वाराणसी

संत महापुरुषोंकी शिक्षाको करें आत्मसात-बाबा अवधूत गुरुपद

मां महा मैत्रायणी योगिनीका श्रद्धापूर्वक मनाया गया निर्वाण दिवस
ग्राम डोमरी के अघोरेश्वर भगवान राम घाट स्थित अघोरेश्वर महाविभूति स्थल के पुनीत प्रांगण में परमपूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी की जननी मां महा मैत्रायणी योगिनी जीश् का २९ वां निर्वाण दिवस श्रद्धा एवं भक्तिमय वातावरण में मनाया गया। सेवकों द्वारा आश्रम परिसर की साफ. सफ ाई की गई। बाबा गुरुपद संभव राम जी ने परमपूज्य अघोरेश्वर महाप्रभु एवं माताजी की समाधि पर माल्यार्पण, पूजन एवं आरती किया। इसके बाद श्री पृथ्वीपाल जी ने सफलयोनि का पाठ किया। तत्पश्चात् पूज्य बाबा जी ने हवन-पूजन किया। इस अवसर पर संस्था के अध्यक्ष बाबा अवधूत गुरुपद संभव राम ने कहाकि हमलोग आश्रमों में संत-महापुरुषों के यहाँ आते-जाते हैं तो उनकी शिक्षाओं को आत्मसात करें। रास्ते में बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो हमको भटकाव की तरफ ले ही जाती हैं और हमलोग पहुंच नहीं पाते हैं। हम उन आश्रमों में, विहारों में उन महापुरुषों की बातों को सुनते हैं, लेकिन चिंतन-मनन नहीं करते हैं, उन पर चलने का प्रयत्न नहीं करते हैं, उसके अर्थ को समझने का प्रयत्न नहीं करते हैं। अवसर सामने आन पड़ता है तो वह हमारे व्यवहार से प्रकट हो जाता है कि हमने उन बातों को शायद अनसुनी कर दिया या समझा ही नहीं। हमलोगों की दशा ठीक वैसी ही हो जाती है कि श्लाख तोते को पढाया फिर भी हैवां ही रहाश्। वह तो पशु-पक्षी हैं और वही रहेंगे, चाहे कितना भी उनको पड़ा दें। वह भी कुछ हद तक समझदार होते हैं, लेकिन हम तो मनुष्य हैं। सुख और दु:ख जिसको हम समझते हैं. या तो वह सामग्री से हमलोग सुखी होते हैं, या उस मोह से, माया से, ममता से, लगाव से ग्रसित होकर हमारी बुद्धि हरी जाती है। संसार में दु:ख.सुख दोनों है, परन्तु इसमें दु:ख-ही-दु:ख अधिक है। क्योंकि जो भी हमारे सामने है चाहे वह सामग्री हो, चाहे घर, जमीन-जायदाद, रुपया-पैसा-जेवर हो, चाहे हमारे परिजन हों, मित्र-साथी हों, बड़े हों, छोटे हों, किसी का समय निश्चित नहीं होता है। कब, कौन, किस समय साथ छोड़ देता है। यह तो क्षणभंगुर संसार है ही। हम दुखित होते हैंए हम रोते हैं तो हमारी आत्मा को भी वह तकलीफ होती है। हम अपने ही अपने को नहीं समझ पाते हैं, अपने ही अपने को नहीं देख पाते हैं, अपने अपने में नहीं रह पाते हैं। अपने ही अपने को नही देख पाते है।