Post Views: 22 डा. वरिन्दर भाटिया सन् १९९१ के आर्थिक सुधारोंके बादसे ही अबतक यह बात बार-बार दोहराई जाती रही है कि सरकारका काम व्यापार करना नहीं है। हम जानते हैं कि १९६९ में तत्कालीन सरकारने १४ बैंकोंका राष्ट्रीयकरण किया था। आरोप था कि यह बैंक देशके सभी हिस्सोंको आगे बढ़ानेकी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी नहीं […]
Post Views: 18 ऋतुपर्ण दवे गाजियाबादके मुरादनगरके उखलारसी गांवकी घटनाने पूरे देशको झकझोर कर रख दिया। लोग आये तो थे एक मृतकका अंतिम संस्कार करने लेकिन भ्रष्टाचारने २७ लोगोंको निगल लिया। श्मशानमें ही मौतका ताण्डव मच गया। ऐसी घटना उस महानगरमें घटी जहां गगनचुंबी इमारतोंकी भरमार हैं। बड़े-बड़े निर्माण कार्योंमें दक्षताकी कमीं नहीं है। पहली […]
Post Views: 36 श्रीराम शर्मा भगवानके अनगिनत नाम हैं, उनमेंसे एक नाम है सच्चिदानंद। सत्ïका अर्थ है टिकाऊ अर्थात न बदलने, न समाप्त होनेवाला। इस कसौटीपर केवल परब्रह्मï ही खरा उतरता है। उसका नियम, अनुशासन, विधान एवं प्रयास सुस्थिर है। सृष्टिके मूलमें वही है। परिवर्तनोंका सूत्र संचालक भी वही है। इसलिए परब्रह्मïको सत्ï कहा गया […]