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शहादतकी यादमें मुहर्रम

मुहर्रम हराम इस्लामी सालका पहला महीना है। इस महीनेकी दसवीं तारीख सन्ï ६१ हिजरीमें अल्लाहके रसूल हजरत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लमके नवासे हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम धर्मकी रक्षाके लिए फासिक एवं फाजिर अधर्मी शासक यजीदकी फौज द्वारा कर्बलाके मैदानमें शहीद हो गये। उन्होंने एक दिनमें बहत्तर लोगोंकी कुरबानी पेश करके अपने नानाके दीनको मिटनेसे बचा लिया। इस्लामी सालका बारहवां महीना जिल हिज्जा भी कुरबानीका महीना है। इस्लामसे पहले भी मुहर्रम उन चार महत्वपूर्ण महीनोंमें शामिल था जिनमें झगड़ा और नाहक खून बहाना मना था। उन्मुल मोमिनीन हजरत आयशा सिद्दीका रजीअल्लाहो अनहा फरमाती हैं कि इस्लामसे पहले कुरैशी आशूराका रोजा रखा करते थे। नबीए करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम भी यह रोजा रखते थे। जब आप मदीना तशरीफ ले गये तो वहां भी आप यह रोजा रखते थे। आपने इसे रखनेका हुक्म भी दिया लेकिन जब अल्लाहने रमजानुल मुबारकके एक माहके रोजेको फर्ज करार दे दिया तो आशूराका रोजा नफ्ज रोजोंमें शामिल हो गया। आशूराके दिन पैगम्बर हजरत मूसा अलैहिस्सलामको उस वक्तके जालिम बादशाह फिरऔनपर विजय प्राप्त हुई। फिरऔन अपने लश्करके साथ नील नदीमें गर्क हो गया। यहूदी हजरत मूसाकी जीतकी खुशीमें इस दिन रोजा रखते हैं। चौथे खलीफा हजरत अली अलैहिस्सलामकी शहादतके बाद उनके बड़े बेटे हजरत इमाम हसन अलैहिस्सलाम खलीफा हुए। अमीर मआवियाने खलीफा बननेके बाद अपनी जिन्दगीमें ही अपने पुत्र यजीदको अपना उत्तराधिकारी बना दिया। जबकि वह जानते थे कि उनका पुत्र फासिक एवं फाजिर है। यजीदने खलीफा बननेके बाद हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलामसे बैअत लेनेके लिए मदीनेके गवर्नरको पत्र लिखा। हुसैनने यजीदकी बैअतसे इनकार कर दिया। हजरत इमाम हुसैन उमरा करके जब कूफाके लिए रवाना हुए तो यजीदने उमर सादकी कमानमें एक बड़ी फौज उन्हें रोकनेके लिए भेजी। हुसैनने तीन शर्तें रखीं-मुझे मदीना वापस जाने दो, यजीदके पास ले चलो मैं उससे बात करके समस्याका समाधान कर लूंगा। मुझे हिन्दुस्तान जाने दो। लेकिन उमर सादने कोई शर्त न मानी और उन्हें वहीं रुकनेको बाध्य किया। इमाम हुसैनने जमीनके मालिकोंको रकम अदा करके वह जमीन खरीद ली। वहां अपने खेमे बांट दिये। उसके बाद हुरके नेतृत्वमें फौजका नया दस्ता आया तो हुसैनने हुरको अपना परिचय दिया। हुर इमाम हुसैनके साथ आ गया। मुहर्रमकी सातवीं तारीखको यजीदी फौजने पानी बन्द कर दिया। दसवीं मुहर्रमको हजरत इमाम हुसैनने अपने बहत्तर लोगोंकी शहादत पेश की। सबसे आखिरमें नमाज पढ़ते हुए शहीद हुए। हजरत इमाम हुसैनकी शहादतकी याद हर वर्ष मुहर्रममें मनायी जाती है। हजरत इमाम हुसैनने शहीद होकर इस्लामको नयी जिन्दगी अता कर दी और यजीदियत हमेशाके लिए मिट गयी।
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 लोक संवाद
डिजिटल तकनीकका इस्तेमाल

महोदय- खबर है जिसकी सचाई परखना अभी बाकी है, लेकिन वह खतरनाक है और हिन्दुस्तानके डिजिटल राहपर बढऩेमें एक बड़ा रोड़ा और खतरा साबित हो सकती है। किसी छोटे दुकानदारने पेटीएमसे भुगतान लेना शुरू किया और जब उसने अपने बैंक खातेमें रकम डालनेकी कोशिश की तो साढ़े १७ लाख रुपयेकी रकम गायब हो गयी। ऐसी चार घटनाएं और उसकी चार लाख जगहोंपर पढ़ी गयी। खबरोंसे हो सकता है कि लोग कैशलेस होनेका इरादा छोड़ दें। आज भी रात-दिन खबरें आती हैं कि किस तरह किसीके एटीएम कार्डसे जालसाजी हो गयी और उसकी जिन्दगीभरकी जमा पूंजी लुट गयी। जब लोगोंके बीच साक्षरता और जागरूकताकी तैयारी डिजिटल होनेकी नहीं है, तब आंधी-तूफानकी रफ्तारसे डिजिटलीकरणके खतरे कम नहीं हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यमें ही जहां मुख्य मंत्रीने यह तय किया है कि कुछ महीनोंमें ही दस लाख लोगोंको डिजिटल लेन-देनके हिसाबसे तैयार किया जायगा तो ऐसी कई तरहकी ठगीके बारेमें भी सोचना होगा। लोगोंके घर जाकर नोट लूटकर लाना आसान नहीं होता है, लेकिन ऑनलाईन किसीकी भी जानकारीको हासिल करना भी आसान है और उसे लूट लेना भी आसान है। इस मुद्देपर हमने पहले भी लिखा है कि केन्द्र सरकारको एक ऐसी योजना लानी चाहिए कि कैशलेस और डिजिटल लेन-देनमें जो लोग ठगी या जुर्मके शिकार होते हैं, उनकी भरपाई करनेके लिए एक बीमा योजना लायी जाय, उसके बिना यह पूरा सिलसिला जनताके हितोंके खिलाफ जायगा। आज उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यमें साइबर जुर्मसे निबटनेके लिए पुलिस भी तैयार नहीं है और साइबर अपराध दर्ज तो हो जाते हैं, लेकिन मुजरिमोंतक पहुंचकर लूटको वापस लानेके मामले बहुत कम हैं। इसलिए आज जब सरकार लोगोंके डिजिटल शिक्षणके कामको युद्धस्तरपर शुरू कर रही है तो पहलेसे ही लोगोंको सावधानी सिखाना जरूरी है और ऐसा सिखानेवाले लोगोंको भी पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियोंसे प्रशिक्षण दिलवाना जरूरी है, ताकि पहले वह खुद समझें और फिर प्लास्टिक इस्तेमाल करनेवाले, फोनसे भुगतान करनेवाले लोगोंको समझा सकें। यह काम आसान नहीं होगा, क्योंकि चारों तरफ फैले हुए छोटे-छोटे दुकानदारों और छोटे-छोटे ग्राहकोंको संघटित रूपसे सिखानेका मौका भी आसान नहीं होगा और आज जब बाजार पूरी तरह चौपट है तो ऐसेमें किसी छोटे दुकानदारको प्रशिक्षणके लिए किसी जगह बुलाना भी उसके जख्मोंपर नमक छिड़कनेकी तरहका होगा। इसलिए सरकारको अखबार, टीवी, और सीधे जनसंपर्कसे भी लोगोंको जुर्मसे सावधान रहनेका प्रशिक्षण देना पड़ेगा। आज तो जो बुजुर्ग लोग हैं, वह भी अपने बचपनसे पहले सिक्के और फिर नोट देखते और इस्तेमाल करते आये हैं और इसलिए वह इसमें धोखेसे आम तौरपर बचना जानते हैं। लेकिन हम अखबारोंमें जब साइबर धोखाधड़ीकी खबरें पढ़ते हैं तो दिखता है कि बहुत पढ़े-लिखे और पेशेवर, परिपक्व और कामयाब लोग भी ठगीके शिकार हो रहे हैं। इसलिए आज जब लोगोंको मोबाइल बैंकिंग, क्रेडिट और डेबिट कार्ड, फोनसे भुगतान जैसे कई चीजोंकी तरफ मोड़ा जा रहा है तो ऐसी तमाम सावधानी बहुत जरूरी है क्योंकि लोगोंका भरोसा इस नयी तकनीकपर यदि बैठ नहीं पाया तो इसका इस्तेमाल कामयाब भी नहीं होगा और लोग सुरक्षित भी नहीं रहेंगे। -राजेश खत्री, वाया ईमेल।