सम्पादकीय

सोशल मीडियापर नियन्त्रण जरूरी


डा. भरत झुनझुनवाला      

गत सप्ताह मंत्रिमंडलमें हुए फेरबदलमें सूचना प्रौद्योगिकीमंत्री रविशंकर प्रसादने इस्तीफा दे दिया है। इस इस्तीफेके पीछे दो संभावनाएं हैं। एक संभावना है कि श्री रविशंकर प्रसादने ट्विटर एवं अन्य दूसरी सोशल मीडिया कंपनियोंपर प्रधान मंत्रीकी इच्छासे इतर अधिक सख्ती की जिसके फलस्वरूप इन सोशल मीडिया कंपनी द्वारा देश एवं प्रधान मंत्री स्वयंकी वैश्विक रैंकिंगपर प्रभाव पड़ सकता था, इसलिए प्रधान मंत्रीने इनका इस्तीफा मांग लिया। दूसरी संभावना है कि रविशंकर प्रसादने इन कंपनियोंपर पर्याप्त सख्ती नहीं की जिससे देशके भविष्यपर संकट आ सकता था और हल्का-फुल्का दिखावटी काम करके इनके गलत कार्योंपर रोक नहीं लगायी इसलिए प्रधान मंत्रीने इनका इस्तीफा मांग लिया। इन दोनों संभावनाओंमें सत्य क्या है यह तो प्रधान मंत्री स्वयं ही जानते हैं। फिलहाल विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारके सामने दो परस्पर विरोधी उद्देश्य हैं। एक उद्देश्य है कि देश एवं प्रधान मंत्रीकी वैश्विक पैठ बनाये रखनेमें सोशल मीडियाका सहयोग लेते रहना। दूसरा उद्देश्य है देशकी जनताके प्रति जवाबदेही और देश हितको हासिल करनेके लिए सोशल मीडियापर नियंत्रण करना।

आजसे ३०० वर्ष पूर्व भारतमें ईस्ट इंडिया कंपनी मालका व्यापार करनेके लिए आयी थी। भारतके राजाओंने उन्हें व्यापार करनेकी छूट दी। इनके द्वारा कोई फर्जी या झूठा माल बेचा गया हो, ऐसा संज्ञानमें नहीं आता है। लेकिन सच्चा माल बेचनेके बावजूद इनके प्रवेशके दो सौ वर्षोंके अंदर ही भारतका विश्व आयमें हिस्सा २३ प्रतिशतसे घटकर मात्र दो प्रतिशत रह गया। आप यह सोचिए कि यदि सच्चे मालके व्यापारीके प्रवेशसे ही देशकी ऐसी दुर्गति हो सकती है तो सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा फर्जी सूचना परोसनेसे देशकी कितनी हानि हो सकती है! इन सोशल मीडिया कंपनियोंके द्वारा क्या सूचना परोसी जाती है इसपर वर्तमानमें देशकी जनता अथवा सरकारका कोई भी नियंत्रण नहीं होता है। यह स्वतंत्र हैं। जैसे पिछले अमेरिकी चुनावके पहले ट्विटरने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्पके खातेको ब्लॉक कर दिया था। उनका कहना था राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा गलत सूचनाएं डाली जा रही हैं। इसी क्रममें बीते समयमें भाजपाके कुछ नेताओंकी पोस्टको भी ट्विटरने ब्लॉक कर दिया गया था। प्रश्न यह है कि इन सूचनाओंके सही और गलत होनेका निर्णय कौन लेगा और किस उद्देश्यसे लेगा। यह निर्णय यदि जनताके हित हासिल करनेके उद्देश्यसे लिये जायं तो स्वीकार होते हैं जबकि यही निर्णय यदि सोशल मीडिया कंपनीके वाणिज्यिक स्वार्थोंको बढ़ानेके लिए लिये जायं देश और जनताकी अपार हानि हो सकती है। जैसे ईस्ट इंडिया कंपनीके द्वारा व्यापार करनेसे हुआ था।

इस संबंधमें रविशंकर प्रसादके नेतृत्वमें सरकारने नये नियम लागू किये थे जिसके अंतर्गत सोशल मीडिया कंपनियोंको एक शिकायत अधिकारी, एक प्रशासनिक अधिकारी और एक सरकारसे समन्वय करनेके अधिकारीकी नियुक्ति करनी थी। मेरी समझसे यह नियम पूर्णतया सही दिशामें है लेकिन अपर्याप्त हैं। इन नियमोंके लागू होनेके बावजूद सोशल मीडिया कंपनियां अपना मनचाहा व्यवहार करती रह सकती हैं। जैसे शिकायत अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी और समन्वय अधिकारीकी नियुक्तिके बाद भी ट्विटर भाजपाके नेताओंकी पोस्टको ब्लॉक कर सकता था। समन्वय अधिकारीको ट्विटरको किसी पोस्ट विशेषके सम्बन्धमें आदेश देनेका अधिकार इन नियमोंमें नहीं दिया गया था। केवल विशेष परिस्थितियोंमें सरकार उन्हें सुधार करनेके लिए कह सकती है।

लेकिन सरकार द्वारा सोशल मीडिया कंपनियोंके नियंत्रणमें दूसरा संकट भी पैदा होता है। जैसे चीनने सोशल मीडिया कंपनियोंको आदेश दे रखा है कि कोरोना वायरसके वुहानकी प्रयोगशालामें उत्पन्न होने संबंधित कोई भी सूचना वह अपने प्लेटफार्मपर नहीं डालेंगे अथवा जैसे बैलेरूसके तानाशाह लुकाशेन्कोको एवं म्यांमारके तानाशाह मिंग हांग लेंग द्वारा सोशल मीडिया कंपनियोंको कहा जा सकता है कि उनके आततायी व्यवहारका विरोध करनेवाली किसी भी पोस्टको सोशल मीडिया कंपनी पोस्ट नहीं करेगी। ऐसेमें सरकारके सोशल मीडियापर नियंत्रणसे जनताकी हानि हो सकती है। अत: सरकार द्वारा सोशल मीडिया कंपनियोंपर नियंत्रणके दो पहलू हैं। एक है कि सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा जनहितकी अनदेखी करते हुए गलत सूचना परोसी गयी हो तो सरकारकी दखल जरूरी होती है। दूसरी तरफ यदि सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा गलत सरकारके विरोधमें जनताको सही सूचना उपलब्ध करानेकी स्वतंत्रताको संरक्षित करना भी उतना ही जरूरी है। हमें इन दोनों परस्पर विरोधी उद्देश्योंके बीचमें रास्ता ढूंढऩा है। इस समस्याके समाधानका सर्वश्रेष्ठ उपाय यह है कि सरकार द्वारा स्वतंत्र नागरिकोंकी समिति बनायी जाये जिसे सोशल मीडियाके विरुद्ध शिकायत सुनने एवं निर्णय लेनेका अधिकार हो अथवा जैसे किसी कंपनी द्वारा शेयर धारकके प्रति अनुचित व्यवहार करनेकी शिकायत सेबीसे की जा सकती है, उसी प्रकार सोशल मीडिया नियंत्रण बोर्ड बनाना चाहिए जो सोशल मीडियाको आदेश दे लेकिन सरकारके सीधे नियंत्रणसे बाहर हो।

दूसरा उपाय है कि बड़़ी सोशल मीडिया कंपनियोंका सरकार विभाजन कर दे। अपने देशमें कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया स्थापित है जो कि किसी वाणिज्यिक कंपनी द्वारा बाजारमें एकाधिकारका उपयोग कर मालको महंगा बेचने इत्यादिपर रोक लगा सकती है। सरकारको चाहिए कि कॉन्पिटिशन कमीशनको आदेश दे कि किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफार्मकी अधिकतम सदस्य संख्याको निर्धारित कर दे। जैसे यदि आज भारतमें ह्वïाट्सएपके पांच करोड़ ग्राहक हैं तो कंपटीशन कमीशन निर्धारित कर सकती है कि किसी एक कंपनी द्वारा ४० प्रतिशत यानी दो करोडसे अधिक ग्राहक हासिल नहीं किये जायंगे। इससे अधिक संख्यामें ग्राहक हासिल करनेपर उस कंपनीको दो या अधिक टुकड़ोंमें विभाजित कर दिया जायगा। इस विभाजनका लाभ होगा कि इन कंपनियोंके बीचमें प्रतिस्पर्धा बनेगी और देशकी स्वदेशी सोशल मीडिया कंपनीको बाजारमें प्रवेश करनेका अवसर मिल जायगा। इनकी आपसी प्रतिस्पर्धासे इनके ऊपर स्वयं दबाव बनेगा कि यह जनताको गलत सूचना न परोसे। यदि किसी एक सोशल मीडिया कंपनीने गलत सूचना परोसी तो दूसरी सोशल मीडिया कंपनी उसे एक्सपोस कर सकती है और ऐसेमें सोशल मीडिया स्वयं ही अपने ऊपर नियंत्रण रखेगी। देशके प्रिंट मीडियामें कई खिलाड़ी होनेके कारण ऐसा ही दबाव प्रेसपर बना रहता है। सरकारने जो नियम बनाये हैं वह सही दिशामें हैं लेकिन इससे बहुत आगे जानेकी जरूरत है और बड़ी सोशल मीडिया कंपनियोंको तोड़कर टुकड़ोंमें बांटनेपर सरकारको कानून बनाना चाहिए।