सम्पादकीय

आयकरमें वृद्धि आवश्यक


बीते कई वर्षोंसे सरकार लगातार आयकर, जीएसटी और आयत करकी दरोंमें कटौती करती आ रही है। यह कटौती सार्थक होती यदि साथ-साथ अर्थव्यवस्थामें गति आती जैसे हल्का भोजन करनेसे शरीरमें तेजी आती है। लेकिन कटौतीके कारण सरकारके राजस्वमें उलट गिरावट आयी है। अर्थव्यवस्थाके मंद पड़े रहनेके कारण राजस्वमें भी गिरावट आयी है। सरकारका घाटा तेजीसे बढ़ रहा है जैसे व्यक्ति हल्का भोजन करे लेकिन प्रदूषित क्षेत्रमें रिहाईश करे तो हल्का भोजन निष्प्रभावी हो जाता है। राजस्वमें गिरावटकी यह परिस्थिति ज्यादा दिनतक नहीं टिक सकती है उसी तरह जैसे ऋण लेकर घी पीनेकी प्रक्रिया ज्यादा दिनतक नहीं चलती है। चार्वाकके सिद्धांत ‘ऋणं कृत्वा घृतम पिवेत[ से काम नहीं चलेगा। अंतत: सरकारको अपने उन खर्चोंको कम करना होगा जो उत्पादक नहीं हैं जैसे मूर्तियां बनाना। बीते वर्षोंमें सरकारने आयकरमें बड़ी कम्पनियों और छोटे करदाताओं सभीको कुछ न कुछ छूट दी है।
अपेक्षा थी कि आयकरकी दरमें कटौती होनेके कारण आयकरदाताओंके हाथमें ज्यादा रकम बचेगी और वह बाजारसे माल अधिक मात्रमें खरीदेंगे और खपत अधिक करेंगे। साथ ही बड़े उद्योगोंके हाथमें ज्यादा रकम बचेगी और वह ज्यादा निवेश करेंगे। इस प्रकार बाजारमें खपत और निवेशका सुचक्र स्थापित हो जायगा। इस सुचक्रके स्थापित होनेसे पुन: सरकारको अधिक मात्रमें आयकर मिल जायगा। आयकरकी दरको घटानेसे अर्थव्यवस्था गति पकड़ लेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। कारण यह है कि आयकर मुख्यत: देशका समृद्ध वर्ग अदा करता है। यदि सरकारने इस वर्गको आयकरमें सौ रुपयेकी छूट दी तो हम मान सकते हैं कि ५० रुपया वहे बचत करेंगे। इस रकमका निवेश वह शेयर बाजार, विदेशमें अथवा सोना खरीदनेमें करेंगे। शेष ५० रुपये यदि वह खपतमें लगाते हैं तो हम मान सकते हैं कि इसमेंसे २५ रुपये विदेशी माल खरीदनेमें, विदेश यात्रा करनेमें अथवा बच्चोंको विदेशमें पढऩेको भेजनेमें लगायेंगे। इस प्रकार २५ रुपया विदेश चला जायेगा। अंतमें केवल २५ रुपयेकी देशके बाजारमें मांग उत्पन्न होगी। सरकारका घाटा सौ रुपये बढ़ेगा जबकि बाजारमें मांग २५ रुपयेकी बढ़ेगी। न्यून मात्रामें मांग उत्पन्न होनेसे निवेशकोंकी निवेश करनेकी रुचि नहीं बनेगी। इस हानिप्रद नीतिको अपनानेके कारण समृद्ध वर्गके करदाताओंके हाथमें रकम बची लेकिन वह रकम बाजारमें न आकर या तो बैंकोंमें जमा हो गयी अथवा विदेशोंमें चली गय। इसलिए टैक्सकी दरोंमें कटौतीके बावजूद देशकी अर्थव्यवस्था कोविड संकट आनेके पहलेसे ही मंद पड़ी हुई है और इसमें गति नहीं आ रही ह। कोविडने इसे और पस्त कर दिया है।
टैक्समें कटौती करनेका दूसरा पक्ष घाटेकी भरपाईका है। सरकारके खर्च बढ़ते जा रहे हैं लेकिन टैक्समें छूट देनेसे राजस्वमें कटौती हो रही है। इसलिए सरकारका घाटा बढ़ रहा है। इस घाटेकी भरपाई सरकार बाजारसे ऋण लेकर पूरी करती है। इसी घाटेको वित्तीय घाटा कहा जाता है। जैसा ऊपर बताया गया है इस चालू वर्ष २०२०-२१ में यह घाटा जीडीपीका ३.५ प्रतशतसे बढ़कर सात प्रतिशत होनेको है। यह बढ़ता वित्तीय घाटा एक या दो वर्षके लिए सहन किया जा सकता है जैसे दुकानदार बैंकसे ऋण लेकर यदि अपने शोरूमका नावीनीकरण करे और उसकी बिक्री बढ़ जाये तो एक या दो वर्षके अन्दर वह अतिरिक्त बिक्रीसे हुई अतिरिक्त आयसे लिये गये ऋणका भुगतान कर सकता है। लेकिन यदि वह ऋण लेकर शोरूमका नवीनीकरण करे और बिक्री पूर्ववत रहे तो वह ऋणके बोझसे दबता जाता है, ब्याजका बोझ बढ़ता जाता है, उसकी आय घटती जाती है और अंतत: उसका दिवाला निकल सकता है। हालमें कुछ जानकारोंने बतायाकी दुकानदारोंने बैंकसे ऋण लेते समय जो पोस्ट डेटेड चेक दे रखे थे वह उनका भी भुगतान नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि उनकी आय दबावमें है। कुछ अपने व्यक्तिगत खर्चोंमें कटौती करके बैंकोंको कुछ रकमकी अदायगी कर रहे हैं। बैंककी वसूली हो भी जाये तो भी दूकानदारकी आय कम हो रही है, वह बाजारसे कम माल खरीद रहा है और बाजारमें मांग कम उत्पन्न हो रही है। अर्थव्यवस्था मंद पड़ी हुई है। ऋण लेना हानिप्रद होता है यदि उसके अनुसार कारोबारमें वृद्धि और मुनाफा न हो। आज देशकी यही परिस्थिति है। सरकार ऋण लेती जा रही है लेकिन अर्थव्यवस्था मंद पड़ी हुई है।
ऐसेमें वित्तमंत्रीके सामने चुनौती है। उत्तरोत्तर ऋण लेकर वह अर्थव्यवस्थाको नहीं सम्भाल पायंगी। उन्हें सख्त कदम उठाने पडेंगे। पहला कदम सरकारी घाटेको कम करनेका लेना होगा। मूर्तिया बनाने और सरकारी कर्मियोंको बोनस देनेपर विराम लगाना चाहिए, बल्कि कर्मियोंके वेतनमें ५० प्रतिशतकी कटौती करनी चाहिए। हालमें मुजफ्फरनगरके एक व्यापारीने बताया कि उनका व्यापार कोरोना पूर्वकी स्थितिसे अब आधेपर वापस लौटा है। उनकी आय पूर्वसे आधी हो गयी है। यही हाल लगभग देशके अधिकांश कारोबारियोंकी है। इसलिए जब सेवितकी आयमें ५० प्रतिशतकी कटौती हो गयी है तो सेवकोंकी आयमें भी उसी अनुपातमें ५० प्रतिशतकी कटौती करना उचित दिखता है। ऐसा करनेसे सरकारका घाटा घटेगा। समयक्रममें जब अर्थव्यवस्था पुन: ठीक हो जाये तो सेवकोंके वेतन पूर्ववत किये जा सकते हैं। इनकी नियुक्ति जनताकी सेवाके लिए की गयी है। जब सेवित मर रहा है तो सेवकको लड्ïडू खिलनेका क्या प्रयोजन है।
आगामी बजटमें सरकारको आयकरमें और कटौती नहीं करनी चाहिए, बल्कि आयकरमें वृद्धि करनी चाहिए। इससे समृद्ध वर्गपर टैक्सका बोझ बढ़ेगा लेकिन इनकी खपतमें ज्यादा कटौती नहीं होगी। जीएसटीकी दरमें कटौती करनी चाहिए क्योंकि इससे आम आदमीको राहत मिलेगी और बाजारमें मांग बढ़ेगी। आयातकरमें भी वृद्धि करनी चाहिए जिससे कि आयातित माल देशमें न आये और घरेलू उद्योगोंका विस्तार और समृद्धि हो। यदि वित्तमंत्री आयकर और आयात कर बढ़ाकर जीएसटीको कम करें तो अर्थव्यवस्था पुन: कुछ अंशतक पटरीपर आ सकती है।