सम्पादकीय

डरावनी है कोरोनाकी दूसरी लहर


आशीष वशिष्ठ

हमारी लापरवाहीका परिणाम है कि कोरोनाके मामले बढ़ रहे हैं और जीवन प्रभावित हो रहा है। पहली लहरका पीक १७ सितंबरको था, जब करीब ९७ हजार केस सामने आये थे। उसके मुकाबले दूसरी लहरमें ८ अप्रैलको १ लाख ३१ हजार ८७८ नये केस सामने आये। पिछले साल वायरसके शुरू से लेकर अबतक एक दिनमें मिले मरीजोंकी संख्या सबसे अधिक है। मौतें भी ८०२ हो गयी हैं। बीते वर्ष १७ अक्तूबरके बाद यह पहली बार है जब एक दिनमें ८०० से ज्यादा मृत्यु हुई है। १७ अक्तूबरको १०३२ मरीजोंने जान गंवा दी थी। कुल सक्रिय मरीजोंका आंकड़ा ८ लाखको पार कर चुका है। देशमें मरीजोंके मिलनेकी रफ्तार भी बढ़कर ९.२१ फीसदी हो गयी है। मतलब अब हर सौ लोगोंमें नौ कोरोनासे संक्रमित पाये जा रहे हैं। नये केसेजको लेकर जो स्टडी हुई है, उसके अनुसार बदलते स्ट्रेनकी वजहसे लक्षण भी बदल रहे हैं। शुरूमें लग रहा था कि महाराष्टï्र सहित कुछ राज्योंमें ही उसका असर रहेगा लेकिन देखते-देखते पूरा देश उसकी गिरफ्तमें आ गया। इस बार उसकी गति बहुत तेज होनेसे चिकित्सा प्रबंध कम पडऩे लगे हैं। कहीं वेंटीलेटरकी कमी है तो कहीं ऑक्सीजनकी। अस्पतालोंमें बिस्तरोंका अभाव होनेसे मरीजोंको घरपर रहकर इलाज करनेकी सलाह दी जा रही है। गम्भीर मरीजोंको लगाये जानेवाले रेमडेसिवर इंजेक्शनकी उपलब्धता भी पर्याप्त नहीं है। जिस तरह सरकार कोरोनाकी वापसीको लेकर निश्चिन्त हो चली थी उसी तरह चिकित्सा जगत भी उसके पलटवारको लेकर बेफिक्र-सा था। आम जनताकी लापरवाही तो हमारे राष्टï्रीय चरित्रको दर्शाती ही है। ऐसेमें कोरोनाको भी तेजीसे पांव फैलानेका अवसर मिल गया। बीते १६ जनवरीको हेल्थकेयर वर्कर्सको टीका लगानेके साथ ही देशमें कोरोना टीकाकरणकी शुरुआत हुई थी। २ फरवरीसे फ्रटलाइन वर्कर्सको भी वैक्सीन लगने लगी थी। १ मार्च ६० वर्षसे ऊपरके और ४५-५९ वर्षके गम्भीर बीमारियोंसे जूझ रहे लोगोंको वैक्सीन लगने लगी थी। इस बीच, कोरोनाकी दूसरी लहर हावी हुई और सरकारने १ अप्रैलसे ४५ वर्षसे ऊपरके सभी लोगोंको वैक्सीनेशनमें शामिल कर लिया। देशभरमें अबतक ८.२४ करोड़ लोगोंको पहला डोज और १.१८ करोड़ लोगोंको दूसरा डोज दिया जा चुका है। इन्हें मिलाकर अबतक ९.४३ करोड़ डोज दिये जा चुके हैं। महाराष्टï्र और राजस्थानके बाद सबसे ज्यादा वैक्सीन डोज गुजरातमें दिये गये हैं। यहां अबतक ८४ लाखसे ज्यादा डोज दिये जा चुके हैं। उत्तर प्रदेशमें भी ८१ लाखसे ज्यादा डोज दिये गये हैं। पीएम मोदीने मुख्य मंत्रियोंसे अगले दो-तीन हफ्तेमें वायरसके प्रसारको रोकनेके लिए युद्धस्तरपर काम करनेकी अपील की है। पीएमने ११ से १४ अप्रैलतक देशमें वैक्सीन महोत्सव मनानेका भी आह्वान किया, ताकि अधिकसे अधिक पात्र लाभार्थियोंको टीका लग सके।

वस्तुत: जैसे ही टीकाकरण शुरू हुआ वैसे ही आम जनतामें यह अवधारणा प्रबल हो उठी कि उनके पास कोरोनासे बचावका रक्षा कवच आ गया है। लेकिन अबतक जितने लोगोंको टीके लगे हैं उस गतिसे तो यह काम पूरा होनेमें लम्बा समय लगेगा। ऐसेमें जो सामान्य तरीके हैं वह ही बचावमें सहायक होंगे जिनकी उपेक्षा करनेका दुष्परिणाम देश भोग रहा है। टीका लगनेके बाद भी अनेक लोगोंको लापरवाही महंगी पड़ी है। लेकिन जनताको कसूरवार ठहराने मात्रसे काम नहीं चलेगा क्योंकि राजनीति भी उसे लापरवाह बनानेमें सहायक है। मसलन राजनीतिक जलसोंमें कोरोना शिष्टïाचारकी जिस बेहयाई और दबंगीसे धज्जियां उड़ायी जाती हैं वह भी संक्रमणके फैलावकी बड़ी वजह है। चुनाववाले राज्योंमें तो लगता ही नहीं कि कोरोनाका कोई डर है। दिल्ली उच्च न्यायालय पूछ रहा है कि प्रचार करनेवाले नेता मास्क क्यों नहीं लगा रहे? राजनीतिका आलम यह है कि प्रधान मन्त्री द्वारा कोरोनापर विचार करने बुलायी गयी आभासी बैठकमें बंगालकी मुख्य मंत्री ममता बैनर्जी हिस्सा नहीं लेंगीं। पहले भी ऐसा हो चुका है। हालमें पंजाब सहित कुछ राज्योंमें राजनीतिक जलसोंपर भी रोक लगायी गयी है। २ मईको पांच राज्योंके चुनाव परिणाम आनेके बाद आगामी वर्षके मुकाबलोंके लिए मैदान सजने लगेगा। राजनीतिक दलोंके अपने स्वार्थ हैं। लेकिन मौजूदा हालातमें लोगोंकी जानके साथ अर्थव्यवस्थाको बचाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

बीते एक महीनेमें जिस तरहसे संक्रमणने सुरसा जैसा मुंह फैलाया उसके बावजूद लॉकडाउन लगानेके फैसलेको प्रदेश और स्थानीय प्रशासनके जिम्मे छोडऩेपर केन्द्र सरकारसे पूछा जा रहा है कि जब संक्रमितोंका दैनिक आंकड़ा सवा लाखसे भी अधिक हो चुका है, जिसमें आगे भी वृद्धिकी पूरी सम्भावना है तब भी वह इस बारेमें उदासीन क्यों है? जानकारोंके अनुसार, जिस कारणसे केंद्र सरकार देशभरमें लॉकडाउन लगानेसे पीछे हट रही है वह है अर्थव्यवस्था। बीते वर्ष अनेक महीनोंतक अधिकांश उद्योग-व्यापार बंद रहनेसे अर्थव्यवस्थाके चिंताजनक स्थितिमें आनेसे विकास दर नकारात्मक दिशामें बढ़ गयी। दिवालीके समय लॉकडाउन हटनेपर आर्थिक गतिविधियोंने दोबारा गति पकड़ी जिसका असर जीएसटी संग्रहमें लगातार हुई वृद्धिके रूपमें सामने आया। इसीलिए प्रदेश सरकारें नयी लहरपर काबू पानेके लिए नाइट कफ्र्यू और लॉकडाउनका सहारा ले रही हैं। लेकिन नाइट कफ्र्यू या तालाबंदीकी दहशत और चिंता इतनी है कि कई स्थानोंपर कोचिंग सेंटर और अन्य शिक्षण संस्थानोंने असहमतिके स्वर उठाने शुरू कर दिये हैं। खुदरा चेन, होटल, रेस्तरां, ढाबा और इलेक्ट्रॉनिक्स, कम्प्यूटरके कारोबारसे जुड़े व्यापारियोंने सरकारोंको चेतावनी देना शुरू कर दिया है कि या कफ्र्यू और तालाबंदीको आसान करें या वापस लें अथवा व्यापारी सड़कोंपर उतरनेको विवश होंगे। फैक्टरियों, मिलों और पॉवरलूमपर ताले लटकने शुरू हो गये हैं। हालांकि कुछ उद्योग अपने मजदूरोंको वेतन, खाना और आवासकी सुविधाएं उपलब्ध करवा रहे हैं। लेकिन यह कबतक संभव होगा? मजदूरोंके एक तबकेने अपने गांव लौटना भी शुरू कर दिया है। कोरोना वायरस अनिश्चित है, लिहाजा आदमी कबतक घरमें कैद रहेगा या कारोबारकी तालाबंदी करता रहेगा? आम नागरिकमें निराशा, कुंठाके साथ उकताहट भी पैदा होने लगी है, लिहाजा वह तल्ख प्रतिक्रिया देने लगा है। नाइट कफ्र्यू या तालाबंदीसे क्या हासिल किया जा सकता है? बेशक यह अधूरा समाधान है। रातके बाद सामान्य दिन शुरू होना है और फिर लोगोंको कामपर जाना ही होगा, सामाजिक और सार्वजनिक मेल-मिलाप भी होगा, जबतक हम कोरोना प्रोटोकॉलका पालन नहीं करेंगे, तबतक संक्रमणको समाप्त कैसे किया जा सकता है? सरकारें और अदालतें भी याद रखें और उसके मुताबिक अपने दायित्व निभायें। फिर भी यह लड़ाई अनिश्चित और अंतहीन रहेगी, विशेषज्ञोंका ऐसा मानना है। इन तमाम चुनौतियोंके बावजूद देशके पास पहलेकी अपेक्षा बेहतर अनुभव और बेहतर संसाधन उपलब्ध हैं। हमें लॉकडाउनकी अवधि याद करनी होगी और उस समय हमारे द्वारा बरती जानेवाली सावधानियोंको फिरसे अपनाना चाहिए।