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'मानस’ की तीन धाराएं

विद्वान मानते हैं कि श्रीरामचरित मानसमें तीन प्रकारकी सभ्यताओंका संगम हुआ है। यह सभ्यताकी धाराएं अलग-अलग दिशामें बहती हुई भी एक जगह एकत्र होती हैं। प्रथम धारा या सभ्यता है अयोध्याकी। यह धारा दर्पणके समान है, जिसमें लोग अर्थात्ï अयोध्याकी प्रजा उसमें अपने रूपका प्रतिबिम्ब देखती है। अयोध्यावासी अपने कार्यों एवं भावोंके रूपोंका साक्षात्कार इस दर्पण-धारामें करते हैं। वह अपने स्वरूपका दर्शन दर्पणमें करते हैं और उसे परब्रह्मïसे जुड़ा अनुभव करते हैं। अयोध्यावासी मानते हैं कि राम यदि परब्रह्मï न भी हो तो मर्यादा पुरुषोत्तम तो हैं ही। वह रामके गौरवसे अपनेका संयुक्त मानकर इस दर्पणकी धारामें अपनेको एक कर देते हैं। साथ ही मनुष्य समस्त कर्मोंको समाहित कर स्वयं ही अपनेको भक्तिकी धारामें तैरते हुए पाते हैं। 'मानसÓ की दूसरी धारा चित्रकूट की। चित्रकूटमें अयोध्या भी है और मिथिला भी है। यहां अर्पण प्रमुख हो जाता है। हर कोई चित्रकूटमें अपने ही अर्पण अथवा समर्पण कर देना चाहता है। भरत कहते हैं कि भइया आप अयोध्या लौट चलें और वहांकी सत्ता सम्भालें और राम कहते हैं कि नहीं भाई, पिताने आपको अयोध्याकी सत्ता दी है तो आप अयोध्याका राज्य भोगें। यह त्रेताके उस कालखण्डका अजीब ऊहापोहवाला क्षण था, जब दोनों भाई राम और भरत एक-दूसरेको सत्तासीन करना चाहते हैं। चित्रकूटमें सत्तासे निर्मोह होनेके अजब दृश्य उपस्थित है। इसके साक्षी बनते हैं विदेह जनकके साथ मिथिलावासी और अयोध्याका सम्पूर्ण समाज। अर्पण और समर्पणकी यह धारा 'मानसÓ में महत्वपूर्ण घटना बन जाती है। अर्पणकी सभ्यताको सारे वनवासी भी ध्यानमें देखते हैं और तीसरी सभ्यता है 'मानसÓ में लंकाकी, यह धारा बड़ी बलवती है। वहां न तो दर्पण है स्वयंके मूल्यांकनका न तो चित्रकूटकी भांति अर्पण है। लंकामें संघर्षण है। दशाननके अहंकारका अद्ïभुत प्रदर्शन है। लंकामें अभिमान अपने चरमपर है। वह बलका हो या स्वर्णका या अन्य बातोंका। लंकामें संघर्षणकी धारा बड़ी बलवती है कि उसके समान संसारमें कोई नहीं है। यही अभिमान एवं संघर्षणकी धारा लंकाके सर्वशक्तिमान दशकंधर तथा लंकावासियोंको डुबानेके लिए पर्याप्त थी। यह कामके अर्पण एवं रावणके संघर्षणका ऐसा युद्ध था, जिसमें राम विजयी रहे। त्रेताकी यह घटना आज भी प्रासंगिक है। अहंकार कभी स्थायी नहीं रहता। वह एक समय नष्टï होता ही है। विद्वान मानते हैं कि मनमें 'मानसÓ को रखें 'मानसÓ की घटनाओंसे प्रेरणा लें और बुद्धिमें अपने हनुमानको स्थान दें। जीवनमें कार्य करते समय मारुतनंदनको स्मरणमें रखें और रामनामको सर्वोपरि रखें। गुरु रूपमें महादेव जीवनको संतुलित रखेंगे।
लोक संवाद
अन्य खेलोंको बढ़ावा मिल
महोदय,-  भारतमें क्रिकेट भावनाओंका खेल बन चुका है। १२५ करोड़से ज्यादाकी आबादीवाले देशमें क्रिकेट खिलाडिय़ोंकी लम्बी लिस्ट है। मेहनत, लगन और जबरदस्त प्रतिस्पर्धाके कारण ही अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट टीममें पंहुचनेवाला खिलाड़ी खुद अपनी और देशकी सफलताके लिए जी-जान लगाकर सफलताके नये आयाम स्थापित करना चाहता है। भारतीय टीमके लगातार शानदार प्रदर्शन और सतत मेहनतके कारण ही भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्डने अकूत सम्पत्ति एकत्र कर ली है। यदि केवल टैक्सकी बात की जाय तो २००८ से २०१८ के बीच दस वर्षोंमें बोर्डने ३५०० करोड़ रुपये जमा किये हैं। इसी तरह यदि बोर्डकी कुल सम्पत्तिकी बात की जाय तो २०१४-१५ में ५४३८.७, २०१५-१६ में ७८४७.१, २०१६-१७ में ८४३१.९, जबकि २०१७-१८ में ११९१६.८ करोड़ रुपये आंकी गयी है। विश्वके सबसे मंहगे खेल संस्थानोंमें शुमार भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड हम सभीके लिए गर्वका विषय है। लेकिन कटु सत्य यह भी है कि जिस देशमें प्रतिभाओंकी कोई कमी नहीं है, उस देशमें बाकी अन्य खेलोंके संचालनके लिए पर्याप्त पैसा नहीं है। महिला खिलाड़ी हमेशासे उपेक्षित रही हैं। सीमित संसाधन और गरीबीके कारण प्रतिभावान खिलाड़ी मौजूद होनेके बाद भी अन्य बहुतसे महत्वपूर्ण और लोकप्रिय खेलोंमें हम आवश्यक अर्हता पूरी नहीं कर पाते और दावेदारीके प्रारम्भिक चरणसे ही बाहर हो जाते हैं। फुटबाल, साइक्लिंग, तैराकी और इसी तरहके अन्य ओलम्पिकके लोकप्रिय खेलोंमें हम खेल शुरू होनेके पहले ही बाहर हो जाते हैं। अत: खेल मन्त्रालयको स्वयं और बीसीसीआईसे अपील करके जमा इस अकूत दौलतका इस्तेमाल अन्य खेलोंको बढ़ावा देनेके लिए करना चाहिए ताकि भारतीय युवा अपनी मेहनतकी बदौलत सफलताके नये आयाम स्थापित कर सके और विश्वपटलपर भारतीय तिरंगेको सभी खेलोंमें स्वर्ण पदककी बुलन्दियोंतक पंहुचा सके। -अभिषेक मिश्र, कानपुर।