक्षा नीतिके सामने आते ही तमिलनाडुमें जिस तरह राजनीतिक दलों द्वारा हिंदीका विरोध शुरू हुआ वह एक किस्मसे ओछी सियासत ही कहा जायगा। नयी शिक्षा नीतिमें त्रिभाषा फार्मूलेकी चर्चा तो की गयी थी लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि उसके क्रियानवयनपर सरकारने मुहर लगा दी थी। सरकारने गैरहिंदी राज्योंमें हिन्दीकी अनिवार्यताको समाप्त कर दिया है। यहां समझना होगा कि कमेटीने अंग्रेजीके साथ भारतीय भाषाओं एवं संस्कृत या लिबरल आट्र्सको बढ़ावा देनेपर जोर दिया है। भला यह किस तरह हिन्दी भाषाको थोपनेकी बात हुई। लेकिन यहां कुछ राजनीतिक दल इस तरह प्रचारित कर रहे हैं मानों नयी शिक्षा नीतिके जो मसौदे हैं, वह लागू कर दिये गये हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि इस तरहके ओछे विरोधमें कांग्रेसके दिग्गज नेता पी. चिदंबरम भी शामिल हैं। चूंकि तमिलनाडुमें हिन्दी विरोधके नामपर पहले भी त्रिभाषा फार्मूलेपर सियासत हो चुकी है और उसके खतरनाक परिणाम सामने आ चुके हैं, जबकि नयी शिक्षा नीतिमें क्षेत्रीय भाषाओंको नजरअंदाज करने और हिंदींको थोपनेकी मंशा ही नहीं है। सच तो यह है कि आज हिन्दी वैश्विक स्तरपर संवादके संवाहकके साथ रोजगारका कारक बन चुकी है। जब जर्मनीके हाईडेलबर्ग, लोअर सेक्सोनीके लाइपजिंग, बर्लिनके हम्बोलडिट और बॉन विश्वविद्यालयके अलावा दुनियाके कई शिक्षण संस्थाओंमें हिंदी भाषा पाठ्यक्रममें शामिल किया जा चुका है और दुनियाके ४० से अधिक देशोंके ६०० से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलोंमें हिंदीकी पढ़ाई हो सकती है तो देशके अन्य राज्योंमें इससे परहेज क्यों? आज जब वैश्वीकरणके माहौलमें हिन्दी भाषा विदेशी कम्पनियोंके लिए भी लाभका एक आकर्षक भाषा एवं जरिया बन चुकी है और वह कम्पनियां अपने उत्पादोंको बड़ी आबादीतक पहुंचानेके लिए हिन्दी भाषाको माध्यम बना रही हैं, ऐसेमें क्या तमिलनाडुके सियासी दल हिन्दी भाषाका विरोध कर अपने ही लोगोंके हितोंपर कुल्हाड़ी नहीं चला रहे हैं?
स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयोंके पाठ्यक्रमोंको तार्किक, वैज्ञानिक और रोजगारोन्मुख बनानेके लिए एक अरसेसे नयी शिक्षा नीतिकी मांग हो रही थी। मौजूदा शिक्षा नीति १९८६ में बनायी गयी थी और १९९२ में इसका संशोधन किया गया। मंत्रालयके विशषज्ञ समितिमें इसरोके पूर्व प्रमुख डा. के. कस्तुरीरंगनके अलावा गणितज्ञ मंजुल भार्गवके साथ आठ अन्य सदस्य शामिल हैं। अच्छी बात यह है कि विशेषज्ञोंने पूर्व कैबिनेट सचिव टी.एस. सुब्रमण्यमकी अध्यक्षतावाले पैनल और मंत्रालय द्वारा गठित पैनलकी रिपोर्टपर भी गौर फरमाया है। अब जब विशेषज्ञोंकी कमेटीने कड़ी मेहनत कर राष्ट्रीय शिक्षा नीतिका ड्रॉफ्ट सरकारको सौंप दिया है तो उचित होगा कि उसपर सियासत करनेके बजाय उसे लागू करनेकी दिशामें रचनात्मक पहल करें। विशेषज्ञोंकी कमेटीने सुझाव दिया है कि सेमेस्टर सिस्टमकी तर्जपर बोर्ड परीक्षाएं भी सालमें दो बार करायी जायं तथा छात्रोंको बोर्ड परीक्षामें विषयोंको दोहरानेकी अनुमति देनेके लिए एक नीति गढ़ी जाय। छात्रोंको इस बातकी सुविधा मिलनी चाहिए कि उसे जिस सेमेस्टरमें लगता है कि परीक्षा देनेके लिए तैयार है, उस समय उसकी परीक्षा ली जानी चाहिए। बादमें उसे लगता है कि वह और बेहतर कर सकता है तो उसे परीक्षा देनेका एक और विकल्प देना चाहिए। कमेटीने इस बातकी भी सिफारिश की है कि चूंकि आजका युग कंप्यूटर एवं तकनीकका है, लिहाजा कंप्यूटर आधारित परीक्षा और पाठ्यक्रम कौशल विकासपर आधारित होना चाहिए। कमेटीने नर्सरीसे पांचवींतक बच्चोंको उनकी मातृभाषामें पढ़ाई कराने एवं एकसे अ_ïारह वर्ष आयुतकके बच्चोंको मुफ्त गुणवत्तायुक्त शिक्षा दिये जानेकी वकालत की है। नयी शिक्षा नीतिमें शिक्षाके अधिकारको पहली कक्षाके बनिस्बत नर्सरी, वहीं आठवींके बजाय १२वींतकका विस्तार करनेका सुझाव शामिल है। मौजूदा स्कूल पाठ्यक्रम और पुस्तकोंमें गणित, राजनीति, समाज, मनोविज्ञान, चिकित्सा, खगोलशास्त्र, दर्शनशास्त्र एवं भारतीय सभ्यता एवं संस्कृतिकी बोध करानेवाली भारतीय भाषाओंको शामिल करनेपर जोर दिया गया है। इसके अलावा विशेषज्ञोंकी कमेटीने और अन्य महत्वपूर्ण सुझाव दिये हैं। मसलन विश्वके शीर्ष दो सौ संस्थाओंके कैंपस भारतमें खोले जायं।
नालंदा, तक्षशिलाके तर्जपर भारतीय प्राचीन विश्वविद्यालयोंको आगे बढ़ाया जाय। विश्वविद्यालय अनुदान आयोगको भंग कर भारतीय उच्च शिक्षा आयोग अधिनियम-२०१८ बनाया जाय। बड़े पैमानेपर मल्टीडिस्पलिनेरी विश्वविद्यालय और कालेज खोले जायं जिसमें एक साथ कई विषयोंका अध्ययन हो सके। पाठ्यक्रमोंमें साहित्य, भाषा, इतिहास, खेल, योग, आयुर्वेद और संगीतका समावेशन हो, ताकि छात्रोंका समावेशी विकास हो सके। कमेटीने राष्ट्रीय छात्रवृत्ति कोष बनानेका सुझाव दिया है ताकि छात्रोंको शिक्षाके लिए प्रोत्साहित किया जा सके। कमेटीने गरीब छात्रोंको शुल्क मुक्त शिक्षा देनेकी व्यवस्थापर जोर देनेके साथ प्रतियोगी परीक्षाओंको संपन्न करानेके लिए नेशनल टेस्टिंग एजेंसी गठित करनेकी सिफारिश की है।
इसके अलावा स्नातक प्रोग्राममें तीन एवं चार वर्षीय डिग्रीका सुझाव भी शामिल है। जिसमें चार वर्षीय डिग्री प्रोग्राममें पढ़ाई करनेके बाद छात्रको एक सालमें ही परास्नातककी डिग्री मिलनेकी सुविधाका जिक्र है। एमफिल प्रोग्राम खत्म करनेके साथ लिबरल एजुकेशल इंस्टीट्यूशनके तहत बैचलर ऑफ लिबरल आटर््स, बैचलर ऑफ लिबरल एजुकेशन डिग्री विद् रिसर्च शुरू करनेका सुझव दिया गया है। कमेटीने देशमें सकारात्मक शिक्षाको विकसित, क्रियान्वित और मूल्यांकित करनेके लिए राष्ट्रीय शिक्षा आयोगके गठनपर बल दिया है। नयी शिक्षा नीतिके सुझावोंमें निजी स्कूलोंको अपनी फीस ढांचा तय करनेकी आजादीके साथ इस बातपर भी जोर दिया गया है कि निजी संस्थानों द्वारा फीसका ढांचा तय करते वक्त मनमानीपूर्ण रवैया नहीं अपनाना चाहिए। कमेटीका सुझाव शिक्षाको गुणवत्तापरक और विश्वस्तरीय बनानेके दिशामें अहम है लेकिन बात तब बनेगी जब देशके राजनीतिक दल स्वार्थ भरे रवैयेको त्यागकर संकीर्णताके केंचूलसे बाहर निकलेंगे।