सम्पादकीय

ज्ञानका सम्बन्ध


ओशो

उस परम सत्ताको ऋषियोंने ज्ञान कहा है। लेकिन जिस ज्ञानको हम जानते हैं, उस ज्ञानसे उसका कोई भी संबंध नहीं है। हम किसे ज्ञान कहते हैं उसे ठीकसे समझ लें तो ऋषि किसे ज्ञान कहता है उसे समझना आसान हो जायगा। पहली बात तो यह है, सदा किसी ज्ञेयका होता है, अकेला ज्ञान हमें कभी नहीं होता। हम सदा किसी वस्तुके संबंधमें ज्ञानको उपलब्ध होते हैं, अकेला ज्ञान कभी नहीं होता। वृक्ष, मनुष्य, राहपर पड़े पत्थर, सूर्यको जानते हैं, लेकिन जब भी जानते हैं तो थोड़ा ही जानते हैं। जब भी हम कुछ जानते हैं, उसे ऋषियोंने अशुद्ध ज्ञान कहा है, क्योंकि वह जो कुछ है, वह महत्वपूर्ण होता है, ज्ञान महत्वपूर्ण नहीं होता। आकाशमें सूर्यको देखते हैं, सूर्यको जानते हैं तो सूर्य महत्वपूर्ण होता है, जानना महत्वपूर्ण नहीं होता। हमारा यह जो ज्ञान है, यदि सारे विषय हमसे छीन लिये जायं तो तत्काल खो जायगा, क्योंकि विषयके बिना इसका कोई अस्तित्व नहीं है। इसका तो यह अर्थ हुआ कि यह ज्ञान हमपर निर्भर नहीं है, विषयपर निर्भर है। यदि सारे विषय अलग कर लिये जायं और चारों तरफ शून्य हो तो हमारा ज्ञान खो जायगा, क्योंकि हमने ऐसा कोई ज्ञान तो जाना ही नहीं है, जो स्वयंमें ही ठहरा हुआ हो। हमारा सारा ज्ञान वस्तुओंमें ठहरा हुआ है ऑब्जेक्टसमें तो यह बिलकुल स्पष्ट विचार है कि यदि सारे पदार्थ अलग कर लिय जायं तो हमारा ज्ञान भी खो जायगा। इसका अर्थ हुआ कि ज्ञान हममें निर्भर नहीं है, जो पदार्थ हम जानते थे उसमें निर्भर था। यह है हमारा ज्ञान। जब ब्रह्मïको ज्ञान कहता है ऋषिको ऐसे ज्ञानसे प्रयोजन नहीं है, क्योंकि जो ज्ञानपर निर्भर हो, उसको ऋषियोंने अज्ञान कहा है। जो ज्ञान दूसरेपर निर्भर है, यदि ज्ञानके लिए भी मैं स्वतंत्र और मालिक नहीं हूं तो फिर और किस चीजके लिए स्वतंत्रता और मालकियत हो सकती है। यह ज्ञान हमारे और सारे अनुभवोंके साथ जुड़ा हुआ है। हमारे सारे अनुभव इस ज्ञान जैसे ही हैं। कोई प्रेम करनेको न हो तो क्या आप उस समय प्रेमके क्षणमें हो सकते हैं। कोई प्रेमी न हो तो क्या आप प्रेम कर सकते हैं। शायद आप सोचेंगे, कर सकते हैं, लेकिन आपको ख्याल होना चाहिए तब भी आप तभी कर सकेंगे जब चित्तमें आप पहले प्रेमीकी कल्पना कर लें, अन्यथा नहीं कर सकेंगे। वह कल्पना सहारा बनेगी फिर भी आप अकेले होकर प्रेमपूर्ण नहीं हो सकते हैं। ऐसा प्रेम भी दूसरेपर निर्भर हो गया। हम जिसे प्रेम कहते हैं, वह प्रेम सदा दूसरेपर निर्भर होता है। वह इतना निर्भर हो जाता है दूसरेपर कि प्रेम गुलामी बन जाती है। तो हमारा प्रेम और जिस प्रेमको स्वतंत्रता कहते हैं जीजस या बुद्ध, उसमें कोई संबंध नहीं है। फूलको देखते हैं तो हमें सौंदर्यका बोध होता है, सूरजको डूबते देखते हैं तो हमें सौंदर्यका बोध होता है, लेकिन हमने क्या कभी ऐसा सौंदर्य जाना है जो किसी वस्तुपर निर्भर न हो सीधा, शुद्ध सौंदर्य हो नहीं, हमने ऐसा कोई सौंदर्य नहीं जाना। हमारी सब अनुभूतियांपर निर्भर हैं और इन्हीं अनुभूतियोंका हम जोड़ हैं।