सम्पादकीय

आन्तरिक सुरक्षाकी चुनौती


डा. सुशील कुमार सिंह  

सामान्यत: समझा जाता है कि नक्सल आंदोलन उन क्षेत्रोंसे सम्बंधित है जहां आधारभूत संरचनाकी न सिर्फ कमी है, बल्कि संसाधनोंका भी भरपूर आभाव है जबकि सचाई यह है कि नक्सलवाद प्रभावित तमाम इलाके खनिज संसाधनोंके विपुल भण्डारसे पटे हैं। विकाससे अछूता यह क्षेत्र दशकोंसे न केवल नक्सलवादकी समस्यासे जूझ रहा है, बल्कि अब तो यह देशके एक-तिहाई जिले और आबादीतक विस्तार ले चुका है। सुरक्षा बलोंके २४ जवान छत्तीसगढ़के बीजापुर और सुकमा जिलेकी सीमापर नक्सली हमलेमें शहीद हो गये जबकि ३१ घायल हैं। एक कोबरा जवान लापता भी है। तलाशी अभियान जारी है। सीआरपीएफके महानिदेशकके अनुसार आपरेशनमें किसी तरहकी इंटेलिजेंस चूक नहीं हुई है। फिलहाल हमलेकी सूचना मिलते ही केन्द्र सरकारकी त्वरित प्रतिक्रिया देखी जा सकती है। तीन राज्योंमें मतदान पूरा होनेके बाद नक्सलियोंका गढ़ भेदनेकी सुगबुगाहट भी है। स्वराष्ट्रमंत्रीका कथन कि जवानोंका बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा और नक्सलियोंको मुंहतोड़ जवाब दिया जायेगा। यह गलत साबित हुआ है कि पिछले दो सालमें माओवाद कमजोर हुआ है। असलमें जब छत्तीसगढ़में विधानसभा चुनाव २०१८ में होने थे उस समय कांग्रेस पार्टीने जन घोषणापत्र जारी किया था। उसे २०१३ में झीरम घाटीमें माओवादी हमलेमें मारे गये कांग्रेस नेताओंको समर्पित किया गया था। नक्सलवाद समस्याके समाधानके लिए नीति तैयार की जायेगा और वार्ता शुरू करनेके गम्भीर प्रयास भी होंगे ऐसी बातें घोषणापत्रमें थी। विकासके माध्यमसे मुख्यधारामें नक्सलियोंको जोडऩेकी बात हर सरकारने किया परन्तु यह सिर्फ कागजोंतक ही रह गया।

शान्ति स्थापित करनेकी बात करनेवाली सरकारें नक्सलवादको लेकर कोई समाधानकी खास नीति नहीं बना पायी हैं। गौरतलब है कि सुरक्षाबलों और माओवादियोंके बीच बीते चार दशकोंमें बस्तर इलाकेमें संघर्ष चल रहा है। साल २००० में जब छत्तीसगढ़ बना तब भी यहां सिलसिला रूका नहीं। राज्य बननेसे लेकर अबतक ३२ सौसे अधिक मुठभेड़की घटनाएं हुई। गृह विभागकी रिपोर्ट यह बताती है कि जनवरी २००१ से मई २०१९ तक माओवादी हिंसामें १००२ नक्सली मारे गये हैं तो १२३४ सुरक्षाबलोंके जवान शहीद हुए हैं। १७८२ आम नागरिकोंकी जान भी इसमें गयी है। हालांकि ३८९६ माओवादियोंने समर्पण भी किया है। नक्सलवादी हिंसा जिस आकार और स्वरूपका है उसकी जड़े बहुत गहरी हो चली हैं। देश ७५ सालकी स्वतंत्रताके द्वार पर खड़ा है परन्तु मध्य भारतका छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखण्ड, आन्ध्र प्रदेश सहित कई राज्य और जिले नक्सलवादकी चपेटमें है। स्पष्ट है कि शासन सारगर्भित नीतियां और अलग-थलग पड़े हिंसक क्रियाओंसे लिप्त इन तत्वोंको संभाल पानेमें सफल नहीं रही है। आंतरिक सुरक्षाको खतरा बने माओवाद देशके लिए अब किसी बड़े तूफानसे कम नहीं है। स्वराष्टï्रमंत्री कह रहे हैं कि नक्सलियोंने अपनी मौजूदगी दिखानेके लिए हिंसा की है। यह बात सही है कि एक लम्बे अंतरालके बाद नक्सलवादका यह हिंसक रूप देखनेको मिला जिसमें २५ से ३० नक्सली भी मारे गये हैं। देशमें नक्सलवादका किसी कोनेमें और किसी भी पैमानेपर उपलब्ध होना चैनसे नहीं बैठनेकी नीति होनी चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि जनताको माओवादी विचारधारासे मोह भंग हो रहा है परन्तु माओवाद समाप्त नहीं हुआ है।

छत्तीसगढ़ नक्सलवादसे जिस पैमानेपर प्रभावित है वह कहीं अधिक चिंता वाला है। पिछले एक दशकमें कई अलग-अलग घटनाओंमें माओवादी खूनी अंजाम देते रहे हैं। मार्च २००७ में बीजापुरके पास रानीबोदलीमें आधी रातमें जब माओवादियोंने पुलिस कैंपपर जब हमला किया तब पुलिसके ५५ जवान शहीद हुए। पिछले वर्ष जुलाईमें माओवादी हमलोंके चलते २३ पुलिसकर्मी शहीद हुए। २००९ जुलाईकी घटनामें भी २९ पुलिसकर्मी जबकि अप्रैल २०१० में बस्तर इलाकेमें बारूदी सुरंगके माध्यमसे घटनाको अंजाम देकर ७६ जवानोंको मार दिया गया। सिलसिलेवार तरीकेसे देखें तो साल २०१० के भीतर ही तीन माओवादी हमले हुए जिसमें दर्जनों सुरक्षा बल शहीद हुए। गौरतलब है कि बस्तरके दरमा घाटीमें माओवादियोंका हमला कांग्रेसपर बड़ी चोटवाला था। इसीमें कांग्रेस पार्टीके प्रदेश अध्यक्ष समेत पूर्व केन्द्रीयमंत्री विद्या चरण शुक्ल समेत तीस लोग मारे गये। इसे ध्यानमें रखकर २०१८ के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावमें नक्सल समस्याके समाधानके लिए नीति और वार्ता शुरू करनेके लिए गम्भीर प्रयास जैसे संदर्भ कांग्रेसने अपने एजेण्डेमें रखकर अपने नेताओंको समर्पित किया था। २०१८ से छत्तीसगढ़में भूपेश बघेलकी सरकार है जो कांग्रेससे है। सुकमामें २४ अप्रैल २०१७ को नक्सली हमलेमें सीआरपीएफके २५ जवान शहीद हुए थे और पिछले साल २१ मार्चको सुकमामें ही १७ सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे और अब एक बार फिर २४ जवान शहीद हुए जो पिछले तीन-चार सालोंमें सबसे बड़ी घटनाके रूपमें देखी जा सकती है।

भारतमें नक्सलवादको खाद-पानी दशकोंसे मिलता रहा है और इसे फलने-फूलनेमें सामाजिक-आर्थिक समस्याओंने कहीं अधिक काम किया। भूमि सीमा कानूनका उल्लंघन, बेरोजगारी, गरीबी, मूलभूत सुविधाओंका अभाव, शिक्षा एवं स्वास्थ समेत कई परिघटनाओंने इसे पूरा अवसर दिया। अक्षम, अप्रशिक्षित एवं कमजोर मनोबलवाले सरकारी कर्मचारियोंके साथ कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्तिने भी नक्सलवादको वटवृक्ष बननेमें कमोबेश मदद तो किया है। हर बार कहा जाता रहा है कि नक्सलवाद सुरक्षाके लिए खतरा है परन्तु इस खतरेको भांपनेमें कोई सरकार खरी नहीं उतरी। सरकारें आती और जाती रहीं जबकि नक्सलवाद वहीं ठहरा रहा और विशाल आकार लेता रहा। साल २००६ में तत्कालीन प्रधान मंत्री द्वारा नक्सली समस्याको भारतीय-आंतरिक सुरक्षाके सामने सबसे बड़ी चुनौतीके रूपमें घोषणाके बाद कई कदम उठाये। स्वराष्टï्र मंत्रालयके अंतर्गत एक अलग खण्ड नक्सल प्रबंधन अभियानको स्थापित किया गया। योजना आयोग द्वारा उन्हीं वर्षोंमें एक विषेशज्ञ समितिकी स्थापना भी की गयी, जिसमें बताया गया कि सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पक्षपातकी समस्याके चलते यह असर हो रहा है। समितिने यह भी बताया था कि स्थानीय समुदायको सशक्त बनानेके प्रयासके अभावके चलते नक्सलवादका उद्भव है। सब कुछ साफ है परन्तु निबटना आसान नहीं है। सुशासनका दावा करनेवाली सरकारोंके लिए नक्सलवाद आज भी टेढ़ी खीर बना हुआ है और आंतरिक सुरक्षाके लिए बड़ी चुनौतीपर यह उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्यमें इससे निबटनेके लिए कोई उपाय खोजा जायेगा।