सम्पादकीय

बंगालमें कांटेदार मुकाबला


राजेश माहेश्वरी

बंगालकी चुनावी लड़ाई दिलचस्प और कांटेदार हो चुकी है। ममता बनर्जी जुझारू योद्धाकी भांति मैदानमें मजबूतीसे डटी हैं। बीते दिनों प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदीकी परेड ग्राउण्डमें चुनावी रैलीके बाद बंगालमें चुनाव प्रचारने और तेजी पकड़ी है। प्रधान मंत्रीकी पहली रैलीमें अभिनेता मिथुन चक्रवर्तीने भाजपाका दामन थाम लिया। मिथुन दादाके भाजपामें आनेसे लड़ाईमें धार बढ़ गयी है। विभिन्न प्लेटफार्मने जो पूर्वानुमान पश्चिम बंगाल चुनावको लेकर लगाये हैं, उन सबमें भाजपाको बढ़त मिलती दिख रही है। २०१९ के लोकसभामें ४२ मेंसे १८ सीट जीतनेवाली भाजपाके हौसले हालमें बिहार विधानसभा चुनावमें मिली शानदार जीतके बाद बुलंद हैं। भाजपाने पश्चिम बंगालमें कई कद्दावर नेताओंसे लेकर केन्द्रीय मंत्रियोंको ममताके खिलाफ उतारकर मुकाबलेको कांटेका बना दिया है। भाजपा पहले और दूसरे चरणके लिए अपने ५७ उम्मीदवारोंके नामोंकी घोषणा कर चुकी है। तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस, लेफ्ट और आइएसएफ गठबंधनने भी अपने उम्मीदवारोंके नामोंका ऐलान कर दिया है। लेकिन सबसे दिलचस्प मुकाबला नंदीग्राममें होने जा रहा है। नंदीग्रामसे तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपामें आये शुभेंदु अधिकारीको टिकट दिया गया है। खास बात यह है कि ममताने अपनी पारम्परिक सीट भवानीपुरको छोड़कर नंदीग्रामसे चुनाव लडऩे जा रही है। ऐसेमें राजनीतिक विश्लेषकों और मीडियाकी निगाहें नंदीग्राम सीटपर टिक गयी हैं। वास्तवमें नंदीग्रामने ही ममता बनर्जीको पश्चिम बंगालकी सबसे बड़ी कुर्सीतक पहुंचाया था। इस वजहसे यह उनके लिए काफी भाग्यशाली रहा है। लेकिन नंदीग्रामके जरिये ममताको सत्ता दिलानेमें शुभेंदु अधिकारीकी अहम भूमिका थी। २००७ में भूमि अधिग्रहणके खिलाफ हो रहे प्रदर्शनोंमें अधिकारी परिवारने बड़ी भूमिका निभायी थी। इस अधिग्रहणके खिलाफ बनी कमेटीमें शुभेंदु अधिकारीकी किरदार अहम था। तब १४ लोग पुलिस फायरिंगमें मारे गये थे। विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) के खिलाफ मुख्य रूपसे शुभेंदु अधिकारी ही रैलियों और कार्यक्रमोंका आयोजन करते थे। कहा जा सकता है कि शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम आन्दोलनका बड़ा चेहरा रहे थे और उन्होंने ही यहांसे ममता बनर्जीके लिए सियासी जमीन तैयार की थी। इससे शुभेंदुको ममताके करीबियोंमें गिना जाता था। वह तृणमूल कांग्रेसमें नंबर दोके नेता भी बने थे। अधिकारी परिवारका पूर्वी और पश्चिमी मेदिनीपुरमें खास प्रभाव माना जाता है। शुभेंदु अधिकारी पहले दावा कर चुके हैं कि यदि उन्हें नंदीग्रामसे टिकट मिलता है तो वह या तो ममताको ५० हजारसे ज्यादा वोटोंसे हरायंगे या फिर राजनीतिसे संन्यास ले लेंगे।

वहीं, बॉलीवुड स्टार मिथुन चक्रवर्तीके भाजपामें आनेसे पार्टीको मजबूती मिलना तय माना जा रहा है। मिथुन दादा तृणमूल कांग्रेसकी तरफसे राज्यसभा सदस्य भी रह चुके हैं किन्तु कार्यकाल पूरा होनेके पहले ही त्यागपत्र दे दिया था। कुछ सालोंसे वे कुछ टीवी शोमें बतौर निर्णायक दिखाई देते हैं तथा फिल्मोंसे तकरीबन दूर हैं। भाजपाने प्रधान मन्त्रीके साथ मंच देकर पार्टीने यह संकेत तो दे ही दिया कि उनमें उसे तुरुपका इक्का दिख रहा है। बंगालकी सियासत और समाज दोनोंपर फिल्मों और साहित्यका जबर्दस्त असर रहा है शायद इसलिए मिथुन दादाको अपने साथ जोड़ा है। इससे पूर्व वामपंथी और तृणमूल कांग्रेसने भी फिल्मी हस्तियोंका बिना संकोच उपयोग किया। तृणमूलने मिथुनको पुराना नक्सली बताकर यह तो स्वीकार कर लिया कि उनके भाजपाई बननेसे उसे नुकसान हो सकता है। खुदको कोबरा नाग जैसा बताकर मिथुनने यह संकेत तो दे ही दिया कि वह भाजपाके प्रचार अभियानकी मुख्य भूमिकामें होंगे। बंगाल चुनावकी पूरी तस्वीर देखें तो अब मुकाबला त्रिकोणीय होता दिख रहा है। तृणमूल कांग्रेस, भाजपा, और लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधनके बीच। ऐसा नहीं कि लेफ्ट और कांग्रेस पश्चिम बंगालमें पहली बार साथ आये हों। इससे पहले २०१६ का विधानसभा चुनाव भी दोनों पार्टियोंने साथ मिलकर लड़ा था। लेकिन २०१९ के लोकसभा चुनावमें वह अलग हो गये थे। अब २०२१ के विधानसभा चुनावमें वह फिरसे साथ आ रहे हैं। इसलिए दोनों पार्टियोंके मिलन-बिछोह-मिलनकी रणनीतिको समझना जरूरी है। साल २०११ में जबसे तृणमूल कांग्रेस सत्तामें आयी, उसके पहलेतक पश्चिम बंगालको लेफ्ट पार्टीका गढ़ माना जाता था। लेकिन धीरे-धीरे उनकी साख ऐसी घटी कि विधानसभामें मुख्य विपक्षी पार्टी भी नहीं रह पायी। आज नौबत अस्तित्व बचानेतक पहुंच गयी है। बंगालमें फिलहाल कांग्रेस और लेफ्ट मुख्य विपक्षी दल है।

वर्ष २०१६के विधानसभा चुनावमें कुल २९४ सीटोंमेंसे तृणमूल कांग्रेस २११ सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। कांग्रेसको ४४ सीटें, लेफ्टको ३२ सीटें और बीजेपीको तीन सीटोंपर जीत मिली थी। वोट शेयरकी बात करें तो तृणमूल कांग्रेसको तकरीबन ४५ फीसदी वोट शेयर मिले थे। लेफ्टके पास वोट शेयर २५ फीसदी था, लेकिन सीटें कांग्रेससे कम थीं। कांग्रेसके पास १२ फीसदीके आसपास वोट शेयर था लेकिन उसे लेफ्टसे ज्यादा सीटें मिली थी। भाजपाका वोट शेयर तकरीबन दस फीसदी था। साल २०१९ के लोकसभा चुनावमें यह सारे समीकरण धरेके धरे रह गये। कुल ४० सीटोंमेंसे तृणमूलने २२ सीटें जीतीं, भाजपाने १८ और कांग्रेस दोपर सिमट गयी। लेफ्टका खाता भी नहीं खुला। इसमें दो राय नहीं है कि ममता बनर्जी सत्ता विरोधी लहरका सामना कर रही हैं। यदि उनके साथ मिलकर गठबंधन करते तो शायद कांग्रेस और लेफ्टका राजनीतिक अस्तित्व बिल्कुल ही खत्म हो जाता। यही वजह है कि दोनों पार्टियोंने तृणमूलको चुनौती देनेके लिए एक होना सही समझा।

लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनके लिए भाजपा सबसे बड़ी चुनौती है या फिर तृणमूल कांग्रेस गठबंधनको इस बारेमें तय करना होगा। फिलहाल गठबंधन दोनों पार्टियोंसे ही समान दूरी बनाकर चलनेकी रणनीतिपर काम कर रहा है। उनकी इस रणनीतिसे तृणमूलको नुकसान होगा या फिर भाजपाको यह कह पाना अभी मुश्किल है। राजनीतिक विश्लेषकोंकी माने तो बीजेपीका हिंदू वोट है और कांग्रेसका भी है। उसी तरहसे तृणमूल कांग्रेसके पास भी मुस्लिम वोट लेफ्टके पास भी मुस्लिम वोटर है। यह गठबंधन दूसरी पार्टीके वोट काटेंगे या फिर अपने अस्तित्वको बचानेमें कामयाब हो पायंगे? यह सबसे बड़ा सवाल है। बंगालमें भाजपाकी बढ़तने मुकाबलेको और दिलचस्प बना दिया है। आखिरकार २ मईको ही यह पता चलेगा कि बंगालने परिवर्तनको पंसद किया या फिर दीदीका साथ।