सम्पादकीय

ध्यानकी गहनता 


श्रीराम शर्मा

असंभवको संभव बनानेवाला अंतर्यात्राका विज्ञान उनके लिए ही है जो अंतर्चेतनाके वैज्ञानिक होनेके लिए तत्पर हैं। योग साधक भी रहस्यवेत्ता वैज्ञानिक होता है। फर्क सिर्फ  इतना है कि सामान्य पदार्थ वैज्ञानिक बाह्य प्रकृति एवं पदार्थोंको लेकर अनुसंधान करते हैं, जबकि योग साधक आंतरिक प्रकृति एवं चेतनाको लेकर अनुसंधान करते हैं। जिस जीवनको साधारण लोग दु:खोंका पिटारा या फिर सुख भोगका साधन समझते हैं, उसमेंसे वह अलौकिक आध्यात्मिक विभूतियोंके मणि-मुक्तकोंका अनुसंधान कर लेता है। ध्यानकी परम प्रगाढ़ता संस्कारोंके कीचड़को धो डालती है। हालांकि यह सब मुश्किल है, क्योंकि प्रत्येक संस्कारको मिटानेमें भारी श्रम, समय एवं साधनाकी जरूरत पड़ती है। इनतक पहुंचनेसे पहले मनकी उर्मियोंको शांत करना पड़ता है। मनकी लहरें जब थमती हैं, मनकी शक्तियां जब क्षीण होती हैं, तभी साधना गहरी एवं गहन होती है। मनका अपना कोई विशेष अस्तित्व नहीं। यह तो बस भावोंकी लहरोंका प्रवाह है। इन लहरोंकी गति एवं तीव्रता कुछ ऐसी है कि मनका अस्तित्व भासता है। सारी उम्र ये लहरें न तो थमती है और न मिटती है। आमजनके लिए तो मनको नियंत्रित करना कठिन है, परन्तु ध्यान इन कठिनको संभव बनाता है। ध्यान ज्यों-ज्यों गहरा होता है, मनकी लहरें शांत पड़ती जाती हैं और इस शांतिके साथ प्रकट होती है एक अद्भुत स्वच्छता, जिसे महर्षि शुद्ध स्फटिककी भांति कहते हैं। मनमें भेद है। मन कोयला भी है और हीरा भी। विचारोंके धूल भरे तूफानमें इसका शुद्ध स्वरूप प्रकट नहीं होता है। ध्यानकी गहनता इसे संभव बनाती है। जो ध्यान करते हैं, इसे अनुभव करते हैं। यह अनुभूति उन्हें शांति भी देती है और ऊर्जा भी। इसीसे ज्ञानकी नवीन किरणें भी फूटती और फैलती हैं। यह मनकी विशेष अवस्था है, जिसका अहसास केवल उन्हींको हो सकता है, जिन्होंने इसे अनुभव किया हो। क्योंकि यह मनकी वर्तमान अवस्था एवं व्यवस्थतासे एकदम उलट है। जहां वर्तमानमें अज्ञान, अशांति एवं असक्ति छायी रहती है। वही इसमें ज्ञान, शांति एवं ऊर्जाके नये-नये रूप भासते हैं। जीवनका हरपल ज्ञानदायी, शांतिदायी एवं ऊर्जादायी होता है। यह सब होता है बिना किसी बाहरी साधन-सुविधाओंकी बैशाखीका सहारा लिये। अभी तो स्थिति है कि ज्ञान चाहिए तो पढ़ो, सीखो, शांति चाहिए तो शांत वातावरण तलाशो और शक्ति चाहिए तो शरीर एवं मनको स्वस्थ रखनेकी कवायद करो। यही नहीं वह जिसे भी अपने ध्यानका विषय बना लें, उसीके सभी रहस्योंको अनुभव कर सकता है। तदाकार होनेकी यह अवस्था सम्प्रज्ञात समाधि है। इसके अवलंबनसे किसी भी वस्तु, व्यक्ति, विषय, विचारके यथार्थको जाना जा सकता है। ऐसे व्यक्तिके ध्यानकी एकाग्रतामें सब कुछ बड़े स्पष्ट रीति से साफ-साफ प्रतिबिंबित होता है।