सम्पादकीय

अन्नदाताकी मेहनतका परिणाम


डा. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

खरीफ फसलोंकी एमएसपीकी घोषणा करते हुए आयोगनेफसलोंकी एमएसपीमें भी उल्लेखनीय वृद्धि कर दलहनी फसलोंके प्रति काश्तकारोंको प्रेरित करनेका प्रयास किया है। पिछले सात महीनोंसे चल रहे किसान आन्दोलनको देखते हुए यह सरकारका एकतरफा परन्तु सकारात्मक निर्णय माना जा सकता है। २००४ में एमएस स्वामीनाथन आयोगने अपनी सिफारिशमें न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करनेका एक फार्मूला सुझाया था कि उत्पादन लागतसे कमसे कम ५० प्रतिशत अधिक एमएसपी घोषित की जाय। इसीको ध्यानमें रखते हुए खरीफ एमएसपीकी घोषणा मानी जा सकती है। हालांकि अभी यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है कि सरकारने जो एमएसपीकी घोषणा की है उसका पूरा-पूरा लाभ काश्तकारोंको कैसे मिलें। इसके लिए घोषित एमएसपीके स्तरपर मण्डियोंमें भाव आते ही स्वत: खरीदकी व्यवस्था हो तभी किसानोंको इसका लाभ मिल सकता है नहीं तो यह सब कागजी घोषणाएं रह जाती है और सरकारकी घोषणाओंका फायदा आम किसानको न मिलकर बिचौलियोंको मिल जाता हैै। देखा जाय तो हिन्दुस्तान ही नहीं, बल्कि दुनियाके देशोंमें इस कोरोना महामारीके दौरमें कृषि ही बड़ा संबल रही है। जब सबकुछ ठहर गया तब खेती-किसानी ही ऐसी रही जो लगातार पूरी दमखमसे चलती रही और अच्छे उत्पादनसे अर्थव्यवस्थाको राहत दी तो दूसरी और अन्नदाताकी मेहनतका परिणाम रहा कि कहींपर भी खाद्य पदार्थोंको लेकर कोई समस्या नहीं आयी। हमारी अर्थव्यवस्थाको तो बचानेमें खेती किसानीकी खास भूमिका रही तो देशभरमें कहीं भी अन्नधनकी कोई कमी नहीं रही। हालांकि आज दलहन-तिलहनोंके भावोंमें बेतहासा वृद्धि हो रही हैं और लोगोंके दैनिक जीवनपर यह महंगी भारी पड़ रही है। परन्तु सबसे खास बात यह कि कोरोना लाकडाउन और अनलाक अवधिमें भी करोड़ों लोगोंको सरकार द्वारा नि:शुल्क अनाज वितरित किया गया है और यह सब अच्छे मानसून और हमारे अन्नदाताकी मेहनतका परिणाम है।

किसानोंको कमसे कम उनकी लागतका लाभकारी मूल्य दिलानेके लिए सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्यकी घोषणा की जाती है। देशमें पहली बार १९६६-६७ में सबसे पहले गेहूंकी सरकारी खरीदके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्यकी घोषणा की गयी थी। तत्कालीन प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्रीने एक अगस्त १९६४ को एल.के. झाकी अध्यक्षतामें इसके लिए कमेटी घटित की थी। गेहूंकी समर्थन मूल्यपर खरीद व्यवस्थाका एक विपरीत प्रभाव सामने आनेपर कि किसान अन्य फसलोंकी जगह गेहूंकी फसलपर ही केन्द्रित होने लगे तो ऐसी स्थितिमें सरकारने अन्य प्रमुख फसलोंके न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करनेकी ओर कदम बढ़ाये। केन्द्र सरकार द्वारा सीएसीपी यानी कि कृषि मूल्य एवं लागत आयोगकी सिफारिशपर कृषि जिंसोंके न्यूनतम समर्थन मूल्यकी घोषणा की जाने लगी। आज देशमें २३ फसलोंके न्यूनतम समर्थन मूल्यकी घोषणा की जाती है। इसमें सात गेहूं, धान आदि अनाज फसलें, पांच दलहनी फसलें, सात तिलहनी फसलों, चार नकदी फसलोंके समर्थन मूल्यकी घोषणा की जाती है। नकदी फसलोंमें गन्नाके सरकारी खरीद मूल्यकी सिफारिश गन्ना आयोग द्वारा की जाती है तो गन्नेकी खरीद भी सीधे गन्ना मिलों द्वारा की जाती है। इसी तरहसे कपासकी खरीद सीसीआई यानी कि कॉटन कारपोरेशन ऑफ इण्डिया द्वारा की जाती है। मुख्य तौरसे अनाजकी खरीद भारतीय खाद्य निगमके माध्यमसे और दलहन एवं तिलहनकी खरीद नेफैड द्वारा राज्योंकी सहकारी संस्थाओं और अन्य खरीद केन्द्रोंके माध्यमसे की जाती है। केरल सरकारने १६ तरहकी सब्जियोंके बेस मूल्य तय करनेकी पहल की है तो अब हरियाणा सरकार भी केरलकी तरह सब्जियोंका बेस मूल्य तय करनेपर विचार कर रही है।

आज किसान आन्दोलनका केन्द्रीय बिन्दु एमएसपी ही है। नये कानूनमें किसानोंको अपनी उपज कहीं भी बेचनेके लिए स्वतंत्र करनेसे आन्दोलनकारियोंको लग रहा है कि मण्डी व्यवस्था प्रभावित होगी परन्तु सरकारने कई मंचों एवं कई बार यह स्पष्ट कर दिया है कि मण्डी व्यवस्था भी रहेगी तो एमएसपी व्यवस्था भी जारी रहेगी और इस विषयमें किसी तरहका संदेह नहीं किया जाना चाहिए। एमएसपीपर खरीद व्यवस्थाका विश्लेषण किया जाय तो कुछ दशकों पहलेतक स्थितियां बिल्कुल अलग थी। सार्वजनिक वितरण प्रणालीके तहत वितरण व्यवस्थाके सुचारु संचालन और बाजारपर नियंत्रण के लिए गेहूं और धानकी खरीद सरकार द्वारा व्यापक स्तरपर की जाती रही है। अन्य फसलोंका जहांतक सवाल है देशके अधिकांश प्रदेशोंमें खाद्यान्नोंकी खरीद एफसीआई द्वारा राज्योंके मार्केटिंग फैडरेशनोंके माध्यमसे सहकारी संस्थाओंके माध्यमसे एवं तिलहनों और दलहनोंकी खरीद नैफड द्वारा भी इसी व्यवस्थाके तहत किया जाता रहा है। एक समय था जब सरकारी खरीदकी घोषणा होने मात्रसे बाजारमें जिंसोंके भाव बढ़ जाते थे तो २५ से ३० प्रतिशत सरकारी खरीदसे भाव एमएसपी स्तरपर आ जाते थे। परन्तु पिछले एक दशकसे ऐसा लगता है जैसे एमएसपी व्यवस्थापर व्यापारी काबिज हो गये हैं और इसको इस तरहसे समझा जा सकता है कि कई खरीद केन्द्रोंपर तो वहां उत्पादित कुल फसलसे भी अधिक खरीद देखनेको मिल जाती है।

एमएसपी खरीद व्यवस्थामें अब निजी खरीददारोंकी भागीदारी बढ़ गयी है। इस आरोपको सिरेसे नकारा नहीं जा सकता कि छोटे किसानोंसे उनकी फसलोंको कम दामोंमें खरीदकर उनके नामसे एमएसपीपर खरीद केन्द्रोंपर बेचकर किसानके नामपर उसका लाभ बिचैलिये लेने लगे है। हालांकि पिछली रबीमें एक शुभ संकेत देखनेको मिला है कि अधिकांश फसलोंके भाव एमएसपीसे अधिक देखे गये हैं। जिस तरहसे एमएसपीकी घोषणा की है उसी तरहसे एक व्यवस्था भी सुनिश्चित हो जानी चाहिए कि मण्डियोंमें आवकके साथ ही भाव एमएसपीसे कम हो तो तत्काल सरकारी खरीद शुरू हो जाय तभी इसका लाभ किसानोंको सही रूपमें मिल सकता है। समयपर खरीद और माफी जैसी योजनाओंके स्थानपर अनुदानित खाद-बीज उपलब्ध कराये जायं तो देशका अन्नदाता विकासकी नयी इबारत लिखनेमें सक्षम हो सकेगा। इस तरहकी असलमें अन्नदाताको एमएसपीका लाभ दिलाना सरकारोंका दायित्व है तो व्यवस्थाको प्रभावित करती बाजार ताकतोंको भी व्यवस्थासे हटानेका दायित्व सरकारोंका हो जाता है।