सम्पादकीय

सतत् गतिशील है प्राणशक्ति

प्राण नहीं तो जीवन नहीं। उपनिषदके तीसरे अनुवाकमें प्रारम्भका कथन ध्यान देने योग्य है। कहते हैं- प्राणं देवा अनु प्राणन्ति। मनुष्य: पशवश्च ये। यहां देवताओं, मनुष्यों और पशुओंको प्राणका अनुसरणकर्ता बताया गया है। बड़ी बात है कि देवता भी प्राणपर निर्भर हैं। प्राण ही आयु है। प्राणके अभावमें शरीरका कोई अस्तित्व नहीं है। उत्तर वैदिककालमें […]

सम्पादकीय

महात्मा गांधीकी दृष्टिमें धर्मान्तरण

धर्मांतरणका क्या अर्थ है। क्या यह केवल किसी व्यक्ति उपासना पद्धति बदलनेको धर्मांतरण कहते हैं। क्या केवल यह इतनातक सीमित है। यदि ऐसा हो तो इसपर आपत्ति क्यों जतायी जाती है। वास्तवमें धर्मांतरणका अर्थ उपासना पद्धति बदलनेतक सीमित नहीं है। धर्मांतरणसे आस्थाएं बदल जाती है, पूर्वजोंके प्रति भाव बदल जाता है। जो पूर्वज पहले पूज्य […]

सम्पादकीय

महात्मा गांधीका चंपारण सत्याग्रह

आज गांधीजीका १५१वां जन्मदिवस है। इस मौकेपर हम उनकी प्रासंगिकतापर थोड़ी चर्चा करेंगे। १९१७ से लेकर मृत्यपर्यंत रहे किसान उनके सत्याग्रहके केंद्र बिंदु रहे। उनके अनुसार, ‘अपनी मिट्टी और धरतीको खोदनेके तरीकेको भूलना, अपने अस्तित्वको भूलनेके बराबर हैÓ। जब बिहारके चंपारनमें किसानोंसे अंग्रेजों द्वारा नीलकी जबरन खेती करवायी जाती थी। जिसको तीन कठिया कानून कहा […]