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समुचित आहार

जिसका आहार, विहार, विचार एवं व्यवहार संयमित है, जिसके कार्योंमें दिव्यता, मनमें सदा पवित्रता एवं शुभके प्रति अभीप्सा है, जिसका शयन एवं जागरण नियमित है, वही सच्चा योगी है। आहारसे व्यक्तिके शरीरका निर्माण होता है। आहारका शरीरपर ही नहीं, मनपर भी पूरा प्रभाव पड़ता है। छान्दोग्योपनिषद्में कहा गया है-
आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि: सत्त्वशुद्धौ धु्रवा स्मृति:॥
स्मृतिलब्धे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्ष:॥
आहारके विषयमें महर्षि चरकका एक दृष्टांत बहुत ही सुंदर है। एक बार महर्षि चरकने अपने शिष्योंसे पूछा, कोऽरुक, कोऽरुक, कोऽरुक्ï। कौन रोगी नहीं, अर्थात् स्वस्थ कौन है। महर्षिके प्रबुद्ध शिष्य वाग्भटने उत्तर दिया, हितभुक्ï, मितभुक्ï, ऋतुभक्ï। हितकारी, उचित मात्रा एवं ऋतुके अनुकूल भोजन करनेवाला स्वस्थ है। अपनी प्रकृति (वात, पित्त, कफ) को जानकर उसके अनुसार भोजन लें। यदि वात प्रकृति है, शरीरमें वायु विकार होते हैं तो चावल आदि वायुकारक एवं खट्टे भोजनका त्याग कर देना चाहिए। छोटी पिप्पली, सोंठ, अदरक आदिका प्रयोग करते रहना चाहिए। पित्त प्रकृतिवालेको गर्म, तले हुए पदार्थ नहीं लेने चाहिए। घी, खीरा, ककड़ी आदि कच्चा भोजन लाभदायक होता है। कफ प्रकृतिवालेको ठंडी चीजें चावल, दही, छाछ आदिका सेवन अति मात्रामें नहीं करना चाहिए। दूधमें छोटी पिप्पली, हल्दी आदि डालकर सेवन करना चाहिए। उचित मात्रामें भोजन लेना चाहिए। आमाशयका आधा भाग अन्नके लिएए चतुर्थांश पेय पदार्थोंके लिए रखते हुए शेष भाग वायुके लिए छोडऩा उचित है। ऋतु के अनुसार पदार्थोंका मेल करके सेवन करनेसे रोग पास नहीं आते। भोजनका समय निश्चित होना चाहिए। असमयपर किया हुआ भोजन अपचन करके रोग उत्पन्न करता है। चबाकर भोजन करनेसे हिंसा भावकी भी निवृत्ति होती है, क्योंकि हम सब जानते हैं कि जब क्रध आता है, तब व्यक्ति दांत पीसने लगता है, अर्थात्ï क्रोधका उद्गम स्थान दांत है। यदि हम हिंसाभावको समाप्त करना चाहते हैं तो हमें चबानेपर विशेष ध्यान देना चाहिए। एक श्लोक है जिसका तात्पर्य है-जो प्रात:काल उठकर जलपान करता है, रात्रिको भोजनोपरान्त दुग्धपान तथा मध्याह्नमें भोजनके बाद छाछ पीता है उसे वैद्यकी आवश्यकता नहीं होती। अर्थात्ï वह व्यक्ति निरोग रहता है। इसके साथ भोजनमें खनिज, लवण एवं विटामिन बी भरपूर होने चाहिए। निद्रा अपने-आपमें पूर्ण सुखद अनुभूति है। बालक एवं वृद्धके लिए आठ घण्टे सोना उचित है।
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लोक संवाद
अनावश्यक है शिक्षकोंको बुलाना
महोदय,- महोदय, एक तरफ देशके प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी देशकी जनता बार-बार आग्रह करते रहते हैं कि जब जरूरी कार्य हो तभी अपने घरसे बाहर निकलें। ऐसेमें यदि कोरोना वायरसके प्रति जरा-सी लापरवाही पूरे समाजके लिए संकटकी स्थिति पैदा कर सकती है। भारतमें इस समय कोरोनाकी रफ्तार अपने चरमपर है। अनुमान लगाया जा रहा है कि आनेवाले समयमें यह और तेजीसे बढग़ा। बात करें उत्तर प्रदेशकी तो यहां कोरोना वायरसकी रफ्तार आसमान छू रही है और अब यह राज्य भारतका पांचवा सबसे अधिक कोरोना संक्रमित राज्य बन चुका है। यहां अबतक २३ हजारके करीब कोरोना पीडि़त हैं और यह आंकड़ा बहुत तेजीसे बढ़ रहा है। अब इस संकटकी स्थितिको देखते हुए केंद्र सरकारने अनलॉक-२ में भी स्कूल-कालेज न खोलनेका फैसला लिया है, ताकि यह संक्रमण और न फैल सके। परंतु उत्तर प्रदेशमें बेसिक तथा माध्यमिक शिक्षकों और कर्मचारियोंको बुलानेका फैसला लिया है। बेसिकके शिक्षक १ जुलाईसे तथा माध्यमिकके शिक्षक ६ जुलाईसे विद्यालयोंमें बुलाये जानेकी तारीख निर्धारित की गयी। यह फैसला उत्तर प्रदेशके मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथकी अध्यक्षतामें लिया गया है। अब सवाल यह है कि जब केन्द्र सरकारने कोरोना वायरसके संक्रमणके खतरेको ध्यानमें रखते हुए सभी स्कूल-कालेजोंको ३१ जुलाईतक बन्द कर दिया है ऐसेमें क्या शिक्षकोंको बुलाना जायज है। एक तरफ जहां भारतमें कोरोना वायरसके मरीज प्रतिदिन बीस हजारके करीब आने लगे हैं और अब तो यह और तेजीसे फैल रहा है। गौर करनेवाली बात यह है कि देशके कोरोना वारियर्स जैसे कि डाक्टर, सेनाके जवान, पुलिस आदि यह सभी कोरोनासे संक्रमित हो चुके हैं। इन सभीको कोरोना वायरस इसी वजहसे हुआ, ताकि बाकी लोगोंकी जान बची रहे। परन्तु अभीतक शिक्षक वर्गमें कोरोना वायरसका प्रभाव नहीं पड़ सका है क्योंकि स्कूल-कालेज बन्द थे और शिक्षकोंको बुलाया भी नहीं गया था जिससे यह वर्ग इस जानलेवा वायरससे अछूता है। अब जब विद्यालय बन्द पड़े हैं, नया सत्र शुरू हुआ नहीं है और छात्र भी नही हैं इसके साथ ही कोरोनाकी रफ्तार भी तेजीसे बढ़ रही है तो इन सभी परिस्थितिको  देखते हुए शिक्षकों बुलाना सही होगा, यह सोचने योग्य है। हां यह हो सकता है कि कुछ न कुछ काम शिक्षकोंके लिए हो जो बेहद आवयश्क हो परन्तु प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदीका ही कहना है कि जान है तो जहान है। जान रहेगी तो बाकी पड़े काम आनेवाले समयमें भी पूरे किये जा सकते हैं। इसके साथ ही जरूरी कार्योंपर चर्चा वीडियो कांफ्रेंसिंगके जरिये भी की जा सकती है जो कि हमारे प्रधान मंत्री अक्सर करते रहते हैं। इससे सोशल डिसटेंसिंग भी बनी रहती है और कार्यपर चर्चा भी हो जाती है। लेकिन शिक्षकोंको बुलाया गया और देखते ही देखते यह वर्ग भी पीडि़त हो गया तब तो यह संक्रमण फैलनेमें और वृद्धि दर्ज होगी। यदि शिक्षकोंको बुलाना सही होता तो केंद्र सरकार जरूर अपनी गाइडलाइनमें यह जरूर कहती। इसके साथ ही यदि नया सत्र शुरू हो गया होता, छात्र विद्यालय आने लगते और संक्रमणकी रफ्तार धीमी होती तब यह फैसला सटीक होता। परन्तु वर्तमानमें जो देशकी स्थिति है वह पूरा इसके उलट है और इसे देखते हुए योगी आदित्यनाथकी अध्यक्षतामें हुई बैठकमें लिए गये इस फैसलेको लेकर दोबारा विचार करना चाहिए और शिक्षकोंकी जानकी बाजी नहीं लगानी चाहिए। -यशस्वी सिंह, प्रयागराज।