सम्पादकीय

कृषिके नामपर जल बर्बादी अक्षम्य


डा. भरत झुनझुनवाला
सात आईआईटीके समूहको पर्यावरण मंत्रालयने गंगा नदीके प्रबंधनका प्लान बनानेका काम दिया था। आईआईटीके समूहने कहा कि यदि हमारी नदियां सही स्थितिमें है तो हम मान सकते हैं कि सारा पर्यावरण संतुलनमें है। भूमि, वायु और पानी तीनोंका संबंध नदीसे होता है। दूसरा प्रश्न उठता है कि नदीके स्वास्थ्यका मूल्यांकन कैसे करें तो उनका कहना था कि यदि नदीकी श्रेष्ठ मछली स्वस्थ है तो हम मान सकते हैं नदी स्वयं स्वस्थ है। तब नदीका पानी और उसमें रहनेवाले अन्य जीव सब स्वस्थ होंगे। इस आधारपर आईआईटीके समूहने आकलन किया कि नदीको स्वस्थ रखनेके लिए कितना पानी छोड़ा जाना चाहिए। आज नदियोंपर बनायी गयी बरजोंसे नदीका अधिकतर पानी निकाल लिया जाता ह। बराजके आगे नदीमें पानी शून्य या शून्यप्राय रह जाता है। वर्तमानमें गंगा पर हरिद्वार, बिजनौर, नरोरा और कानपुरमें बनी बरजोंके नीचे गंगामें प्राय शून्यप्राय पानी रह जाता है। प्रश्न उठता है कि नदीको जीवित रखनेके लिए कितना पानी छोडऩा जरूरी है। इस मात्राको पर्यावरणीय प्रवाह कहा जता है। इस सम्बन्धमें २००६ में इंटरनेशनल वॉटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट श्रीलंका, जिसमें भारत सरकारकी भी सहभागिता है, ने भारतकी तमाम नदियोंमें पर्यावरणके लिए जरूरी प्रवाहका आकलन किया था। उन्होंने बताया कि गंगाको ए-श्रेणीकी नदी बनानेके लिए ६७ फीसदी, बी-श्रेणीके लिए ४४ प्रतिशत और सी-श्रेणीके लिए २९ प्रतिशत प्रवाह छोड़ा जाना चाहिए। जाहिर है कि जब गंगा हमारी राष्ट्रीय नदी है तो हमारा प्रयास होना चाहिए कि उसे ए-श्रेणीकी तरफले जाना चाहते हैं। अत: ६७ प्रतिशत प्रवाह छोडऩा चाहिए। इसके बाद २०११ में इलाहाबाद हाईकोर्टने निर्णय दिया कि गंगामें ५० प्रतिशत पानी नरोरासे छोड़ा जाना चाहिए। इस मामलेकी पैरवी वरिष्ट अधिवक्ताने की थी। इसके बाद वल्र्ड वाइल्डलाइफ फंडने २०१२ में सुझाव दिया कि कानपुरसे ४७ प्रतिशत प्रवाह छोड़ा जाना चाहिए। इसके बाद २०१४ में आईआईटीके समूहने गंगा नदी बेसिन मैनेजमेंट प्लान बनाया। उन्होंने मैदानी गंगामें जरूरी प्रवाहका आकलन नहीं किया था। लेकिन उन्होंने ऋषिकेशमें पशुलोक बैराजके संबंधमें कहा कि इससे ५५ प्रतिशत प्रवाह छोड़ा जाना चाहिए। हरिद्वार बैराज पशुलोक बैराजसे केवल २० किलोमीटर दूर है इसलिए पशुलोक बैराजमें जो ५५ प्रतिशत पानी छोडऩेकी बात कही गयी है उसे हम हरिद्वारके लिए भी लागू मान सकते हैं। इसके बाद २०१५ में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बेंगलोर द्वारा प्रकाशित करंट साइंस पत्रिकाके एक लेखमें बताया गया कि यमुनाके लिए ५० से ६० प्रतिशत पानी उसकी जैव विविधता कायम रखनेके लिए छोड़ा जाना चाहिए। इसके बाद जल संसाधन मंत्रालयने २०१५ में ही स्वयं एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें आईआईटीके समूहकी संस्तुतिको दोहराया गया। इन तमाम अध्ययनोंसे स्पष्ट है कि वैज्ञानिक दृष्टिसे मैदानी गंगामें लगभग ५० प्रतिशत पर्यावरणीय प्रवाह छोड़ा जाना चाहिए। लेकिन जल संसाधन मंत्रालयने अक्तूबर २०१८ में एक विज्ञप्ति जारी की जिसके अनुसार हरिद्वार बैराजमें मानसूनके समय ५७ क्यूमिक (क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड) और मानसूनके अतिरिक्त समयमें ३६ क्यूमिक पानी छोडऩेका आदेश जारी किया गया। बिजनौर, नरोरा और कानपूर बरजोंमें इससे कम पानी छोडऩेके आदेश दिये गये हैं। यह मात्रा उपलब्ध पानीका केवल छह प्रतिशत बनती है। अत: हाईकोर्टके आदेश एवं तमाम अध्ययनोंकी ५० प्रतिशत प्रवाह छोड़े जानेकी संस्तुतिके बावजूद जल संसाधन मंत्रालयने केवल छह प्रतिशत प्रवाह छोडऩेके आदेश दिये है।
प्रश्न है कि ५० प्रतिशत पानी क्यों छोड़ा जाय। यहां हमें दो मांगोंके बीच रास्ता निकालना है। एक तरफ किसानोंको खेतीके लिए पानी चाहिए तो दूसरी तरफ मछुआरोंको अपनी जीविका चलनेके लिए पानी चाहिए। मछलियों, कछुओं और पानीके अन्दरके जलीय पौधोंको जीवित रहनेके लिए पानी चाहिए। यह ही हमारे पर्यावरणको सुरक्षित रखते हैं। इसके अलावा जब नदीमें पानी बहता है तो वह पूरे क्षेत्रके भूगर्भके पानीका पुनर्भरण करता है जिससे सिंचाईके लिए और ज्यादा पानी उपलब्ध हो जाता है। पानी ज्यादा होता है तो वह अपनेको स्वयं साफ भी कर लेता है। आपको और हमको नदीमें डुबकी लगानेके लिए और उसके सौंदर्यको निहारनेके लिए भी पानी चाहिए। इसलिए यह सोचनाकी केवल नहरसे हम पानी निकाल करके सिंचाई कर लेंगे उचित नहीं है। सरकारको किसानों और अन्य जीवोंके बीचमें संतुलन बैठाना होगा जो कि जल संसाधन मंत्रालयने नहीं किया है। २०११ का हाईकोर्टका आदेश आज भी बरकरार है लेकिन उस आदेशकी अवहेलना करते हुए सरकार द्वारा ५० प्रतिशत प्रवाह नरोरासे नहीं छोड़ा जा रहा है। समयकी मांग है कि हम गंगा समेत सभी नदियोंसे सिंचाईके लिए पानी कम निकालें और ५० प्रतिशत प्रवाह छोडऩा शुरू करें।
ऐसा करनेसे किसानोंको जो पानी कम मिलेगा उसका उपाय है कि किसानोंको पानीका आयतनके आधारपर मूल्य अदा करनेको कहा जाय जिससे कि वह पानीका उपयोग कम करें। उनपर जो पानीके मूल्यका अतिरिक्त बोझ पड़ता है उतना उनके फसलके दाममें वृद्धि कर दी जाय। ऐसा करनेसे एक तरफ किसानको पानीका मूल्य अदा करना पड़ेगा तो दूसरी तरफ किसानको मूल्य अधिक मिलेगा और उसकी भरपाई हो जायगी। लेकिन तब हम आप शहरी जनताको महंगा अनाज खरीदना पड़ेगा। इसलिए अंतत: प्रश्न यह है हम सस्ते अनाजके पीछे भागेंगे अथवा प्रकृतिको संरक्षित करते हुए थोड़ा महंगा अनाज स्वीकार करेंगे और मछलियों, कछुओं, पौधोंको संरक्षित करेंगे।
क्या हम बहती नदीके सौंदर्यका आनन्द लेनेके लिए और नदीमें डुबकी लगानेका आनन्द लेनेके लिए दो रुपये प्रति किलो अनाजका अतिरिक्त मूल्य देना चाहेंगे। अंतत: हमें तय करना है कि हम नदीको केवल अनाजके उत्पादनका साधन मात्र मानेगे अथवा नदीकी जो उच्चकोटिकी क्षमताएं हैं जैसे उसका सौंदर्य या उसमें स्नान करनेका आनन्द या मछलियोंकी उठखेलियां देखनेका आनन्द उसके पीछे भागेंगे। हम जल संसाधन मंत्रालयसे प्रार्थना कर सकते हैं कि नदी और मनुष्यकी ऊंची संभावनाओंको फलीभूत करें और केवल अनाज उत्पादनके नामपर कृषिमें पानीकी की जा रही बर्बादीको बनाये रखनेके लिए नदीको मौतके घाट न उतारें। सरकारको चाहिए कि सिंचाईके पानीका आयतनके अनुसार मूल्य वसूल करे और तदनुसार समर्थन मूल्यमें वृद्धि करे जिससे किसान भी खुश हो और हमारी नदियां भी।