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विवेककी ओर

बीज जब टूटता है और अपने अंकुरको सूर्यकी तलाशमें भूमिके ऊपर भेजता है तो जैसी उथल-पुथल उसके भीतर होती है वैसी ही उथल-पुथलका सामना हम भी कर रहे हैं। इसमें घबराने और चिंतित होनेका कोई भी कारण नहीं है। यह अराजकता संक्रमणकालीन है। इसके भयसे पीछे लौटनेकी वृत्ति आत्मघाती है। फिर पीछे लौटना तो कभी संभव नहीं है। जीवन आगेकी ओर ही जाता है। जैसे सुबह होनेके पूर्व अंधकार और भी घना हो जाता है, ऐसे ही नयेके जन्मके पूर्व अराजकताकी पीड़ा भी बहुत सघन हो जाती है। हमारी चेतनामें हो रही इस सारी उथल-पुथल, अराजकता, क्रांति और नयेके जन्मकी संभावनाका केंद्र और आधार विज्ञान है। विज्ञानके आलोकने हमारी आंखें खोल दी हैं और हमारी नींद तोड़ दी है। उसने ही हमसे हमारे बहुतसे दीर्घ पोषित स्वप्न छीन लिये हैं और बहुतसे वस्त्रोंने भी हमें स्वयंके समक्ष ही नग्न खड़ा कर दिया हैए जैसे किसी ने हमें झकझोर कर अर्धरात्रि में जगा दिया हो। ऐसे ही विज्ञान ने हमें जगा दिया है। विज्ञान ने मनुष्य का बचपन छीन लिया है और उसे प्रौढ़ता दे दी है। उसकी ही खोजों और निष्पत्तियोंने हमें हमारी परंपरागत और रूढि़बद्ध चिंतनासे मुक्त कर दिया है, जो वस्तुत: चिंतना नहीं, मात्र चिंतनका मिथ्या आभास ही थी, क्योंकि जो विचार स्वतंत्र न हो, वह विचार ही नहीं होता है। सदियोंसे जो अंधविश्वास मकड़ीके जालोंकी भांति घेरे हुए थे उसने उन्हें तोड़ दिया है और यह संभव हो सका है कि मनुष्यका मन विश्वासकी कारासे मुक्त होकर विवेककी ओर अग्रसर हो सके। कलतकके इतिहासको हम विश्वास काल कह सकते हैं। आने वाला समय विवेकका होगा। विश्वाससे विवेकमें आरोहण ही विज्ञानकी सबसे बड़ी देन है। यह विश्वासका परिवर्तन मात्र नहीं है, वरन विश्वाससे मुक्ति है। श्रद्धा तो सदा बदलती रहती हैं। पुराने विश्वासोंकी जगह नये विश्वास जन्म लेते रहे हैं लेकिन आज जो विज्ञानके द्वारा संभव हुआ है, वह बहुत अभिनव है। पुराने विश्वास चले गये हैं और नयेका आगमन नहीं हुआ है। पुरानी श्रद्धाएं टूट गयी हैं और नयीका आविर्भाव नहीं हुआ है। यह रिक्तता अभूतपूर्व है। श्रद्धा बदली नहीं, शून्य हो गयी है। श्रद्धा शून्य तथा विश्वास शून्य चेतनाका जन्म हुआ है। विश्वास बदल जायं तो कोई मौलिक भेद नहीं पड़ता है। एककी जगह दूसरे आ जाते हैं। अर्थीको ले जाते समय जैसे लोग कंधा बदल लेते हैं, वैसा ही यह परिवर्तन है। विश्वासकी वृत्ति तो बनी ही रहती है। जबकि विश्वासकी विषय वस्तु नहीं, विज्ञानने विश्वासको नहीं बदला है, उसने तो उसकी वृत्तिको ही तोड़ डाला है। विश्वास वृत्ति ही अंधानुगमनमें ले जाती है और वही पक्षपातोंके चित्तको बांधती है। जो चित्त पक्षपातसे बंधा हो, वह सत्यको नहीं जान सकता है। जाननेके लिए निष्पक्ष होना आवश्यक है। वह मानना ही उसका बंधन बन जाता है जबकि सत्यके साक्षातके लिए चेतनाका मुक्त होना आवश्यक है। विवेक ही सत्यके द्वारतक ले जानेमें समर्थ है और विवेकके जागरणमें विश्वाससे बड़ी और कोई बाधा नहीं है। यह स्मरणीय है कि जो व्यक्ति विश्वास कर लेता है, वह कभी खोजता नहीं। खोज तो संदेहसे होती है श्रद्धासे नहीं। समस्त ज्ञानका जन्म संदेहसे होता है।
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 लोक संवाद
बढ़ती जनसंख्या, घटते रोजगार

महोदय,- बढ़ती जनसंख्यासे समस्या उत्पन्न हो रही है। न ही लोगोंको रोजगार मिल रहा है, न रोटी-कपड़ेकी व्यवस्था हो पा रही है। हालमें रोजगारके लिए रेलवेमें ९० हजार पदोंके लिए आवेदन आये, जिसमेंसे दो करोड़से अधिक आवेदन कर चुके हैं, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि देशमें कितनी बेरोजगारी है। देशमें बढ़ती आबादीपर सरकारको रोक लगाने चाहिए, क्योंकि आये दिन शिक्षा जैसे बहुमुखी क्षेत्रपर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ रहा हैं। यदि जनसंख्या निवारणपर सरकार अभीसे ध्यान नही दिया तो देश विकराल रूप धारण कर लेगा, देशकी अर्थव्यवस्थापर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा। देशमें डिजिटल इंडिया न्यू इंडिया जैसे मुद्देपर केवल बात होती है। वहीं गरीब भूखे रहनेके लिए विवश है। सबसे पहले सरकारको इन महत्वपूर्ण समस्याओंका निवारण करना होगा। तभी देश खुशहाल हो सकेगा। -राहुल उपाध्याय, बलिया।