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समय और सफलता

हर व्यक्तिकी अपनी सोच होती है। वह उसीके अनुसार कार्य करता है लेकिन कभी-कभी ऐसे अवसर भी आते हैं जब व्यक्तिकी सोचके अनुरूप कार्य नहीं हो पाता और वह असफज हो  जाता है। इसमें सबसे बड़ा हाथ है समय और परिस्थितियोंका। जो व्यक्ति उपयुक्त समयमें कार्य करता है आगे चलकर परिस्थितियां उसके अनुरूप बन जाती हैं। कार्य शुरू करनेसे पहले समयका आकलन आवश्यक है। हममेंसे बहुतसे लोग कभी-कभी अपने कार्यमें सफलता प्राप्त करके ऊंची उड़ान भरते हुए आकाश छूने लगते हैं। ऐसेमें उन्हें यह ध्यान नहीं रहता कि नीचे पृथ्वी भी है। नीचे धरती होनेका अहसास जिन्हें होता है वही व्यक्ति इतिहास-पुरुष बनते हैं, क्योंकि जिसने नीचे धरतीको आधार न बनाया वह अपनी उड़ानसे थककर नीचे धड़ामसे गिरेगा। ऐसे व्यक्तिको इतिहास खारिज कर देता है। वास्तविकता यह है कि उड़ान नीचेसे ऊपरकी ओर भरी जाती है तो जिस धरतीसे आप ऊपर उड़ते हैं, वह धरती आपका आधार है और थकनेपर उसी प्लेटफार्मपर आपको उतरना है। इसका ध्यान रखना आवश्यक है। जो लोग मानसिक रूपसे इस बातका अनुभव करते हैं वह नीचे सकुशल उतर आते हैं। यह बात जग-जाहिर है कि जो समयको अपने अनुकूल बनाकर अपने कार्यका शुभारम्भ करते हैं, वह निश्चित रूपसे सफलता प्राप्त करते हैं। व्यक्तिको समयके साथ अपने मनको अभय भी करना पड़ता है। असल बात यह है कि जबतक आपके अन्दर भय बना हुआ है, तबतक आप सफलता प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि यह भय हमें उड़ान नहीं भरने देता। कार्य करनेके पहले नाना प्रकारके संशयोंसे अपनेको ग्रस्त करना उचित नहीं है। यह भय और संशय हमें डराते हैं और कदम-कदमपर हमारा उत्साह भंग करते हैं। अत: यह आवश्यक है कि हम जो भी कार्य आरम्भ करें उसे निभर्य मनसे करें और यह देख लें कि समय उपयुक्त है अथवा नहीं। यहां समय एवं अवसर दो चीजें हैं। व्यक्तिको अवसर कभी-कभी मिलता है और समय हर समय उपलब्ध है। देखना यह है कि सबसे अच्छा समय कब मिल रहा है। उसीका मनमें आकलन और अनुमान करके कार्य शुरू कर दें तो अवश्य ही सफलता मिलेगी। मनमें हर समय असफलताका विचार करना किसी भी स्थितिमें अच्छा नहीं होता। असफलताका चिन्तन हमें निराश करता है। हमारे मनमें हताशा भरता है। अत: कार्य शुरू करें उपयुक्त समयपर और ऊपर पहुंचकर नीचे धरतीका ध्यान भी रखें। अन्तत: उतरना तो इसी धरतीपर है, वह भी सकुशल और सुरक्षित।
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लोक संवाद

मौसमकी मारसे बेहाल हिमालयी राज्य


महोदय,- भारतके हिमालयी राज्योंमें असम और मिजोरम जलवायु परिवर्तनके प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं। पोलैंडके कॉप २४ जलवायु सम्मेलनमें भारतीय वैज्ञानिकोंकी टीमने एक अध्ययन रिपोर्टमें इसकी जानकारी दी है। पोलैंडमें आयोजित कॉप २४ जलवायु सम्मेलनमें यह रिपोर्ट पेश की गयी। इसके लिए वैज्ञानिकोंकी टीमने पूर्व एवं पश्चिममें स्थित १२ हिमालयी राज्योंका विभिन्न मानकोंके आधारपर अध्ययन किया है। टीममें इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस (आईआईएससी), बंगलुरूके अलावा भारतीय तकनीकी संस्थान (आईआईटी), मंडी और आईआईटी गुवाहाटीके विशेषज्ञ शामिल थे। ऐसे संवेदनशील राज्योंकी सूचीमें जम्मू-कश्मीर तीसरे नंबरपर है। रिपोर्टमें कहा गया है कि अपनी भौगोलिक स्थितिकी वजहसे असम सबसे ज्यादा संवेदनशील है। इसकी वजह यह है कि असम राज्यमें बहुत कम जमीन सिंचाईके दायरेमें है। इसके अलावा प्रति एक हजार ग्रामीण घरोंपर जंगलका अनुपात भी यहां सबसे कम है। असममें सौ दिनोंकी रोजगार गारंटी योजना मनरेगाकी पहुंच भी बहुत कम है। इसी तरह मिजोरमका लगभग ३० फीसदी इलाका ढलवां होनेके कारण राज्यमें जलवायु परिवर्तनका असर ज्यादा होनेका अंदेशा है। ऐसे इलाके भूस्खलनके प्रति काफी संवेदनशील होते हैं। इसका नुकसान आम लोगोंको झेलना पड़ता है। यह अध्ययन जलवायु परिवर्तनकी वजहसे होनेवाले बदलावोंके अनुरूप खुदको ढालनेके लिए अहम मानकों मसलन सिंचाईवाली जमीनके क्षेत्रफल, प्रति व्यक्ति आय, फसल बीमाकी पहुंच, जंगल इलाके और ढलवां जमीनके आधारपर किया गया। यह आंकड़े जनगणना एवं दूसरे सरकारी रिकार्डसे लिये गये। रिपोर्टमें कहा गया है कि पहाड़ी राज्य होनेके बावजूद सिक्किम जलवायु परिवर्तनके प्रति सबसे कम संवेदनशील है। इसकी वजह वहांके घने जंगल, आबादीका घनत्व कम होना और प्रति व्यक्ति आय बाकी राज्योंके मुकाबले ज्यादा होना है। आईआईएससी, बंगलुरूमें सेंटर फॉर सस्टेनेबल टेक्नॉलजीमें प्रोफेसर एन.एच. रवींद्रनाथने जलवायु सम्मेलनमें रिपोर्ट पेश करते हुए कहा, संवेदनशील राज्योंकी इस रैंकिंगसे केंद्र एवं संबंधित राज्य सरकारोंको जलवायु परिवर्तनसे होनेवाले बदलावोंसे निबटनेकी कारगर रणनीति बनानेमें सहायता मिलेगी। इससे केंद्र सरकार ज्यादा संवेदनशील राज्यों और उनके सबसे ज्यादा संवेदनशील जिलोंकी शिनाख्त कर प्राथमिकताके आधारपर ठोस कदम उठा सकती है। असम अपनी भौगोलिक स्थितिके अलावा बदहाल आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियोंकी वजहसे भी ज्यादा संवेदनशील माना गया है। यहां जलवायु परिवर्तनके चलते बार-बार आनेवाली बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाका मुकाबला करनेमें लोग सक्षम नहीं हैं। बीते कुछ वर्षोंके दौरान राज्यको कई बार बाढ़ और सूखे जैसे हालातोंका सामना करना पड़ा है। जलवायु परिवर्तनकी वजहसे इन प्राकृतिक विपदाओंकी गंभीरता बढ़ी है। स्टेट एक्शन प्लान फॉर क्लाइमेट चेंजकी रिपोर्टमें कहा गया है कि बीते ६० सालों (वर्ष १९५१ से २०१०) के दौरान राज्यमें सालाना औसत तापमान ०.५९ डिग्री सेल्सियस बढ़ा है और वर्ष २०५० तक इसमें १.७ से २.२ डिग्री सेल्सियसतक बढ़ोतरीका अंदेशा है। औसतन सालाना बारिशमें भी ३८ फीसदी वृद्धि हो सकती है। इसके अलावा वर्ष २०५० तक राज्यमें चायकी पैदावार भी लगभग ४० फीसदी घट जायगी। राज्यकी ३२ फीसदी आबादी गरीबी रेखासे नीचे रहती है। इसमेंसे भी ज्यादातर लोग अपनी आजीविकाके लिए मौसमकी अनुकूलतापर निर्भर हैं। ऐसेमें मौसममें बदलावकी वजहसे आनेवाली आपदाओंसे उनको बचाना बेहद मुश्किल है। ब्रह्मïपुत्रमें स्थित दुनियाका सबसे बड़ा नदी द्वीप माजुली जलवायु परिवर्तनकी मारकी सबसे बड़ी मिसाल है। बार-बार आनेवाली बाढ़की वजहसे इसका क्षेत्रफल साल-दर-साल सिकुड़ता जा रहा है। बारिशके पैटर्नमें बदलाव, सूखे और बाढ़की मारकी वजहसे इस द्वीपसे हालके वर्षोंमें रोजी-रोटीकी तलाशमें लोगोंका पलायन तेज हुआ है। -प्रभाकर, कोलकाता।