सम्पादकीय

ध्यानकी प्रगाढ़ता 


सदानन्द शास्त्री

अंतर्यात्राके पथपर चलनेवाले योग साधकमें सतत सूक्ष्म परिवर्तन घटित होते हैं। उसका अस्तित्व सूक्ष्म ऊर्जाओंके आरोह-अवरोह एवं अंतर-प्रत्यंतरकी प्रयोगशाला बन जाता है। योग साधकके लिए यह बड़ी विरल एवं रहस्यमय स्थिति है। ध्यानकी प्रगाढ़तामें होनेवाले इन सूक्ष्म ऊर्जाओंके परिवर्तनसे जीवनकी आंतरिक एवं बाह्य स्थिति परिवर्तित होती है। इन ऊर्जाओंमें परिवर्तन साधकके अंदर एवं बाहर भारी उलट-पुलट करते हैं। योगकी इस साधनाभूमिमें साधकको बहुत ही सक्रिय, सजग एवं समर्थ होना पड़ता है, क्योंकि ध्यान योगके प्रयोगमें सूक्ष्म ऊर्जाएं कुछ इस ढंगसे परिवर्तित होती हैं कि इनसे साधककी समूची प्रकृति प्रभावित हुए बिना नहीं रहती। जीवनको असल अर्थ देनेवाली अंतर्यात्रा विज्ञानके प्रयोग सूक्ष्म हैं। इनकी विधि, क्रिया एवं परिणाम योग साधककी अंतर्चेतनामें घटित होते हैं। इस संपूर्ण उपक्रममें स्थूल क्रियाओंकी उपयोगिता होती भी है तो केवल इसलिए, ताकि साधककी भाव चेतना इन सूक्ष्म प्रयोगोंके लिए तैयार हो सके। एक विशेष तरहकी आन्तरिक संरचनामें ही अंतर्यात्राके प्रयोग संभव बन पड़ते हैं। बौद्धिक योग्यता, व्यवहार कुशलता अथवा सांसारिक सफलताएं इसका मानदंड नहीं हैं। इन मानकोंके आधारपर किसीको साधक अथवा योगी नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए महत्वपूर्ण है। चित्तकी अवस्था विशेष, जो अब निरुद्ध होनेके लिए उन्मुख है। चित्तमें साधनाके सुसंस्कारोंकी संपदासे मनुष्यमें न केवल मनुष्यत्व जन्म लेता है, बल्कि उसमें मुमुक्षा भी जगती है। पवित्रताके प्रति उत्कट लगन ही व्यक्तिको अंतर्यात्राके लिए प्रेरित करती है और इस अंतर्यात्राके लिए गतिशील व्यक्ति धीरे-धीरे स्वयं ही पात्रताके उच्च स्तरीय सोपानोंपर चढ़ता जाता है। उसे अपने प्रयोगोंमें सफलता मिलती है। अंतसमें निर्मलता, पवित्रताका एक विशेष स्तर हो, तभी प्रत्याहारकी भावदशा पनपती है। इसके प्रगाढ़ होनेपर ही धारणा परिपक्व होती है और तब प्रारंभ होता है ध्यानका प्रयोगात्मक सिलसिला। मानसिक एकाग्रता, चित्तके संस्कारोंका परिष्कार, अंतसकी गं्रथियोंसे मुक्तिके एकके बाद एक स्तरोंको भेदते हुए अंतिम ग्रंथि भेदनकी प्रक्रिया पूरी होती है। इसी बीच योग साधककी अंतर्चेतनामें ध्यानके कई चरणों एवं स्तरोंका विकास होता है। सबीज समाधिकी कई अवस्था, फलित होती हैं।