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प्रिंस हैरी और मेगन मार्कल शादी के बंधन में बंधे

एक बुजुर्ग आदमी हमेशा मेरे भीतर  रहा है: गुलजार
नयी दिल्ली। गीतकार गुलजार ऐसे गिने चुने लेखकों में से एक रहे हैं जिन्होंने अपनी कलम के जादू से कई पीढ़ियों के दिलों पर राज किया है। हालांकि उनका मानना है कि ‘‘एक बुजुर्ग आदमी’’ हमेशा उनकी चेतना की गहराई में रहा है। ‘मेरे अपने’ और ‘आंधी’ जैसी फिल्मों के निर्देशन के लिए जाने जाने वाले लेखक और कवि 83 वर्षीय गुलजार ने कहा कि वह कभी बॉलीवुड के फार्मूला पर आधारित ‘लड़के - लड़की’ की प्रेम कहानी को बताने के लिए आकर्षित नहीं हुए थे।
 रेखा-नसीरूद्दीन शाह और अनुराधा पटेल के प्रेम त्रिकोण पर आधारित ‘इजाजत’ फिल्म का उदाहरण देते हुये उन्होंने कहा, ‘ मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं मेरे भीतर हमेशा से एक बुजुर्ग आदमी रहा है।’’ गुलजार ने बताया, ‘‘जब कभी मेरे पास एक पटकथा आती है तो उसमें एक युवा लड़का - लड़की नहीं रहती है। वे सभी परिपक्व चरित्र होते हैं।’’ गुलजार 13वें हेबिटेट फिल्म महोत्सव में एक सत्र में निर्देशक विशाल भारद्वाज और राकेश ओमप्रकाश मेहरा से मुखातिब थे। यह फिल्म महोत्सव 27 मई तक चलेगा।
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रिश्तों की गर्माहट : खजूर पे अटकेफिल्म समीक्षा

फिल्म 'खजूर पे अटके' हल्के फुल्के अंदाज में मानवीय मूल्यों का अहसास कराती है। ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर में हम अपने रिश्ते नातों को भूलते जा रहे हैं और हर रिश्ते पर स्वार्थ हावी हो रहा है, इन्हीं को निर्देशक हर्ष छाया ने खूबसूरती के साथ पर्दे पर पेश किया है। स्टार कास्ट भले बहुत बड़ी ना हो लेकिन कहानी में दम हो तो छोटे बजट की फिल्म भी बड़ा कमाल कर जाती है। खजूर पे अटके से भी बड़ा कमाल दिखा सकती है।
 देविंदर मुंबई के एक अस्पताल में भर्ती है और अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। खबर सुनकर मुंबई से दूर रहने वाले उसके दो भाई और बहन का परिवार वहां आ जाता है।  लेकिन जब देविंदर की सांसें बढ़ती जाती हैं तो इन्हें तकलीफ होने लगती है। उसके भांजे लड़कियों को इशारेबाजी में लग जाते हैं और डांस बार आदि चले जाते हैं। एक रिश्तेदार की लड़की एक्टिंग के लिए ऑडिशन देने चली जाती है तो भाई की बीवी अपना हुलिया ठीक कराने के लिए ब्यूटी पार्लर जाती है। यही नहीं देविंदर की पत्नी को भी खाने पीने से फुर्सत नहीं है तो उसका लड़का भी अपनी गर्लफ्रैंड के साथ बिजी है। आखिरकार देविंदर इस दुनिया से चला जाता है लेकिन जाते-जाते अपने रिश्तेदारों को बड़ी सीख देकर चला जाता है।  अभिनय के मामले में मनोज पाहवा कमाल के रहे। सीमा भार्गव का काम भी अच्छा रहा। विनय पाठक, अलका अमीन, सना कपूर और डॉली अहलूवालिया का किरदार भी दर्शकों को पसंद आयेगा। फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी कहानी है जो कहीं भी जरा-सी भी भटकी नहीं है। फिल्म का गीत-संगीत सामान्य है। फिल्म अच्छा टाइम पास करेगी एक बार देखा जा सकता है।
 कलाकार- मनोज पाहवा, सीमा भार्गव, विनय पाठक, अलका अमीन, डॉली अहलूवालिया, सुनीता सेनगुप्ता, सना कपूर और निर्देशक हर्ष छाया।
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अंग्रेजी में कहते हैं :  पार्टनर के प्रति सच्चा प्यार

 फिल्म 'अंग्रेजी में कहते हैं' जीवनयापन के ही काम में लगे मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी है।  निर्देशक ने दिखाया है किस तरह आज भी हमारे समाज में मर्दवादी सोच की बहुलता है। स्त्री को घर के काम के लिए ही उपयुक्त समझा जाता है और मर्द जो चाहे वो करे ऐसा आज भी भारत के ज्यादातर हिस्सों में होता है। निर्देशक हरीश व्यास ने एक सशक्त कहानी के खूबसूरत चित्रण के जरिये समाज को आइना दिखाने का काम किया है।
 कहानी वाराणसी में रहने वाले यशवंत बत्रा (संजय मिश्रा) और उनकी पत्नी किरण (एकवली खन्ना) के जीवन के इर्दगिर्द घूमती है। इन दोनों की एक लड़की है। जीवन की आपाधापी में कभी यशवंत को अपनी पत्नी को आई लव यू कहने या उसे प्यार जताने का मौका ही नहीं मिला। उसे तो बस यही लगता था कि शादी हो गयी है तो प्यार तो है ही। यशवंत सरकारी नौकरी करता है और चाहता है कि उसकी बेटी प्रीती (शिवानी रघुवंशी) शादी करके अपने ससुराल में घर का कामकाज करे। लेकिन प्रीती की सोच अपने पिता के विपरीत है। वह पड़ोस के लड़के जुगनू (अंशुमान झा) से प्यार करती है। पिता की मर्जी के खिलाफ वह जुगनू से छिप कर मंदिर में शादी कर लेती है। इससे यशवंत अपनी पत्नी से नाराज रहने लगता है और एक दिन वह उसे यह कह देता है कि जिस तरह प्रीती चली गयी उसी तरह तुम भी मुझे छोड़ कर जा सकती हो। यह बात सुन कर किरण घर छोड़ कर चली जाती है। कुछ दिनों बाद यशवंत की मुलाकात फिरोज (पंकज त्रिपाठी) और सुमन (इप्शिता चक्रवर्ती) से होती है। दोनों अलग-अलग धर्मों के हैं लेकिन इसके बावजूद दोनों ने शादी की और सुमन जानलेवा बीमारी के कष्ट से जूझ रही है। ऐसे में फिरोज उसका पूरा साथ दे रहा है। इन दोनों के इस निश्छल प्यार को देख कर यशवंत को अपने पर पछतावा होने लगता है और वह सोचता है कि उसने कभी अपनी पत्नी को प्यार नहीं किया। वह परेशान हो जाता है और अपनी पत्नी को वापस लाने का निर्णय लेता है। लेकिन क्या किरण वापस आती है फिल्म देखकर ही पता चलेगा।
 अभिनय के मामले में संजय मिश्रा प्रभावी रहे। उन्होंने गजब का काम किया है। पंकज त्रिपाठी का काम भी दर्शकों को पसंद आयेगा। एकवली खन्ना, शिवानी रघुवंशी, इप्शिता चक्रवर्ती और बृजेंद्र काला अपनी अपनी भूमिकाओं में प्रभावी रहे। फिल्म के संवाद अच्छे बन पड़े हैं। फिल्म का दूसरा भाग कुछ ज्यादा ही नाटकीय लगा है। गीत-संगीत सामान्य है। निर्देशक हरीश व्यास जरा क्लाइमैक्स पर और मेहनत करते तो यह और अच्छी फिल्म बन सकती थी।
 कलाकार- संजय मिश्रा, पंकज त्रिपाठी, अंशुमान झा, शिवानी रघुवंशी, इप्शिता चक्रवर्ती, बृजेंद्र काला और निर्देशक- हरीश व्यास।