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पूर्वी लद्दाखमें एलएसीपर तनाव

 भारतने जयशंकर - डोभाल को रखा बातचीतसे दूर
नयी दिल्ली नयी दिल्ली (एजेंसी)। पूर्वी लद्दाख में जो हो रहा है, उसे टाला नहीं जा सकता था क्योंकि कोरोना वायरस की जानकारी छिपाने को लेकर दुनियाभर से फजीहत झेल रहे चीन ने ध्यान भटकाने का यही रास्ता चुना है। चीन की रणनीति है कि भारत के साथ विवाद उस हद तक बढ़े कि पूरी दुनिया की चिंता कोरोना से हटकर दो बड़े देशों के बीच शांति बहाली के प्रयासों की तरफ शिफ्ट हो जाए। भारत ने चीन की इसी चाल को समझकर बिल्कुल संयम बरतने का फैसला किया और विवाद को बिल्कुल स्थानीय स्तर तक सीमित रखने की ठान ली।  यही वजह है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा(एलएसी) पर भारतीय और चीनी सैनिकों के एक-दूसरे की आखों में आखें डाले डटे रहने का एक महीना होने जा रहा है, लेकिन मोदी सरकार ने चीन से बातचीत के लिए न विदेश मंत्री एस. जयशंकर और न तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार(एनएसए)अजित डोभाल को मैदान में उतारा है। चीन की बढ़ती बौखलाहट का एक वजह यह भी है कि भारत उसकी चाल में नहीं फंस रहा। यह ट्राइड ऐंड टेस्टेड स्ट्रैटिजी है कि दुश्मन को दर्द देना है तो उसकी अपेक्षाओं पर पानी फेरो। भारत चीन के साथ यही कर रहा है। वरिष्ठ पत्रकार इंद्राणी बागची ने परेशान हाल चीन की मजबूरियों और भारत की सटीक रणनीति पर हमारे सहयोगी अखबार द इकनॉमिक टाइम्स में एक लेख लिखा है। वो कहती हैं कि चीन ने लद्दाख में जो बखेड़ा खड़ा किया है, उसका मूल कारण न जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करना है, न एलएसी के पास तेजी से ढांचगत निर्माण और न ही चीन से भारत आने वाले प्रत्यक्ष विदेश निवेश (स्नष्ठढ्ढ) पर पहरेदारी का फैसला। चीन को आर्टिकल 370 हटाने का खुन्नस निकालना होता तो वह अगस्त 2019 में ही अपना रंग दिखा सकता था। इसी तरह, एलएसी पर भारत की सड़कें सालों से बन रही हैं, वह बहुत पहले ही अड़ंगा डाल सकता था।