सम्पादकीय

सर्वोच्च न्यायालयका सकारात्मक पहल

विजयनारायण
भारत सरकार तीनों किसान कानूनोंके विभिन्न पहलुओंपर किसान संघटनोंके नेताओंको बुलाकर सलाह-मशविरा कर सकती थी। किन्तु उसने ऐसा नहीं किया। तीनों ही कृषि विधेयक संसदके विगत सत्रमें हड़बड़ीमें पारित करा दिये गये। लोकसभामें पारित करानेके बाद विधेयकोंको राज्यसभामें उस समय पेश किया गया जब सत्र समाप्त हो रहा था। राज्यसभामें भारी हंगामा हुआ किन्तु राज्यसभाके उपाध्यक्षने इसे पारित घोषित कर दिया। उपाध्यक्षसे सदस्योंकी भारी झड़प हुई और कुछ सदस्योंके खिलाफ काररवाई भी की गयी, जिसके विरोधमें वे संसद भवनके सामने गांधीजीकी प्रतिमाके सामने धरनेपर बैठ गये। इन तीनों विधेयकोंके पारित होनेके विरोधका दौर भी पहले तो सुप्रीम कोर्टमें वैधानिक चुनौती देनेवाली याचिकाओंसे शुरू हुआ और दूसरी ओर छह राज्योंके किसानने दिल्लीकी ओर मार्च शुरू कर दिया। हम पहले इन तीनों कृषि कानूनोंकी वैधानिकताकी चुनौती देनेवाली याचिकाओंसे सम्बन्धित विभिन्न पहलुओंपर करना चाहेंगे।
कृषि क्षेत्र संविधानकी समवर्ती सूचीमें आता है यानी कृषि सम्बन्धी विधेयक संसद और राज्योंकी विधानसभाओंमें भी पारित किये जा सकते हैं। जहां ऐसी स्थिति हो वहां भारत सरकारको राज्योंसे परामर्श कर लेना चाहिए। भारत सरकारने इन तीनों कानूनोंको पारित करनेसे पहले राज्य सरकारोंसे कोई परामर्श नहीं किया। सर्वोच्च न्यायालयने भी इशारा किया है। चूंकि केन्द्र सरकारने राज्य सरकारोंके साथ कोई विचार-विमर्श नहीं किया, शायद इसीलिए कई राज्य सरकारोंने इन तीनों कानूनोंको लागू करनेसे ही इनकार कर दिया है।
एक और महत्वपूर्ण पहलूकी ओर भी ध्यान देना जरूरी है। अबतक विभिन्न राज्योंमें कृषि और खेतीसे सम्बन्धित प्राय: सभी कानून राज्योंके विधानमण्डलों द्वारा पारित हैं। इस सम्बन्धमें हर राज्यका अपना अलग कानून है। ऐसे अलग कानूनोंकी परम्परा भी अंग्रेजी राजसे शुरू होती है, जब लार्ड कार्नवालियसने १८७० के आसपास इस बंदोबस्त कानूनको लागू किया। बंदोबस्त कानून भी हर राज्यके अलग थे और वह बुनियादी तौरपर खेती और खेतोंके मालिकाने सम्बन्धी अधिकारोंपर आधारित थे। देशकी आजादीके बाद हर राज्यने जमींदारी उन्मूलन सम्बन्धी अपने कानून बनाये। भूमि सुधार और जमीनकी सीमाबंदी सम्बन्धी कानून भी हर राज्यके अलग-अलग हैं। यहां समस्या उत्पन्न होती है तीसरे कृषि कानूनसे जिसमें ठेकेदार खेतीकी व्यवस्था की गयी है। इस देशके गांवोंके लिए यह नयी व्यवस्था है। ठेकेकी खेतीसे उत्पन्न विवादोंके निबटारेकी भी चर्चा है। किसानोंमें यह आशंका व्याप्त हो गयी है कि ठेका खेती और उसमें होनेवाले विवादोंसे उनका मालिकाना हक छिन जायगा। इसी कानूनमें देशके पूंजीपतियोंको समानान्तर मंडी खोलनेकी भी चर्चा है। अभीतक मंडियां सरकारी हैं। मंडियोंकी स्थापना भी राज्य सरकारोंने कानून बनाया है। किसानोंमें यह भी आशंका व्याप्त है कि सरकारी मंडिया समाप्त हो जायंगी और निजी मंडियां माल जमाकर मुनाफा कमायंगी।
किसानोंकी इस आशंकाको बल दे दिया है आवश्यक वस्तु कानूनकी समाप्तिने। इस कानूनको पारित ही इसीलिए किया गया था कि मालकी जमाखोरी रोकी जाय। अब जबकि यह कानून समाप्त कर दिया गया है तो जमाखोरी अधिकार बन गया है और मंडिया खोली भी इसलिए जा रही हैं। इस बिन्दुपर भी सरकार कोई सफाई प्रस्तुत नहीं कर पा रही है। एक और आशंका किसानोंके मनमें न्यूनतम समर्थन मूल्यपर सरकारी क्रयकी है। यह व्यवस्था पचास साल पुरानी हो चुकी है देशमें कृषि क्रान्ति होनेके साथ ही लागू कर दी गयी थी। कृषि मूल्य आयोगने सिफारिश की थी कि किसानोंको लागत मूल्यके डेढ़ गुना वसूली मूल्य निर्धारित होना चाहिए लेकिन ऐसा हुआ कभी नहीं। इस फार्मूलेके अनुसार गेहूंकी आनेवाली फसलकी कीमत ३९ सौ रुपया प्रति क्विंटल होनी चाहिए। किन्तु सरकारने घोषणा की है कि १९५० रुपये प्रति क्विंटलकी। यानी किसानको हर क्विंटलपर एक हजार रुपयेका घाटा होनेवाला है और इसी तरहका घाटा गेहूंके अलावा धान एवं अन्य २६ फसलोंके न्यूनतम मूल्यपर हो रहा है। न्यूनतम वसूली मूल्यसे सम्बन्धित भारत सरकारने कोई कानून नहीं बनाया है, बल्कि सरकारी आदेशोंसे नियम लागू होता है। किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य देनेके लिए कानून बनानेको भी तैयार नहीं है। किसानों और सरकारी सोचके बीचका अन्तर भारी है और इसीलिए विवाद गहरा रहा है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखण्ड और मध्यप्रदेशके लाखों किसान दिल्लीकी सड़कोंपर जमा हैं। भारी ठण्डके कारण कई किसानोंकी मृत्यु हो चुकी है। केन्द्र सरकारके साथ किसान नेताओंकी आठ चक्रकी बैठक हो चुकी है। किसान अड़े हैं कि तीनों कानून वापस किये जायं। अगले चक्रकी बैठक भी होनी है किन्तु विवाद इतना गहरा है कि कोई चमत्कार ही समझौता करा सकता है। इस बीच सुप्रीम कोर्टने मध्यस्ताके लिए चार सदस्यीय टीम बनायी है। किसान नेताओंने इस पहलका स्वागत किया है किन्तु चार सदस्यीय समितिमेंसे कुछ सदस्योंपर उन्हें आपत्ति है कि वे सरकार समर्थक हैं। किसान इस समितिके समक्ष अपनी बात करते हैं या नहीं, यह देखनेकी बात है। कुछ किसान नेताओंने तीनों कृषि कानूनोंकी वैधानिकताको चुनौती देनेवाली याचिकाएं भी सुप्रीम कोर्टमें प्रस्तुत कर रखी है। लगता है चार सदस्यीय समितिकी रिपोर्ट आ जानेके बाद ही सुप्रीम कोर्ट इन याचिकाओंपर भी सुनवाई करेगा।