सम्पादकीय

सही इलाजसे ही सिर दर्दसे छुटकारा सम्भव


 डा. अमोद मनोचा      

अमूमन हर उम्रका व्यक्ति सिरदर्दका अनुभव करता है। आम तौरपर सिरदर्द सौसे भी ज्यादा प्रकारके होते हैं, लेकिन कुछ प्रकार अन्यकी तुलनामें ज्यादा आम हैं। विश्व स्तरपर पिछले साल लगभग आधी दुनियाने कमसे कम एक बार सिरदर्दका अनुभव किया। वहीं कुछ लोग हर महीने १५ या ज्यादा दिनोंतक इसका अनुभव करते हैं। सिरदर्दको अक्सर हल्केमें लिया जाता है और तबतक नजरअंदाज किया जाता है, जबतक वह गंभीर बनकर जीवनकी गुणवत्ताको खराब न करने लगे। सर्वाइकोजेनिक सिरदर्द गर्दन यानीकी सिरके पिछले हिस्सेमें होता है। सही निदानके साथ इसके कारणोंका सफल इलाज संभव है, जिसके बाद व्यक्तिको समस्यासे पूरी तरह राहत मिल जाती है। दुर्भाग्यसे जागरूकतामें कमीके कारण इसका निदान ही नहीं किया जाता है। आम तौरपर कॉर्पोरेट सेक्टरमें काम करनेवाले पेशेवरोंमें गर्दन दर्द, माइग्रेन और तनावके कारण होनेवाले सिरदर्दकी संभावना ज्यादा होती है। इसके मुख्य कारण तनावग्रस्त वातावरण और डिजिटल स्क्रीनपर लंबे समयतक काम करना हैं। हालिया लॉकडाउनमें डिजिटल स्क्रीनका इस्तेमाल बहुत ज्यादा बढ़ा है। वहीं, वर्क फ्रॉम होमके दौरान लोगोंने शरीरकी मुद्रापर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया, जिसके कारण सिरदर्द और रीढ़की समस्याओंमें वृद्धि हुई है। सरल शब्दोंमें कहा जाय तो यह दर्द सर्वाइकल स्पाइन या गर्दनसे शुरू होता है। हालांकि वास्तवमें समस्या गर्दनमें होती है, लेकिन इसका दर्द सिर और चेहरेके कुछ हिस्सोंमें फैल जाता है। इस समस्यासे ग्रस्त हर व्यक्तिकी गर्दनमें जकडऩ नहीं होती है, लेकिन उन्हें इसके दर्दका अनुभव अवश्य होता है। विभिन्न प्रकारकी चीजें गर्दनमें दर्दको ट्रिगर करती हैं, जैसे कि जॉइंट्स, डिस्क, गर्दनकी मांसपेशियां और आसपासके टिशू। गर्दनके ऊपरी जॉइंट्स रीढ़के ऊपरी हिस्सेके नर्व डिसॉर्डरसे जुड़े होते हैं, जो इस दर्दका मुख्य कारण है। व्यक्तिमें यह दर्द गर्दनको हिलाने या गर्दनके मूवमेंटमें कमीके साथ ट्रिगर हो सकता है। इस प्रकारके सिरदर्दमें आम सिरदर्दकी दवाइयां बिल्कुल असर नहीं करती हैं।

सर्वाइकोजेनिक सिरदर्द महिलाओंमें ज्यादा होता है। जिन कामोंमें सिरको लंबे समयके लिए झुकाकर रखना पड़ता है, जैसे कि हेयर स्टाइलिस्ट, ट्रक ड्राइवर आदिमें इसका खतरा ज्यादा है। तथ्य बताते हैं कि यह समस्या उन्हें ज्यादा परेशान करती है, जो लंबे समयसे तीव्र सिरदर्दकी समस्या और गर्दनकी मोचका शिकार हैं। आम तौरपर इसमें सिरका एक हिस्सा शामिल होता है, जिसमें गंभीर दबावका अहसास होता है, गर्दनको हिलानेपर दर्द बढ़ता है और आराम करनेसे राहत मिलती है। यह दर्द सिरके पीछे, आगे, ऊपर और साइडमें हो सकता है। कई बार यह दर्द आंखोंके आसपास महसूस होता है। इस सिरदर्दके साथ गर्दन और सिरमें जकडऩकी समस्या हो सकती है। साथ ही कई बार मरीजोंको हाथों, कंधों और जबड़ेमें भी दर्दका अनुभव होता है। इसके लक्षण कई अन्य प्रकारके सरिदर्दसे मिलते-जुलते हैं, इसलिए इसका सही निदान थोड़ा मुश्किल होता है। गंभीर होनेपर यह माइग्रेनका संकेत देता है। यहांतक कि यह दर्द अन्य सिरदर्दोंके साथ भी हो सकता है जैसे कि माइग्रेन, जिसके कारण इसका निदान करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। सिरदर्दकी जानकारीके अलावा मेडिकल इतिहासकी जानकारी जैसे कि तनावका स्तर, ऑफिसका वातावरण, आहार और नींदकी आदतें और मेडिकेशनकी आवश्यकता पड़ती है। सही निदानके लिए अक्सर परीक्षणों और जांचोंके साथ इंजेक्शनकी जरूरत भी पड़ती है। जांचे जैसे कि एक्स-रे, सीटी स्कैन और एमआरआई इसके निदानमें सहायक साबित होती हैं।

सर्वाइकोजेनिक सिरदर्दका इलाज इसके स्थानपर निर्भर करता है। अधिकतर मामलोंमें जीवनशैलीमें बदलाव, फिजिकल थेरेपी, मेडिकेशन, दर्द निवारक इंजेक्शन और कुछ मामलोंमें सर्जरीकी आवश्यकता पड़ती है। इस सिरदर्दसे लंबे समयके लिए राहतके लिए इसके मुख्य कारकों जैसे कि सोनेकी मुद्रा, सोनेकी गलत आदतें, ऑफिसमें गलत मुद्रामें बैठना और जीवनशैली संबंधी अन्य आदतोंकी पहचान आवश्यक है। फिजिकल थेरेपीकी मददसे भी लक्षणोंमें लंबे समयके लिए राहत मिलती है। मेडिकेशन जैसे कि एंटी-इंफ्लेमेटरी, मांशपेशियोंको रिलैक्स करनेवाली दवाएं और पेन किलर्स आदिकी सलाह दी जाती है। हालांकि इनके फायदे सीमित होते हैं, लेकिन फिजिकल थेरेपीके साथ इनका सेवन मरीजको समस्यासे राहत देता है। गर्दनके जोड़, नसों या मांसपेशियोंके इंजेक्शनके मुख्य उपचारमें शामिल हैं क्योंकि ये न सिर्फ निदानकी पुष्टि करते हैं, बल्कि दर्दमें भी राहत देते हैं। सिरदर्दमें लंबे समयके राहतके लिए एक्स-रे मार्गदर्शनके साथ रेडियोथेरेपी प्रक्रियाका इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि सर्जरीकी जरूरत हमेशा नहीं पड़ती है, लेकिन गंभीर मामलोंमें कोई विकल्प न रहनेपर सर्जरी करना जरूरी हो जाता है।

इसके अलावा सबसे आम बीमारी है जोड़ोंका दर्द। जोड़ोंमें कई बार उठते-बैठते अचानक कट-कटकी आवाज आती है, जिसे लोग अक्सर सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। वास्तवमें यह गठियाका संकेत हो सकता है। जोड़ोंमें आनेवाली कट-कटकी इस आवाजको मेडिकल भाषामें क्रेपिटस कहा जाता है। यदि कट-कटकी आवाजके अलावा कोई अन्य समस्या नहीं है तो घबरानेकी आवश्यकता नहीं है। लेकिन यदि इसके साथ अन्य लक्षण भी जुड़े हुए हैं तो जल्दसे जल्द समस्याकी जांचकी जरूरत है। कट-कटकी आवाजका कारण जोड़ोंके भीतर मौजूद द्रवके साथ जुड़ा हुआ है। इस द्रवमें हवाके कारण बने बुलबुले फूटने लगते हैं, जिसके कारण जोड़ोंमें कट-कटकी आवाज आती है। जब जोड़ोंके मूवमेंटके दौरान वहां मौजूद कार्टिलेज घिसने लगते हैं तो ऐसेमें क्रेपिटसकी समस्या होती है। आवाजकी समस्या जोड़ोंके मुडऩे, स्क्वाट्स करने, सीढिय़ां चढऩे-उतरने, कुर्सी या जमीनसे उठने आदिके दौरान हो सकती है। आम तौरपर इस समस्यामें चिंतावाली कोई बात नहीं है, लेकिन यदि कार्टिलेज रफ हो जाय और आवाजके साथ दर्दकी शिकायत भी होने लगे तो यह धीरे-धीरे ऑस्टियोपोरोसिसकी बीमारीमें बदल जाती है।

ऑस्टियोपोरोसिस एक प्रकारकी गठियाकी बीमारी है, जिसमें हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। इसमें फ्रेक्चरका खतरा बहुत ज्यादा रहता है। ऑस्टियोपोरोसिसके अन्य कारणोंमें खान-पान, बदलती लाइफस्टाइल, व्यायामकी कमी, शराबका अत्यधिक सेवन, शरीरमें कैल्शियम, विटामिन डी और प्रोटीनकी कमी आदि शामिल हैं। क्रेपिटस या ऑस्टियोपोरोसिसके मरीजको एक दिनमें १०००-१५०० मिलीग्राम कैल्शियमका सेवन करना चाहिए। दूध और दूधसे बनी चीजें, हरी पत्तेदार सब्जियां, फल, ओट्स, ब्राउन राइस, सोयाबीन आदिका सेवन करें। भुने चनेके साथ गुड़ खानेसे कट-कटकी आवाज दूर होती है। इसमें मौजूद कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन और विटामिन हड्डियोंको मजबूती प्रदान करते हैं।

वर्कआउटसे पहले वॉर्मअप जरूर करें क्योंकि वॉर्मअप हड्डियों और मांसपेशियोंको लचीला बना देता है, जिससे जोड़ोंमें आवाजकी समस्याकी शिकायत नहीं होती है। यदि आपका वजन बहुत ज्यादा है तो वजनको कम करें क्योंकि मोटापा गठियाकी बीमारीको जन्म देता है। आवाजके साथ जोड़ोंमें दर्द भी है तो जल्दसे जल्द हड्डीके किसी अच्छे डॉक्टरसे समस्याकी जांच करायें। विटामिन डीका सबसे अच्छा स्रोत सूरजकी रोशनी है। हर दिन १५ मिनटके लिए धूपमें बैठनेसे हड्डियोंकी कमजोरी दूर होती है। टहलने और दौडऩेसे न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक क्षमता भी बढ़ती है। वजन उठानेवाली कसरत, चलना, दौडऩा, सीढिय़ां चढऩा, ये व्यायाम हर उम्रमें हड्डियोंको स्वस्थ बनाये रखनेमें लाभदायक हैं। पानी कई बीमारियोंका रामबाण इलाज होनेके साथ यह हड्डियोंको भी मजबूत एवं लचीला बनाता है। पानीकी पार्याप्त मात्राके सेवनसे हड्डियोंमें जकडऩकी समस्या भी दूर होती है। यह तो आपने देखा ही होगा कि कैसे छोटे शिशुकी रोज मालिश की जाती है, जिससे उसकी नाजुक हड्डियां मजबूत बन सकें। इसी प्रकारसे हर उम्रके लोगोंको अपने जोड़ोंकी रोज मालिश करनी चाहिए।