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अत्याचार सहती मूक भावना

आज महिलाएं अनेक उपलब्धियां प्राप्त कर स्वयंको साबित कर रही हैं। जटिलतम प्रतिस्पर्धाओंमें पुरुषोंको पीछे छोड़ अपना मुकाम बना रही हैं। फिर भी स्त्री होना अभिशाप बना है। क्योंकि वह सुरक्षित नहीं हैं।
हैदराबादकी पशु चिकित्सकके साथ हुई दरिन्दगीने हैवानियतके एक और चेहरेको पटलपर लाकर प्रस्तुत कर दिया है। आये दिन कहीं-न-कहीं कोई-न-कोई स्त्री, स्वयंके स्त्री होनेका मूल्य अपनी अस्मिता, प्राण या फिर दोनों ही देकर चुकाती है। मुगलों तथा अंग्रेजोंके समय तो स्त्रियोंकी अस्मिता और भावना लगभग हर रोज तार-तार होती थी। आजादीके बाद जब सब कुछ बदल रहा था तब स्त्रियोंकी स्थितिमें भी बहुत बड़े बदलावकी परिकल्पना की गयी थी। हर क्षेत्रमें महिलाओंको अवसर दिये गये। जिसका स्त्रियोंने न केवल लाभ लिया, बल्कि पुरुष प्रधान समाजको यह दिखा भी दिया कि वह पुरुषोंसे किसी भी मामलेमें कम नहीं हैं। लेकिन पुरुषोंका एक बड़ा वर्ग आज भी नारीको दोयम दर्जेकी हैसियत देते हुए उसे अपनी दासी समझता है। यही कारण है कि लाख प्रयासोंके बावजूद भी स्त्रियोंपर होनेवाले विभिन्न प्रकारके अत्याचार रुकनेकी अपेक्षा दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। इधर कुछ दशकोंसे बलात्कारके साथ अमानवीयताकी सारी हदें पार करते हुए जिस तरहसे पीडि़ताओंकी निर्दयतापूर्वक हत्याएं हो रही हैं, वह स्त्रियोंके प्रति पुरुषोंकी अति विकृत मानसिकताको निरुपित करता है। सात वर्ष पूर्व दिल दहला देनेवाले दिल्लीके निर्भया काण्डके बाद भारतीय संसद द्वारा बलात्कारियोंके लिए सख्त कानून बनाया गया था। तब ऐसा लगा था कि अब शायद ऐसी घटनाओंकी पुनातावृत्ति न हो। लेकिन उसके बाद भी मुम्बई काण्ड, कठुआ काण्ड, राजस्थानका भंवरी देवी काण्ड, उत्तर प्रदेशका उन्नाव काण्ड और अब हैदराबाद जैसा जघन्य काण्ड हो गया। निर्भया काण्डके बाद बीते सात वर्षोंमें देशमें दो लाखसे भी अधिक बलात्कारकी घटनाएं घट चुकी हैं। एक आंकड़ेके मुताबिक देशमें प्रत्येक वर्ष लगभग ४० हजार, प्रतिदिन लगभग १०९ तथा हर घंटेमें लगभग पांच लड़कियोंके साथ बलात्कार जैसा घृणित और अमानवीय अपराध होता है। पिछले दस वर्षोंके दौरान पूरे देशमें लगभग दो लाख ८९ हजार बलात्कारके मामले दर्ज हुए हैं। जिनमेंसे २५ प्रतिशतके आसपास मामले नाबालिग बच्चियोंके साथ हुई हैवानियतके हैं। प्रतिवर्र्ष लगभग दो हजार अपराध सामूहिक बलात्कारके होते हैं। राह चलते छेड़छाड़ और छीटाकशीकी घटनाओंकी तो कोई गिनती ही नहीं है। देशके ५० से अधिक जन-प्रतिनिधियोंके ऊपर महिलाओंके साथ अपराधके मामले विचाराधीन हैं। चार जन-प्रतिनिधियोंपर तो सीधे-सीधे बलात्कारके ही मुकदमें चल रहे हैं।
राष्टï्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा २१ अक्तूबर २०१९ को जारी किये गये तीन वर्षके आंकड़ोंके मुताबिक २०१७ में महिलाओंके विरुद्ध हुए अपराधके तीन लाख ५९ हजार ८४९ मामले देशभर में दर्ज किये गये। जो कि २०१६ से छह प्रतिशत अधिक हैं। इन अपराधोंमें महिलाओंकी हत्या, बलात्कार, दहेज हत्या, आत्महत्याके लिए प्रेरित करना, एसिड अटैक, महिलाओंके साथ क्रूरता, घरेलू हिंसा तथा अपहरणके मामले शामिल हैं। वर्ष २०१६ में तीन लाख ३८ हजार ९५४ महिलाओंके साथ हुए आपराधिक मामले दर्ज किये गये थे। जबकि २०१५ में इन अपराधोंकी संख्या तीन लाख २९ हजार २४३ थी। इन आंकड़ोंके मुताबिक महिलाओंपर हो रहे अत्याचारके मामले निरन्तर बढ़़ते ही जा रहे हैं। जिन्हें रोकनेके अबतकके सभी प्रयास विफल ही दिखाई दे रहे हैं। हालमें एक टी.वी. चैनलने देर रात दिल्लीकी अलग-अलग सुनसान सड़कोंपर अपनी महिला रिपोर्टरको गुप्त कैमरेकी निगरानीमें अकेले खड़ा करके वहांसे निकलनेवाले लोगोंकी प्रतिक्रिया जाननेका प्रयास किया। उनमेंसे किसी भी रिपोर्टरके साथ किसीने जबरदस्ती करनेकी कोशिश तो नहीं की, परन्तु अनेक पुरुषोंने उन्हें कालगर्ल समझकर अपने साथ चलनेका निमन्त्रण अवश्य दिया। इससे यह सिद्ध होता है कि समाजमें पुरुषोंका एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो स्त्रियोंकी अस्मिताका सौदा वस्तुकी तरह बेधड़क होकर करता है। हालाकि इसके लिए महानगरोंमें तेजीसे फल-फूल रहा वेश्यावृत्तिका धन्धा ही सबसे अधिक जिम्मेदार है। इसलिए यह धन्धा फल-फूल रहा है। क्योंकि आदर्श और संस्कारकी श्वेत चादर ओढ़े अनेक गणमान्य नागरिक इस धन्धेके ग्राहक बनकर घूम रहे हैं। ऐसे लोगोंकी दृष्टिïमें स्त्री केवल एक भोगकी वस्तु ही है। महिला पत्रकारको अपने साथ चलनेका निमन्त्रण देनेवाले लोग प्रथम दृष्टïया पढ़े-लिखे और साधन सम्पन्न लग रहे थे। इससे यह भी सिद्ध होता है कि पुरुर्षोंका उच्च शिक्षित होना भी स्त्रियोंके प्रति उनका दृष्टिïकोण बदलनेमें सहायक नहीं है। तब फिर अल्प शिक्षित या अशिक्षित लोगोंसे नारीके सम्मानकी अपेक्षा भला कैसे की जा सकती है?
आशाराम, राम रहीम, नित्यानन्द और चिन्मयानन्द जैसे अनेक धर्माचार्योंपर लगे बलात्कारके आरोपोंसे भी स्त्रियोंके प्रति समाजके दृष्टिïकोणका बहुत हदतक अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसे लोग बड़े-बड़े मंचोंसे प्रवचन देकर समाजका मार्गदर्शन करनेका दावा करते हैं। चिल्ला-चिल्लाकर लोगोंका आह्वान करते हैं कि संसारकी प्रत्येक स्त्रीको माताकी तरह सम्मान देना चाहिए। लेकिन स्वयं नारियोंके प्रति किस तरहका भाव रखते हैं, यह सभीको पता है। जिन नेताओंके कन्धोंपर देशको आगे ले जानेकी जिम्मदारी है, उनमेंसे भी अधिकांश नारियोंके प्रति कलुषित मानसिकताके शिकार हैं। देवियोंको पूजनेवाले देशमें बेटियोंके साथ भेदभाव तथा अत्याचारका सिलसिला आखिर कबतक बन्द होगा?
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उद्वेलित करता अग्निकांडका भयावह मंजर
अवधेश कुमार      
राजधानी दिल्लीके अग्निकांडने पूरे देशको हिला दिया है। अग्निशमन एवं आपदा प्रबंधनकी उच्चतम व्यवस्थाके रहते हुए यदि लोगोंकी जिन्दगी बचाना संभव न हो तो समझा जा सकता है कि पूरी स्थिति कैसी रही होगी। जिन लोगोंने फिल्मिस्तानके अनाज मंडीके उस दुर्भाग्यशाली स्थानको जाकर देखा है वह बता सकते हैं कि वहां काम करनेवालोंकी जिन्दगी हर क्षण जोखिममें थी। जाने-आनेका एक ही दरवाजा, वह भी रातको बाहरसे बंद हो जाय, खिड़कियांतकको ढंक दिया गया हो और अंदर प्लास्टिक, चमड़े आदिकी सामग्रियां हो तो आग लगनेके बाद क्या स्थिति हो सकती है। कोई जगह ही नहीं थी जिससे अंदर फंसे लोग निकल भागते। गलियां इतनी संकरीकी दमकलकी गाडिय़ोंका पहुुंचना मुश्किल। उस दृश्यकी कल्पनासे ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि अन्दर फंसे लोग बचाओ-बचाओ कर रहे हों, स्थानीय लोग उनको बचाना भी चाहते हों परन्तु उनके पास फंसे लोगोंको जलते देखनेके अलावा कोई चारा ही नहीं था। अग्निशमन विभागके कर्मी भी किस तरह मोबाइलकी रौशनीसे बाहरके ग्रिलको काटकर अंदर घुसे वह भी हमारे सामने है। जितने लोग बचाये जा सके वह इन कर्मियोंकी बहादुरीके कारण।
ठीक है कि दिल्ली सरकार, दिल्ली प्रदेश भाजपा, अन्य राज्य सरकारों सबने मृतकोंके परिजनोंके लिए सहायता राशि घोषित की है। यह एक न्यूनतम जिम्मेदारी है जो कि सरकारें पालन कर रही है लेकिन प्रश्न है इस तरहकी नौबत आयी ही क्यों। इस समय घटनाका अत्यंत ही सरलीकरण किया जा रहा है। एक सामान्य प्रतिक्रिया है कि फैक्टरी अवैध थी, उसके बारेमें सरकारको पता नहीं था इसलिए जो कुछ उसपर कानूनी पाबंदी लागू होनी चाहिए, नहीं हो पायी। यदि राजधानी दिल्लीका सर्वे किया जाय तो लाखों मकानोंमें ऐसे छोटे-छोटे कामकाज, फैक्टरियां जो भी कहें व्यवसाय हो रहा है। उनका कोई निबंधन नहीं और जब निबंधन ही नहीं है तो फिर जो कानूनी अर्हताएं हैं उनकी पूर्तिका सवाल कहांसे पैदा होता है। जिस अनाज मंडीमें इतनी बड़ी त्रासदी हुई है वहां गली-गलीमें इस तरहके अनेक कारोबार और फैक्टरियां चल रही हैं। स्थानीय पुलिसको पता है। वहांके वार्डके सदस्य, विधायकको जानकारी है। यह नहीं कहा जा सकता कि कोई भी काम छिपाकर किया जा रहा था। यह केवल दिल्लीकी ही बात नहीं है। पूरे देशमें इसी तरह छोटी-छोटी फैक्टरियां, उद्योग, कारोबार आदि चल रहे हैं। ध्यान रखनेकी बात यह भी है कि बहुत छोटी पूंजी लगाकर दस-बीस मजदूरोंको लेकर जो काम शुरू करता है उनमेंसे ज्यादातरको पता ही नहीं होता कि वह जो कर रहा है गैरकानूनी है। सबको रोजगार चाहिए रोजी-रोटी चाहिए। जिसके हाथमें जो विधा है उसके अनुसार कोई कारोबार खड़ा करता है। अनाज मंडीमें भी ऐसा ही था। उसमें कुछ प्लास्टिकके खिलौने बन रहे थे, कुछ पैकेजिंगका काम हो रहा था।
दुर्भाग्यशाली मकानमें जो मजदूरोंकी दशा देखकर छाती पीटनेवाले जरा मजबूर व्यावहारिकताको समझें। मजदूरोंके खाने-पीने, सोनेकी व्यवस्था भी वहीं थी। एक-एक कमरेमें २०-२५ लोग रह रहे हैं और वही काम भी कर रहे हैं तो वहांकी स्थितिका अंदाजा लगाया जा सकता है। जो बाहरसे रोजगारके लिए दिल्ली आता है उसके लिए आश्रय स्थल है। एक मजदूरके लिए दिल्ली जैसे शहरमें किरायेका कमरा लेना और उसका खर्च वहन करना आसान नहीं। कमाईका बड़ा हिस्सा कमरेके किराये और आवागमनमें खर्च हो जायगा। कोई किसीसे काम मांगने जाता है तो यह नहीं पूछता कि आपकी फैक्टरी उद्योग या जो कारोबार है वह वैध है या अवैध। जिसको रोजगार मिल गया उसके लिए तो मुंह मांगी मुरीदके समान है। वह अपना पेट पाले, अपने परिवारका पालन करें कि वैध और अवैध देखें। अवैध कारखाने, उद्योग, कारोबार चल रहे हैं उनके लिए जिम्मेदार कौन है। इस समय उस फैक्टरीका मालिक और मैनेजर गिरफ्तार है। उसपर मुकदमा चलेगा। लेकिन क्या यही पर्याप्त है। सवाल है कि स्थानीय थानेका जो थानेदार है उसको जिम्मेदार क्यों नहीं माना जाय। जो नगर पालिका परिषद है उसके अधिकारी जिम्मेदार क्यों नहीं हो सकते। जो स्थानीय सरकारी इंजीनियर हैं, जो खुलेआम घूस लेकर जहां दो मंजिल मकान बनना चाहिए वहां चारसे सात मंजिल मकान बनवाया उसको क्यों नहीं गिरफ्तार करना चाहिए। अग्निकांडमें अपना सब कुछ गंवा देनेवाला मालिक अरबपति नहीं है। बहुत छोटी पूंजीसे और ज्यादातर अपने ही क्षेत्रके मजदूरोंको साथमें लेकर कारोबार कर रहा था। लेकिन हम केवल उसे ही दोषी मान ले और प्रशासनको बरी कर दें तो इस समस्याका हल नहीं हो सकता।
जाहिर है इसके लिए जितने भी जिम्मेदार अधिकारी हैं वह चाहे किसी विभागके हों उनपर हर हालमें मुकदमा चलाया जाना चाहिए, ताकि दूसरे इससे सीख लेकर अपने चरित्र और व्यवहारमें बदलाव लायें। दिल्लीमें लंबे समयसे सुना जा रहा है कि आवासोंमें चलनेवाली फैक्टरियंोंको बवाना औद्योगिक क्षेत्रमें शिफ्ट किया जायगा। प्रश्न है कि इतने वर्षोंमें क्यों नहीं हुआ। सच यह है कि जितने कारोबार चल रहें है उन सबको शिफ्ट करना संभव ही नहीं। वैसे भी कोई व्यक्ति अपने घरके दो कमरेमें कोई छोटा कारोबार शुरू कर देता है और उसके पास कोई रजिस्ट्रेशन नहीं है तो उसका क्या करेंगे। कुछ लोग किसी मूल कम्पनीकी कुछ उपकरणों या सामग्रियोंका निर्माण कर रहे हैं। उसका जीवनयापन उससे चलता है। तात्पर्य यह कि समस्या काफी जटिल है। इसके समाधानके लिए मानवीय एवं कानूनी दोनों पहलुओंके बीच संतुलन स्थापित करना होगा। कौनसे काम कहां-कहां चल रहे हैं उनकी सम्पूर्ण सूची बनानी पड़ेगी। उस सूचीके आधारपर किनको शिफ्ट किया जा सकता है कि किनको रहने देना है इसका निर्णय करना पड़ेगा। क्या इसके लिए हमारे नेता और अधिकारी तैयार हैं।
कायदेसे तो दिल्लीकी सेटेलाइट मैपिंग होनी चाहिए जिससे पता चले कि कहां क्या-क्या कारोबार हो रहा है। हर मोहल्लेका सर्वे होना चाहिए जिससे पूरा विवरण सामने आ सके। उसके बाद केन्द्र सरकार, दिल्ली सरकार और संबंधित विभागोंके अधिकारी बैठकर एक दूरगामी योजना बनायें और उस योजनाके अनुसार आगे बढ़ा जाय तो समस्याका कुछ निदान हो सकता है। अनेक विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ कारोबार रिहायशी इलाकोंमें चलाये जा सकते हैं। घरेलू उद्योग ही नहीं ऐसे कई कारोबार या निर्माण कारखाना, जिससे पर्यावरणको बहुत ज्यादा नुकसान नहीं है उनको चलाते रहनेकी अनुमति दी जा सकती है। सरकार योजना बनाकर काम करें तो जहां प्रवेशके ऐसे रास्ते नहीं है कि दुर्घटनामें अग्निशमन और दमकल विभाग पहुंच सके वहां रास्ता बनाया जाय। इसके लिए बाधा बननेवाले घरोंके हिस्सेको तोड़ दिया जाय। अन्य न्यूनतम आधारभूत संरचनाओंकी व्यवस्था आसानीसे हो सकती है। केवल गहरी समझ एवं राजनीतिक इच्छाशक्तिकी आवश्यकता है।
दुर्भाग्य है कि जब भी ऐसी घटना होती है आनन-फाननमें कुछ कदम उठाये जाते हैं, गिरफ्तारियां होती हैं, कुछ फैक्टरियों, कारोबारोंको गैरकानूनी बताकर सील किया जाता है और फिर सब कुछ भूल जाते हैं। दिल्लीमें ही पिछले फरवरीमें करोलबागके एक होटलमें आग लगी। उसके पास अग्निशमन विभागका अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं था। उस उस घटनाके बाद ३५ होटलोंको सील कर दिया गया। ३५ होटल बंद होनेका मतलब है, कमसे कम ३००० से ज्यादा लोग लोगोंका रोजगार छिन जाना, पर्यटकोंके लिए कठिनाइयां बढ़ाना। क्या यही एक रास्ता था। क्या उन होटल मालिकोंके साथ बैठकर जो कानूनी जरूरत है उनको पूरी कराकर उनमेंसे जो चलाये जा सकते हैं उनको चलानेकी व्यवस्था नहीं की जा सकती। सच कहा जाय तो वर्तमान अग्निकांडकी त्रासदी हमसे इस समस्याके संदर्भमें सम्पूर्ण एप्रोच बदलनेकी मांग कर रही है।