सम्पादकीय

दूसरोंको दोष


श्रीराम शर्मा

यदि किसीका व्यवहार अनुचित प्रतीत होता है तो यह माननेसे पहले कि सारा दोष उसीका है, स्वयंपर भी विचार अवश्य करें। दूसरोंपर दोषारोपण करनेका आधा कारण तो स्वयं समाप्त हो जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि किसीकी छोटी-सी भूल या अस्त व्यस्ततापर आप मुस्करा देते हैं या व्यंगपूर्वक कुछ उपहास कर देते हैं। आपकी इस क्रियासे सामनेवाले व्यक्तिके स्वाभिमानपर चोट लगना स्वाभाविक है। अपनी प्रशंसा सभीको प्यारी लगती है परन्तु व्यंग या आलोचना हर किसीको अप्रिय है। कोई नहीं चाहता कि अकारण लोग उसका उपहास करें। इसलिए दूसरोंसे प्रतिकारकी भावना बनानेके पूर्व यदि अपना भी दोष दर्शन कर लिया करें तो अकारण उत्पन्न होनेवाले झगड़े जो कि प्राय: इसीसे अधिक होते हैं, क्यों हों। यदि किसीको अपनी बात मनवानी ही है अथवा यह पूर्ण रूपसे जान लिया गया है कि अमुक कार्यमें इस व्यक्तिका अहित है, आप उसे छुड़ाना चाहते हैं तो भी अशिष्ट या कटु व्यवहारका आश्रय लेना ठीक नहीं। यदि वह व्यक्ति आपके तर्क या सिद्धांतको नहीं मानता तो आप उसे अयोग्य, मूर्ख या दुष्ट समझने लगते हैं और अनजाने ही ऐसा कुछ कह या कर बैठते हैं जो उसे बुरा लगे। इससे दूसरेके आत्माभिमानको चोट लगती है, जिसकी प्रतिक्रिया भी कटु होती है। उससे कलह बढऩेकी ही संभावना अधिक रहेगी। उसी बातको स्नेह और आत्मीयता पूर्वक कहें तो आपके संबंध भी अच्छे बने रहते हैं और आपकी बात भी मान ली जाती है। ऐसे समय किन्हीं व्यक्तियों या घटनाओंके उदाहरण प्रस्तुत करें तो प्रभाव और भी परिपुष्ट होगा किंतु यह ध्यान बना रहे कि आपकी बात पूर्ण आत्मीयताके साथ कही जा रही है। इतनेपर भी शत-प्रतिशत यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वह आपकी बात मान ही ले, क्योंकि उसकी अपनी धारणा भी तो किसी आधारपर टिकी होती है। उसके सिद्धांतमें बल है अथवा नहीं, यह अलग बात है। बात सिर्फ मान्यताकी है। ऐसे समय उसे दुष्ट माननेकी अपेक्षा यह देखना अधिक श्रेयस्कर है कि उसके ज्ञान या अनुभवमें कमी है या उसे प्रभावित करवानेकी क्षमताका आपमें अभाव है। इस प्रकारके विचारसे आप उत्तेजित भी नहीं होते, क्रोध भी नहीं आता और प्रतिशोध या बदला लेनेकी हानिकारक भावना भी नहीं बनती। आपके संबंध भी ज्योंके त्यों बने रहते हैं। उनमें भी किसी प्रकारका तनाव पैदा नहीं होता। मनुष्यको सम्मान उसकी योग्यता-अयोग्यता, गुरुता, कार्यक्षमता और उपयोगिताके आधारपर मिलता है। पात्रत्वके अभावमें आपको सम्मान मिलनेकी आशा नहीं बांधनी चाहिए। अहंकारवश कई व्यक्ति पात्रता न होते हुए भी दूसरोंसे भारी सम्मानकी आशा करते रहते हैं और जब वह नहीं मिलता है तो दूसरोंको दोष देने लगते हैं।