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ऊर्जाके क्षेत्रमें चुनौतियां

आजके भारतके ऊर्जा परिदृश्यके लिहाजसे मुख्य मुद्दा तेजीसे घटित हो रहे वैश्विक घटनाक्रमोंके बीच निर्बाध ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना एवं उपलब्ध ऊर्जा क्षमताको बढ़ाने जैसी अतिमहत्वपूर्ण चुनौतियां हैं।
विश्वमें ऊर्जा उत्पादक देशों और उपभोक्ता देशोंके बीच बेहतर तालमेल और ऊर्जाकी सही कीमत भी भारत जैसे विकासशील देशोंके लिए अतिमहत्वपूर्ण है। वैश्विक पर्यावरणको न्यूनतम नुकसान पहुंचानेके साथ जीवाश्म ईंधनका उपयोग कम करके ऊर्जाके वैकल्पिक स्त्रोतोंको बढ़ावा देना अब प्राथमिक आवश्यकताओंमेंसे एक है। भारतकी 'उज्ज्वला योजना’ भी स्वास्थ्य और पर्यावरणकी बेहतरीके लिए घरेलू उपयोगके लिए साफ ऊर्जाके इस्तेमालको बढ़ावा देनेके लिए लायी गयी है। अब भारतके तकरीबन ८० प्रतिशत घरोंमें गैसका इस्तेमाल हो रहा है। शेष घरोंमें अब भी खाना बनानेके लिए कोयले, लकड़ी या केरोसिनका उपयोग किया जा रहा है जो न सिर्फ स्वास्थ्य, बल्कि पर्यावरणके लिए भी अत्यधिक नुकसानदेह है। वाहनोंके लिए भारतने २०२० तक बीएस-६ मानक लागू करना तय किया है, जो यूरो-६ मानकोंके समतुल्य होगा। २०२० तक पुराने व्यावसायिक वाहनोंको हटाकर नये मानकोंवाले स्वच्छ-ऊर्जाके वाहन लाना और विद्युत वाहनोंको बढ़ावा देना भारत सरकारकी प्राथमिकताओंमें शामिल है। भारतमें बिजली उत्पादन और फर्टिलाइजर उद्योगमें सबसे ज्यादा ऊर्जा खर्च होती है। देशमें दुनियाका चौथा सबसे बड़ा कोयला भंडार है। हमारे यहां कोयला ऊर्जाका प्राथमिक स्त्रोत भी है। भारतमें बिजली उत्पादनके क्षेत्रमें कोयलेकी हिस्सेदारी अब भी ६० प्रतिशत है जो पर्यावरणकी दृष्टिसे चिंताजनक है। भारत २०१५ में संयुक्त राष्ट्र संघके पेरिसमें हुए जलवायु परिवर्तन सम्मेलन यानी सीओपी २१ के प्रति पूर्ण रूपसे प्रतिबद्ध है, जो ऊर्जाके बेहतर इस्तेमालपर जोर देता है। इसीलिए भारत सौर, जल-विद्युत, पवन, और परमाणु ऊर्जाके क्षेत्रोंमें भी तेजीसे आगे बढ़ रहा है। भारतमें सौर-ऊर्जाके क्षेत्रमें अथाह संभावनाएं है। भारतने ही पहल करके ६० देशोंका अंतरराष्ट्रीय सौर-ऊर्जा मैत्री संघटन बनाया है। देश २०२२ तक अपनी सौर-ऊर्जा क्षमताको सौ गीगावाटतक पहुंचानेके लिए प्रतिबद्ध है। २०२० तक भारत परमाणु ऊर्जासे बिजली उत्पादनको २० गीगावाटतक पहुंचानेका प्रयास कर रहा है। भारतकी २०२५ तक २३ नये परमाणु रियेक्टर बनानेकी भी योजना है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी और पेट्रोल निर्यात करनेवाले देशोंके संघटन 'ओपेकÓ के अनुसार वैकल्पिक स्त्रोतोंके बाद भी सन्ï २०४० तक ऊर्जाके क्षेत्रमें परंपरागत जीवाश्म ईंधनकी हिस्सेदारी तीन-चौथाई रहेगी। दुनियामें अमेरिका और चीनके बाद भारतमें सबसे ज्यादा ऊर्जाकी खपत होती है। १३२ करोड़की विशाल जनसंख्या और ७.२ प्रतिशतकी जीडीपी दरके साथ तेजीसे विकास करते भारतके लिए अपनी ऊर्जा आवश्यकताओंकी न्यूनतम दरपर निरंतर आपूर्ति सबसे बड़ी जरूरतोंमेंसे एक है। लगातार बढ़ती आबादी और ऊर्जाकी मांगके साथ देशमें घरेलू स्रोतोंकी सीमित क्षमताके कारण भारतको हर साल बड़ी मात्रामें तेल और प्राकृतिक गैसका आयात करना पड़ता है, जिसमें देशके बजटका बड़ा हिस्सा खर्च होता है। रूस, अमेरिका, चीन, कनाडा और दक्षिण अमेरिकी देशोंके अलावा विश्वमें तेल और गैसके सभी प्रमुख उत्पादक देश खाड़ी, पश्चिम-एशिया और उत्तरी-अफ्रीकामें है, जहां शांति और स्थायित्व हमेशासे चुनौती रहा है। आतंकवादके अलावा भी इन देशोंके आपसमें संबंध और मतभेदोंका असर वैश्विक ऊर्जा बाजारपर पड़ता रहा है। विश्वमें तेल और गैसकी बढ़ती कीमतोंका एक कारण यह भी है। भारतमें घरेलू स्त्रोतोंसे उपलब्ध ऊर्जा और कुल जनसंख्याका अनुपात बहुत कम है। २०१६-१७ में भारतका घरेलू तेल और गैस उत्पादन ६८ मिलियन टनतक गिर गया। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतोंका ८० प्रतिशत आयात करता है। बढ़ती मांग और अंतरराष्ट्रीय कीमतोंके कारण भारतके तेल आयात खर्चमें लगातार तेजी आ रही है। वर्तमानमें भारतका तेल आयात तकरीबन ४.४ मिलियन बैरल प्रतिदिन है। २०१७ में भारतको सबसे ज्यादा तेल आपूर्ति क्रमश: इराक, सऊदी अरब और ईरानसे हुई। वर्तमान वित्त वर्षमें भारतका तेलपर खर्च ८८ बिलियन डालर रहनेका अनुमान है।
भारतको तेल और प्राकृतिक गैसकी आपूर्ति जलीय टैंकरोंसे होती है। भारत चाहता है कि प्राकृतिक गैसकी आपूर्ति आगे पाइपलाइनके जरिये हो, जो दीर्घावधिमें भारतको सस्ती पड़ेगी। इसके लिए ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइनपर भारतकी बरसोंसे दोनों देशोंसे बातचीत चल रही है। २००९ में अमेरिकाके दबावमें आकर भारतने योजनाको रद कर दिया था क्योंकि ईरानपर आर्थिक प्रतिबंधों और पाकिस्तानमें आतंकवादके मद्देनजर सुरक्षा और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित नहीं थी और पूरी योजनाके आर्थिक पक्षपर भी सवाल थे। अब ईरानपर आर्थिक प्रतिबंधोंमें ढीलके बाद उसपर पुनर्विचारकी बात हो रही है। एक-दूसरे बेहतर विकल्पके रूपमें टीएपीआई यानी तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इंडिया गैस पाइपलाइनपर भी काम चल रहा है और इसके २०१९ तक पूरे होनेकी संभावना है। इसके पूर्ण होनेसे तुर्कमेनिस्तानसे सीधे दक्षिण एशियाको गैसकी आपूर्ति होगी। एक और योजना समुद्रीय ईरान-भारत गैस पाइपलाइनकी भी है जो अभी सिर्फ वैचारिक स्तरपर है। भारतने कजाकिस्तानसे भारततक भी एक हाइड्रोकार्बन पाइपलाइन बनानेका सुझाव दिया है जो कजाकिस्तानसे शुरू होकर उज्बेकिस्तान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान होते हुए भारत आयगी। १५०० किमी लंबी यह प्रस्तावित पाइपलाइन पांच देशोंसे गुजरेगी और पूरे क्षेत्रकी ऊर्जा आवश्यकताओंको पूरा करेगी। यानी २१वीं सदीमें संभावनाओंके अनुरूप भारत भविष्यकी आवश्यकताओंको देखते हुए तैयारी कर रहा है।
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पुरस्कार वापसीकी खुली पोल
अवधेश कुमार
तीन वर्ष पहले पुरस्कार वापसीके घृणात्मक अभियानकी पोल एक साहित्यकारने सप्रमाण खोली है। हालांकि साहित्य अकादमीके पूर्व अध्यक्ष यदि इसपर नहीं लिखते तो भी तटस्थ और निष्पक्ष लोगोंको इसके पीछे एक व्यक्तिके खिलाफ माहौल बनानेकी योजनाका पता था। पुरस्कार वापसीकी घटनासे साफ लक्षित था कि पूरा अभियान कहीं न कहींसे संचालित हो रहा है। इसके पीछे कोई स्वत:स्फूर्त प्रेरणा नहीं थी। देशमें ऐसा वातावरण था ही नहीं, जिसमें किसी लेखकको कुछ लिखने या बोलनेपर किसी तरहकी बंदिश हो। साहित्य अकादमीके पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारीने यही कहा है कि सारे लेखक, कवि जहां चाहते अपनी बात पूरी स्वतंत्रतासे रख रहे थे लेकिन झूठ यह फैला रहे थे कि अभिव्यक्तिकी आजादी खतरेमें आ गयी है। वास्तवमें पूरा अभियान राजनीतिक था, जिसका एक ही लक्ष्य था प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकारके खिलाफ माहौल बनाना। मोदी या उनकी सरकारकी मुखालफत करनेमें कोई समस्या नहीं है, लेकिन यह खुलकर होना चाहिए। इन रचनाकारोंमें इतना नैतिक बल नहीं था कि ऐसा कर सकें तो छद्म रूपसे पुरस्कार वापसीके जरिये यह कुप्रचार करनेकी कोशिश करने लगे कि देशमें सहिष्णुता खत्म हो रही है, बोलने और लिखनेपर पाबंदी लग चुकी है। केंद्रीय संस्कृतिमंत्री महेश शर्माने पिछले वर्ष फरवरीमें लोकसभामें बताया कि इन लेखकोंने यह कहते हुए अपने पुरस्कार लौटाये थे कि उनकी अभिव्यक्तिकी आजादीपर हमला किया जा रहा है और अकादमी इस मुद्देपर चुप है।
पिछले तीन सालोंमें ३९ लेखकोंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाये हैं। इन लेखकोंने कन्नड़ लेखक और साहित्य अकादमी बोर्डके सदस्य एम.एम. कलबुर्गीकी हत्या और दादरी कांडमें अखलाककी हत्यापर विरोध जताते हुए कहा था कि अभिव्यक्तिकी आजादी खतरेमें है और यदि अब नहीं बोले तो खतरे और बढ़ जायंगे। ३० अगस्त, २०१५ को कलबुर्गीकी गोली मारकर हत्या कर दी गयी। इसी समय दादरीके बिसहारा गांवमें गोहत्या करने और गोमांस खानेका आरोप लगाते हुए लोगोंने अखलाककी हत्या कर दी। कलबुर्गीकी हत्याके बाद लेखक उदय प्रकाशने ५ सितबर, २०१५ को साहित्य सम्मान लौटाकर सबसे पहले विरोधकी शुरुआत की। पुरस्कार वापसीके बाद अकादमीने २३ अक्तूबर २०१५ तथा इसके बाद १७ दिसम्बरको बैठक बुलाकर प्रस्ताव द्वारा पुरस्कार लौटा चुके लेखकोंसे अपने फैसलेपर पुनर्विचार करनेका अनुरोध किया था। इसमें हत्याकी कड़े शब्दोंमें निंदा भी की गयी थी। इस अनुरोधको केवल एक लेखक राजस्थानके नन्द भारद्वाजने स्वीकार कर पुरस्कार लौटानेका अपना निर्णय वापस लिया था। 
ब्रिटेनके प्रधान मंत्रीको लेखकोंकी ओरसे एक पत्रक देकर मांग की गयी कि ब्रिटेन यात्राके दौरान वह मोदीसे भारतमें बढ़ रहीं असहिष्णुतापर बात करें। यह वैसा ही प्रयास था जैसे मोदीके सत्तामें आनेके पूर्व कुछ सांसदोंके हस्ताक्षरवाला पत्र अमेरिकी राष्ट्रपतिको भेजा गया था। इसे राजनीतिक एजेंडा नहीं तो और क्या कहेंगे। इन्होंने विदेशमें देशकी छवितककी चिंता नहीं की। २०१४ के चुनावमें जब यह स्पष्ट होने लगा कि मोदीके नामपर भाजपा सत्तामें आ रही है तो कन्नड़ लेखक यू.आर. अनंतमूर्तिने बयान दिया कि यदि मोदी प्रधान मंत्री होंगे तो मैं देश छोड़कर चला जाऊंगा। क्या यह किसी उदार चरित्रवाले, वह भी रचनाकारका बयान हो सकता है। इतनी घृणा इनके अन्दर एक व्यक्तिको लेकर थी। सब जानते हैं कि अशोक वाजपेयी अनंतमूर्तिके मित्र हैं। उन्हें अकादेमी पुरस्कार अनंतमूर्तिके साहित्य अकादेमी अध्यक्ष कालमें मिला था। बाजपेयी मोदी विरोधी उस अभियानके भी अगुवा थे जो आम चुनावके ठीक पहलेसे कुछ लेखकों द्वारा चलाया जा रहा था। ९ अप्रैल, २०१४ के एक दैनिकमें ४० लेखकोंने मतदाताओंसे भाजपाको वोट न देनेकी अपील की। इनमें वह नाम शामिल हैं जिन्होंने साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाये। अशोक वाजपेयीके नेतृत्वमें ही पांच लोग पुरस्कार अभियानके अगुवा थे तथा इनके मुख्य मित्रोंकी संख्या दो दर्जनके आसपास थी, जो इसमें शमिल हुए। बाकी या तो दबाव या फिर प्रचार पानेकी लालसासे इनसे जुड़े। सच यह है कि इन्होंने चाहे जैसे माहौल बनाये लेकिन इनका दिली समर्थन बहुत कम था। तिवारीने यही कहा है कि बहुतसे लेखकों, मित्रों और परिचित-अपरिचित बुद्धिजीवियोंके ई-मेल फोन, पत्र आदि लगातार मिलते रहे, जिनमंै लगभग सभी पुरस्कार वापस करनेवालोंके विरुद्ध थे।
वास्तवमें यह पांच सूत्रधार अपने निकटके लेखकों द्वारा उनके परिचित लेखकोंको बार-बार फोन कराकर पूछते रहते थे कि आप कब लौटा रहे हैं या क्या आप नहीं लौटा रहे हैं। तथाकथित असहिष्णुता विरोधी आंदोलनके लिए इन लेखकोंने देशव्यापी नेटवर्किंग और अभियान चलाया था। कैसे लेखकोंपर दबाव बनाया जा रहा था इसके दो उदाहरण देखिये। विश्वनाथ तिवारीको लेखक रमाशंकर द्विवेदीने ३० अक्तूबर २०१५ को फोनपर बताया कि उन्हें साहित्य अकादेमीके एक अवकाश प्राप्त लेखकने फोनपर पुरस्कार लौटानेके विषयमें पूछा। १२ अक्तूबरको अंग्रेजीके वरिष्ठतम लेखक (९३ वर्षीय) शिव के. कुमारने तिवारीको ई-मेल किया। इसमें उन्होंने कहा कि कुछ लोगोंने मुझे भी पुरस्कार और पद्मभूषण लौटानेको कहा है लेकिन मैं ऐसा नहीं कर रहा हूं। यह एक राजनीतिक पाखंडके सिवा कुछ नही है। किसी तरहकी अभिव्यक्तिकी स्वतंत्रतापर कोई अंकुश नहीं है। मुझे उम्मीद है आप इन सबसे विचलित नहीं होंगे। यदि इनका उद्देश्य राजनीतिक नहीं होता तो जिन राज्योंमें हत्या की घटनाएं (कर्नाटक, उत्तर प्रदेश) हुई उनसे प्राप्त पुरस्कार वापस किये जाते। कानून-व्यवस्था तो राज्य सरकारोंका विषय है। जब काशीनाथ सिंहसे पूछा गया कि आपने उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थानका पुरस्कार क्यों नहीं लौटाया जबकि अखलाककी हत्या उत्तर प्रदेशमें ही हुई है उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेशमें अभिव्यक्तिकी आजादी है, यहां सहिष्णुताकी समस्या नहीं। घटना उत्तर प्रदेशमें हुइ वहां आजादी है परन्तु भारतमें नहीं। जैसा विश्वनाथ तिवारीने लिखा है, काशीनाथ सिंहने स्वयं फोनपर उनसे कहा था कि वह पुरस्कार नहीं लौटायंगे। इसके तीन दिन बाद ही उन्होंने मीडियाके सामने पुरस्कार वापसीकी घोषणा कर दी। क्यों किया ऐसा? काशीनाथ सिंहने भी चुनावमें मोदीका खुलकर विरोध किया था। तसलीमा नसरीनने उस समय साफ कहा था कि लेखकोंका यह विरोध मोदी सरकारसे है।
यह किस कदर झूठ फैला रहे थे इसका भी उदाहरण देखिये। तथाकथित असहिष्णुताका यह अभियान जब समाप्त हो रहा था उस समय २२ नवंबर, २०१५ को अशोक वाजपेयीने लिखा कि एक लेखककी दिन दहाड़े हत्याके बाद साहित्य अकादेमीने शोकसभातक नहीं की। सच यह है कि इसके एक महीने पहले यानी २३ अक्तूबर, २०१५ का अकादेमीकी कार्यकारिणीका वह प्रस्ताव उन्हें मिल चुका था जिसमें शोकसभाका पूरा ब्यौरा है तथा अखबारोंमें और अकादेमीके वेबसाइटपर भी सूचना उपलब्ध थी कि अकादेमीने बेंगलुरुमें बाकायदा निमंत्रण-पत्र छापकर बड़ी शोकसभा आयोजित की थी। क्या इसके बाद कहनेकी आवश्यकता है कि उस पूरे अभियानका सहिष्णुता या अभिव्यक्तिकी स्वतंत्रतासे कोई लेना देना नहीं था। इसका एक ही एजेंडा था, मोदी विरोध। इनके न चाहते हुए भी मोदी प्रधान मंत्री बन चुके थे। यह इनसे सहन नहीं हो रहा था। इसलिए कलबुर्गी और अखलाककी दुखद हत्याका उन्होंने उपयोग करके प्रच्छन्न एजेडा चलाया। इससे पता चलता है कि जिन रचनाकारोंको देशने इतना सम्मान दिया, उन्हें अपना आइकॉन माना वह वाकई इतने तुच्छ और छोटे व्यक्तित्ववाले हैं कि लोकतांत्रिक तरीकेसे चुने गये किसी व्यक्तिको स्वीकार नहीं कर सकते, जिसे यह अपना वैचारिक विरोधी मानते हैं। अब सारा सच एक बार फिर सामने आनेके बाद देशको यह तय करना चाहिए कि इनके साथ कैसा व्यवहार किया जाय।