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पुरुषोत्तम मासकी महिमा

 पुरुषोत्तममासकी शुरुआत होचुकी है। पुरुषोत्तममासमें भगवान विष्णुकी पूजाकरनेसे सभी प्रकारकीमनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।हिन्दू धर्ममें इस माहकाविशेष महत्व है।माना जाता हैकि अधिकमासमें कियेगये धार्मिक कार्योंकाकिसी भी अन्यमाहमें किये गयेपूजा-पाठसे दसगुना अधिक फलमिलता है। यहीवजह है किश्रद्धालु अपनी पूरीश्रद्धाके साथ भगवानकोप्रसन्न कर अपनाइहलोक तथा परलोकसुधारनेमें जुट जातेहैं। अधिक मासमेंकुछ खास नियमभी बताये गयेहैं। इन नियमोंकापालन करनेसे भगवानविष्णुका आर्शाीवाद प्राप्त होताहै। अधिकमासके अधिपतिस्वामी भगवान विष्णु मानेजाते हैं। पुरुषोत्तमभगवान विष्णुका हीएक नाम है।इसीलिए अधिकमासको पुरुषोत्तम मासकेनामसे भी जानाजाता है। इसविषयमें एक बड़ीही रोचक कथापुराणोंमें पढऩेको मिलती है।कहा जाता हैकि भारतीय मनीषियोंनेअपनी गणना पद्धतिसेहर चंद्र मासकेलिए एक देवतानिर्धारित किये। हालांकि अधिकमाससूर्य और चंद्रमासके बीच संतुलनबनानेके लिए प्रकटहुआ तो इसअतिरिक्त मासका अधिपति बननेकेलिए कोई देवतातैयार नहीं हुए।ऐसेमें ऋषि-मुनियोंनेभगवान विष्णुसे आग्रहकिया कि वहही इस मासकाभार अपने ऊपरलें। भगवान विष्णुनेइस आग्रहको स्वीकारकर लिया औरइस तरह यहपुरुषोत्तम मास बनगया। अधिकमासमें विवाहआदि शुभ कार्योंपरपांबदी होती है।अधिक मासमें नयाव्यवसाय आरंभ करनेसेआर्थिक परेशानियां मिलती हैं।इस अवधिमें कियेगये कार्योंके मंगलपरिणाम नहीं आतेहैं। इसलिए अधिकमासमेंमुंडन और कर्णवेधया गृह प्रवेशनहीं करना चाहिए।इस अवधिमें कोईभी संपत्तिका क्रयया फिर विक्रयनहीं करना चाहिए।ऐसी संपत्ति भविष्यमेंआपका नुकसान करवादेती है। इसमाहमें व्रत, दान, पूजा,हवन, ध्यान करनेसेपाप कर्म समाप्तहो जाते हैंऔर किये गयेपुण्योंका फल कईगुणा प्राप्त होताहै। देवी भागवतपुराणके अनुसार मलमासमें कियेगये सभी शुभकर्मोंका अनंत गुनाफल प्राप्त होताहै। इस माहमेंभागवत कथा श्रवणकाभी विशेष महत्वहै। पुरुषोत्तम मासमेंतीर्थ स्थलोंपर स्नानकाभी महत्व है।दानका विशेष महत्वबताया गया है।इसमें दीपदान करनाशुभ माना गयाहै। इसके अतिरिक्तधार्मिक पुस्तकोंका दान भीशुभ बताया गयाहै। अधिक मासकेप्रथम दिन प्रतिपदातिथि है इसदिन घीका दानश्रेष्ठ फलदायी बताया गयाहै।

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लोकसंवाद

विकसितदेश अमेरिका

महोदय,-अमेरिका दुनियाका सबसे विकसितदेश माना जाताहै। अमेरिकाके शस्त्रबलकीबराबरी काफी हदतकयदि कोई देशकर सकता हैतो वह हैरूस और उसकेप्रभाववाले सभी छोटेराष्ट्र। अमेरिकाको विस्तारसे कुछइस तरह समझाजा सकता है।उत्तर अमेरिका, मध्यअमेरिका, दक्षिण अमेरिका। उत्तरीअमेरिकाके देश समूह-इसमें यूनाइटेड स्टेट,कनाडा, मैक्सिको और ग्रीनलैण्डमिलकर उत्तरी अमेरिकाकेरूपमें जाने जातेहैं। कनाड़ा औरयूनाइटेड स्टेट दोनों हीलोकतान्त्रिक देश हैं।मैक्सिकोकी सरकार रिपब्लिकन औरडेमोक्रेटिक दोनों मिला-जुलास्वरूप है। ग्रीनलैण्डकीजनसंख्या बहुत हीकम है फिरभी इसका सामरिकमहत्व बहुत ज्यादाहै। मध्य अमेरिकाकासमूह- इसमें सेण्ट्रलअमेरिका, वेस्टइण्डीज द्वीप है।सेण्ट्रल अमेरिकाके अन्दर बेलीजे,कोस्टारिका, एडसेल्वेडोर, ग्वाटरमाल, हण्डूरा, निकारागुआऔर पनामा है।जो नार्थ-साउथअमेरिकाको जोड़ते हैं। दक्षिणअमेरिकामें अर्जेण्टीना, बोल्विया, ब्राजील, कोलम्बिया,एक्वाडोर, गाइना, परागुवे, पेरू,उरुग्वे, वेनेजुएला, सूरीनाम औरफ्रेंचगाइना आते हैं।आमेजन बहुत हदतकसुरक्षा प्रदान करती हैं।इस क्षेत्रकी प्राकृतिकसम्पदाका दोहन बहुतही कम होपाया है। अत:भविष्यमें इसके प्राकृतिकसम्पदाके लिए संघर्षभी हो सकतेहैं। सबसे बड़ाखतरा इसके लिएसोवियत रूस औरउसके सहायक राष्ट्रहैं। यूनाइटेड स्टेटऔर मैक्सिको दोनोंही अमेरिकी स्टेटआर्गनाइजेशनके सदस्य हैं। यूनाइटेडस्टेट और कनाडा,नार्थ अटलांटिक ट्रीनीआर्गनाइजेशनके सदस्य हैं। यूनाइटेडस्टेटकी मैक्सिको तथा कनाड़ाकेसाथ कोई भीद्विपक्षीय संधि नहींहै। प्रथम विश्वयुद्धके दौरान और पहलेनार्थ अमेरिका औरकनाडामें कोई युद्धया गृहयुद्ध १९१७के पहले नहींहुआ था। द्वितीयविश्वयुद्धके बाद तोबर्लिन-कोरियावार, दक्षिण वियतनामसेमदद कपुवा मिसाइलक्राइसिस प्रमुख है। डोमिनिकन-सिविल वार १९६४तथा १९६७-६८में एल सेल्वेडोरतथा हण्डरामें दोनोंदेशोंके सीमापर युद्ध हुएऔर सैन्य टेक्योरपनामामें हुआ। हण्डूरामेंसैन्य सत्ता द्वाराअधिग्रहण १९१२ मेंतथा गुरिल्ला औरसिविल वार निकरागुआमेंअपना बड़ा भारीमहत्व रखते हैं।१९७९ में ग्रेनेडामेंसेना द्वारा राजनीतिकसत्ताका अधिग्रहण एक चकितकरनेवाली घटना थी।आर्गनाइजेशन आफ अमेरिकास्टेट (ओएसए) इण्टर अमेरिकनडिफेंस बोर्ड, (आईएडीबी) आर्गेनाइजेशनआफ लैटिन अमेरिकाइकोनामिक सिस्टम (एसईएलए) भीअपना महत्व रखतेहैं। उत्तरी अमेरिका,मध्य अमेरिका तथादक्षिण अमेरिका आज पूरेविश्वमें अपनी ताकत,सैन्य बल नौसैन्यबल, हवाई सैन्यबलके साथ पैरामिलिटरीबल तथा पुलिसबलके अलावा परमाणुशक्ति बल तथाबैलिस्टिक मिसाइलोंकी ताकतसे अपनेआपको दुनियाकी सबसेबड़ी ताकत समझतेहैं। लेकिन इसतथ्यको रूस क्या,चीनके और दक्षिणकोरिया माननेके लिए तैयारनहीं हैं। रूसआज जिस स्थितिमेंपहुंचा है इसमेंवर्तमान रूसी राष्टï्रपति पुतिन सभीकेनेतृत्व क्षमताका परिणाम है।उपरोक्त तमाम नेताओंनेअपने उदाहरणीय नेतृत्वद्वारा सोवियत संघकी जनताकासहयोग, विश्वास, सबका विकाससभी सदस्य देशोंकीसम्प्रभुताका आदर-सम्मान,सुरक्षा आदिको सबसे आगेरखा है। इन्हींमूलभूत आधारोंको आगे रखकरसभी देशोंको चलायाऔर विकसित कियाहै। देशोंकी अखण्डताऔर एकता सबकोएक साथ जोड़ेरखनेका महामंत्र बना हुआहै। चेकोस्लोवाकियाका सैन्यअधिग्रहण १९६८ मेंहुआ जो सोवियतपेालितब्यूरोकी सैन्य नीतिके झलककोभी जाहिर करताहै। यह काललिबोनाइड ब्रिजनोवके नेतृत्वकालकी घटनाथी। इस नीतिकोब्रिजनोव डाक्ट्रिनके नामसे भीजाना जाता है।१९७८-७९ कीबात है किसोवियत यूनियन अफगानिस्तानमें दखलअन्दाजीकरने लगा जिसकेप्रमुख दो कारणथे। पहला, कम्युनिस्टोंकेखिलाफ स्थानीय गोरिल्लाओंकाबढ़ता प्रभाव। दूसरा,सैन्य बलको इतनाबढ़ाना, जिससे ईरान औरपाकिस्तानको प्रभावित किया जासके। यूनियन आफसोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक एककम्युनिस्ट देश है।-मेजर (रि.) ओंकारनाथदूबे, वाराणसी।