Tel: 0542 - 2393981-87 | Mail: ajvaranasi@gmail.com


नवीनतम समाचार » प्रशंसनीय दीपक

प्रशंसनीय दीपक

निराश मनुष्योंको मिट्टीके छोटेसे दीपकसे प्रेरणा लेनी चाहिए जो अंधेरेमें प्रकाश बिखेर देता है। दीपक अपने महत्वको प्रकट करके धनिकोंका भी प्यारा बन जाता है। यह अपने अल्प प्रकाश द्वारा जरुरतमन्दोके रुके कायोंको पूर्ण करके उनके द्वारा प्रशंसित होता रहता है और अपने अस्तित्वको प्रशंसाके योग्य बनाता है। इस छोटेसे दीपकने ऐसा कभी विचार भी न किया होगा कि उसके पास दो-चार सौ किलो तेल होना चाहिए सौ-दो सौ किलो रुई होनी चाहिए साथ ही उसने कभी यह भी कल्पना न की होगी कि उसका भी आकार सूर्य और चंद्रमाके समान बहुत बड़ा होना चाहिए ताकि वह भी बहुत अधिक प्रकाश बिखेर सके। मिट्टीके इस छोटेसे दीपकके पास इतनी फुर्सत ही नहीं होती है कि वह कर्महीन लोगोंकी तरह केवल मंसूबे बांधता रहे। यह छोटा-सा दीपक अपनी आजकी परिस्थितियोंका आदर करते हुए अपनी मात्र एक रुपयेकी पूंजीसे ही अपने कार्यको आगे बढ़ाता है। निसंदेह इसका कार्य बहुत ही छोटा होता है लेकिन यह अपने इस छोटेसे कार्यमें सफलता प्राप्त करता रहता है सफलता चाहे छोटेसे कार्यसे प्राप्त की जाय या बड़े कार्योंसे महत्व दोनोंका ही अपनी-अपनी जगह एक-सा ही होता है जब भी कोई व्यक्ति किसी छोटेसे कार्यमें सफलता प्राप्त करता है तो उसे उस स्थितिमें उसी आनन्दकी अनुभूति होती है जिस आनन्दकी अनुभूति बड़ेसे बड़े व्यक्तियोंको बड़े कार्योंको सफलतापूर्वक संपादित करनेपर होती है। जीवनका उद्देश्य आनन्दकी अनुभूति करना ही होता है और जो अपने जीवनमें आनन्दकी अनुभूति करते रहते हैं उनका जीवन सदैव सफल रहता है। जब कभी कोई व्यक्ति किसी कारणसे अंधकारमें रह रहा होता है उस स्थितिमें उसके लिए एक छोटेसे दीपककी रोशनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए सफलता चाहे सूर्य और चंद्रमाके प्रकाशके समान चमक रही हो या दीपककी रोशनीके समान हो महत्व दोनोंका ही अपनी-अपनी जगहपर होता है। आध्यात्मिक रूपसे छोटेसे दीपकके प्रकाशको अधिक महत्वपूर्ण माना गया है इसीलिए तो सूर्य या चंद्रमाके प्रकाशकी उपस्थितिमें भी पूजा स्थलोंमें छोटेसे दीपकोंको प्रज्वलित करके इन्हें प्रकाशित किया जाता है और इस प्रकाशके महत्वको बढ़ाया जाता है।
लोक संवाद
सर्वत्र राम
महोदय,- जनमानस रामराज्यको ही सर्वोपरि मानता है और राम राज्यकी स्मृतियोंमें जीता है। रामका नाम लेकर सत्तासीन होता है परन्तु सही मायनेमें रामसे प्रेम नहीं करता। सम्पूर्ण जनमानसके लिए राम ही रहीम हैं। यही भाव भारतमातामें रहनेवालाका विश्वबन्धुत्वकी पहचान है यही वसुधैव कुटुम्बकम है। प्रतिपल सतत स्मरणमें रहते हुए कि हमारे चारों ओर ३६० डिग्रीपर हर चीज, प्राणी, ईश्वर-खुदाके स्मरणमें तल्लीन है। अच्छे कार्य एवं समस्याके निस्तारणके लिए हमें सद्ïबुद्धि आये, निस्तारणके लिए बढ़-चढ़कर हिस्सा लें। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि हमें कानूनका पालन हृदयसे करना चाहिए। इस सूत्रपर अमल करके राम जन्मभूमि समस्याका अतिशीघ्र निस्तारण करना चाहिए। जो राष्ट्रहितमें है। -डा. बनवारी सिंह, वाराणसी।