सम्पादकीय

टीकाकरण से ही मिलेगी राहत


डॉ. श्रीनाथ सहाय 

कोरोनाकी नयी लहर का कहर देशभर में जारी है। देशके कोने-कोने से कोरोनासे जुड़ी दुखद खबरें सामने आ रही हैं। इसे क्या कहा जाए कि एक तरफ देशमें कोरोनाकी रोकथाम के लिए टीकाकरण हो रहा है तो वहीं दूसरी ओर संक्रमितोंके आंकड़े आये दिन नये रिकार्ड बना रहे हैं। बावजूद इसके चिकित्सा क्षेत्रके विशेषज्ञोंका मत है कि टीकाकरणसे ही हालात काबूमें आएंगे। जब आबादी के बड़े हिस्से का टीकाकरण हो जाएगा तो उसके बाद यह बीमारी इतना घातक प्रभाव नहीं डाल पाएगी। कम शब्दोंमें कहा जाए तो ऐसे वक्तमें जब देशमें कोरोना संकटकी दूसरी लहर गंभीर स्थिति पैदा कर रही है, वैक्सीन ही अंतिम कारगर उपाय नजर आता है।

१६ जनवरी से शुरू हुए टीकाकरण अभियानको करीब तीन माह पूरे हो चुके है। टीकाकरण के मामलेमें भारत ने दुनियाके सभी देशों को पीछे छोड़ दिया है। भारतने पड़ोसी मुल्क चीनको भी पीछे छोड़ दिया है, जहांसे कोरोना संक्रमणका पहला मामला सामने आया था। इसके अलावा टीकाकरणकी रेसमें ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देश भी भारत से पीछे हैं। भारतमें अबतक दस करोड़ से ज्यादा कोरोना वैक्सीनकी डोज दी जा चुकी है। भारतके अलावा दुनियामें अमेरिका और चीन दो देश ही ऐसे हैं जहां अबतक कुल दस करोड़ खुराक दी गयी है। लेकिन खास बात ये है कि अपने देश में ये मुकाम सिर्फ ८५ दिनोंमें हासिल किया गया। जबकि अमेरिका को टीके की १० करोड़ खुराक देने में ८९ दिन लगे और चीन को इस काम में १०२ दिन लग गए।

वहीं दूसरी और देशमें कोरोना महामारी विकराल रूप ले चुकी है। बीते २४ घंटे में एक लाख ९९ हजार ३७६ नए मरीज मिले हैं। ९३,४१८ ठीक हुए और १,०३७ की मौत हो गयी। नए केस का आंकड़ा पिछले साल १६ सितंबर को आए पहले पीक के दोगुना से ज्यादा हो गया है। तब एक दिनमें सबसे ज्यादा ९७,८६० केस आए थे। इसके साथ ही एक्टिव केस, यानी इलाज करा रहे मरीजोंकी संख्या १४ लाख ६५ हजार ८७७ हो गयी है। यह १५ लाख के पार हो सकती है, क्योंकि इसमें बीते दो दिन से एक लाख से ज्यादा की बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे में बचावके परंपरागत उपायोंके साथ टीकाकरण अभियानको गति देने की जरूरत है ताकि देश लाकडाउन जैसे उपायों से परहेज कर सके।

देशमें कोरोना वायरसके घातक प्रभावको देखते हुए सरकारने विदेशी टीकोंको मंजूरी दी है। केंद्र सरकार द्वारा विदेशी टीकोंको स्वीकृति देना और आयातका बाजार खोलना यकीनन एक स्वागतयोग्य निर्णय है। फाइजर, माडर्ना और जानसन एंड जानसन सरीखी विदेशी कंपनियोंने भारतमें मानवीय परीक्षण किये अथवा नहीं, अब यह सवाल गौण है, क्योंकि बढ़ते संक्रमणपर लगाम कसना सरकार और जनताकी साझा प्राथमिकता है, लेकिन ये टीके कई देशोंमें इस्तेमाल किए जा रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और विज्ञान पत्रिका ‘द लैंसेटÓ ने इन टीकोंका सकारात्मक विश्लेषण किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अलावा अमरीका, ब्रिटेन, यूरोप और जापान ने इन्हें आपात मंजूरी दी हुई है।

हमारे कोविड-१९ के राष्ट्रीय विशेषज्ञ समूह ने फाइजर और मॉडर्ना से अतिरिक्त डाटाकी मांग की थी, लेकिन वे अमरीका की फूड एंड ड्रग्स अथॉरिटी की स्वीकृतिके आधारपर ही भारतके बाजारमें प्रवेश चाहती थीं। ऐसा नहीं हो सका, तो कमोबेश फाइजर ने बीती फरवरीमें अपना आवेदन वापस ले लिया था। तब कोरोनाका संक्रमण भारतमें इतना नहीं फैला था कि उसे ‘नई लहरÓ का नाम दिया जा सके। अब अप्रत्याशित रूप से कोविड का घोर आपातकाल मंडरा रहा है, लिहाजा उसी संदर्भमें टीकोंकी स्वीकृति देखनी चाहिए। अभी भारत की ही कुछ कंपनियोंके टीके पाइपलाइनमें हैं। आने वाले कुछ महीनोंमें उन टीकोंको भी मंजूरी मिल सकेगी, लिहाजा टीकाकरण का संकट दूर हो सकेगा।

बहरहाल, कोरोना संकटकी भयावहताको देखते हुए कोविड-१९की वैक्सीनोंका उत्पादन बढ़ानेकी जरूरत महसूस की जा रही है। दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन उत्पादक कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने वैक्सीन उत्पादन क्षमताको बढ़ानेके लिये तीन हजार करोड़ रुपयेके अनुदान की मांग की है। निस्संदेह ऐसे मुश्किल वक्त में जीवन रक्षक उद्यमके लिये खजाना खोलनेमें केंद्रको संकोच नहीं करना चाहिए। प्रयोग की जा रही दो वैक्सीनों के अलावा अन्य वैक्सीनोंके उत्पादन पर भी विचार होना चाहिए। इसी क्रम में रूसी वैक्सीन स्पुतनिकको भी आपातकालीन उपयोगके लिये उत्पादन हेतु अनुमति दिये जानेकी जरूरत है। टीकाकरण से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि प्रसिद्ध डाक्टरों और वैज्ञानिकों ने टीकेको ही कोरोनाका ‘सुरक्षा-कवचÓ नहीं माना है, लेकिन उनके शोधात्मक अध्ययनोंके निष्कर्ष हैं कि टीका संक्रमण की तीव्रता और जानलेवा प्रभावोंको निरस्त करनेका काम करता है। संक्रमित मरीजको अस्पताल जानेकी नौबत भी बेहद सीमित हो जाती है। दोनों खुराकें मिलने के बाद टीका मानवीय देहमें रोग प्रतिरोधक क्षमता पैदा करने लगता है। विदेशी टीकोंके प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं।

बीते साल लाकडाउन की सख्ती से जहां देशकी आर्थिक स्थितिपर प्रतिकूल असर पड़ा था, वहीं एक बड़ी आबादीको शहरोंसे गांवोंकी ओर विस्थापित होना पड़ा था। बड़े पैमाने पर रोजगारका संकट भी पैदा हुआ था। बहरहाल,नयी चुनौती के बीच दिल्ली, महाराष्ट्र और पंजाब समेत कई राज्यों ने रात्रि कफ्र्यू जैसे उपायों को अपनाना शुरू कर भी दिया है। आंशिक बंदी, कन्टेनमेंट जोन बनाने और सार्वजनिक सभाओंपर रोक लगायी जा रही है। ऐसेमें टीकाकरण अभियान लक्षित वर्ग विशेष, आयु वर्गके हिसाब से देशमें चल रहा है। स्वास्थ्यकर्मियों, फ्रंटलाइन वर्करों, साठ सालसे अधिक आयु वर्गके लोगोंको टीकाकरणका लाभ देनेके बाद अब ४५ वर्ष से अधिक आयु वर्गके लोगोंको टीका लगाने का कार्य शुरू हो चुका है। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि ४५ आयु वर्ग से नीचेके लोगोंको भी कोरोना अपना शिकार बनाता रहा है, जिसके लिये भी टीकाकरणकी जरूरत महसूस की जा रही है।

दरअसल, टीकाकरण अभियान की विसंगतियोंको दूर करके इस अभियान में तेजी लाने की जरूरत है। वैक्सीन आपूर्तिको लेकर गैर भाजपा शासित राज्योंकी शिकायतोंके बाद आरोपों-प्रत्यारोपोंका सिलसिला भी जारी है। वहीं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री इस मुद्देपर राजनीतिक बयानबाजी को अनुचित बताते हैं और कहते हैं कि पर्याप्त मात्रामें वैक्सीनकी आपूर्तिकी जा रही है। उनका मानना है कि ऐसी बयानबाजीसे जहां लोगोंका मनोबल प्रभावित होता है, वहीं देशकी अंतर्राष्ट्रीय छविपर प्रतिकूल असर पड़ता है।