सम्पादकीय

आत्मबलपर कृत्रिम सफलताका दंश


दनेश ‘शैलेश’
संघर्षकी सीढिय़ां चढ़कर सफलताके दुर्गपर आसीन होना सबको अच्छा नहीं लगता है। लेकिन जब आप किसीके द्वारा बलात उठाये जानेपर किसी मंच विशेषपर आरूढ़ होते हैं तो वह सफलता आपको भीतरसे न केवल कचोटती है, बल्कि गहन अपराधबोधका भी शिकार बना देती है। लेकिन इसके दूसरी ओर परिश्रम, निष्ठा, ईमानदारी एवं समर्पणके आधारपर तय किया गया ज्ञान और साधनाका सफर आपको जहां भौतिक खुशियोंसे सराबोर कर सकता है, वहां भीतरसे भी आपको आत्मबल देता है। प्रायोजित सफलताएं चाहे बाह्य दृष्टिसे आपको सुख, उल्लास एवं आनंदकी प्रतीति कराती हों लेकिन भीतर-भीतर अपराध बोधका दंश आपको लगातार चुभन देता रहता है। सफलता वही वास्तवमें सफलता कहलाने लायक है, जिसमें आपके जीवनका एक-एक क्षण, एक-एक पल परिश्रम, स्वाध्याय, ईमानदारी, सेवा, समर्पणके रूपमें व्यतीत हुआ हो। प्रसिद्ध विचारक हरमन मेलविल्लेका कथन है कि मौलिकतामें असफल होना, कृत्रिम सफलतासे अच्छा है। वस्तुत: कृत्रिम सफलताको पानेके लिए भी मनुष्य वास्तविक सफलतासे कई गुना अधिक जुगाड़, परिश्रम, दौड़-धूप एवं अपनी दुर्लभ ऊर्जाका अपव्यय करता है। किंतु उसी ऊर्जाका उपयोग वह मौलिकताके क्षेत्रमें अपने असली मूल्योंको संरक्षित कर अपनी स्वाभिमानी प्रतिभाका परिचय देनेके लिए नहीं करता। वहीं विजयी होनेके बावजूद भीतरसे पराजित होनेका ही बोध कराती है। दूसरी प्रकारकी निष्ठावान सफलता उसे हारनेपर भी जीतनेका अहसास करानेकी क्षमता रखती है। सफलता और असफलताके मार्गमें आता परिश्रम, निष्ठा, दौड़-धूप एवं उद्यमकी दृष्टिसे बहुत ज्यादा अंतर नहीं होता है। जितना परिश्रम एक व्यक्ति कमरतोड़ मेहनत कर धन जुटानेमें करता है, उससे कम किसी भी रूपमें कोई चोर उसे पानेके लिए नहीं करता है। प्रसिद्ध विचारक कॉलिन आर डेविसने कहा है कि सफलताका मार्ग तथा असफलताका मार्ग लगभग समान ही होता है। जिस प्रकार कोई विद्यार्थी बिना परिश्रम शार्टकटसे उस विषय अथवा कक्षामें स्वर्ण पदक अथवा उच्चतम अंक प्राप्त कर सर्वोत्तम घोषित हो सकता है, लेकिन गुणवत्ता, ज्ञान और मौलिकताकी दृष्टिसे हर क्षण वह उस तथाकथित ज्ञानी समाजका सामना करनेके लिए स्वयंको नितांत असमर्थ असहाय एवं सर्वथा अयोग्य पाता है। जीवनके किसी भी क्षेत्र विशेषमें सफल होनेके लिए प्रतिद्वंद्वी पक्ष कई प्रकारके डर, भय, आतंक एवं हौवा आदिका वातावरण सृजित कर देते हैं, जिससे पहला पक्ष अपने लक्ष्य, गंतव्य अथवा संघर्ष-पथसे विचलित हो जानेके लिए बाध्य हो जाता है। लेकिन असली सफलताकी चाह रखनेवाला मौलिक सर्जक, चिंतक, विचारक और अपने लक्ष्यपर आरूढ़ होनेवाला व्यक्ति एवं व्यक्तित्व वह है जो जीवन-लक्ष्यमें ऐसे किसी भी कृत्रिम शोर-शराबेसे प्रदर्शनोंकी चुनौतियोंसे किसी भी प्रकार विचलित नहीं होता और उन्हें परास्त करता हुआ अपने गंतव्य एवं लक्ष्यकी ओर अग्रसर होता है। सफलताका वही असली आनंद है जब क्षण-क्षण हमारे जीवन मूल्यय हमारा परिश्रमय हमारी निष्ठा और हमारे आदर्शोंका भावनात्मक दुर्ग अपने मनके भीतर मौलिकता एवं दृढ़तासे मूल्य बोधका संचय करता है।
प्रसिद्ध चिंतक बिल कॉस्बीके अनुसार सफलता पानेके लिएए आपकी सफलताकी इच्छा, आपके असफलताके भयसे बड़ी होनी चाहिए। आज संसारमें बहुत सारे लोग जीवनके क्षुद्र स्वार्थोंको सिद्ध करनेके लिए अपने जीवन-मूल्योंको गिरवी रखते हुए, कृशकाय अवस्थामें भी किसीकी चमचागिरी एवं छद्म स्तुतिगानमें ऐसे-ऐसे कार्य कर अपना उल्लू सीधा करनेमें जुटे रहते हैं कि उन्हें अपने मूल्यों, उम्र एवं सीमाओंका भी बोध नहीं रहता, फिर वह अपनी आत्माकी दुर्लभ वाणीको गिरवी रख अपने लिए मृत्यु शैयापर जानेसे पहले भी याचक बन मांगते रहते हैं, फिर कृत्रिम चकाचौंध यानी-पद, गाड़ी, प्रतिष्ठा, समितियोंकी सदस्यता, किसी बोर्ड अथवा विश्वविद्यालयों आदिकी अध्यक्षता जैसे उच्च पदोंको पानेकी चाहमें दुर्लभ जीवन गंवा बैठते हैं। संसारकी दृष्टिमें बार-बार विजयी, वैभवी एवं अति संपन्न दिखाई देते हुए भी वे भीतरसे अपनेको निकृष्टतम एवं विपन्न करार देते हैं। यह दुर्लभ जीवन ईश्वरने अपनी प्रतिभाको चंद स्वार्थोंमें गिरवी रखनेके लिए अथवा किसीका चारण-भाट कवि बनकर उनके व्यर्थ स्तुतिगानके लिए नहीं दिया है। अपनी आत्मा एवं मूल्योंकी हत्या कर मिला कृत्रिम वैभव, पद एवं सत्ता भला किस काम की। परिश्रम एवं मौलिकताकी सीढिय़ां चढ़कर ही फलदायिनी हो सकती है सफलता। अन्यथा ऐसी कृत्रिम सफलता सर्पदंशकी तरह आत्मा एवं हृदयको दंश देती रहती है।