सम्पादकीय

भूमिको उपजाऊ बनानेकी चुनौती


डा. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा        

संयुक्त राष्ट्र संघके मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखेपर आयोजित वर्चुअल संवादमें १४वें सत्रमें मुख्य भाषण देते हुए नरेन्द्र मोदीने कहा कि बंजर होती भूमिके कारण दुनियाके सामने गंभीर संकट है। यह संकट भूमिके बंजर होनेतक ही सीमित नहीं हैं अपितु इससे जैव विविधता, जलवायु, खाद्यान्न संकट और सूखेकी समस्यासे जुड़ी हुई है। कोरोना महामारीने दुनियाको एक सबक भी दे दिया है और वह यह कि सबकुछ थम सकता है परन्तु खेती किसानी रही तो हालातोंको काबूमें किया जा सकता है। दुनियाके देशोंमें लंबे लाकडाउनके बावजूद खेती किसानी ही बड़ा राहत लेकर आयी और दुनियामें कहीं भी खाद्यान्नोंकी कमी नहीं देखनेको मिली। ऐसेमें बंजर होती भूमिको बचाना और भी अधिक जरूरी हो गया है। दरअसल तेजीसे बढ़ते मरुस्थलीकरणके कारण भारत सहित दुनियाके देशोंके सामने बड़ी चुनौती लेकर उभरा है। पिछले एक दशकसे दुनियाके देश इसके प्रति गंभीर हुए हैं और वैश्विक नीति बनाकर उसके क्रियान्वयनपर जोर दिया जा रहा है। भारतने इस दिशामें तेजीसे कदम बढ़ाये हैं और गम्भीर प्रयासोंका ही परिणाम है कि एक दशकमें ३० लाख हैक्टेयर वन क्षेत्र विकसित किया है। भारतकी गम्भीरताको इसीसे समझा जा सकता है कि भारतने दो करोड़ दस लाख हैक्टर बंजर भूमिके लक्ष्यको बढ़ाकर दो करोड़ ६० लाख हैक्टर कर लिया है और २०३० तक इसे हासिल करनेकी प्रतिबद्धता दर्शायी है। इससे कार्बन उत्सर्जनमें भी कमी आयगी।

भारतके संदर्भमें यह सब इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि सेंटर फार साइंस एण्ड एनवायरमेंटकी रिपोर्टके अनुसार भारतमें उपजाऊ भूमि निरन्तर कम होती जा रही है वहीं बंजर भूमिका दायरा बढ़ता जा रहा है। इससे पहले २०१७ में वार्षिक रिपोर्टमें ३२ फीसदी भूमिके बंजर होनेकी चेतावनी आ चुकी है। दरअसल समूची दुनियामें खेती योग्य उपजाऊ भूमिका दायरा कम होता जा रहा है। एक ओर दुनियाके देशोंमें सामने भुखमरीसे निजात दिलानेकी बड़ी चुनौती है। हालिया रिपोर्टोंमें दुनियाके देशोंमें भुखमरी और कुपोषणके आंकड़े बढऩेके समाचार हैं वहीं यह अवश्य संतोषकी बात है कि देशमें सरकारी और गैर-सरकारी प्रयासोंसे कुपोषणमें कमी आयी है। परन्तु कोरोना महामारीके कारण अब कुपोषणमें कमीकी समस्या सामने खड़ी हो गयी है। देशमें किसान और खेतीको प्रोत्साहित करनेके उपाय किये जा रहे हैं। रसायनोंके अत्यधिक प्रयोगसे होनेवाले नुकसानसे जनजागृति लायी जा रही है वहीं अभियान चलाकर किसानोंको जैविक खेती अपनानेको प्रेरित किया जा रहा है। अब तो जीरो बजट खेतीकी बात की जाने लगी है। किसानोंको खेतीके साथ ही पशुपालन अपनानेको प्रेरित किया जा रहा है परन्तु जो रिपोर्ट आयी है वह निश्चित रूपसे चिंतनीय है। रिपोर्टके अनुसार देशमें ३२ प्रतिशत भूमि बंजर होनेके कगारपर है। देशके २६ राज्योंमें भूमिके बंजर होनेका खतरा बढ़ता जा रहा है। राज्योंमें २००७ से २०१७ के दौरान भूमिके बंजर होनेके जो संकेत मिले हैं और जो इजाफा हो रहा है वह गंभीर संकटकी ओर इशारा करता है। भूमिकी बंजरताके प्रमुख कारण प्रर्यावरणीय है। पर्यावरणीय प्रदूषणके परिणाम सामने आने लगे हैं। स्थितिकी गंभीरताको इसीसे समझा जा सकता है कि दुनियाके देशोंके सम्मेलनमें स्वयं प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदीने २.६ करोड़ हैक्टयर भूमिका उपजाऊ बनानेका लक्ष्य रखा है। दरअसल यह लक्ष्य बढ़ाया गया है। इससे पहले यह लक्ष्य कम था। देखा जाय तो भूमिके अनउपजाऊ होनेके कई कारणोंमेंसे एक कारण अधिक पैदावारके चक्करमें रसायनोंके अत्यधिक प्रयोगके लिए किसानोंको प्रेरित करनेको जाता है।

आज पंजाब जो सबसे अधिक उत्पादन देनेवाला प्रदेश रहा हैं, वहांके खाद्यान्नको उपयोगमें लेनेसे डर लगने लगा है। वहीं बिना किसी भावी योजनाके अंधाधुध शहरीकरणसे खेतीकी जमीन कम होती जा रही है। परिवारोंके बंटवारेंके चलते जोत कम होती जा रही हैं। बारहमासी नदियां एवं पानीके स्रोत अब बीते जमानेकी बात हो गये हैं। देशके ८६ जलनिकायोंके गंभीर रूपसे प्रदूषित बताया जा रहा है। कर्नाटक, तेलगांना और केरलकी स्थिति भी गंभीर मानी जा रही है। अतिवृष्टि एवं अनावृष्टिके चलते भूमि बंजर होने लगी है। दुनियाके देशोंमें मरुस्थलका विस्तार होता जा रहा है। शहरीकरण, रसायनोंके उपयोगसे भूमिके लाभकारी तत्वों और लाभकारी वनस्पतियोंके विलुप्त होने, परम्परागत लाभकारी पेड़ोंको काटनेके कारण समस्या उभरने लगी है। एक ओर अत्यधिक बारिशसे भूमिमें कटाव, दूसरी तरफ धूलभरी आंधी तूफानोंसे मरुस्थलका विस्तार, भूगर्भीय जलके अत्यधिक दोहन, प्लास्टिक, पेट्रोकेमिकलके अत्यधिक उपयोग एवं इसी तरहके अन्य कारणोंसे भूमि बंजर होती जा रही है। जैव विविधता नष्ट हो रही है। यहांतक कि गौरेयाका पलायन हो रहा है तो अनेक प्रजातियोंके सामने अस्तित्वका संकट आ गया है। यह तो तब है जब आंकड़े यह कहते हैं कि देशमें जंगलोंका विस्तार हुआ है।

इसके साथ ही पानीका खारापन बढऩे, वातावरणमें हवा-पानी ही नहीं सभी तरहसे फैल रहा प्रदूषण आज भूमिके उपजाऊपनको प्रभावित कर रहा है। यही नहीं, एक समय केवल मलयेरिया ही सबसे अधिक प्रभावित करता था परन्तु आज मलयेरियाके ही कई रूप डेंगू, चिकनगुनिया एवं न जाने कितने ही रूपमें सामने आ गये हैं और दुनियाके देशोंको हिलाकर रख दिया है और अब कोरोना महामारीने तो दुनियाको थामके रख दिया है। शुद्ध सांसतक मुश्किल हो गयी है। दरअसल सरकारको एक साथ कई मोर्चोपर जुटनेकी जरूरत हो गयी है। अधिक उत्पादनके लिए रसायनोंका जरूरतसे ज्यादा उपयोग, शहरीकरणके नामपर गांवोंके अस्तित्वको मिटाने, पेड़-पौधों एवं वनस्पतियोंको बिना सोचे-समझे नष्ट करने, अत्यधिक भूमिगत जल दोहन करनेका परिणाम सामने हैं। शहरीकरणके चक्करमें पानीके बहाव एवं जमाव क्षेत्रकी अनदेखी करनेसे भूगर्भीय पानीका संकट सामने है। वाटर हार्बेस्टिंग सिस्टम किस तरहके बने हैं वह जगजाहिर है। यदि सिस्टम सही होते तो मामूली बरसातमें ही पानी भरने और शहरोंके थम जानेकी स्थितियां नहीं आती और भूजलका स्तर निश्चित रूपसे एक स्तरपर तो रह ही जाता। एनिकटपर एनिकट और इतने अवरोध बना दिये कि बांधोंतक पानी पहुंचना ही असंभव हो गया। ऐसेमें अब बंजर होती भूमिको उपजाऊ बनाने और भावी प्रभावोंको देखते हुए कार्ययोजना बनानेकी आवश्यकता है नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब गंभीर खाद्यान्न संकटके साथ ही अन्य संकटोंसे रुबरु होना पड़ेगा। अब कोरोनाने जिस तरहके अनुभव दुनियाके देशोंको दिये हैं उसे ध्यान रखते हुए कार्य योजना बनानी होगी। क्योंकि खेती किसानी ही सबसे बड़े संकट मोचकके रूपमें हैं और उसमें पोष्टिक तत्वोंको बनाये रखना हमारी जिम्मेदारी हो जाती है। इसलिए बंजर भूमिको बचानेके सभी एवं ठोस प्रयासोंपर काम करना होगा।