सम्पादकीय

ईष्र्या और स्पर्धा


वी.के.जायसवाल

इस दुनियामें अच्छे लोगोंकी कमी नहीं है जो अपार दुखोंको देखकर दुखी हो जाते हैं। किंतु यह भी सत्य है कि ऐसे लोगोंकी भी संख्या भी अत्यधिक है जो दूसरो के सुखको देखकर कुंठित हो जाते हैं। ऐसे ही लोगोंको ईष्र्यालुकी संज्ञा दी जाती है। मानव स्वभावका यह एक ऐसा घातक दुर्गुण है जो स्वाभाविक प्रक्रियाके अंतर्गत मस्तिष्कमें आनेवाले अच्छे विचारोंको नष्ट करता ही रहता है। ईष्र्यालु लोग दूसरोंकी सम्पन्नता नष्ट करनेके लिए तत्पर रहते हैं तथा अपने विरोधियोंके विरुद्ध दुष्प्रचार करते रहते हैं। वर्तमानमें अपने ही देशमें कुछ ऐसा ही देखनेको मिल रहा है जिसमें कृषि संबंधी कानूनोंको लेकर कुछ ऐसे ही लोगों द्वारा पूरी तरहसे दुष्प्रचार किया जा रहा है। इस प्रकारका दुष्प्रचार करनेवालोंकी केवल एक ही मंशा रहती है और वह यह है कि जो कोई भी देशको सफलताकी ओर अग्रसर कर रहा हो उसे किसी भी तरहसे रोका जाय। दूसरोंका अपकार करनेकी मात्र बात सोचना कितना भयानक, घातक और बुरा हो सकता है इसपर विचार करनेकी ऐसे ही लोगोंको महती आवश्यकता है। ईष्र्याका यदि कोई सात्विक रूप हो सकता है तो स्वस्थ स्पर्धा है। इसलिए सदैव यही प्रयास करना चाहिए कि वह स्पर्धाके माध्यमसे स्वयंको श्रेष्ठ बनानेका प्रयास करें न कि ईष्र्या करके, जो न केवल लाभदायक है, बल्कि इसे ही श्रेष्ठ कहा जायगा। आजके समयमें ईष्र्याका स्तर इतना अधिक बढ़ गया है जो अब न केवल व्यक्तियोंके मध्य है, बल्कि इसमें पूरे-पूरे समूह सम्मिलित हो गये हैं और इसीके माध्यमसे येन-केन-प्रकारेण किसी भी अच्छे कार्यको करनेसे रोकना होता है। जिसे राजनीतिके नामपर स्पर्धा कदापि नहीं कहा जा सकता है, बल्कि यह सब विशुद्ध ईष्र्या ही है। वास्तविक स्पर्धा एक ऐसा उत्तम गुण है जो किसी गुणवान व्यक्तिके गुणोंसे प्रभावित होकर अपने आपको उसके सामान बनानेका प्रयास करना होता है। ऐसे ही व्यक्तिके गुणोंको अपनेमें धारण करनेकी प्रबल इच्छा ही स्पर्धा है। स्पर्धा एक ऐसी प्रबल इच्छा है जिसमें ईष्र्याकी तरह दूसरोंके गुणोंको देखकर जो दुष्प्रभाव मस्तिष्कपर पड़ता है वह स्पर्धाके माध्यमसे गुणवान व्यक्तियोंके गुणको अपनेमें उतारनेका प्रयास करनेवाले लोगोंमें कदापि नहीं होता है क्योंकि स्पर्धामें श्रेष्ठ उपायोंसे किसी गुणवान व्यक्तिके समान बननेकी एक सात्विक कामना निहित होती है। इस प्रकारके स्वभाववाले मनुष्योंका लक्ष्य एक ही होता है और वह महान पुरुषोंके समान बननेका होता है। इसलिए ऐसे ही गुणवाले लोगोंको महानता हासिल करनेमें बिल्कुल भी विलंब नहीं होता है इसीसे ऐसे ही लोग संसारमें अपने यश वैभव और प्रतिष्ठाका विस्तार करनेमें सफल होते रहते हैं।