सम्पादकीय

गतिरोध अनुचित


कृषि सुधार कानूनोंके खिलाफ विगत आठ महीनोंसे चल रहे किसान संघटनोंके आन्दोलनका लम्बा चलना उचित प्रतीत नहीं होता है। केन्द्र सरकार और किसान संघटनोंके बीच ११ दौरकी बातचीत हो चुकी है लेकिन अबतक स्वीकार्य समाधान सामने नहीं आ सका है। दिल्लीकी सीमाओंपर किसान संघटनोंका आन्दोलन चल रहा है। तीनों कृषि कानूनोंके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रहे किसान प्रतिदिन दो सौकी संख्यामें सिन्धू बार्डरसे आकर जन्तर-मन्तरपर समानान्तर संसद चला रहे हैं। इन किसानोंको शान्तिपूर्ण प्रदर्शनकी अनुमति दिल्लीके उप राज्यपालने दी है लेकिन गतिरोधका बने रहना उचित नहीं है, क्योंकि इससे निर्णयपर नहीं पहुंचा जा सकता है। जबतक यह गतिरोध समाप्त नहीं होता तबतक समाधानकी ओर बढऩेका रास्ता भी साफ नहीं होगा। केन्द्रीय कृषिमंत्री नरेन्द्र सिंह तोमरने कहा है कि सरकार खुले मनसे किसान संघटनोंसे वार्ताके लिए तैयार है और किसान नेताओंको भी खुले मनसे वार्ताके लिए आना चाहिए। यदि कृषि कानूनोंमें कोई आपत्तिजनक प्रावधान है तो सरकार उसके समाधानके लिए तैयार है। उन्होंने यह भी कहा कि किसान संघटन आन्दोलनका रास्ता छोड़कर वार्ताके लिए आगे आयें। कानूनोंमें खामियोंपर हम वार्ता करनेको तैयार हैं। यदि किसान संघटनोंको बातचीतका हमारा प्रस्ताव स्वीकार नहीं है तो किसान संघटन बातचीतका अपना प्रस्ताव लेकर आयें, हम उसपर बात करनेको तैयार हैं। चर्चा तभी आगे बढ़ेगी जब दोनों पक्ष आगे बढऩेकी कोशिश करें। नि:सन्देह यह बात सही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्थामें किसी भी समस्याके समाधानका स्वीकार्य माध्यम वार्ता ही है। ऐसी स्थितिमें किसी प्रकारकी जिदका कोई औचित्य नहीं है। गतिरोधको तोडऩा होगा तभी वार्ताका मार्ग प्रशस्त होगा। यह भी स्पष्टï है कि गतिरोध अकारण नहीं होता है, उन कारणोंपर भी चर्चा जरूरी है, जिसके चलते गतिरोध बना हुआ है। इसलिए जब सरकार खुले मनसे बातचीतके लिए तैयार है तो किसान संघटनोंको भी इस दिशामें आगे बढऩा होगा। किसी भी आन्दोलनको लम्बे समयतक चलानेसे कोई निष्कर्ष नहीं निकलनेवाला है। यह किसानों और देश दोनोंके हितमें नहीं है। वार्ताके अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं है। किसान संघटनोंके नेता सकारात्मक सोचके साथ वार्ताकी मानसिकताके साथ आगे आयें तभी समाधान निकल पाना सम्भव होगा।

पाकिस्तान-चीनमें कटुता

चीन और पाकिस्तानके सम्बन्धोंमें अब खटास आने लगी है, क्योंकि यह सम्बन्ध स्वार्थ और शोषणपर आधारित है। चीन अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिए पाकिस्तानको मोहरा बना रहा है। पाकिस्तानकी आर्थिक मददके बदले वह अपनी दखलंदाजी बढ़ा रहा है। यह पाकिस्तानके चेतनेका समय है कि वह अपनेको चीनके चंगुलसे मुक्त करे वरना उसकी सम्प्रभुता खतरेमें पड़ जायगी। पाकिस्तानने जिसे पाला-पोसा वही अब उसकी मुसीबतका सबब बन गया है। आयेदिन आतंकवादी पाकिस्तानी सेनाके साथ चीनी कर्मचारियोंको निशाना बना रहे हैं। यही कारण है कि चीनी कर्मचारियोंकी सुरक्षाका भरोसा देनेवाले पाकिस्तानसे चीनका भरोसा उठ रहा है। पाकिस्तानके खैबर पख्तूनख्वाके ऊपरी कोहिस्तानमें दसू बांधपर कामके लिए जा रहे चीनी इंजीनियरोंपर आतंकवादी हमलेसे नाराज चीनने पाकिस्तानमें चल रही अपनी परियोजनाओंपर जहां रोक लगा दी है वहीं हमलेकी जांचके लिए चीनी जांचकर्ताओंकी टीम भेजकर पाकिस्तानके प्रति अपना अविश्वास जता दिया है। इस हमलेमें नौ चीनी इंजीनियरोंकी मौत हो गयी, जबकि अनेक चीनी कर्मचारी घायल हुए हैं। चीनने ५० अरब डालरकी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) परियोजनाका कामकाज सम्भालनेवाले उच्चस्तरीय निकाय संयुक्त समन्वय समितिकी बैठक स्थगित कर अरबों डालरकी दसू जल विद्युत परियोजना भी रोक दी है। हालांकि चीनी कर्मचारी अपनी सुरक्षाके लिए एके ४७ रायफल लेकर चल रहे हैं लेकिन उनमें असुरक्षाका भाव उत्पन्न हो गया है, जो पाकिस्तानके लिए गलेकी हड्डïी बन सकता है। चीनी परियोजना और उसके कर्मचारियोंकी सुरक्षामें पाकिस्तानके तीस हजारसे ऊपर सैनिक तैनात हैं, परन्तु उसके बावजूद आतंकवादी हमलेसे बाज नहीं आ रहे हैं। यह पाकिस्तान सरकारके लिए खतरेकी घंटी है। यदि समय रहते आतंकवादियोंको नेस्तनाबूद करनेकी काररवाई नहीं की गयी तो पाकिस्तानका अस्तित्व ही खतरेमें पड़ जायगा।