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यहां नकल-ट्यूशन पाप है: गुरदासपुर का निराला शिक्षण संस्थान, जहां शिक्षक-वार्डन से लेकर स्वीपर तक सब छात्राएं


गुरदासपुर। यहां शिक्षक भी छात्राएं हैं और वार्डन भी, कुक और स्वीपर की जिम्मेदारी भी छात्राओं के पास है। यह संभवत: अपनी तरह का पहला ऐसा निजी शिक्षण संस्थान होगा, जहां हर जिम्मेदारी छात्राएं निभा रही हैं।

यहां न सिर्फ लड़कियों को बिना ट्यूशन फीस शिक्षा दी जा रही है, बल्कि उनके अभिभावकों की छोटी-मोटी जरूरतों को भी पूरा किया जा रहा है।

गुरदासपुर के तुगलवाल में सेवा भाव से चलाया जा रहा बाबा आया सिंह रियाड़की शिक्षण संस्थान मिसाल बन चुका है। यहां नर्सरी से लेकर ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई होती है।

बाबा आया सिंह रियाड़की डिग्री कालेज के प्रिंसिपल 80 वर्षीय स्वर्ण सिंह विर्क बताते हैं कि 1974 में 14 बच्चियों के साथ शुरू किए गए इस शिक्षण संस्थान में इस समय करीब 3500 छात्राएं हैं।

यहां नकल और ट्यूशन को पाप माना जाता है। अच्छे अंक लेने वाली छात्राओं को वजीफा दिया जाता है। कालेज में पिछले करीब पांच साल से परीक्षा परिणाम 100 प्रतिशत आ रहा है।

दस प्रतिशत छात्राएं मेरिट में रहती हैं। 60 प्रतिशत से अधिक छात्राएं प्रथम श्रेणी में पास होती हैं। कालेज प्रदेश में किसी पहचान का मोहताज नहीं है। यह गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी से मान्यता प्राप्त है।

प्रिंसिपल स्वर्ण सिंह विर्क ने इस शिक्षण संस्थान की शुरुआत जमीन लीज पर लेकर की थी। उस समय जमीन का सालाना ठेका पांच हजार रुपये था, जो अब बढ़कर ढाई लाख हो गया है।

उन्होंने इलाके की बच्चियों को अशिक्षित देखा, तो ऐसा संस्थान शुरू करने का विचार आया। तब अभिभावक बच्चियों को पढ़ाना अच्छा नहीं समझते थे।

इसीलिए उन्होंने ऐसा शिक्षण संस्थान बनाने की सोची जो बच्चियों की मुफ्त शिक्षा के साथ उनके अभिभावकों की जरूरतों को भी पूरा कर सके।

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अभिभावकों के लिए बाबे नानक दी हट्टी

अभिभावकों की रोजाना जरूरतों को पूरा करने के लिए बाबे नानक दी हट्टी के नाम से एक कार्नर बनाया गया है, जहां राशन के अलावा वर्दी, किताबें, कापियों के साथ पशुओं के लिए चारा तक उपलब्ध है।

बाबा आया सिंह रियाड़की कालेज में पढ़ने वाली छात्राएं अपने परिवार की रोजाना जरूरत की वस्तुएं यहां से ले जा सकती हैं।

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विद्यार्थी केंद्रित शिक्षा

संस्थान का पूरा सिस्टम विद्यार्थी केंद्रित शिक्षा पर आधारित है। स्कूल में अध्यापक से लेकर स्वीपर तक की जिम्मेदारी बच्चे ही निभाते हैं। बड़ी कक्षाओं की छात्राएं छोटी कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाती हैं।

संस्थान का उद्देश्य छात्राओं में लीडरशिप क्वालिटी पैदा करना है। छोटी कक्षाओं को पढ़ाने वाली गगनदीप कौर डबल एमए, बीएड, एमफिल तक की पढ़ाई कर चुकी हैं।

कई छात्राएं अन्य संस्थानों से पीएचडी कर रही हैं। वह बताती हैं कि आतंकवाद के दौर में उसके माता-पिता को आतंकियों ने मौत के घाट उतार दिया था।

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वह अपनी नानी के पास रहने के लिए आ गईं। उन्होंने तीसरी कक्षा में इस संस्थान में पढ़ाई शुरू की और अब वह पीएचडी कर रही हैं।

पढ़ाई के साथ-साथ वह कालेज में पढ़ने वाली छात्राओं को पढ़ा रही हैं। बीसीए सेकेंड ईयर की पढ़ाई कर रहीं गांव लीलकलां की नवजोत कौर ने बताया कि वह बचपन से ही इसी संस्थान में पढ़ी हैं।

अब वह बीसीए करने के साथ-साथ छोटे बच्चों को पढ़ा रही हैं। इसका फायदा यह हो रहा है कि उसकी बच्चों को पढ़ाने की प्रैक्टिस साथ ही चल रही है।

कालेज में आज तक किसी तरह का प्रोसपेक्टस नहीं छपवाया गया। कालेज के होस्टल में रहने वाली छात्राओं से साल में 6500 रुपये लिए जाते हैं।

अगर कोई छात्रा पैसे भरने में असमर्थ होती है, तो वह यहां बिना पैसे दिए रह सकती है। होस्टल में वार्डन से लेकर खाना बनाने तक की जिम्मेदारी छात्राओं की है। इसके लिए कमेटियां बनाई गई हैं।

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नकल पकड़वाने पर 21 हजार का पुरस्कार

प्रिंसिपल स्वर्ण सिंह विर्क का दावा है कि यहां पर परीक्षा के दौरान कोई भी बच्चा नकल नहीं करता। बच्चे खुद पैसे इकट्ठे कर परीक्षा केंद्र में नकल करते पकड़े जाने पर 21 हजार रुपये पुरस्कार रखते हैं। परीक्षा के दौरान बच्चों पर स्टाफ तैनात नहीं किया जाता।

कैसे निकलता है खर्च

कालेज ने सात एकड़ जमीन खेती के लिए किसानों को ठेके पर दी है। इससे बदले में उन्हें साल भर के अनाज के अलावा प्रति एकड़ ठेका शुल्क भी मिलता है। इसके अलावा होस्टल फीस भी ली जाती है।

पुरानी व कबाड़ हो चुकी वस्तुओं को रीसाइकल करने के लिए विशेष स्टोर बनाया गया है। इन वस्तुओं को बेचकर कमाई होती है। हर साल करीब एक से डेढ़ लाख रुपये जुटाए जाते हैं।

प्रिंसिपल विर्क कहते हैं कि हम खर्च का हिसाब-किताब नहीं रखते। उनका मानना है कि यह सब हेराफेरी के लिए और कागजी खानापूर्ति के लिए किया जाता है। कालेज का पूरा परिसर 15 एकड़ में फैला हुआ है।

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छात्राएं भी करती हैं खेती, अपनी आटा चक्की, गन्ना पिराई की मशीनें

एक एकड़ क्षेत्र में छात्राएं खुद खेतीबाड़ी करती हैं। यहां आर्गेनिक खेती की जाती है। किसी भी तरह की रासायनिक खाद या दवा का प्रयोग नहीं किया जाता।

कूड़े से देसी खाद तैयार करने के लिए अलग से जगह का प्रबंध किया गया है। छात्राएं यहां दाल व सब्जियां आदि उगाती हैं। अब यहां लहसुन, प्याज, मिर्च आदि की खेती की तैयारी की जा रही है।

कालेज को छह जोन में बांटा गया है। हर जोन अपने हिस्से के खेत में सब्जियां आदि उगाता है। इसकी पूरी जिम्मेदारी छात्राओं पर ही रहती है।

कालेज की अपनी आटा चक्की, गन्ना पिराई की मशीनें, गन्ने से गुड़ तैयार करने के प्लांट हैं। यहां इस्तेमाल होने वाली हर वस्तु कालेज में ही तैयार होती है।

कालेज में चीनी का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया जाता है। उसकी जगह पर गुड़ या शक्कर का प्रयोग होता है। सेंधा नमक भी प्रयोग किया जाता है।

गोबर गैस प्लांट

कालेज में पशु भी रखे गए हैं। छात्राओं को यह सुविधा दी गई है कि अगर उनके परिजन घरों में पशु रखना चाहते हैं तो कालेज की ओर से उन्हें फ्री चारा दिया जाएगा।

यहां गोबर गैस प्लांट चलाया जाता है। इस गैस से कालेज की रसोई में छात्राएं खुद खाना तैयार करती हैं। बाकी बचने वाले गोबर को खाद के तौर पर प्रयोग किया जाता है।

गोबर गैस की सप्लाई से रोजाना एक हजार रुपये की बचत की जाती है। इसके अलावा सोलर पावर प्लांट लगाया गया है। जिससे हर साल बिजली के बिल में दस हजार रुपये की कटौती की जाती है।

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सादगी के लिए सफेद वर्दी

बच्चों में सादगी और समानता की भावना पैदा करने के लिए सफेद रंग की वर्दी पहनना जरूरी किया गया है। सप्ताह के सभी दिनों में सफेद वर्दी, सफेद दुपट्टा और पूरी बाजू की कमीज पहनना जरूरी है।

अनुसाशन को यहां उच्च प्राथमिकता दी जाती है। कालेज का प्रबंध चलाने के लिए बच्चों की कमेटियां बनाई गई हैं, इन कमेटियों के सदस्य पूरा काम व्यवस्थित ढंग से करते हैं। कमेटी के कार्यों के लिए खुद जिम्मेदार भी होते हैं।

कीर्तन से दिन की शुरुआत

छात्राओं के दिन की शुरुआत गुरुबाणी कीर्तन के साथ होती है। छात्राओं को विरासत से जोड़े रखने के लिए विरासत घर तैयार किया गया है। जहां पर पुरातन वस्तुओं को सहेजकर रखा गया है।

बच्चे हर पर्व पर मैगजीन तैयार करते हैं। खास बात यह है कि स्कूल में किसी भी पर्व पर छुट्टी नहीं होती। स्कूल में ही हर त्योहार मनाया जाता है।

विरासत घर में बलिदानियों की पुरानी तस्वीरों के अलावा उनके मृत्यु प्रमाण पत्र भी सहेजकर रखे गए हैं। संग्रहालय में कालेज की शुरुआत के समय से अब तक होने वाले सभी आयोजनों की हजारों तस्वीरें लगाई गई हैं।

गेट से शुरू हो जाते है स्लोगन बोर्ड

जैसे ही कालेज के मुख्य गेट से प्रवेश किया जाए तो पूरे रास्ते में दोनों तरफ सैकड़ों स्लोगन बोर्ड लगाए गए हैं। इन पर कालेज के विद्यार्थी रोज नए विचार लिखते हैं, ताकि उन्हें जीवन में अमल में ला सकें। इसके साथ ही एक तरफ पंजाब का पूरा इतिहास दर्शाते नक्शे तैयार करवाए गए हैं।

बच्चों को इनाम में मिलती है एफडी

कालेज प्रबंधकों ने बच्चों को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए एक अनोखा प्रयास किया है। विभिन्न गतिविधियों में पुस्कार जीतने वाले बच्चों को नकद पुरस्कार दिया जाता है।

यह पैसे उन्हें सौंपे नहीं जाते, बल्कि उसकी उनके नाम पर एफडी करवा दी जाती है। इसके लिए बच्चों के खाते भी खुलवाए गए हैं और अब तक 3.74 लाख रुपये की एफडी करवाई जा चुकी हैं।

बलिदानियों की याद में कारगिल पार्क

कारगिल जंग के दौरान बलिदान होने वाले जिले के सैनिकों की याद में कालेज के बाहर कारगिल शहीद यादगारी पार्क का निर्माण करवाया गया है।

इस पार्क में लगे पौधे शहीदों के परिजनों की ओर से लगाए गए थे, जो अब वृक्ष बन चुके हैं। पार्क में शहीद दलबीर सिंह, हरबंस मल्ल, कुलबीर सिंह, मुकेश कुमार, सतवंत सिंह, निर्मल सिंह और मेजर सिंह की याद में पौधे लगाए गए हैं।

प्रिंसिपल विर्क ने भावुक होते हुए बताया कि जब शहीदों के परिजन इस पार्क में पहुंचते हैं तो इन वृक्षों को अपने बच्चे समझकर उनसे लिपट जाते हैं।

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कालेज में पांच मुख्य स्थल

1. कैरेक्टर शाला

कैरेक्टर शाला में छात्राएं धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करती हैं। जहां श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के प्रकाश के अलावा कुरान, बाइबल, गीता आदि जैसे तमाम ग्रंथ रखे गए हैं। छात्राएं अपनी रुचि के हिसाब से रोजाना इनका पाठ करती हैं।

2. बैटर इंग्लिश

बैटर इंग्लिश के तहत विशेष कमरे का निर्माण किया गया है। जहां पर इंग्लिश ग्रामर की पुस्तकें रखी गई हैं। कोई भी छात्रा इंग्लिश का ज्ञान बढ़ाने के लिए इन पुस्तकों को पढ़ सकती है।

3. लाइब्रेरी

कालेज में विशेष तौर पर लाइब्रेरी बनाई गई है। जहां पर ऐतिहासिक महत्व व विभिन्न विषयों से जुड़ी हजारों किताबें रखी गई हैं। छात्राएं रोज यहां पर बैठकर किताबें पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ाती हैं।

4. न्यूज पेपर स्टैंड

छात्राओं को रोजाना की जानकारी से जोड़ने के लिए न्यूज पेपर स्टैंड बनाया गया है। जहां पर वह हर भाषा के अखबारों का अध्ययन करती हैं। यही नहीं वह यहां पर खुद के लिए लिखे हुए लेख भी स्टैंड पर चिपकाती हैं।

5. कंप्यूटर लैब

छात्राओं को तकनीकी ज्ञान देने के लिए कंप्यूटर लैब तैयार की गई है। जहां पर करीब 20 कंप्यूटर इंस्टाल किए गए हैं।

कारसेवा से जुड़े थे बाबा आया सिंह रियाड़की

बाबा आया सिंह रियाड़की गुरमुख सिंह पटियाला वाले के जत्थे के साथ कारसेवा करते थे। उनके कुछ रिश्तेदार धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बन गए थे।

जब बाबा ने उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि उनकी बेटियों के लिए पढ़ने का कोई प्रबंध नहीं है। अगर वह उन्हें ऐसा करने से रोकना चाहते हैं, तो उनके लिए शिक्षा का प्रबंध करें।

इसके बाद बाबा ने 1925 में ‘पुत्री पाठशाला’ खोली। 23 अप्रैल, 1968 को बाबा का निधन हो गया। उसके बाद प्रिंसिपल स्वर्ण सिंह विर्क ने उनकी याद में 1974 में बाबा आया सिंह रियाड़की कालेज की शुरुआत की।