सम्पादकीय

सीताके सात स्वरूप


शिवप्रसाद ‘कमल’
बाल्मीकि रामायणमें सीताके स्थान रामसे आगे माना गया है। सारी रामकथा सीताको केन्द्रमें रखकर चलती है। तुलसीने भी रामचरितमानसमें सीताके सात स्वरूपोंका वर्णन करके उन्हें महत्वपूर्ण स्थान दिया है। मानसमें भी सम्पूर्ण रामकथा सीताके इर्द-गिर्द घूमती है। तुलसीके अनुसार जैसे मानसके सात कांड हैं, वैसे ही सीताके साथ रूप भी हैं जो हर काण्डसे पृथक हैं। बालकाण्डकी सीता राजा जनककी पुत्री हैं और धनुष यज्ञके समय किशोरी हैं। जनकने लक्ष्य किया था कि किशोरी सीता प्राय: शिवधनुषके साथ क्रीड़ा करती हैं। यहांतक कि उसपर विराजकर उसे अपने स्थानसे च्युत भी कर देती हैं। इस दृश्यने राजा जनकके मनमें यह भाव भर दिया कि क्यों न शिव-धनुष भंग करनेवाले वीर पुरुषके साथ सीताका पाणिग्रहण कर दिया जाय और अन्तत: जनकने धनुष यज्ञकी घोषणा कर दी। अनेक देशोंके राजा इसमें भाग लेते हैं। यह देखकर विश्वामित्र भी राम-लक्ष्मणके साथ जनकपुर धनुषयज्ञ देखने पहुंच जाते हैं। दशरथके पुत्र राम एवं लक्ष्मणको मुनि विश्वामित्र अपने सिद्धाश्रममें अपना यज्ञ पूर्ण कराने लाये थे। ताड़का, सुबाहु वधके पश्चात्ï मुनिका यह यज्ञ सकुशल सम्पन्न होता है। अत: वे दोनों भाईयों, सहित जनकपुर पहुंच जाते हैं और और सभी राजाओं, जिनमें रावण एवं वाणासुर भी हैं- ने हार मान ली तो विश्वामित्रके आदेशपर राम शिवका धनुष तोड़ देते हैं और रामके साथ किशोरीजीका परिणय सम्पन्न होता है। विवाहके पश्चात्ï सीता अयोध्या आती हैं। इस अयोध्या काण्डमें वह रामकी परिणिताके रूपमें हैं। सीता सभी अयोध्यावासियों एवं राजपरिवारकी सबसे सौम्य-कोमल रामकी परिणिता हैं। सीताका वैवाहिक जीवन आरम्भ होता है। कालान्तरमें रामके युवराज पदपर अभिषिक्त करनेके प्रश्नपर कैकेयी आचानक रूठ जाती हैं। राजा दशरथके दिये पूर्वमें दो वरदानोंको आधार मानकर कैकेयी एकमें भरतको युवराज तथा दूसरेमें रामको चौदह वर्षोंका वनवास मांग लेती हैं। रामके साथ भार्या सीता और भाई लक्ष्मण भी वन चले जाते हैं। अब आगे अरण्य काण्डमें सीता तपस्विनीके रूपमें दिखती हैं। वह रामके साथ पर्णकुटी बनाती हैं, रामकी पदसेवा करती हैं अर्थात् रामके तपस्वी रूपमें उनकी अनुगामिनी बनी रहती हैं। इसके बाद आरम्भ होता है चौथा किष्किंधा काण्ड। यहां रावण द्वारा सीताका हरण होता है और वह रामको पुकारती हैं, सहायताके लिए। सीताका वियोगिनी रूप इस काण्डमें परिलक्षित होता है। आगे सुन्दरकाण्डमें जब सीताको खोजते हुए हनुमान लंका पहुंचते हैं तो पाते हैं कि अशोक वाटिकामें अशोक वृक्षके नीचे बैठी सीता भूमिपर दृष्टिï गड़ाये श्रीरामके कमल चरणोंके ध्यानमें निमग्न हैं। यहां प्रभुके पदका ध्यान-चिन्तन करती रहनेवाली साध्वी प्रतीत होती हैं। अंतमें लंका काण्डमें जब सीताको लौटानेके सभी प्रयास विफल हो गये तो राम-रावण युद्ध होता है। रावण वधके पश्चात्ï सीताकी अग्निपरीक्षा और वह तपकर निखरती हैं। फिर सातवें और अन्तिम उत्तर काण्डमें सीता सिंहासनपर महारानीके रूपमें दृष्टिïगत होती हैं। इस प्रकार सात काण्डोंमें सीताके सात स्वरूपोंका दर्शन गोस्वामीजी कराते हैं।