पटना

बिन कांवरिया सावन सून


(आज शिक्षा प्रतिनिधि)

पटना। सावन आ तो गया, लेकिन कांवरियों के बिना यह सूना-सूना लग रहा है। न डाक बम निकले और न ही सामान्य बम ही चले। ऐसे में ‘बोल बम’ के स्वर भी गुम हैं।

सावन रविवार को चढ़ा है। अध्यात्म, संस्कृति और साहित्य की परंपरा में सावन का बड़ा ही महत्व है। इसे पावन माह कहा गया है। वर्षा ऋतु के दो माह में पहला सावन ही है। इसलिए, मेघ इसका सौंदर्य है। लेकिन, सदियों से चली आ रही  शिव की आराधना परंपरा की वजह से इस माह को महादेव की भक्ति के लिए श्रेष्ठ माना गया है। इसीलिए, भोलेनाथ की भक्ति में पूरे माह शिवलिंग पर जलाभिषेक करने एवं फूल, बेलपत्र व धतूरे चढ़ाने के विधान की परंपरा भी सदियों से चली आ रही है।

सावन के माह में सोमवार को तो शिवलिंग पर जलाभिषेक करने एवं फूल, बेलपत्र व धतूरे अर्पित करने का विशेष महत्व है। सोमवार को शिव का दिन कहा गया है। उस दिन उपवास रखने की भी परंपरा है। पौराणिक मान्यता के मुताबिक सावन में शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करने का विधान है। इसके तहत हर साल सावन के पहले दिन से लेकर पूरे माह तक लाखों कांवरिये भागलपुर जिले के सुलतानगंज से कांवर में गंगाजल लेकर पैदल ही बैद्यनाथ धाम (देवघर) पहुंचते हैं और बाबा बैद्यनाथ को चढ़ाते हैं।

सुलतानगंज से बैद्यनाथ धाम पैदनल पहुंचने में कांवरियों को कई दिन लगते हैं। इनमें हर आयु-वर्ग के महिला-पुरुष कांवरियों के परिधान में होते हैं। तेज गति में चलने वाले कांवरिये डाक बम कहलाते हैं। सामान्य गति में चलने वाले कांवरिये बम कहलाते हैं। यही वजह है कि हर साल सावन आते ही कांवर और कांवरियों से जुड़े सामानों से बाजार पट जाता था। सावन के पहले दिन से ही कांवरिये गंगाजल लेकर बैद्यनाथ धाम के लिए निकल पड़ते थे। पहले दिन गंगाजल उठाने वाले कांवरिये सावन चढऩे के एक दिन पहले ही बोल बम का जयघोष करते अपने गांव-शहर से विदा होते।

पर, कोरोना ने कांवरियों के पांव रोक दिये हैं। कांवरियों के पांव रुके हैं कोरोना से बचाव को लेकर जारी सरकारी दिशा-निर्देश के अनुपालन में। जब, कांवर उठेंगे ही नहीं, तो कांवर और कांवरियों से जुड़े सामानों  का बाजार किसके लिए सजे। सो, कांवर और कांवरियों से जुड़े सामानों के बाजार भी नहीं सजे हैं। कांवरियों के बिना रेलवे स्टेशनों एवं बस पड़ावों पर उदासी है। कांवरियों को लेकर निकलने वाली रिजर्व गाडिय़ों के पहिये थमने से राज्य के विभिन्न हिस्सों से सुलतानगंज तक जाने वाली सडक़ें भी उदास हैं।