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अग्निकी खोजने सभ्यताएं बदलीं

प्रकृतिमें प्रतिपल आश्चर्यजनक घटित हो रहा है। सूर्यका उदय और अस्त विस्मय क्यों नहीं पैदा करता? प्रश्नोंका क्षेत्र बड़ा है। फूल खिल रहे हैं। वे पृथ्वीसे रस काया लेते हैं। यहां बड़े प्रश्न हैं।
पृथ्वीके पास रस गंधका कोष कितना है? सूर्य तप रहे हैं। सूर्यके पास ईंधनकी मात्रा क्या है? हाथमें दूरभाष यंत्र है। अब दुनियाके तमाम देशोंसे दूरभाष वार्ता संभव है। इस तकनीकीपर आश्चर्य क्यों नहीं होता। गन्नेके खेतको देखते हैं। गन्ना धरतीसे रस लेता है। अनंतकालसे मीठा है। धरतीके गर्भमें क्या शक्करकी मात्रा है? है तो कितने साल चलेगी? प्रश्न ज्ञानके पिता हैं और जिज्ञासा ज्ञानकी माता। आश्चर्य है कि अब हमारे भीतर प्रश्न क्यों नहीं उगते? उत्तर वैदिक काल प्रश्नोंसे भरापूरा था। तब प्रश्नोंकी खेती थी और प्रश्नोंके फूल फल। कठोपनिषद् इसी कालकी सुंदर रचना है। अल्पवयी नचिकेता प्रश्नकर्ता है और कालके देवता यम उत्तरदाता। बड़ी सुरम्य रचना है कठोपनिषद्। कथाके पात्र और भी हैं। नचिकेताके पिता उद्दालक विख्यात ऋषि परंपरामें है। उन्होंने अपनी कामनाओंकी पूर्तिके लिए यज्ञ कराया। अपनी संपदा पुरोहितोंको दान कर दी। तब यज्ञसे इच्छित फलप्राप्तिके प्रचार रहे होंगे। लेकिन इसी लपेटेमें उद्दालक जैसे ऋषि भी आये। यह एक और बड़ा आश्चर्य है?
उद्दालककी प्रतिष्ठा अन्य उपनिषदेंमें भी है। संभव है कि इस यज्ञके बाद वह दर्शनकी ओर मुड़े हों। उपनिषद्की कथाके अनुसार 'अल्पवयी होनेके बावजूद नचिकेता श्रद्धा विह्वल आवेशमें आया। दानकी जीर्ण शीर्ण गायोंको देखकर वह दुखी हुआ।Ó  वैदिक समाजमें दानकी महिमा थी। आधुनिक समाजमें बहुत लोगोंको अनुदान की इच्छा रहती है। नचिकेताने सोचा 'इन गायोंका शरीर जीर्ण हो चुका है। उन्हें अंतिम बार दुहा जा चुका है। वह ठीकसे घास भी नहीं खा सकतीं। ऐसी गायोंको दान देने वाला सुखहीन लोकोंमें दुखी जीवनको अभिशप्त होगा।Ó संसार कर्मक्षेत्र है। कर्म न करके दान दक्षिणा और यज्ञके माध्यमसे उच्च जीवनकी अभिलाषा उचित नहीं। लेकिन नचिकेताके पिता तो और भी बड़ी गलती कर रहे थे। वह कृशकाय गायोके दानसे श्रेष्ठ जीवनके अभिलाषी थे। नचिकेता इस बातसे व्यथित हुआ। उसने पितासे प्रश्न पूछा 'पिताजी आप मुझे किसे देंगे? वे नहीं बोले। उसने यही प्रश्न तीन बार पूछा। पिताने गुस्सेमें कहा- मैं तुझे मृत्युको दूंगा।Ó अपने कर्मपर गुस्साये और शिशुके तीखे प्रश्नसे आहत पिताके पास प्रश्नका सही उत्तर नहीं था।
प्रश्न बेचैन और ज्ञानसे संतुष्ट व्यक्तिमें अंतर होते हैं। प्रश्न बेचैन जिज्ञासामें रमता है, शोध करता है। नचिकेता ऐसा ही तरुण जिज्ञासु हैं। पिता उद्दालक स्वयंको जानकार मानते हैं। यज्ञ कर्मकाण्डमें उनका विश्वास है। उनके चित्तमें कोई संशय नहीं। लेकिन नचिकेता विचारशील है। वह सोच रहा है, 'मैं बहुतसे सीखनेवालोंमें अच्छे आचरणवाला हूं। कुछ सीखनेवालोंसे मेरा आचरण माध्यम हो सकता हूं। यमका मुझसे क्या काम हो सकता है? जिसे पिताजी मेरे द्वारा मुझे यमके पास पूरा करेंगे।Ó सीखनेको तैयार व्यक्ति शिष्य कहे जाते हैं। शिष्यमें दो गुणोंकी महत्ता बतायी गयी है। पहली है प्रश्न बेचैनी और दूसरी आचार्य और वरिष्ठोंका आदर। नचिकेतामें दोनो है। वह पिताके पास गया। उसने पिताको प्राचीन संस्कृतिका स्मरण कराया। यह संसार मरणधर्मा है। मनुष्य अनाजकी तरह पकता है। नष्ट होता है। अनाजकी तरह ही फिर जन्म लेता है।Ó कठोपनिषद्में आया 'यथा पूर्वेÓ ऋग्वेदके अंतिम सूक्तमें भी प्रयुक्त हुआ है। दोनो प्रसंगोंमें इसका संदर्भ एवं अर्थ एक जैसा ही है।
परंपरासे सतत् संवाद जरूरी है। इसी संवादसे आदर्श आधुनिकताका जन्म होता है। गलत आचरण गलत ही हैं। सही गलतके अर्थपर कालका प्रभाव पड़ता है। इसीलिए परम्परासे संवादके साथ परम्पराका अनुसंधान भी आवश्यक है। संसार अनित्य है। सो मनुष्य जीवन भी अनित्य है। नचिकेताने अनाजके पकने, झरने और फिरसे उगनेका उदाहरण दिया है। उपनिषद् कालके ऋषि अपने वातावरणसे ही उदाहरण देते थे। फिर उत्पन्न होनेके उदाहरणमें तत्कालीन समाजकी पुनर्जन्म मान्यता भी है। कथा बड़ी प्यारी है। नचिकेता यमके घर पहुंचा। यम घरपर नहीं थे। नचिकेताने तीन दिन प्रतीक्षा की। यमदेव लौटे। पत्नीने उनसे कहा, 'सूर्य पुत्र! ब्राह्मïण अतिथिके रूपमें स्वयं अग्निदेवता गृहस्थोंके घर जाते हैं। गृहस्थ अतिथि रूप अग्निको शांत करनेके लिए उसे जल आदि देते हैं। आप भी जल ले जाइये।Ó यहां यम सूर्य पुत्र है। पृथ्वी सूर्य परिवारमें है। इसलिए सभी जीव वनस्पति सूर्य पुत्र है। यम देवता भी है। उपनिषद्में उनका सुन्दर मानवीकरण किया गया है। यम देवता गृहस्थ है। उनकी पत्नी भी है। वैदिक समाजकी अनुभूतिवाले सारे देवताओंकी पत्नियां हैं। ऋग्वेदके एक मंत्रमें स्तुति है कि सभी देवता पत्नियों सहित यज्ञमें पधारें। वैदिक समाजकी पत्नियां मौन नहीं रहतीं। वह अपने पतिका मार्गदर्शन भी करती हैं। यमकी पत्नीने भी यमको अतिथि सत्कारका मर्म समझाया, 'जिसके घरमें अतिथि बिना भोजन ही रहता है। ऐसे मंदबुद्धि पुरुषकी पुत्र धन आदिकी सभी आशाएं समाप्त हो जाती हैं। उसे सुन्दर भाषण या वक्तव्यके फल नहीं मिलते। उसकी अभिव्यक्ति क्षीण हो जाती है। अतिथिकी सेवा जरूरी है। यम देवने पत्नीके कहे अनुसार नचिकेताका आदर किया और कहा, हे ब्राह्मïण विद्वान अतिथि! आप तीन दिनसे बिना अन्न लिये ही मेरे घरपर हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। मेरा कल्याण करें। आप प्रत्येक तीन दिवसके बदले तीन वरदान मांग सकते हैं। यहां क्षमा याचनाके साथ तीन पुरस्कार भी हैं। कथा प्रेरक है। यम देव यहां अपनी शक्ति भी बताते हैं। वह वरदान देनेकी स्थितिमें है। उनका प्रस्ताव विचारणीय है।
संसार कर्म क्षेत्र है। कर्म प्रेरणाका केन्द्र अभिलाषा है। सबकी अभिलाषाएं भिन्न-भिन्न हैं। हम नचिकेताकी जगह स्वयंको रख सकते हैं। नचिकेता युवा होकर भी साधारण महत्वाकांक्षी नहीं था। उसने पिताकी प्रसन्नतासे जुड़ा पहला वर मांगा। पिता माता हमारे यहां संसारमें होनेका कारण है। वह न होते तो हम भी न होते। पिता प्रसन्न रहें, बाकी बातें बाद की। यमराजने यह वर दे दिया। अब बारी ज्ञान की। नचिकेताने 'अग्नि तत्वÓ की गहरी जानकारी मांगी। संसारका आधार ताप है। ताप अग्निका अंतस् है। हम सब अग्नि पोषित हैं। अग्निकी खोजने दुनियाकी सभ्यताएं बदल दीं। नचिकेताने ठीक ही अग्नि तत्वकी व्याख्या पूछी। यह दूसरा वर था। फिर तीसरेकी बारी आयी। नचिकेता ने मनुष्य के होने और मृत्यु के बाद होने या न होने के असमंजस पर स्पष्टीकरण मांगा। यह प्रश्न भारतीय दर्शन की एक प्रमुख समस्या था और आज भी है। बादके दोनो प्रश्नोंके उत्तर जाननेके लिए कठोपनिषद् पढऩेमें कोई समस्या नहीं है।
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पृथ्वीको बचानेकी चुनौती
अभिजीत मोहन
बाइस अप्रैलको दुनियाभरमें पर्यावरण संरक्षणके प्रति समर्थन प्रदर्शित करनेके लिए पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। इस दिवसका शुभारंभी अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सनके द्वारा १९७० में एक पर्यावरण शिक्षाके रूपमें किया गया जो आज संसारके १९२ देशोंमें मनाया जाता है। सीनेटर जेराल्ड नेल्सनके मनमें पृथ्वी दिवसका विचार तब आया जब उन्होंने देखा कि सेंट बारबरा तेल रिसाव, प्रदूषण उगलती फैक्ट्रियां, पावर प्लांटोंसे निकलते खतरनाक तत्व, नगरीय कचरे और मलबेसे पर्यावरण बुरी तरह प्रदूषित हो रहा है। उन्होंने इस ओर अमेरिकी जनमानसका ध्यान आकर्षित करते हुए २२ अप्रैल १९७० को पृथ्वी दिवस आयोजित कर आधुनिक पर्यावरण आंदोलनकी शुरुआत की। लाखों अमेरिकी नागरिकोंने इस आयोजनमें सहभागिता कर स्वस्थ एवं स्थायी पर्यावरणके निर्माणके लिए अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की। लेकिन यह त्रासदी है कि एक ओर दुनियाके सभी देश पृथ्वी दिवसके नामपर पर्यावरण सुरक्षाको लेकर चिंता जताते हैं, नये-नये कानून गढ़ते हैं लेकिन दूसरी ओर पर्यावरणको नुकसान पहुंचानेसे भी बाज नहीं आते हैं। नतीजा सामने है। विकासके नामपर प्रति वर्ष सात करोड़ हेक्टेयर वनोंका विनाश हो रहा है। आज प्रकृतिकी एक-तिहाईसे अधिक प्रजातियां नष्ट हो चुकी हैं। जंगली जीवोंकी संख्यामें ५० फीसदीकी कमी आयी है। उदाहरणके तौरपर भारतमें ही पिछले एक दशकमें पर्यावरणको बनाये रखनेमें महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले गिद्धोंकी संख्यामें ९७ फीसदीकी कमी आयी है। वनोंके विनाशसे वातारण जहरीला होता जा रहा है और प्रतिवर्ष दो अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआक्साइड वायुमण्डलमें घुल-मिल रहा है। इससे जीवनका सुरक्षा कवच मानी जानेवाली ओजोन परतको भारी नुकसान पहुंच रहा है। ओजोन परतको होनेवाले नुकसानसे कुछ खास किस्मके अत्यंत अल्प जीवी तत्वों (वीएसएलएस) की संख्यामें तेजीसे वृद्धि हुई है जो मानव जातिके अस्तित्वके लिए खतरनाक है। इन खास किस्मके अत्यंत अल्प जीवी तत्वों (वीएसएलएस) का ओजोनको नुकसान पहुंचानेमें भागीदारी ९० फीसदी है। विडंबना है कि ओजोन परतकी सुरक्षासे संबंधित संयुक्त राष्ट्रके मांट्रियाल प्रोटाकालमें इन तत्वोंपर नियंत्रणकी कोई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था नहीं है।
गौरतलब है कि दुनियाके बीस सबसे ज्यादा क्लोरोफ्लोरो कार्बन उत्सर्जित करनेवाले देशोंके बीच ओजोन परतके क्षरणको रोकनेके लिए १६ सितंबर, १९८७ को अंतरराष्ट्रीय स्तरपर एक संधि हुई जिसे मांट्रियाल प्रोटाकॉल नाम दिया गया। इसका मकसद ओजोन परतके क्षरणके लिए जिम्मेदार गैसों एवं तत्वोंके इस्तेमालपर रोक लगाना था। लेकिन इस दिशामें अभीतक अपेक्षित सफलता हासिल नहीं हुई। आंकड़ेंके मुताबिक अबतक वायुमण्डलमें ३६ लाख टन कार्बन डाइआक्साइडकी वृद्धि हो चुकी है और २४ लाख टन आक्सीजन समाप्त हो चुकी है। यदि यही स्थिति रही तो २०५० तक पृथ्वीके तापक्रममें लगभग चार डिग्री सेल्सियसतक वृद्धि हो सकती है। वैज्ञानिकोंका मानना है कि पृथ्वीका तापमान जिस तेजीसे बढ़ रहा है यदि उसपर समय रहते काबू नहीं किया गया तो अगली सदीमें तापमान ६० डिग्री सेल्सियसतक पहुंच जायगा। आज जब ४८ डिग्री सेल्सियसकी गर्मी मनुष्य सह नहीं पा रहा है तो ६० डिग्री सेल्सियस गर्मी वह कैसे बर्दाश्त करेगा? नतीजा यह होगा कि सूर्यकी किरणें कैंसर जैसे भयंकर रोगोंमें वृद्धि करेगी। यदि पृथ्वीके तापमानमें मात्र ३.६ डिग्री सेल्सियसतक वृद्धि हो जाय तो आर्कटिक एवं अण्टाकर्टिकाके विशाल हिमखण्ड पिघल जायंगे। इससे समुद्रके जल स्तरमें दस इंचसे पांच फुटतक वृद्धि हो सकती है। इसका परिणाम यह होगा कि समुद्रतटीय नगर समुद्रमें डूब जायंगे। भारतके मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पणजी, विशाखापट्टनम कोचीन और त्रिवेंद्रम नगर समुद्रमें होंगे। इसी तरह न्यूयार्क, लॉस एंजिल्स, पेरिस और लंदन आदि बड़े नगर भी जलमग्न हो जायंगे। पर्यावरणके साथ खिलवाड़का सबसे घातक असर ध्रवीय क्षेत्रोंपर पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय अनुपातको देखते हुए उत्तरी धु्रव क्षेत्र दोहरी तेजीसे गरम हो रहा है। उत्तरी धु्रव समुद्रमें फैली स्थायी बर्फकी मोटी परत कम हो रही है। सदियोंसे बर्फके मजबूत चादरमें ढके क्षेत्र पिघल रहे हैं। वर्ष २००७ की इंटरगवर्नमेंटल पैनलकी रिपोर्टके मुताबिक दुनियाभरके करीब ३० पर्वतीय ग्लेशियरोंकी मोटाई वर्ष २००५ में आधे मीटरसे ज्यादा कम हो गयी। वैज्ञानिकोंका मानना है कि इसके लिए मुख्य रूपसे ग्रीन हाउस गैसोंका उत्सर्जन जिम्मेदार है। हिमालय क्षेत्रमें पिछले पांच दशकोंमें माउंट एवरेस्टके ग्लेशियर दोसे पांच किलोमीटर सिकुड़ गये हैं। इसके अलावा हिमालयके ७६ फीसदी ग्लेशियर तेजीसे सिकुड़ रहे हैं। अनुमानित भूमंडलीय तापनसे जीवोंका भौगोलिक वितरण भी प्रभावित हो सकता है। कई जातियां धीरे-धीरे धु्रवीय दिशा या उच्च पर्वतोंकी ओर विस्थापित हो जायंगी।
निश्चित रूपसे मनुष्यके विकासके लिए प्रकृति प्रदत्त संसाधनोंका दोहन आवश्यक है। परन्तु उसकी सीमा निर्धारित होनी चाहिए। लेकिन उसका पालन नहीं हो रहा है। विकासके लिए बिजली आवश्यक है। लेकिन जिस तरह बिजली उत्पादनके लिए नदियोंके सतत प्रवाहको रोककर बांध बनाया जा रहा है उससे खतरनाक पारिस्थितिकीय संकट उत्पन्न हो गया है। जलका दोहन स्रोत सालाना रिचार्जसे कई गुना बढ़ गया है। पेयजल और कृषि जलका संकट गहराने लगा है। आज भारतकी ३३ फीसदी जनता प्यासी है। गंगा और यमुना जैसी अनगिनत नदियां सूखनेके कगारपर हैं। सीवरका गंदा पानी और औद्योगिक कचरा बहानेके कारण क्रोमियम और मरकरी जैसे घातक रसायनोंसे नदियोंका पानी जहर बनता जा रहा है। वैज्ञानिकोंकी मानें तो जल संरक्षण और प्रदूषणपर ध्यान नहीं दिया गया तो आनेवाले दो सौ सालोंमें भूजल स्रोत सूख जायगा। गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तनको लेकर १९७२ में स्टाकहोम, १९९२ में जेनेरियो, २००२ में जोंहासबर्ग, २००६ में मांट्रियाल और २००७ में बैंकॉक सम्मेलन हुआ। लेकिन त्रासदी है कि जलवायु परिवर्तनसे निबटनेकी पहलपर ईमानदारीसे अमल नहीं हुआ। लेक सेक्स सम्मेलन १९४९ में इस बातपर बल दिया गया था कि प्रकृतिके उपकरण एक नैसर्गिक बपौतीके रूपमें है जिन्हें शीघ्रतासे नष्टï नहीं करना चाहिए। इसी तरह स्टाकहोम सम्मेलन १९७२ में मानवीय पर्यावरणपर घोषणा हुई। सैद्धांतिक रूपसे पृथ्वीके प्राकृतिक द्रव्यों जिनमें वायु, पानी, भूमि तथा पेड़-पौधे शामिल हैं, को वर्तमान तथा भावी पीढिय़ोंके लिए सावधानीपूर्ण तथा उपयुक्त योजना तथा प्रबंध द्वारा सुरक्षित रखनेपर बल दिया गया। १९९२ के रियो शिखर सम्मेलनमें कहा गया कि स्थायी विकासके सभी सरोकारोंका केंद्र-बिंदु मानव जाति ही है और उसे प्रकृतिके साथ पूर्ण समरसता रखते हुए स्वस्थ एवं उत्पादनशील जीवन जीना चाहिए। लेकिन यह सभी सिद्धांत कागजोंतक सीमित हैं। मानव आज भी अपने दुराग्रहोंके साथ है। प्रकृतिसे उसका खिलवाड़का तरीका पहलेसे भी जघन्य होता जा रहा है।