सम्पादकीय

राजनीतिमें जातीय समीकरण


नवीनचन्द्र  

उत्तर प्रदेशमें अगले सालकी शुरुआतमें यानी कुछ ही महीनों बाद विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं। दलितों एवं अति पिछड़ोंकी राजनीतिक गोलबंदीसे राज्यकी बड़ी ताकत बनीं और चार बार सत्तामें आ चुकी मायावती फिर ब्राह्मïणोंको खुश करनेकी कोशिशमें जुट गयी हैं। उधर सवर्णोंकी पार्टीके रूपमें जानी जानेवाली भाजपा दलितों एवं पिछड़ोंके लिए लाल कालीन बिछाये बैठी है। तीस सालसे सत्तासे बाहर और हाशियेपर पहुंच चुकी कांग्रेस प्रियंका गांधीके सहारे ब्राह्मïणों, दलितों एवं मुसलमानोंके परंपरागत वोट बैंकको पुनर्जीवित करनेकी कोशिशमें है तो समाजवादी पार्टीके अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने मजबूत यादव-मुस्लिम आधारमें भाजपासे खिन्न चल रही जातियोंको खींचनेकी रणनीति बना रहे हैं। कांशीरामने जिस दलित-अति पिछड़ा-मुस्लिम जातीय समीकरणसे बसपाको मजबूतीसे खड़ा किया था, उस आधारको बहुमतके लिए अपर्याप्त मान कर मायावतीने २००७ में उसमें ब्राह्मïणोंको चतुराईसे जोड़ा और पहली बार पूर्ण बहुमत पाया था। मनुवादियोंको गले लगानेकी इस चुनावी रणनीतिको उनकी सोशल इंजीनियरिंग कहा गया था। साल २०१२ के चुनावोंमें यही सोशल इंजीनियरिंग अपने तीखे अंतर्विरोधोंके कारण उन्हें महंगी पड़ी।

सन् २०१४ आते-आते भाजपाने अपने नये अवतारमें इसी सोशल इंजीनियरिंगको सबका साथ, सबका विकास नारेके तहत बड़ी चतुराईसे अपनाया। उसने अपनेको गैर-जाटव दलित और गैर-यादव पिछड़ी जातियोंकी उद्धारकके रूपमें पेश किया। इससे दलित एवं पिछड़ी जातियों-उपजातियोंके अंतर्विरोध गहरे हुए और वह बड़े वोट बैंकसे छिटक गये। भाजपाने इन अंतर्विरोधोंको खूब हवा दी। परिणामस्वरूप अति पिछड़ी जातियोंका नेतृत्व उभरा, जिसे भाजपाने अपने पालेमें खींच लिया। इससे बसपा और सपाका जनाधार कमजोर हो गया। साल २०१४, २०१७ और २०१९ के चुनावोंमें उत्तर प्रदेशमें भाजपाकी भारी जीत मुख्यत: इसी दलित-पिछड़ा जोड़-तोड़के कारण संभव हुई। इस सफल रणनीतिको भाजपा २०२२ के लिए न केवल कायम रखनेमें लगी है, बल्कि उसे और मजबूत करनेका जतन कर रही है। केंद्रीय मंत्रिपरिषदका हालिया विस्तार साफ बताता है कि भाजपा उत्तर प्रदेशके लिए इस रणनीतिको कितना महत्व दे रही है। जो सात नये मंत्री उत्तर प्रदेशसे मोदी सरकारमें शामिल किये गये, उनमें छह पिछड़ा या दलित हैं, सवर्ण (ब्राह्मïण) सिर्फ एक है।

उत्तर प्रदेशसे अब १६ मंत्री हो गये हैं। यह न केवल अबतककी सबसे बड़ी संख्या है, बल्कि इसी जातीय समीकरणको पुष्ट करती है। उदाहरणके लिए, अपना दलकी अनुप्रिया पटेलको न केवल वापस शामिल किया गया, बल्कि बेहतर मंत्रालय भी दिया गया है। अपना दल यादवोंके बाद सबसे ताकतवर कुर्मियोंका प्रतिनिधित्व करता है। क्या भाजपाके इस दलित-पिछड़ा प्रेमालापसे सवर्ण जातियां, विशेष रूपसे ब्राह्मïण, खिन्न हैं। भाजपाको तो ऐसा नहीं लगता (मुख्य मंत्री, एक उपमुख्य मंत्री और कई मंत्री उच्च जातियोंके हैं), लेकिन विपक्ष, खासकर मायावती इसे खूब प्रचारित कर रही हैं, ताकि ब्राह्मïण एक बार फिर उन्हें समर्थन दे दें। बीते रविवारको मायावतीने ऐलान किया कि मुझे पूरा भरोसा है कि अब ब्राह्मïण समाज बहकावेमें आकर भाजपाको वोट नहीं देगा। उनके अनुसार ब्राह्मïण अब पछता रहे हैं। ब्राह्मïणोंको भरोसा दिलानेके लिए बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रके नेतृत्वमें २३ जुलाईको अयोध्यासे एक अभियान भी शुरू किया जा रहा है। मिश्र मायावतीके विश्वस्त और बसपाका बड़ा ब्राह्मïण चेहरा हैं। साल २००७ में उन्होंने ही बसपाके ब्राह्मïण भाईचारा अभियानका नेतृत्व किया था। मायावती ब्राह्मïणोंका समर्थन हासिल करनेके लिए तो रणनीति बना रही हैं, लेकिन जो दलित जातियां उनके पालेसे छिटक चुकी हैं, उन्हें वापस लानेके लिए उनकी क्या योजना है, इसका संकेत नहीं मिलता। उनके जाटव जनाधारमें भी भीम आर्मीने कुछ सेंध लगायी है। दलित आधारको एकजुट रखे बिना उच्च जातियोंका समर्थन उन्हें सत्तातक शायद ही पहुंचा सके। अखिलेश यादव भी सपासे दूर हो गये पिछड़े नेताओंको साधनेमें सक्रिय हो गये हैं। उन्होंने किसी बड़े दलसे चुनावी गठबंधनकी संभावनासे इनकार किया है, लेकिन छोटे दलोंकी तरफ दोस्तीका हाथ बढ़ा रहे हैं। यह छोटे दल वास्तवमें विभिन्न पिछड़ी और दलित जातियोंके नेताओंके हैं, जो सत्ताकी वर्तमान जोड़-तोड़में बड़े दलोंसे समर्थनकी अधिकाधिक कीमत वसूलनेकी फिराकमें रहते हैं। कुर्मियोंके अपना दलका एक हिस्सा भाजपाके साथ है तो दूसरेको सपा और कांग्रेस रिझानेमें लगे हैं। निषाद पार्टी, जिसका मल्लाह, केवट, निषाद और बिंद जातियोंमें प्रभाव है, फिलहाल भाजपाके साथ होनेके बावजूद अपनी नाराजगी व्यक्त करता रहता है, जिसपर अखिलेश यादवकी निगाह है। मौर्यों, कुशवाहों और सैनियोंके महान दलको सपाने फिलहाल अपने साथ कर लिया है। पश्चिम उत्तर प्रदेशके जाटोंमें लोकप्रिय राष्ट्रीय लोक दल सपाके साथ मिलकर चुनाव लडऩा तय कर चुका है। आपके कुछ नेताओंसे भी अखिलेशकी बातचीत चर्चामें रही।

बिहार चुनावमें पांच सीटें जीतकर महागठबंधनका खेल बिगाडऩेवाले ऑल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीनके नेता असदुद्दीन ओवैसी भी उत्तर प्रदेशमें दांव आजमायेंगे। उन्होंने भाजपासे नाराज होकर एनडीएसे अलग हुए सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टीके साथ भागीदारी संकल्प मोर्चा बनाया है, जिसमें बाबू सिंह कुशवाहा (कभी मायावती के विश्वस्त) की जन अधिकार पार्टी, प्रजापतियोंकी राष्ट्रीय उपेक्षित समाज पार्टी, राष्ट्रीय उदय पार्टी और जनता क्रांति पार्टी भी शामिल होंगी, ऐसे बयान आये हैं। आप और भीम आर्मीको भी दावत दी गयी है। ये छोटे-छोटे दल स्वयं चुनाव नहीं जीत सकते, लेकिन उनका समर्थन बड़े दलोंके लिए अहम हो जाता है। यह दल कब किसके साथ हो जायं, कहा नहीं जा सकता। सपाके अलावा कांग्रेस भी इन्हें अपने साथ लेनेके लिए बातचीत कर रही है। विभिन्न दलित एवं पिछड़ी जातियोंके भीतर इस राजनीतिक जोड़-तोडऩे छोटी या कम संख्यावाली जातियां भी सत्तामें भागीदारीके लिए संघटित हुई हैं। वह किसी भी तरफ जा सकते हैं, जहां अधिकसे अधिक भागीदारीका आश्वासन मिले। इससे उत्तर प्रदेशका जातीय चुनावी रण रोचक हो गया है।