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ट्रंपके खिलाफ सीनेटमें महाभियोगको मंजूरी

न्यूयार्क(एजेंसी)। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ सत्ता के दुरुपयोग के आरोप में महाभियोग अब सीनेट में चलेगा। सांसदों ने बुधवार को ट्रंप के खिलाफ संसद के निचले सदन में चल रही महाभियोग की कार्रवाई को ऊपरी सदन सीनेट भेजने के पक्ष में वोट किया। सत्ता के दुरुपयोग और संसद के काम में अवरोध पैदा करने के आरोप में ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही 21 जनवरी से शुरू हो सकती है जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस करेंगे। ट्रंप के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सीनेट में 228 सांसदों ने जबकि विपक्ष में 193 सांसदों ने वोट दिया। निचले सदन ने सात महाभियोग प्रबंधकों की नियुक्ति की है, जो डेमोक्रेट्स की तरफ से ट्रंप को राष्ट्रपति पद से हटाने के लिए बहस करेंगे। इन प्रबंधकों की नियुक्ति निचले सदन की स्पीकर नैंसी पेलोसी ने की है। बता दें कि 438 सदस्यीय निचले सदन में डेमोक्रेट्स का दबदबा है। सदन ने 18 दिसंबर को ट्रंप के खिलाफ महाभियोग चलाने की मंजूरी दी थी। अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति ट्रंप देश के इतिहास के तीसरे ऐसे राष्ट्रपति हैं जिनके खिलाफ महाभियोग को मंजूरी दी गई है। हालांकि सीनेट में रिपब्लिक सांसदों का नियंत्रण है, ऐसे में इस बात की संभावना बेहद कम है कि ट्रंप को राष्ट्रपति पद से हटाया जा सकेगा। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि ट्रंप की सत्ता भी फिलहाल सुरक्षित रहेगी क्योंकि महाभियोग की प्रक्रिया निचले सदन में पूरी भी होने के बाद भी रिपब्लिकन बहुमत वाली सीनेट से उसका पास होना मुश्किल है। ट्रंप एक ही सूरत में हट सकते हैं, जब कम से कम 20 रिपब्लिकन सांसद उनके खिलाफ विद्रोह का झंडा उठा लें। फिलहाल इसकी गुंजाइश कम ही है। ट्रंप पर आरोप हैं कि उन्होंने 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में संभावित प्रतिद्वंद्वी जो बिडेन और उनके बेटे के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच के लिए यूक्रेन की सरकार पर दबाव बनाया। बिडेन के बेटे यूक्रेन की एक ऊर्जा कंपनी में बड़े अधिकारी हैं। ट्रंप और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडीमिर जेलेंस्की के बीच हुई कथित फोन वार्ता महाभियोग के लिए एक अहम सबूत है। उधर व्हाइट हाउस ने उम्मीद जताई है कि राष्ट्रपति ट्रंप महाभियोग की प्रक्रिया को आसानी से पार कर ले जाएंगे। चीन के साथ मंगलवार को ट्रेड डील साइन करते वक्त ट्रंप ने इसे महाभियोग को सिर्फ एक अफवाह करार दिया और कहा कि इसका कोई असर नहीं होगा। ट्रंप के कैंपेन मैनेजर ब्रैड पार्सकल ने कहा कि चुनाव से ठीक पहले यह ट्रंप की राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचाने का एक प्रयास है।
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यूएनएससी में पाक-चीन की फिर किरकिरी, कश्मीर मसलेपर मिला करारा जवाब

वाशिंगटन(एजेंसी)। पाकिस्तान व चीन को  संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद(यूएनएससी) में कश्मीर मसले पर एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी है। दरअसल चीन ने पाकिस्तान के कहने पर कश्मीर मसले पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद(यूएनससी) में एओबी(एनी अदर बिजनेस) के तहत क क्लोज डोर मीटिंग का प्रस्ताव रखा जिसे नांमंजूर कर दिया गया। इसके लिए 24 दिसंबर, 2019 की तारीख तय की गई थी लेकिन तब मीटिंग नहीं हो पाई। अब फिर हृस्ष्ट की मीटिंग के दौरान चीन ने कश्मीर मामला उठाया, जिसका स्थायी सदस्यों फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन और रूस के साथ 10 सदस्यों ने विरोध किया और कहा कि यह मामला यहां उठाने की जरूरत नहीं है। इससे पहले भी अगस्त 2019 के बाद कश्मीर पर क्लोज डोर मीटिंग को लेकर की गई पहल कामयाब नहीं हो सकी थी । तब भी कोई सदस्य किसी ने चीन के प्रस्ताव को नहीं माना था। सूत्रों का कहना है कि यूएनएससी के अन्य सभी 14 सदस्यों का मानना है कि यह कोई ऐसा मामला नहीं था, जिसके लिए चर्चा की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र में भारतीय दूत सैयद अकबरुद्दीन ने कहा, हमें खुशी है कि संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के प्रतिनिधियों की ओर से कश्मीर पर लगाए गए बेबुनियाद आरोपों की असलीयत सामने आ गई।पाकिस्तान अपने मंसूबों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कामयाब करने के लिए चीन का इस्तेमाल करता है। पाकिस्तान अपने यहां के हालात को छिपाने के लिए झूठ फैलाता है। यूएनएससी में चीन के प्रस्ताव पर फ्रांसीसी राजनयिक सूत्रों ने कहा, फ्रांस ने एक बार फिर कश्मीर मुद्दे को उठाने के लिए यूएनएससी सदस्य (चीन) के अनुरोध को नोट किया है. फ्रांस की स्थिति नहीं बदली है और बहुत स्पष्ट है कि कश्मीर मुद्दे का हल भारत और पाकिस्तान को द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाया जाना चाहिए। कश्मीर मुद्दे पर ब्रिटेन ने कहा कि यह द्विपक्षीय मसला है और इसका संयुक्त राष्ट्र से कोई लेना-देना नहीं है। ब्रिटेन की तरह अमेरिका ने भी कहा कि यह मामला यूएनएससी का नहीं है। भारतीय राजदूत अकबरुद्दीन ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य करने के लिए भारत सरकार की ओर से प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान गड़बड़ी करने की कोशिश कर रहा है। सैयद अकबरुद्दीन ने कहा, हमें खुशी है कि चीन के प्रयास को एक व्याकुलता के रूप में देखा गया और भारत के कई दोस्त देशों ने कहा कि यह मामला द्विपक्षीय है और इसको यूएनएससी के सामने उठाने की जरूरत नहीं है. पाकिस्तान को भारत से बातचीत करके मामले का हल ढूंढना चाहिए। फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका के अलावा यूएनएससी के एक और सदस्य ने कश्मीर मसले को द्विपक्षीय बता। नयी दिल्ली में एक कार्यक्रम में एस्टोनियाई विदेश मंत्री उरमास रिंसलू ने कहा कि यह एक द्विपक्षीय मुद्दा है। बता दें कि पाकिस्तान की अपील पर चीन ने यूएनएससी के सामने कश्मीर का मसला उस वक्त उठाया, जब भारत ने 15 देशों के राजनयिकों को जम्मू-कश्मीर का दौरा कराया।भारत ने हाल में ही जम्मू-कश्मीर में ब्रॉडबैंड और 2जी सेवाओं में रियायत दी है। इसके साथ ही कुछ राजनीतिक बंदियों की रिहाई की गई है।
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ट्रेड वॉर: ट्रंपने चीनके सामानसे शुल्क हटानेको किया इंकार

वाशिंगटन(एजेंसी)। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के साथ व्यापार समझौते के प्राथमिक चरण पर हस्ताक्षर हो जाने के बाद भी चीन के सामानों पर लगे भारी-भरकम शुल्क को वापस लेने से इनकार कर दिया। ट्रंप ने व्हाइट हाउस में ऐतिहासिक हस्ताक्षर समारोह में कहा कि वह दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते के दूसरे चरण पर हस्ताक्षर होने के बाद ही शुल्क वापस लेंगे। इस व्यापार समझौते को राष्ट्रपति ट्रंप की सरकार की महत्वपूर्ण राजनीतिक व कूटनीतिक जीत माना जा रहा है। ट्रंप ने कहा कि वह शुल्क को लेकर अपनी नीतियां जारी रखेंगे। उन्होंने कहा कि हम शुल्क जारी रख रहे हैं, इससे लोग हैरान हैं। मैं इसे वापस लेने पर सिर्फ तभी सहमत होऊंगा जब व्यापार समझौते के दूसरे चरण पर हस्ताक्षर हो जाएंगे। राष्ट्रपति ने इस समझौते को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिये व्यापक बदलाव बताते हुए कहा कि यह महज एक समझौते से कहीं अधिक है। बता दें कि इस व्यापार समझौते के मुताबिक अमेरिकी ने कई तरह के चीनी माल पर टैरिफ में कटौती की है और इसके बदले में चीन ने कई तरह की अमेरिकी वस्तुओं और सेवाओं की खरीद का वायदा किया है। इसके अलावा चीन ने बौद्धिक संपदा के मामले में अमेरिका की श?िकायतों के समाधान का भी वादा किया है।
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अमेरिकाने इराकके साथ शुरू किया सैन्य अभियान

वाशिंगटन(एजेंसी)। अमेरिका ने दो सप्ताह तक रूकने के बाद इराक के साथ संयुक्त सैन्य अभियान फिर से शुरू कर दिया है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गयी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरानी समर्थकों की तरफ से बगदाद में अमेरिकी दूतावास पर हमले के बाद से शुरू हुए क्षेत्रीय तनाव के बीच दो सप्ताह तक रुकने के बाद अमेरिका ने इराकी सेना के साथ संयुक्त सैन्य अभियान फिर से शुरू कर दिया है। दो अमेरिकी सैन्य अधिकारीयों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरानी सेना ने बगदाद में अमेरिकी दूतावास पर हमला किया जिससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ गया। सैन्य अभियान दो सप्ताह तक रुकने के बाद अमेरिकी सेना ने इराकी सेना के साथ फिर से सैन्य अभियान शुरू कर दिया। सैन्य अधिकारियों ने कहा कि अमेरिका इस्लामिक स्टेट के आतंकवादी समूह के खिलाफ संयुक्त सैन्य अभियान को फिर से शुरू करने की प्रतिक्षा कर रहा था जो पिछले दो सप्ताह से रूका हुआ था। उल्लेखनीय है कि इराक की संसद ने पांच जनवरी को बगदाद हवाई अड्डे के पास ईरानी कमांडर कासिम सोलेमानी के अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे जाने पर अमेरिका के नेतृत्व वाली विदेशी सेनाओं को देश से बाहर करने के पक्ष में संसद में प्रस्ताव पास किया था। अमेरिकी अधिकारियों ने हालांकि इराक से पूरी तरह पीछे हटने से इंकार किया है। व्हाइट हाउस राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रोबर्ट ओ ब्रायन ने पिछले सप्ताह कहा कि अमेरिका 'अपनी शर्तोंÓ पर ही इराक छोड़ेगा। 
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अमेरिकाके टेक्सासमें दी गई साल 2020 की मौतकी पहली सजा

वॉशिंगटन(एजेंसी)। अमेरिका के टेक्सास राज्य ने बुधवार को देश में इस साल की मौत की पहली सजा दी। 15 साल पहले पत्नी की हत्या करने के दोषी शख्स को जहर का इंजेक्शन देकर मौत की सजा दी गई। जॉन गार्डनर(64) को पांचवीं पत्नी टैमी गार्डनर की हत्या के लिए 2006 में मौत की सजा सुनाई गई। वह शारीरिक हिंसा की कई घटनाओं के बाद उसे छोड़कर चली गई थी और उसने तलाक की अर्जी दी थी। तलाक पर फैसला आने से दो सप्ताह पहले वह टैमी के नये मकान में घुसा और उसके सिर में गोली मार दी। टैमी की दो दिन बाद मौत हो गई। अभियोजकों ने कहा कि गार्डनर का अपनी पत्नियों के खिलाफ हिंसा करने का इतिहास रहा है। उसने अपनी दूसरी पत्नी को भी गोली मारी थी, तब वह गर्भवती थी। उन्होंने बताया कि उसने अपनी तीसरी पत्नी का अपहरण भी किया था और उसकी बेटी की पिटाई की थी। अपने अंतिम बयान में गार्डनर ने टैमी के परिवार से माफी मांगी। पिछले साल अमेरिका में 22 लोगों को मौत की सजा दी गई थी जिनमें से नौ को टेक्सास में मृत्युदंड दिया गया। 
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फ्लॉरिडा नौसेना बेस हमले की जांच के लिए डॉनल्ड ट्रंप ने ऐपल से मांगा सहयोग

लास ऐंजिलिस (एजेंसी)। फ्लॉरिडा के नेवी बेस पर हुए आतंकी हमले में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप आतंकियों के आईफोन की जांच कराना चाहते हैं। फ्लॉरिडा नेवी बेस पर 6 दिसंबर को हुए हमले की जांच के लिए राष्ट्रपति ने ऐपल कंपनी से सहायता मांगी है। ट्रंप ने ट्वीट कर कहा कि हमने ऐपल कंपनी को व्यापार और दूसरे मुद्दों पर सहायता की है। हम चाहते हैं कि कंपनी अब हमारी सहायता करे। राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्वीट किया, 'अमेरिकी सरकार ने ऐपल की व्यापार और दूसरे मुद्दों पर सहायता की है। अब बदले में क्यूपर्टिनो, कैलिफॉर्निया के तकनीक कंपनी को अपराधी तत्वों के फोन अनलॉक करने में सहायता करनी चाहिए।' प्रेजिडेंट ट्रंप और ऐपल के सीईओ टिम कुक के बीच का रिश्ता काफी अलग है। इस रिश्ते के बदौलत ट्रंप चीन के साथ एक ट्रेड डील करने में कामयाब रहे जिसने ऐपल के कई बिलियन डॉलर बचाए। ट्रंप और ऐपल कंपनी के बीच ऐसे संबंधों के बाद भी सरकारी अधिकारियों का दावा है कि कंपनी से पूरा सहयोग नहीं मिल रहा है। ट्रंप के अटॉर्नी जनरल विलियम बर्र की शिकायत है कि फ्लॉरिडा हमले की जांच के लिए ऐपल आईफोन अनलॉक करने में कंपनी की ओर से पर्याप्त सहयोग नहीं मिल रहा है। हालांकि ऐपल ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि कंपनी ने डेटा के गीगाबाइट्स उपलब्ध कराए हैं। इससे डिवाइस का बैकअप डेटा जुटाया जा सकता है। ऐपल की ओर से आधिकारिक तौर पर सरकार की डिवाइस को अनलॉक करने की अपील पर इनकार नहीं किया गया गया। हालांकि, कंपनी ने जांच टीम को आईफोन अनलॉक करने के लिए विशेष टूल बनाकर देने से जरूर इनकार कर दिया है। हालांकि, आईफोन अनलॉक करने के लिए सरकार किसी थर्ड पार्टी से भी सहयोग ले सकती है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि थर्ड पार्टी से सहयोग लेकर फोन अनलॉक किए जा सकते हैं।