सम्पादकीय

बेरोजगारोंकी बढ़ती फौज खतरेकी घंटी


रवि शंकर
विभिन्न एजेंसियोंके ताजा सर्वेक्षण इस ओर इशारा करते हैं कि देशमें बेरोजगारीका ग्राफ बढ़ा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संघटन और एशियाई विकास बैंककी संयुक्त रिपोर्टमें कहा गया है कि देशमें कोरोना महामारीके कारण ४१ लाख युवाओंको नौकरीसे हाथ धोना पड़ा है। बेरोजगारीके यह आंकड़े चिंताजनक हैं। इस बातसे इनकार नहीं किया जा सकता कि रोजगार क्षेत्रके हालात संकटमें हैं। शिक्षित युवाओंकी फौज लगातार बढ़ रही है और सरकारें उन्हें रोजगार मुहैया नहीं करा पा रहीं। साफ है, जिन युवाओंके दमपर हम भविष्यकी मजबूत इमारतकी आस लगाये बैठे हैं उसकी नींवकी हालत निराशाजनक है और हमारी नीतियोंके खोखलेपनको राष्ट्रीय पटलपर प्रदर्शित कर रही है।
बढ़ती बेरोजगारी शिक्षित युवाओंको दीमककी तरह चाटती जा रही है। जनसंख्याके अनुसार रोजगारके अवसर जितने सृजित होने चाहिए उतने नहीं हो पा रहे हैं। नतीजतन युवा वर्ग बेरोजगारीकी चक्कीमें पिसकर अपने लक्ष्योंसे भटकता जा रहा है। हालांकि चुनावी समरमें बेरोजगारीको खत्म करनेका एजेंडा हर राजनीतिक दलके घोषणापत्रमें शामिल होता है। चुनाव तदुपरांत कोई भी राजनीतिक दल अबतक युवाओंसे किये गये वादोंपर खरा नहीं उतर पाया है। रोजगार मुहैया करानेके लिए सरकारोंकी ओरसे दावे तो बहुत किये जाते हैं, लेकिन रोजगार फिर भी दूरकी कौड़ी ही साबित हो रहे हैं। जिस तरह उसके उन्मूलनके लिए प्रयास किया जा रहा है उससे लगता है कि यह उन्मूलन इतना आसान नहीं है। इसके लिए कोई कारगर रणनीति बनानेकी आवश्यकता है। दरअसल युवाओंके लिए रोजगार अवसर सृजित किये जानेकी बजाय सरकारें उन्हें चंद रुपये वेतन भत्तेके दिये जानेके नामपर उनका मजाक उड़ाती रही हैं। एनसीआरबीके ताजा आंकड़ोंके अनुसार २०१८ में १२९३६ नौजवानोंने बेरोजगारीके कारण जान दी। रोजाना औसतन ३५ लोगोंने बेरोजगारीके चलते जान दी। आर्थिक विकासके लिए भी बेरोजगारीकी यह स्थिति बहुत खतरनाक सिद्ध हो रही है।
निजी क्षेत्र एवं सरकारी क्षेत्र दोनोंमें स्थिति गंभीर है, निजी क्षेत्रमें सिरपर हमेशा छंटनीकी तलवार लटकी रहती है। वहीं सरकारी क्षेत्रमें रोजगार हासिल करनेके लिए बेरोजगार युवाओंको आज कितनी मशक्कत करनी पड़ रही है, यह बात किसीसे छिपी नहीं है। पढ़े-लिखे लोगोंमे बेरोजगारीके हालात यह हैं कि चतुर्थ श्रेणीके कर्मचारीके पदके लिए प्रबंधनकी पढ़ाई करनेवाले और इंजीनियरिंगके डिग्रीधारी भी आवेदन करते हैं। इसके लिए लाखों बेरोजगार युवाओंको आवेदन करनेके एवजमें आवश्यकतासे अधिक आवेदन राशि देनी पड़ रही है। सरकार द्वारा की जानेवाली भर्तियोंमें पदोंकी संख्या बेरोजगारोंकी भीड़को देखते हुए ऊंटके मुंहमें जीरेके समान होती है। इसके बावजूद लाखों युवाओं द्वारा दिया गया आवेदन शुल्क सरकारके खजानेमें जमा हो जाता है। सरकारको चाहिए कि इस मसलेपर वह गंभीरतासे विचार करे। घोषित तौरपर सरकारी योजनाएं बहुत हैं, परन्तु क्या उनपर ईमानदारीसे अमल नहीं हो पाता है।
जाहिर है, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार ऐसे विषय हैं जिनसे केंद्र और राज्यकी सरकारंम मुंह नहीं मोड़ सकतीं। शिक्षित नौजवानोंको रोजगार मुहैया कराना सरकारोंकी प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इन तीनों मोर्चोंपर भारतका सरकारी तंत्र विफल साबित हुआ है। यह ठीक है कि भारतमें जितनी भी सरकारें अभीतक रही हैं, उन्होंने अपने अनुसार मानव संसाधनको सुदृढ़ करनेका प्रयास जरूर किया है। फिर भी युवाओंके सामने बेरोजगारीका संकट खड़ा है। देशमें बढ़ती इस बेरोजगारीके दो मुख्य कारण है। पहला, सरकारका वह अडिय़ल रवैया है, जिसमें सरकार पैसे खर्च नहीं करना चाहती। जिससे लोगोंके हाथमें पैसा आना कम हो गया है। जब पैसा नहीं है तो लोग खर्च नहीं कर पा रहे हैं। जिससे बाजार और प्राइवेट सेक्टरपर बुरा असर पड़ता है। दूसरा, सरकार बेरोजगारी या आर्थिक मंदीको लेकर गंभीर नहीं दिखती हैं, जो उसके मंत्रियोंके बयानोंसे साबित हो जाता कि वह सचाईको स्वीकार करनेकी जगह उलटे-सीधे बयान देकर इसपर पर्दा डालनेकी कोशिश करते रहते हैं। भारतके सन्दर्भमें एक बात लगातार कही जाती है कि भारत युवाओंका देश है। इसकी ५० प्रतिशतसे अधिक आबादी २५ वर्ष एवं ६५ फीसदीसे अधिक आबादी ३५ वर्षसे कम आयुकी है। इस हिसाबसे यदि गणनाकी जाए तो एक औसत भारतीय उम्र लगभग २९ वर्ष की ठहरेगी, जो चीन एवं जापानकी औसत उम्र क्रमश: ३७ एवं ४८ वर्षसे बहुत कम ठहरती है। भारत यदि वर्तमानमें युवाओंका देश है तो हमें अपने आनेवाले भविष्यके बारेमें भी सोचना चाहिए। परन्तु विडंबना यह है कि देशमें एक तरफ रोजगारके अवसरोंके लाले पड़े हैं तो दूसरी तरफ उपलब्ध अवसरोंमें भी लगातार कटौतियां की जा रही हैं। उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरणकी ढाई दशकोंकी यात्रा रोजगार सृजन और लम्बी उड़ानकी चाहत पालनेवाले युवाओंकी आकांक्षाओंको पूरा करनेमें विफल रही है। सवाल यह भी है कि इन हालातोंमें आखिर देशके युवा कहां जायं। मोदी सरकारने कौशल विकासको लेकर बड़े-बड़े दावे जरूर किये थे, लेकिन अबतक उसका कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ सका है। साफ है कि सरकारकी नीतियोंमें कहीं-न-कहीं कोई व्यावहारिक कठिनाई अवश्य है। अत: सरकारको चाहिए कि वह इसके निराकरण हेतु एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाये और समस्याको और अधिक बढऩे न दे। बेरोजगार युवाओंके तेजीसे बढ़ती तादाद देशके लिए खतरेकी घंटी है। अत: सरकारको बेरोजगार युवाओंको आत्मनिर्भर बनानेके लिए भरसक प्रयास करनेकी जरूरत है।