News सम्पादकीय

लैंगिक भेदभाव महिलाओंके विकासमें रोड़ा


वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की २००१ की रिपोर्टपर यकीन करें तो देशमें महिला समानता के दावे खोखले निकले है। भारतके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश या समाज लैंगिक न्याय के बिना संपूर्ण विकास हासिल करने के दावेके विपरीत हालिया जारी वर्ल्ड इकनामिक फोरमकी रिपोर्टमें महिला समानताकी बात तिनकेकी तरह बिखर गयी है। वर्ल्ड इकनामिक फोरमकी वैश्विक लैंगिक भेद अनुपात रिपोर्ट २०२१ के अनुसार भारतमें आर्थिक भागीदारी और अवसरके क्षेत्रमें बड़ी गिरावट आई है। रिपोर्टके अनुसार इस क्षेत्रमें लैंगिक भेद अनुपात तीन प्रतिशत बढ़कर ३२.६ फीसदी तक पहुंच गया है। रिपोर्ट २०२१ में भारत पिछड़ गया है। १५६ देशों की सूची में भारत २८ पायदान फिसलकर १४०वें स्थानपर आ गया है जो बेहद चिंताजनक है। वर्ल्ड इकनॉमिक फोरमने महिला-पुरुष समानता को लेकर १५६ देशोंकी रिपोर्ट जारी की है। इसमें भारत २८ स्थान फिसलकर १४० वें स्थान पर पहुंच गया है।
रिपोर्टके अनुसार सबसे ज्यादा गिरावट राजनीतिक सशक्तिकरण सबइंडेक्समें आई है, जिसमें महिला मंत्रियोंकी संख्यामें फिरसे १३.५ प्रतिशतकी कमी आयी है। इसके अलावा इस रिपोर्टमें महिला श्रम भागीदारी दरमें भी गिरावट आयी है, जो कि २४.८ प्रतिशत से गिरकर २२.३ प्रतिशत रह गयी है। इस रिपोर्ट में प्रोफेशनल और टेक्निकल क्षेत्र में भी महिलाओंकी भूमिका घटकर २९.२ प्रतिशत रह गयी है। रिपोर्टमें कहा गया है कि, इस क्षेत्रमें सीनियर और मैनेजमेंट लेवलसे जुड़ी पोजिशनमें भी महिलाओंकी भागीदारी सिर्फ १४.६ प्रतिशत है और टाप मैनेजर लेवलपर महिलाओंकी संख्या सिर्फ ८.९ प्रतिशत है। इसी भांति स्वास्थ्य और अस्तित्व से जुड़े सबइंडेक्समें भी महिलाओं के साथ भेदभावकी बात सामने आयी है। रिपोर्टके अनुसार, लिंग आधारित सोच के कारण, जन्मके समय लिंगानुपात में भी बड़ा अंतर सामने आया है। भारत के पड़ोसी देशोंमें से बांग्लादेश ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट २०२१ में ६५वें नंबर पर, नेपाल १०६, पाकिस्तान १५३, अफगानिस्तान १५६, भूटान १३० और श्रीलंका ११६ वें स्थानपर है। अगर आंकड़ोंपर गौर करें तो दिल दहल जायेगा। हकीकत यह है कि महिलाएं आज भी अपने अधिकारोंके लिए संघर्ष कर रही है। महिलाएं पुरुषकी तुलना में बेहद संकुचित क्षेत्रमें चारदीवारी के भीतर ही रहती आयी हैं। अंधेरा होते ही महिला अधिकार और स्वतंत्रता छू मंतर हो जाते है।
आनलाइन सर्वेके मुताबिक वेतन से लेकर परमोशनके दौरान महिलायें भेदभावका शिकार हो रही है। कामकाजी महिलाओंका साफ तौरपर कहना है लिंगभेदके कारण वे इसकी शिकार हुई है। कामकाजी महिलाओं को घरेलू जिम्मेदारियोंके कारण कार्यस्थलपर भेदभावका सामना करना पड़ रहा है। पारिवारिक जिम्मेदारियां उनके विकासमें रोड़ा बन रही है। यह स्थिति दुर्भाग्यजनक है। महिला जननी है। देखा जाये तो उनकी विशेष परिस्थितियोंको देखते हुए उन्हें अधिक अवसर मिलने चाहिए मगर ऐसा नहीं हो रहा है। पारिवारिक जिम्मेदारियां अभिशाप बन गयी है।
आजादीके लगभग सात दशकों बाद भी समाजमें महिलाओं की हालत में कोई खास सुधार नहीं आया है। समाजके नजरिएमें भी महिलाओं के प्रति अबतक खास बदलाव देखने को नहीं मिला है। विश्व बैंककी रिपोर्टके अनुसार महिलाओंमें बढ़ती शिक्षाके बावजूद देशमें आर्थिक मोर्चेपर उनकी भागीदारीमें गिरावट आयी है। इसकी वजह यह है कि ज्यादातर परिवारोंमें अब भी महिलाओंको घरसे दूर रह कर नौकरी करनेकी इजाजत नहीं है। घर-परिवार व पतिसे दूर रह कर नौकरी करने वाली महिलाओंको समाजमें अच्छी निगाहोंसे नहीं देखा जाता।
आधी आबादीको चाहिए स्वतंत्रता और समानतासे जीनेका अधिकार। घर-समाज-देश दुनियाकी अधिकांश आर्थिक शक्तियां पुरुषोंके पास हैं। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार विश्व की समूची संपत्तिमें केवल दो प्रतिशत मालिक महिलाएंहैं। चल-अचल संपत्ति में भी भारी असमानता है। महिलाको हमने चौकी चूल्हे तक सीमित कर रखा है। साथ घूमने, सिनेमा देखने या शॉपिंग पर ले जाने मात्रसे महिलाको उसके अधिकार नहीं मिल जायेंगे। इसके लिए हमें अपनी संकीर्ण सोचके दायरेसे बाहर निकलना होगा। मानसिकता बदलनी होगी। नजरिया साफ करना होगा। अपनी और दूसरेकी बेटीको एक समझना होगा।
लड़कियोंको शिक्षा ओर रोजगार उपलब्ध करानेकी दिशामें हमारे सामाजिक और पारिवारिक स्तरपर बाधाएं सामने आती हैं। हम लड़कों को आगे बढ़ानेमें अपनी रूचि लेते हैं ओर लड़कियोंको पीछे रखने में अपनी भलाई समझते हैं। हमें अपनी इसी सोच को बदलना होगा। कहते है कि एक लड़की शिक्षित हुई तो पूरा परिवार शिक्षाकी रोशनी से जगमगाने लगेगा।