Post Views: 970 हृदयनारायण दीक्षित विश्व कर्मप्रधान है। तुलसीदासने भी लिखा है कर्म प्रधान विश्व रचि राखा। सत्कर्मकी प्रशंसा और अपकर्मकी निन्दा समाजका स्वभाव है। लोकमंगलसे जुड़े कर्मोकी प्रशंसासे समाजका हितसंवद्र्धन होता है। प्रशंसाका प्रभाव प्रशंसित व्यक्तिपर भी पड़ता है। वह लोकहित साधनामें पहले से और भी ज्यादा सक्रिय होता है। समाज प्रशंसनीय व्यक्तिका अनुसरण […]
Post Views: 1,189 श्रीराम शर्मा प्राचीनकालसे तुलना की जाय और मनुष्यके सुख-संतोषको भी दृष्टिगत रखा जाय तो पिछले जमानेकी असुविधाभरी परिस्थितियोंमें रहनेवाले व्यक्ति अधिक सुखी और संतुष्ट जान पड़ेंगे। इन पंक्तियोंमें भौतिक प्रगति तथा साधन-सुविधाओंकी अभिवृद्धिको व्यर्थ नहीं बताया जा रहा है, न उनकी निंदा की जा रही है। कहनेका आशय इतना भर है कि […]
Post Views: 2,273 मानी जाती हैं। इन्हें अपनी ताकतपर घमंड है। थोड़ा बहुत नहीं, बहुत ज्यादा घमंड है। इसी घमंडमें की गयी गलतियां इनकी शक्तिकी पोल खोलनेमें लगी हैं। पिछले लगभग एक डेढ़ सालमें स्पष्ट हो गया कि ये कितना भी दंभ भरें इनमें छोटेसे छोटे देशसे लड़नेतककी ताकत नहीं है। एक साल पहले […]