Tel: 0542 - 2393981-87 | Mail: ajvaranasi@gmail.com


ईरानमें धार्मिक समूहोंपर संकट

ईरान शिया बहुल देश है। जबसे ईरानमें शिया क्रांति हुई है तबसे अन्य धार्मिक समूहोंका जीवन संकटमय हुआ है। उन्हें शिया होने या फिर ईरान छोडऩेका विकल्प दिया जा रहा है।
दुनियामें कई ऐसे उदाहरण है जिसमें इस्लामकी बहुलताके सामने अन्य संस्कृतियोंका विनाश हुआ। इन संस्कृतियोंमें आर्मीनियांकी भी संस्कृति थी, जो दुनियामें कभी प्रेरक मानी जाती थी, कलाके अर्थमें सर्वश्रेष्ठ थी। खासकर अफ्रीकामें इस्लामिक बहुलताके समाने ईसाई संस्कृतियां हिंसाकी चपेटमें हैं जहां बोकोहरम जैसे आतंकवादी संघटन बच्चियोंको भी गुलाम बनाकर रखनेमें हिचकता नहीं है। खास बात यह है भी है कि इस्लामिक बहुलतावाले देशोंमें मानवाधिकार संघटनोंकी पहुंच सीमित होती है, उन्हें उसी तरहकी आजादी हासिल नहीं होती है जैसी आजादी यूरोपीय-अमेरिका या फिर भारत जैसे लोकतात्रिक देशोंमें होती है।
पिछले दिनों बहाई संस्कृतिके संबंधमें जो खबरें आयी है, वह काफी चिंताजनक है। बहाबी संस्कृतिको खतरा आतंकवादी मानसिकतासे ग्रसित देशोंसे ही है। बहाबी संस्कृति उन मजहबी व्यवस्थाको स्वीकार नहीं है जो सिर्फ अपने ही मजहबको सर्वश्रेष्ठ समझती है। बहाबी संस्कृति बहुलतामें विश्वास करती है। कहनेका अर्थ है कि बहाबी संस्कृति कट्टरता, हिंसा और आतंकवादी जैसी मानसिकतासे अलग है और वह मानती है कि सभी मजहबों-सभी धर्मोंमें परस्पर संबंधसे यह दुनिया शांति और सद्ïभावसे चल सकती है, यह दुनिया वैचारिक तौर समृद्ध हो सकती है, यह दुनिया घृणा, हिंसा और आतंकवाद जैसी मानसिकतासे लड़ सकती है।
बहाबी संस्कृतिपर खतरा बढ़ा है। बहाई संस्कृतिके खिलाफ हिंसक और घृणास्पद अभियान बड़ा ही वीभत्स और चिंताजनक है। खासकर ईरानमें बहाबी संस्कृतिको जमींदोज करनेके लिए हिंसक अभियान जोरोपर है। बहाबी संस्कृतिकी सक्रियताको अराजक और हिंसक समूहों द्वारा सरेआम नुकसान पहुंचाया जा रहा है। इस संस्कृतिकी सामूहिक कब्रोंका नामोनिशान मिटाया जा रहा है। बहाबी संस्कृतिकी सामूहिक कब्रोंको यह कहकर नष्ट किया जा रहा है कि यह इस्लामके खिलाफ है, इस्लामकी मान्यताओंकी खिल्ली उड़ाती है, एक इस्लामिक देशमें अन्य पूजा पद्धतियों और अन्य मान्यताओंके लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। ईरानमें बहाबी संस्कृतिके खिलाफ हिंसक और आतंकवादी अभियानको समर्थन भी मिल रहा है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ऐसे अभियानोंके खिलाफ राज सत्ता सक्रिय नहीं है, बल्कि यह कहना सही होगा कि ईरानका राज सत्ता सिर्फ तमाशबीन बना है, सत्ता कोई कठोर दंडकी व्यवस्था नहीं की है। जब सत्ता ही अप्रत्यक्ष तौरपर समर्थनमें खड़ी रहेगी तो फिर किसी भी संस्कृतिको नष्ट होनेसे कैसे बचाया जा सकता है।
ईरान एक शिया बहुलतावाला देश है। जबसे ईरानमें शिया क्रांति हुई है तबसे अन्य धार्मिक समूहोंका जीवन संकटमय हुआ है, अन्य धार्मिक समूहोंका विस्तार और सक्रियता सीमित हुई है, उन्हें शिया होने या फिर ईरान छोड़ देनेका विकल्प दिया जाता है। ईरानमें जो सत्ता होती है वह शिया बहुलताके सिद्धांतपर खड़ी होती है और यह भी निर्धारित होता है कि शिया धर्मगुरु ही सत्ताका असली शासक होगा। शिया धर्मगुरु ही आतंरिक और बाहरी नीति-विमर्श तय करता है। कभी ईरानपर राजशाही सत्ता थी। राजशाही खुलेपन और संस्कृतियोंके बीच परस्परकी हमदर्दी होती थी। शिया क्रांतिके बाद ईरान अराजक देशमें तब्दील हो गया है। ईरान आज अमेरिकासे प्रतिबंधोंकी मार भी झेल रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि ईरानमें शिया राज सत्ताके खिलाफ सुन्नी इस्लामिक समूह भी आतंकवादके रास्तेपर चल रहा है। सउदी अरबके नेतृत्वमें कई सुन्नी इस्लामिक देश ईरानके खिलाफ सक्रिय हैं।
बहाई संस्कृतिके खिलाफ यह अभियान धीरे-धीरे अन्य इस्लामिक देशोंमें फैल रहा है। इस्लामिक आतंकवादी संघटनोंकी भी इसमें अराजक, हिंसक और खतरनाक भूमिका सामिल हो गयी है। बहाई धर्मकी स्थापना बहाउल्लाहने १८६३ में की थी। दुनियाके २३५ देशोंमें बहाई धर्म है और इसके माननेवालोंकी सख्या करीब ६० लाख है। दुनियाके नियामकों और मानवाधिकार संघटनोंको आगे आकर बहाई संस्कृतिकी रक्षामें भूमिका निभानी चाहिए और हिंसक समूहोंसे रक्षा करनी चाहिए।
--------------------------
आरबीआई और तेलका खेल
मिथिलेश झा   
देशकी अर्थव्यवस्थाके लिए रेपो रेटमें कटौती आवश्यक था। फिचने देशकी आर्थिक विकास दरको १८-१९ के लिए घटा दिया है। यह अब ७.२ पर है। पहले ७.८ पर था। उर्जित पटेलने कहा कि कच्चे तेलकी आनेवाले समयमें क्या कीमत होगी यह नहीं समझमें आ रहा है। इसी कारणसे रेट कम नहीं किया गया है। महंगी दरका लक्ष्य जो पहले चार रखा गया था अब इसको घटाकर २.७० से ३.२० पर किया गया है।यहांपर सारा खेल पूर्वानुमानका है। यदि उर्जित पटेलको तेलकी कीमतोंकी चाल पता होती तो उनको रेट-कट करनेमें सहूलियत होती। पिछली बैठकमें सरकार रेट कट चाहती थी लेकिन उर्जित पटेलने अन्तरराष्टï्रीय बाजारमें कच्चे तेलका हवाला दिया था। महंगी उनकी प्राथमिकता थी। उस समय नायमेक्समें कच्चा तेल उफानपर था। यह ७४-७५ डालर प्रति बैरल था। ब्रेण्ट कू्रड ८४-८५ पर चल रहा था। दोनों तेलका भाव इस समय ८५-८६ से घटकर ६० के नीचे चल रहा है। नायमेक्सका भाव ७५-७६ से घटकर ५० के पास चल रहा है। कच्चा तेल भारतीय अर्थव्यवस्थाके लिए लाइफ लाइन है। यदि तेलकी कीमत बढ़ती है तो देशकी अर्थव्यवस्था चरमराती है। इससे करेण्ट एकाउण्टका घाटा बढ़ता है। इसका असर होता है। देशमंै महंगी बढ़ती है। देशका पैसा बाहर जाता है। पैसा बाहर जानेपर आर्थिक विकास घटता है। इससे रोजगारपर असर पड़ता है। रोजगारका अवसर घटता है। जब यह स्थिति होती है तो रुपया कमजोर होता है। यह सब सारा खेल कच्चे तेलकी कीमतोंके कारण चलता रहता है।
इस्तीफा देनेसे पहले उर्जित पटेलने कहा था कि आगे तेलकी कीमतोंका क्या होगा पता नहीं है इसीलिए रेट कट नहीं किया जा रहा है। तब तो महंगीका लक्ष्य भी नहीं घटाना चाहिए था। २.७०-३.२० लक्ष्य किया गया है। यह लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह सामने दिख रहा है कि यह तो होना ही है। पिछले एक महीनेमें तेलकी इतनी बड़ी गिरावट हुई है। कच्चा तेल अन्तरराष्टï्रीय बाजारमें ३० प्रतिशतसे ज्यादा गिरा है। यह गिरावट भारतके लिए अवसर है। २५ डालर तेलकी कीमत गिरी है। इसका सीधा असर होगा कि भारतकी अर्थव्यवस्थाकी विकास दर लगभग १.१/४ प्रतिशत बढ़ेगी। एक-दो महीना भी ५०-६० के बीच तेलकी कीमत घूमेगी तो भारतीय अर्थव्यवस्थाकी विकास दर ०.७५ से १.१/४ के बीच बढ़ेगा। कमसे कम आरबीआईको वर्तमान सरकारकी क्रियाशीलतापर भरोसा रखना चाहिए था। यदि उर्जित पटेलने ध्यान दिया होता तो रेट कट करना आसान होता है।
भारत सरकारने तेलकी राजनीतिपर अपना अमिट छाप छोड़ा है। ट्रम्पने सबसे पहले भारतको ईरानसे तेल लेनेसे मना किया था। तेल लेनेपर प्रतिबन्ध लगानेकी बात की थी। भारतने अमेरिकाकी बातको नहीं माना था। नतीजा सामने आया कि मजबूरन ट्रम्पने ईरानसे तेल आयातके लिए आठ राष्टï्रोंको छूट दी। इसके बाद सऊदी अरबका बयान आया कि यदि भारतको तेलकी कमी होगी तो उसकी वह पूर्ति करेगा। फिर तो बहुत सारे तेल निर्यातक भारतको तेल देनेको तैयार थे। यह भारतके लिए बहुत बड़ी सफलता थी। अबतक भारतके अन्दर जो क्रूडका रेट एक्सचेंजमें चलता है वह नायमेक्ससे लिंक है। यह लिंक भी नायमेक्सके बजाय सऊदी अरबके एक्सचेंजसे लिंक होगा। भारत सरकारके कारण तेलकी राजनीतिमें बड़ा उलटफेर हो चुका है। इस समय भारत तेलकी राजनीतिमें केन्द्रमें है। अमेरिका भेल आयलके कारण दुनियाका कच्चा तेल उत्पादन करनेवाला पहले नम्बरका राष्टï्र बन गया है। दूसरेपर रूस और तीसरेपर सऊदी अरब है। चौथेपर चीन आ गया है। आजके दिन दुनियामें तेलका उत्पादन आवर सप्लाईकी है। भारत सबसे बड़ा आयातक है। अमेरिकाका तेल उत्पादन सबसे महंगा है। यह ५५ डालर प्रति बैरल है। बहुत सारे राष्टï्रकी तेल उत्पादन लागत मात्र दससे बीस डालर प्रति बैरलतक है। राजनीतिक स्तरपर देखें तो इस समय अमेरिका और चीनके बीच ट्रेड वार छिड़ा है। जब सब राष्टï्र अपना हित और दूसरेका अहित करनेमें लगे हैं तो यह स्थिति भारतके पक्षमें जाता है। रूस, चीन, किसी तरह तेलके दामको कम रखना चाहेंगे, क्योंकि इससे अमेरिकाका तेल क्षेत्रमें नुकसान होगा। सारी परिस्थिति भारतके अनुकूल है। भारतने तेल आयातको कम करनेके लिए भी बहुत सारे प्रयास किये हैं। जैसे पेट्रोलमें अल्कोहलकी मात्राको मिलाना। सोलर एनर्जीका उत्पादन बढ़ाना। सड़कपर पेट्रोल-डीजलके वाहनोंके बजाय इलेक्ट्रिक वाहनको चलाना।
उर्जित पटेलको जब आगे कच्चे तेल भावपर संशय था तो वर्तमान भावपर सरकारसे कहना चाहिए था तीन या छह महीनेका एग्रीमेण्ट किसी राष्टï्रसे करनेको। दूसरा, एक प्रकोष्टï बनानेके लिए बोलना चाहिए था जिससे आगेका पूर्वानुमान मिल सके। इस बातपर उर्जित पटेलको सरकारको सुझाव देना चाहिए था। ऐसा कुछ नहीं हुआ तो इतनी बड़ी संस्था, जिसकी जिम्मेदारी देशकी अर्थव्यवस्थाके लिए महत्वपूर्ण है, मात्र कच्चा तेलकी कीमतोंपर हल्के-फुल्के बयान देकर रेट कट न करना गैरजिम्मेदाराना था। भारत सरकारका महत्व ओपेक भी समझ रहा है। प्रोडक्शन कटौतीकी मीटिंगमें मात्र ट्रम्प और मोदीका नाम लिया गया। मोदीके बढ़ते तेलकी कीमतोंपर बयानका उल्लेख किया गया। इस तरह तेलकी कीमतोंका ग्राफ ऊपर नहीं जा सकता है। ऐसा सऊदी अरबके बयानसे स्पष्टï है। भारत सरकारके इस कार्यशैलीको उर्जित पटेल क्यों नहीं देख पा रहे थे। इस बातपर यही कहा जा सकता है कि देशकी बड़ी-बड़ी कुर्सीपर बैठनेवाले लोग भी अपने अहंकी तुष्टिï कर रहे हैं।