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अन्न और मन

अन्नसे हमारा रिश्ता सबसे लम्बा चलता है। कहते हैं कि जैसा अन्न, वैसा मन, जैसा मन, वैसा विचार और जैसा विचार, वैसा कर्म। गीतामें सात्विक, राजसिक और तामसिक तीन प्रकारके भोजनकी चर्चा है। प्रेम और प्रसन्नता देनेवाले भोजनको सात्विकय ईष्र्या, द्वेष, मद और तृष्णा बढ़ानेवाले भोजनको राजसिक और आसुरी प्रवृत्तियां मजबूत करनेवाले भोजनको तामसिक कहा गया है। आज सभी जान गये हैं कि शाकाहारीकी अपेक्षा मांसाहारी व्यक्तिको रोग जल्दी पकड़ते हैं। कटता हुआ पशु जिस भय, बेबसी और बदलेकी भावनाका अनुभव करता है, उसका मांस खानेवालेतक यह भाव पहुंचते ही हैं। 'अन्नÓ को ब्रह्मï कहा गया है। इसका निरादर देवताका अपमान करना है इसलिए अन्नको भोजनके रूपमें तैयार करनेकी प्रक्रिया भी पूजा-अर्चनासे कम नहीं है। खेतोंसे थालीतक पहुंचनेकी अन्नकी यात्रामें कई पड़ाव हैं। कमाने, पकाने, परोसने और खानेवाले व्यक्तियोंकी मानसिकता अन्नके पोषक तत्वोंको प्रभावित करती है। रसोई बनानेवाला इस प्रसंगका सूत्रधार है। खाना बनाते समय उसकी मानसिकता क्या है। खानेवालेके प्रति उसकी भावनाएं अच्छी हैं या नहीं, यह काम उसे मुसीबत तो नहीं नजर आ रहा। यदि हां, तो निश्चित रूपसे भोजनमें नकारात्मक तरंगें पैदा होंगी। अच्छेसे अच्छा व्यंजन भी अपाच्य बन जायगा। घरमें नौकर रखनेका रिवाज आजकल बढ़ गया है। घरभरके सदस्य जो कुछ खाते हैं, वही भोजन सेवकोंतक भी पहुंचना चाहिए। यदि दुर्भाव होता है तो सात्विक होते हुए भी वह भोजन मनको अशांत और रोगी बना देगा। हम अपनी दादी-नानीको याद करें तो पहली रोटी बनाते समय सिरपर पल्लू रखकर खानेवालोंके कल्याणकी कामना करती हुई छवि सामने आती है। प्रेमके रससे बनाया और परोसा भोजन अमृत बनकर मनको ऊर्जा देता है। भोजन करते समय हमारे साथ यदि सज्जन और हितैषी हैं तो मन उल्लाससे भर उठता है। वातावरण भी कम महत्वपूर्ण नहीं। कौर मुंहमें हो और आंखें टीवीपर चल रहे मारधाड़वाले दृश्योंपर टिकी हों तो पेटमें वात, कफ, पित्त और मनमें हिंसाकी भावनाएं पनपती हैं। अन्न और मनके इस रिश्तेको स्वस्थ रखनेके लिए एक और कसौटी है। अन्न धर्मार्जित धनसे प्राप्त किया गया हो। दुष्टका अन्न ग्रहण करनेसे दुष्टता आयगी। कृष्णने दुर्योधनका राजसी भोजन छोड़कर विदुरके यहां साग-रोटी खायी थी। गुरुनानकने धनी सेठका निमंत्रण ठुकरा कर 'भाई लालोÓ के हाथकी बनी कोदराकी सूखी मिस्सी रोटी खायी। अमीरकी रोटीमें गरीबका खून था तो गरीबकी रोटीमें दूध। वह उसकी 'किरतÓ (मेहनत) की कमाईसे बनी थी। इस प्रकार धर्मसे अर्जित अन्न अंतमें ईश्वरको अर्पित करके ग्रहण करनेसे प्रसाद बन जाता है।
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 लोक संवाद
शिक्षककी पात्रता
महोदय,- सरकार कोई भी हो किसीको रोजगार या नौकरी नहीं दे सकती। व्यक्तिको अपने प्रयाससे ही इसे हासिल करना होता है। शिक्षामित्र कैसे नौकरी पा गये, इसकी जानकारी हमें नहीं। लेकिन उन्हें भी अध्यापक पात्रता परीक्षा पास करनी होगी। बहुतसे बीएड, बीटीसी कर नौकरी पा जाते थे। तब बात और थी जैसे और नौकरियोंके लिए इंट्रेंस है तो शिक्षक भर्तीके लिए भी हो। सरकार इस तरह नौकरी बांटती रही तो लोगोंमें गलत संदेश जायगा। अब चाहे शिक्षामित्र हों या शिक्षण ट्रेनिंग किये लोग, शिक्षककी नौकरी पानी है तो पहले प्रवेश परीक्षा दो। शिक्षक पात्रताके लिए भी प्रवेश परीक्षाका प्रावधान अच्छा है। -दिलीप गुप्त, बरेली।